नेपालगन्ज रिपोर्ट बाढ का बहाना, जंगल पर निशाना

विनय दीक्षित:युँ बाढÞ तो पिछले ११ वर्षों से राप्ती नदी में आती है, उससे पहले भी आती थी लेकिन र्फक इतना है, कि तब सिर्फनदी में सीमित रहती थी, आज नदी की बाढÞ के कारण सरकार को भी दबाव और प्रभाव का दिन देखना पडÞ रहा है ।
बाढÞ प्रभावित के नाम पर बहुतांे के जीवन में बहार आती है, किसी प्रकार का फायदा नहीं होता तो वह है पुलिस । गाबिस कर्मचारी से लेकर अनुदान करने वाले निकाय तक हर मोडÞ पर नजर होता है कि कहीं से कुछ रकम कैसे प्राप्त हो, वैधानिक रूप में सरकार तलब देती है लेकिन सिर्फवह काफी नहीं है ।
श्रावण २९ गते जिले में आए बाढ के असर के कारण प्रभाव जीवन पर दो दिखा ही साथ ही सबसे ज्यादा प्रभाव और जोखिम वन जंगल को झेलना पडÞा । तत्कालीन जिला अधिकारी जीवन प्रसाद वली ने मानवीय स्वभाव बताकर मटेहिया गाविस के ६५ परिवार को स्थानीय गणपति सामुदायिक वन क्षेत्र में आश्रय देने की बात की और आज मंजर इतना बदल गया कि हजारों लोग सिर्फघर ही नहीं बल्कि वन में खेत भी बना रहे हैं ।
सरकार ने वन को समुदाय में हस्तान्तरण कर वन सुरक्षा का एक नायाब तरीका तो ढूंढा लेकिन कई जगहों पर वह कारगर सावित नहीं हुआ, लिहाजा सामुदायिक वन का जो क्षेत्रफल था वह बाँकी ही नहीं बचा बल्कि राष्ट्रीय वन को सामुदायिक ने अपना आधार सिला बना लिया ।
जिले में फत्तेपुर, विनौना, बैजापुर, कुसुम, गंगापुर, मटेहिया, नरैनापुर जैसे कई गाबिस में गठित सामुदायिक वन उस क्षेत्र के वन विनाश के मुख्य कारक बने । बाढ ने दर्जनों गावों में क्षति किया, उन गाँव में भी पानी पहुँचा जहाँ लोगों को उम्मीद नहीं थी । वजह वन विनाश से लेकर अवैध उत्खनन तक हो सकता है लेकिन वन में खेत बनाना गम्भीर समस्या का संकेत है ।
जिले के मटेहिया गाबिस स्थित गणपति सामुदायिक वन क्षेत्र में पिछले दिनों में २०० बीघे से ज्यादा जमीन जोतकर स्थानीय लोगों ने खेत बना लिया । रात्रि के समय में सामुदायिक वन के कोषाध्यक्ष ढोढे राढ, सदस्य रामफेरन यादव, भण्डारी यादव लगायत के समूह ने टेक्टर से जंगली जमीन पर कब्जा किया ।
गणपति सामुदायिक वन दोषियों पर कारवाही करने के लिए बैठक बुलाई और निर्ण्र्ाापर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला, लेकिन ढोढे राढ के र्समर्थक कुछ सदस्यों ने हस्ताक्षर करने इन्कार कर दिया जिससे एक बात तय हो गई की घटना के पीछे राढ का हाथ है ।
इस बात की खबर जब मीडिया को लगी तो उसने माहोल में सरगरमी बर्ढाई और जिला वन कार्यालय की एक टीम घटना की जाँच करने मटेहिया पहुँची ।, हिमालिनी से बातचीत में टीम के एक सदस्य ने बताया कि सामुदायिक वन के कुछ पदाधिकारियों की संलग्नता में वन कब्जा अभियान संचालन हुआ है, सामुदायिक वन कारवाही करने में अर्समर्थ है इसलिए अगला कदम बन कार्यालय को उठाना पडेÞगा ।
जिला बन कार्यालय बाँके के प्रमुख जयमंगल प्रसाद गुप्ता ने बताया कि जिले १६२ सामुदायिक बन में से करीब आधा चुरे और निकुन्ज में पडÞ रहे हैं । बाढÞ का बहाना बनाकर लोग सिर्फवन की ओर केन्द्रित हैं, अपनी जमीन सुरक्षित स्थान पर है लेकिन वन कब्जा करने की नीयत ही बन गयी है लोगों की, गुप्ता ने कहा हक केन्द्रस्तर भी प्रयास जारी रख रहे हैं ।
 कितनें गाँव हैं वन में –
जिला वन कार्यालय के अनुसार बाढÞ से पहले या बाढÞ के बाद दर्जन से ज्यादा गाँव वन में कब्जा किए हुए हैं । फत्तेपुर का मेहमानपुर, कुसुम, शोनवषर्ा, कुदरबेटवा, गंगापुर, भोजपुर, भगवानपुर, और नेवाजी गाँव मुख्य रुप से वन में अपना आश्रय स्थल बना चुके हैं ।
राप्ती नदी के तटवर्ती गाँव होने के कारण इन में हर बरसात में बाढÞ का कहर जारी रहता है । कई बार तटबन्ध और व्यवस्थापन की बातें भी बाहर आईं है लेकिन सरकार उदासीन होने के कारण लोगों को जंगल के अलावा दूसरा मौका नहीं मिला ।
जंगल में आश्रय लिए हुए लोगों को संविधान सभा के चुनाव के दौरान भी काफी आश्वासन मिला, लेकिन वोट देने के बाद जनता की हर उम्मीद पर सिर्फपानी फिरता नजर आया ।

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