निर्माण की जिम्मेदारी अन्ततः उत्तरी पडÞोसी को ही

यितेन्द्र:वित्तीय और प्राविधिक रूप से सम्भव नहीं होने के कारण अनेको संघटनों के कडÞे ऐतराज के वाद भी सरकार ने आखिरकार पोखरा क्षेत्रीय अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल के निर्माण की जिम्मेदारी चीनी कम्पनी सीएएमसी को देने का निर्ण्र्ााकर ही लिया । शुरु में भौगोलिक कारणों से पोखरा में क्षेत्रीय विमानस्थल बनाना सही नहीं होगा, कहते हुए इसका बडेÞ पैमाने पर विरोध हुआ था । बाद में, टेण्डर के पैसे को लेकर विवाद हुआ फिर नाफा एवं आय के भार के विवाद के कारण भी इसका काम रुकता रहा ।
जहाँ एक ओर प्राधिकरण की लागत की कीमत से दोगुणा पैसे का प्रस्ताव ठेकेदार कम्पनी के द्वारा किए जाने के कारण इस में विवाद है, वहीं दूसरी ओर प्राधिकरण के आला अधिकारी तथा कर्मचारी यह कहते हुए इसका विरोध कर रहे हैं कि जब तक सरकार पर्याप्त सहयोग राशि मुहैया नहीं कराती है, तब तक महज ऋण राशि से इतना बडÞा विमानस्थल बनाना यथार्थ में इस संस्था को अधोगति की ओर ले जाना है । इस विमानस्थल की कुल लागत राशि २१ अरब रूपया है । सरकार भले ही चीन से न्यून व्याज दर में ऋण लेने की बात कर रही हो परन्तु प्राधिकरण को तो वहाँ आठ प्रतिशत के हिसाब से ऋण मिल रहा है । इसका सिर्फब्याज ही दो अरब रूपये हो जाएंगे जबकि प्राधिकरण का कुल राजश्व ही महज तीन अरब रूपया है, फिलहाल पोखरा एयरपोर्ट से सरकार को महज २५ करोडÞ का ही आय हो रही है । इन्ही बातों को देखते हुए प्राधिकरण, चीन की कम्पनी के साथ समझौता नहीं करना चाहता था, शायद इसीलिए प्राधिकरण के प्रमुख ने कहा भी था कि जब तक इसके सभी बोर्ड आफ मेम्बर हमें लिख कर नहीं देते, वे समझौता पर दस्तखत नहीं करने वाले हंै । एमाले कोटे से पर्यटनमन्त्री बने भीम आचार्य शुरु से ही चीन की कम्पनी को ठेका दिलवाने के पक्ष में रहे हंै ।
प्राधिकरण की पहली ही मीटिंग में मन्त्री महोदय ने चीन की कम्पनी को टेण्डर दिलवाने का निर्ण्र्ााकरवाया । कहा जाता है कि समझौते पर दस्तखत करने के लिए पर्यटनमन्त्री ने दबाव भी दिया था, प्राधिकरण के प्रमुख को । हालांकि प्रमुख का कहना है कि चूंकि टेण्डर के मोडल में परिवर्तन हुआ है, लिहाजा अब किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी कोईर् इपीसी मोडल से निर्माण करने से ठेकदार को निर्धारित समय एवं कीमत पर ही काम करना होगा ।
समझौते के वाद प्राधिकरण वित्त मन्त्रालय के जरिए चीन के एम्पिम बैंक को कर्जा के लिए पत्र लिखेगा । उसके बाद नक्शा एवं डिजाइन बनाने में कम से कम एक वर्षलगेगा । तीन वर्षके अन्दर में इसका निर्माण हो जाना है ।
सन् २०१२ के फरवरी के दूसरे सप्ताह में प्राधिकरण ने खुला टेण्डर किया था, चाइनिज कम्पनी सीएएमसी ने सरकारी लागत अनुमान से ८५ प्रतिशत अधिक अर्थात् ३० करोड ५० लाख डालर का प्रस्ताव किया था । उसको एक वर्षवाद अपने ही दावे से पीछे हटते हुए पुनः चीनी कम्पनी सरकारी लागत पर ही टेण्डर देने को कहा । प्राधिकरण जब तक कुछ समझे तब तक फिर उसका प्रस्ताव आया कि ३० करोडÞ डालर से कम पैसे में तो काम किया ही नहीं जा सकता है । वाद में स्वयं सरकार ने एक समिति गठित की, जिसने २१ करोडÞ ६१ लाख डलर में विमानस्थल निर्माण हो जाने का प्रतिवेदन सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया । खिलराज रेग्मी के नेतृत्ववाली चुनावी सरकार ने तो इस प्रतिवेदन पर ध्यान नहीं दिया, परन्तु नई सरकार के आते ही इस दिशा में पहल शुरु हो गया । प्राधिकरण ने एक अलग पत्र लिख कर पर्यटन मन्त्रालय से कहा कि वे चीन से ऋण के बदले अनुदान मांगे तो बेहतर होगा । नेपाल की सरकार ने ४० वर्षपहले ही इसके लिए आवश्यक जमीन अध्रि्रहण कर रखा है । नये विमान स्थल में मध्यम वर्ग के बोइंग ७५७, एचखस ३२० आदि जहाजों का अवतरण हो पाएगा । जिस कम्पनी को एयरपोर्ट निर्माण करने का टेण्डर मिला है, वही कम्पनी चाइना सीएमसी इन्जिनियरिंग ने अब तक लाओस में दो पुराने एयरपोर्ट में काम किया है । ये दोनों इन्टरनेशनल एयपोर्ट हैं । कम्पनी के वेभसाइट ने खुद कहा है कि उसके पास नये विमानस्थल बनाने का अनुभव नहीं है । चाईना सीएएमसी इन्जिनियरिङ कम्पनी चीन का एक सरकारी संस्थान है, सन् २००१ में इसकी स्थापना हर्ुइ है । यह कम्पनी इपीसी मोडल की परियोजना आन्तरिक एवं वाहृय निवेश तथा व्यापार के क्षेत्र में काम करती आई है । कम्पनी की उपस्थिति एसिया, अप्रिmका अमेरिका एवं पर्ूव युरोप में भी है । नेपाल में विमानस्थल निर्माण के टेण्डर होने पर समझौता होने से ठीक एक सप्ताह पहले नेकपा एमाले के अध्यक्ष झलनाथ खनाल चीन भ्रमण पर गए थे । खनाल के नेपाल आते ही समझौता पर हस्ताक्षर हो गया । मन्त्री आचार्य, खनाल के करीब माने जाते हैं । चीन के एम्पिम बैंक ऋण देने के बाद कई शर्त रखती है कि टेण्डर प्रक्रिया में सिर्फचीन के ठेकेदार सहभागी हो सकते हैं । प्रतिस्पर्धा में जो सबसे कम रकम में काम करने को तैयार होंगे, टेण्डर उन्ही को दिया जाएगा । परन्तु यहाँ तो सबसे कम में टेण्डर लेने वाले ही बाद में जब दो गुणा अधिक पैसे की मांग करने लगे, तब जा कर विवाद हुआ । प्राधिकरण का यह तर्क कि २० अरब के ऋण के तले दबा प्राधिकरण के माथे अतिरिक्त २१ अरब के ऋण डालना सोचनीय है, परन्तु इसकी चिन्ता किसी को नहीं है । चीन र्समर्थक नेपाल के राजनीतिक दल एवं उनके कार्यकर्ता आँख मूंद कर चीन के शर्त को स्वीकार करने एवं एयरपोर्ट निर्माण का इजाजत देने की मांग कर रहे हैं । प्राधिकरण की यह मांग ऋण को अनुदान में बदलने का काम हो, इस पर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है । हो सकता है कि कहीं अख्तियार की तीसरी आँख यहँा पहुंचे और इस की निहित बातें स्पष्ट हो सके । देश को प्रत्यक्ष रूप से घाटा होने वाले समझौता से किसी व्यक्ति या दल का स्वार्थ सिद्ध हो सकता है पर देश का नहीं ।

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