निषेध के लिए निषेध जरूरी है : गोपाल ठाकुर

गोपाल ठाकुर,कचोर्वा-१, बारा,फरवरी २, २०१६ |
निश्चित है कि बीज के भीतर अंकुरण की शक्ति निहित होती है । किंतु अंकुरण के समय बीज के छलके या दल तब तक नवपल्लव को बाहर नहीं आने देते हैं जब तक इनकी शक्ति क्षीण होकर ये खूद अपने अस्तित्व से निषेधित नहीं हो जाते । मानव समाज का अर्थ राजनीतिक अग्रगमन का इतिहास भी निषेधक को निषेध किये बिना गति नहीं लेता । आदिम साम्यवाद को दास-मालिक युग ने, दास-मालिक युग को सामन्तवाद ने और इसे भी पुँजीवाद ने निषेध करते हुए ही अपना अस्तित्व कायम किया है । इसलिए कि हर पहले चरण ने अगले चरण को निषेध ही किया था । कल के दिन में पुँजीवाद को समाजवाद और समाजवाद को साम्यवाद भी निषेध कर ही आगे बढ़ेंगे ।
निश्चित है सामन्तवाद का चरमोत्कर्ष राजशाही में देखा गया । इस दौर राजा, महाराजा और सम्राट अस्तित्व में आए और बहुत शक्तिशाली सामन्ती साम्राज्य खड़े किए गए । राजशाही के खिलाफ भी लोकतंत्र का परचम फहराया गया । राजशाही की बुनियाद सामन्तवाद तो है ही लोकतंत्र की बुनियाद भी शुरूवाती दौर में संसदीय व्यवस्था के नाम पर पुँजीवाद पर ही रखने का प्रयास किया गया । किंतु इस लोकतंत्र को ऐसी कुरूपता भी नशीब हुई कि नेपोलियन, मुसोलिनी और हिटलर को भी इसकी दुहाई देते थकता नहीं देखा गया । खासकर पेरिस कम्युन और अक्टोबर क्रांति के बाद श्रमजीवियों को दबाने के लिए लोकतंत्र भी एक तरह की तानाशाही में बदल गई और इसे पुँजीपतियों ने राजशाही के हाथों कठपुतली बना दी । एक नया नाम गढ़ लिय गयाः संवैधानिक राजशाही । यानी राजसंस्था संविधान से बाहर नहीं जाएगी जिसके तहत राजनीतिक दल के जननिर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए राज्यसत्ता संचालन का अभ्यास करेंगे । किंतु यह एक थोथी दलील ही सावित हुई खासकर वहाँ के लिए जहाँ की राजनीतिक पार्टियाँ राजशाही को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक समझती थीं । नेपाल तो इसका उदाहरण ही रहा ।s-1
नेपाल में प्रजापरिषद और नेपाली कांग्रेस ही नहीं नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की नेतृत्व पंक्ति ने भी शाही दरबार के इशारों पर बहुत हद तक नाचने का प्रयास किया । प्रजापरिषद राणाशाही की जगह राजशाही लाना चाहती थी तो नेपाली कांग्रेस ने भी १९५०-५१ का सशस्त्र विद्रोह श्री ५ महाराजाधिराज सरकार की जय जयकार के उद्घोष के साथ ही शुरू किया था । एक दशक से अधिक समय जेल में सड़ाए जाने के बावजूद नेपाली कांग्रेस के ‘महामानव’ विश्वेश्वर ने १९७९-८० में जनमत संग्रह के दौरान अपनी गर्दन को राजा की गर्दन के साथ जुड़े रहने का उद्घोष किया था । जहाँतक नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों का सवाल है, १९६० में अपने ही दिये संविधान को निगलते हुए स्वेच्छाचारी राजशाही लादनेवाले राजा महेन्द्र को तत्कालीन महासचिव डॉ. केशरजंग रायमाझी ने नरोदम सिंहानुक का अवतार भी बताया था । २००१ में तो एमाले के महासचिव माधव नेपाल ने चाँदी के सिक्के राजा ज्ञानेन्द्र के श्रीचरणों में भेंट कर सलामी तो दी दी थी ही, देश के प्रधानमंत्री नियुक्त होने का अर्जीपत्र भी डाला था । किंतु इन सभी कथित सहनशीलता के बदले दरबार ने नेपाल की जनता को तो कभी कुछ दिया ही नही, इन नेताओं को भी जलील करने में कोई कसर नहीं छोड़ा । यानी नेपाल की राजशाही हमेशा राजनीतिक अग्रगमन को निषेध करती रही । परिणामतः दरबार की कठपुतली रहे पंचों की कुछ कथित समूहों को छोड़ जनयुद्ध और जन आंदोलन के बल पर २००८ में संविधान सभा से नेपाल की सभी राजनीतिक दलों ने राजशाही को सदा के लिए निषेधित कर दिया । आज हम संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल में रहने का दावा कर रहे हैं ।
किंतु यह जरूरी नहीं है कि एक बार अग्रगामी रही राजनीतिक शक्ति सदा अग्रगामी ही रहे । निश्चित ही जब अपने ऊपर का वर्गीय या राष्ट्रीय उत्पीड़न समाप्त हो जाता है या कमजोर पड़ जाता है या वह खूद को शासित से शासक समझने लगता है, तो वह राजनीतिक शक्ति थोथी दलील देने लगती हैः अब निषेध के लिए निषेध जरूरी नहीं है । किंतु जब कमजोर पड़ती है और अग्रगमन के रास्ते चलती है तो घोषित या अघोषित रूप से प्रतिगामियों का निषेध ही उसका पहला कदम होता है । उदाहरण के तौर पर नेपाली कांग्रेस ने हमेशा राजशाही को संवैधानिक बनाकर साथ चलने को कहा, लेकिन २००६ तक आते आते उसे भी राजशाही के लिए निषेध का रास्ता अख्तियार करना पड़ा । कई कम्युनिस्ट घटकों के बिलय के बाद बनी नेकपा (एमाले) के तत्कालीन प्रवक्ता मदन भण्डारी ने तो सैद्धांतिक तौर पर निषेध की राजनीति को तिलांजलि दे दी, एमाले को भी अंततः राजशाही के लिए निषेध का रास्ता ही चुनना पड़ा । बड़े दुःख की बात है कि राजशाही के खत्मा के बाद ये सब के सब ने संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र के रास्ते चलने वाले किसी को निषेध न करने की कसमें तो खाई है, लेकिन राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लड़ रहे मधेशियों सहित सभी उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के लिए निषेध का ही रास्ता अख्तियार कर रखा है जब कि संघीयता विरोधी राष्ट्रीय जन मोर्चा और गणतंत्र विरोधी राप्रपा नेपाल के साथ राजनीतिक सत्ता की साझेदारी चल रही है । तो निश्चित रूप से अगर संघीयता और गणतंत्र पर जिस सत्ता और सरकार की अड़ान बालु की दीवार की तरह दुर्बल हो, वहाँ लोकतंत्र चलेगा क्या ? अतः अभी हमारा संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र पूरा का पूरा खतरे में है ।
इस अवसर पर खस-गोर्खा इतर इस साम्राज्य की जितनी भी उत्पीड़ित राष्ट्रीयताएँ हैं, उन्हें एक जगह आकर खस-गोर्खाली साम्राज्यवाद के अवसान के लिए संघर्ष करना होगा । तो भला जिसका अवसान करना है, इससे बड़ा निषेध और क्या हो सकता ? फिर भी जारी मधेश आंदोलन का कमान संभालने का दावा करने वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के शीर्ष नेतागण अभी गति में रही नेपाली कांग्रेस के १३ वें महाधिवेशन प्रक्रिया को मधेश में अवरुद्ध करने के अपने कार्यकर्ताओं के संघर्ष की जिम्मेदारी लेने से क्यों पिछे हट रहे हैं ? राजशाही की समाप्ति के बाद भी दरबार के पदचिन्ह पर चलनेवाली नेपाली कांग्रेस, एमाले, एमाओवादी, माले, रोहिते, मंडले किसी भी राजनीतिक शक्ति को फिलहाल मधेश में सर उठाने देना मधेश आंदोलन को कमजोर करना है । किंतु लोकतंत्र के नाम पर सिंह और मेमने को समानता की दुहाई देते हुए क्या एक ही जगह रखकर दोनों की खैर मनाई जा सकती है ? कदापि नहीं । तो एक तरफ मधेशी जनता जिसे निषेध करना चाहती है, कथित मधेशवादी नेता अगर उसे आजादी देकर अपनी खैरियत चाहें तो हो सकता है कल मधेश को तो निषेध झेलना ही पड़ेगा, उन्हें खूद भी निषेध का सामना करना पड़े । अतः निषेध के लिए निषेध आवश्यक है, चाहे आप किसी अर्थ राजनीति के पृष्ठपोषक हों ।

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