नेतागण, जनता को गिद्ध की तरह नोच रहें हैं, अब पूरी गिद्ध दृष्टि मधेश के दो नम्बर पर : सुरभि

सुरभि, विराटनगर | आज फिर एक दिल टूटा, ओह गलती हुई दल टूटा कुछ इधर गिरा कुछ उधर गिरा बस अब थापा और राणा को टुकडे बटोरने की देर है । अाैर अब बाबूराम जी का भी दिल अरे नही‌ दल शायद बिखरने ही वाला है । कभी कभी तो लगता है यह देश सती के शाप के साथ ही नौ महीने के शाप से भी ग्रसित है शायद । या फिर ये संयोग ही है कि नौ महीने पहले नवम्बर में रिश्ता बना और अगस्त में टूट गया । अब तो राजनीति से आबद्ध सभी को कोई जाप वाप करवा ही लेना चाहिए ना जाने कब ये नौ महीने भूत सर चढ कर बोलने लगे और अपनी मनहूसियत दिखा दे । वैसे तो देश में अच्छी खबर कम और बुरी अधिक सुनने को मिल रही है । पर कोई फर्क नहीं पड़ता देश के ठेकेदारों को । राजधानी में गड्ढे में गिरने से मौत हुई तो तुरन्त प्रधानमंत्री कार्यालय से गड्ढों को भरने का फरमान जारी हो गया परिणाम भले ही शून्य निकला हो पर यह दर्द अभी भुलाया भी नहीं गया कि रौतहट की दर्दनाक घटना ने देश की बदहाली का चिट्ठा खोल दिया है । पर कोई फर्क नहीं पडता इन ठेकेदारों को । ये तो पार्टी बनाने और तोड़ने में व्यस्त हैं ।

कुर्सी चाहिए तो कहीं भी तालमेल हो जा रहा है चाहे नीति अलग ही क्यों ना हो । वैसे लगता नहीं कि इनकी कोई नीति है । कुछ दिनों पहले हमारे स(अ)क्षम प्रधानमंत्री का एक चर्चित इन्टरव्यू आया था साझा सवाल के अन्तर्गत । जिसमें एक महिला ने पूछा था कि मेरा बेटा प्रधानमंत्री बनना चाहता है क्योंकि उसका मानना है कि प्रधानमंत्री बनने से बड़ी बड़ी गाडि़यों में चढने को मिलता है और पैसा कमाने को मिलता है । हाय रे हमारे काबिल प्रधानमंत्री जी उनका काबिल सा जवाब था कि गाड़ी पर चढना और पैसा कमाने का सपना गलत थोड़े ही है, आपका बच्चा प्रधानमंत्री बनेगा । जिस देश के प्रधानमंत्री जनता के प्रश्न को नहीं समझ सके वो भला देश की समस्याओं को क्या खाक समाधान करेंगे । सीधी सी बात है कि राजनीति पैसा कमाने का जरिया है । अब तो बच्चों को आशीर्वाद में यही कहना चाहिए कि जिन्दगी में एक बार साँसद जरुर बन जाना पूरी जिन्दगी के लिए बेड़ा पार हो जाएगा । जहाँ एक पूर्व प्रधानमंत्री को यह लगता है कि बेरोजगारों को सुसाइड कर लेनी चाहिए और जो ऐसा नहीं करते वो शिक्षक बन जाते हैं । दुर्भाग्य इस देश का जिसने इतने काबिल और सक्षम प्रतिनिधियों को पाया है । जहाँ न तो जनता का महत्व है और ना ही उनकी भूख या शिक्षा का । बस ये तो देश को और जनता को गिद्ध की तरह नोचने पर लगे हैं और अब तो पूरी गिद्ध दृष्टि दो नम्बर पर है ।

जगजीत सिंह का एक गजल है चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले, बस थोड़ा इसे परिवर्तित कर दें तो काफी सटीक बैठता है इन पर, मधेश के साथ कई रिश्ते पुराने निकले, आज तो मधेश पर बस प्यार ही प्यार निकले । जी हाँ अभी तो इन्हें मधेश पर बस प्यार ही प्यार उमड रहा है वो दौर कोई और था जब यही लोग थे जो वहाँ मौत ही मौत बाँट रहे थे । पर अंधा तो मधेश भी है । उन्हें तो बोतल और बोका दिख रहा है, बस सब बिकते जा रहे हैं, तो भला इनका क्या दोष ? टूकड़े फेक रहे हैं और लोग (?) लपक रहे हैं । जी हाँ तमाशा पुरजोर जारी है आइए हम अपनी ही बरबादी का तमाशा देखें और तालियाँ बजाएँ । (व्यंग्य )

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

avatar
  Subscribe  
Notify of
%d bloggers like this: