नेपालियों का राष्ट्र और राष्ट्रिय अखण्डता की दलिल ही पाखण्ड है : कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी, ८ जनवरी |
मुझे अब समझ में आ रहा है कि भारतीय लोग नेपालीको भुच्चर क्यूँ कहते हैं । “नेपाली भुच्चर होता है ।”, यह बात प्रायः भारत में सुना जाता है । वैसे हम मधेशियों को भी वे लोग भुच्चर ही कहते हैं जब हम भी अपने को नेपाली होने का परिचय देते हैं । मैंने कई बार इस शब्द के प्रहारों का सामना की है । मैं जब छोटा था और किसी काम विशेष से भारतीय बाजार या किसी रिश्तेदार के वहाँ पहुँचते था तो लोग यह कहकर चिढाते थे, “देखो, नेपाली भुच्चर आया है ।” कभी कभी तो मैं रोने लगता था और कभी गुस्से से किसी किसी को गाली भी दे देता था । अर्थ मैं समझता नहीं था । मगर उनके बोलने के तरीकों से मुझे काफी हिनताबोध महशुश होता था । बडा होकर मैंने लोगों से पूछा कि भई, “आप लोग नेपालियों को भुच्चर क्यूँ बोलते हैं ?” तो उन्होंने बताया कि भुच्चर का मतलब होता है ः मूर्ख, गवाँर, गुलाम, बेवकूफ, असहाय । मैंने पूछा ः कैसे ? तो उन्होंने कहा कि वहाँ के लोग कुछ समझते ही नहीं हैं । उनकी अन्तिम उद्देश्य पैसे होते है चाहे कुछ भी करके हो । देखो, पैसे के लिए हमारे देश में तुम्हारे नेपाली लोग सैनिक में भर्ना होने आते हैं । हम यहाँ उन्हें बहादुर कहकर सेना में रख लेते हैं । अंग्रेज लोग रख लेते हैं । जबकि हम उन्हें मजाक में बहादुर कहते हैं । अगर वे बहादुर ही होते तो अपने देश के लोगों के साथ न्याय और बाहर बालों से उनको रक्षा करते । वे अपने देश के रक्षा के लिए लड नहीं सकते, मगर पैसों के लिए बाहर के देशों में दारु पीकर मरने को तैयार हो जाते हैं । वे नशें में ही औरों के लिए मर जाते है । इसिलिए हम उन्हें बहादुर कहते हैं ।birod gardai janta 2

 

जनवरी २ के दिन रुपन्देही के मर्चबार में स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन अन्तर्गत के राष्ट्रिय और सामाजिक कार्यो में सहयोग प्रदान करने हेतु प्रशिक्षण के दौरान शारीरिक व्यायाम कर रहे स्वयं सेवकों के कार्यक्रम स्थल में जाकर नेपाली प्रहरीयों के कुछ दर्जन जवानों ने कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की । स्वयं सेवक प्रशिक्षण चला रहे एक युवा नेता ने मुझे फोन पर जानकारी दी कि पुलिस कार्यक्रम को रोकने की बात कर रही है । मैंने उन्हें पुलिस से झलगडने से मना किया और मेरे मना करने से पहले ही वे लोग नहीं लडने का निर्णय ले चुके थे । हमारे सारे नेता कार्यकर्ता शान्तिपूर्ण मार्ग को ही अख्तियार कर रहे हैं ।

कुछ देर बाद मैंने रुपन्देही सि.डि.ओ को फोन करके पूछा कि साहब, “हमारे साथी लोग शान्तिपूर्ण रुप में शारीरिक व्यायाम कर रहे हैं बिना किसी को कोई परेशानी देते हुए तो आपकी पुलिस वहाँ क्या करने चली गयी ? वे धम्की दे रहे हैं । उन्हें बुला लिजिए ।” जबाव में सि.डि.ओ साहेब ने कहा, “आप नेता होकर राष्ट्रद्रोही काम को अंजाम दे रहे हैं ।” राष्ट्र और राष्ट्रिय अखण्डता के विरोध में होने बाले किसी भी कार्यक्रम को रोकने की बात उन्होंने बतायी । जारी रखने पर कानुनी कार्रवाई करने की उन्होंने धम्की भी दी ।

अब उन्हीं सि.डि.ओ, एस.पी तथा सुरक्षा निकाय, जहाँ पे अन्याय का प्राथमिक उपचार होना चाहिए, न्याय का प्राथमिक अनुभूति लोगों को होनी चाहिए, में अन्याय होता है, अत्याचार होता है और निर्दोष लोगों पर भी जालझेल तथा झूठ में सार्वजनिक मुद्दे चलाये जाते हैं तो उनकी विश्वसनियता की ग्यारेण्टी क्या है ? दुसरी बात नेपाल सरकार और उसकी प्रशासन राष्ट्र और राष्ट्रियता की बात करती है । क्या है राष्ट्र, राष्ट्रियता और राष्ट्रिय अखण्डता ? क्या नेपाली सरकार, नेपाली लोग तथा नेपाली प्रशासन ही जानती है राष्ट्र, राष्ट्रियता और राष्ट्रिय अखण्डता का अर्थ और परिभाषा ? मैंने सर्लाही प्रशासन से खुल्ला रुप में हमारे बातों को सुनने, समझने और वार्तलाप करने का अनुरोध की कि कौन है देशद्रोहीे और कौन है देशप्रेमी । मगर वे सुगे के तरह जो सिख लए, वही उनके लिए सत्य है । ऐसे ही नेपाली अधिकारी होते हैं अपने उखान तुक्कों के सहारे जी रहे नेपाल के मुखिया के तरह । नेपालियों की राष्ट्र और राष्ट्रिय अखण्डता की दलिल ही पाखण्ड है ।

राष्ट्र एक भूगोल होता है, जहाँ रहने बाले लोगों का समान संस्कृति, समान खानपान, समान रीतिरीवाज, समान पहिचान, समान रहनसहन, समान पर्व और त्योहार, समान भावना आदि होते हैं । इन्हीं समान तत्वों और भावनाओं की अवस्था और अनुभूतियों से राष्ट्रियता का निर्माण होता है । और जब वहाँ के लोग अपने उन्हीं अवस्थाओं, भावनाओं तथा अनभूतियों को त्यागना नहीं चाहते हों तो वही राष्ट्रिय अखण्डता कहलाता है । और मधेशियों का अपना राष्ट्र है– मधेश । उनका राष्ट्रियता है मधेशियत और उन्हीं मधेशी भाषा, मान, सम्मान, पहिचान, संस्कृति, रीतिरीवाज आदियों को मधेशी खण्ड और बर्बाद होने देना नहीं चाहता, जो उसकी राष्ट्रिय अखण्डता की मांग है ।

प्रथमतः मधेश नेपाल में होने का कोई भी प्रमाण नहीं है । संयुक्त राष्ट्रसंघ से लेकर मधेश के भू–भागों को नेपाल को दो लाख रुपये के बदले और उपहार पुरस्कार के नाम पर देने बाले ब्रिटिश राजदरबार तथा उसके सरकार के पत्र से लेकर सन १८०१, १८१४, १८१५, १८१६, १८६०, १९२३ तथा १९५० के तत्कालिन इष्ट इण्डिया कम्पनी और नेपाली सरकार के बीच सम्पन्न किसी भी सन्धि या सम्झौतों ने मधेश की जमीन नेपाल का होने का दाबा नहीं करता ।
दुसरी बात, नेपाली लोग मधेश के धरती पर करोडों और लाखों वर्षों से रहे मधेशियों को नेपाली नहीं मानते ।
तीसरा कारण, मधेश के राजाओं तथा शासकोंद्वारा निर्मित तथा विकसित भाषा एवं संस्कृतियों से बहुत कम उम्र के नेपाली भाषा और संस्कृति होने की सत्य तथ्य उसके अपने ही इतिहास और इतिहासकार बतलाते हैं ।
चौथी बात, शदियों से भी नेपाली राज्य और उसके शासकोंद्वारा कोशिश करने के बावजुद भी मधेश में मधेशी राजाओं तथा शासकों के द्वारा कायम किए गए भाषा एवं संस्कृतियों को मिटा नहीं पाना ।
पंचम, मधेश के भूमियों पर आतताइयों के तरह निष्पट रुप से ९५ प्रतिशतों से भी ज्यादा एक ही नश्ल के दुष्ट गोर्खाली लुटेरे नेपालीयों को मधेश के शासन, प्रशासन तथा राजस्व कार्यालयों में प्रवेश कराना और मधेशियों को अवसरों से दुर रखकर मधेश पर औपनिवेशिक शासन लादना ।
छठा कारण, मधेशी चाहे जितना बडा भी काम करले, आविष्कार करले, सिद्धी और प्रसिद्धी को प्राप्त करले, कितने बडे कष्ट सह ले, कितने बडे संख्या में शहादत दे दे, नेपाली सरकार या उसके मीडिया बालों को कुछ नहीं सुझता । मगर नेपालियों के चेहरों से मिलता जुलता उनके स्वजाती, चाहे विदेशी ही क्यूँ न हो, मक्खी भी मार दे तो नेपाली सरकार और उसके मीडियों के लिए बहादुरी होना और उसके प्रचार प्रसार का मसाला बन जाता है ।
देश या राष्ट्र का निर्माण किसी ब्रम्हा या परमात्मा ने नहीं, बल्कि इंसानों के समुहों से हुआ है । धर्म ग्रन्थों के अनुसार भी ब्रम्ह ने एक ही देश के कल्पना के साथ ब्रम्हाण्ड बनाया । मगर दुनियाँ के लोगों ने ब्रम्ह के उस ब्रम्हाण्ड को खण्ड खण्ड करके सैकडों राष्ट्र और देश निर्माण कर लिए । वह इस लिए हुआ कि किसी एक समुह या समुदाय का भलाई या स्वार्थ दुसरे समुह या समुदाय के द्वारा पूरा नहीं हो पाया । जब ब्रम्ह के ब्रम्हाण्ड को खण्ड खण्ड कर अलग अलग देश बनाना अपराध नहीं तो मलेशिया से सिंगापुर, एक कोरिया से दो कोरिया, भारत से पाकिस्तान, पाकिस्तान से बंगलादेश, रुस से अन्य दर्जनों देश, इण्डोनेशिया से पूर्वी टिमोर, एक सुडान से दुसरा सुडान, स्पेन से क्याटेलोनिया, अमेरिका में ही जाकिस्तान का घोषणा आदि होना अपराध नहीं हो सकता तो यहाँ विभाजन क्यूँ नहीं हो सकता ?
वैसे मधेश को नेपाल से अलग करने की मधेशियों का न कोई योजना है, न अधिकार । मधेशी बस् नेपाली उपनिवेश से मुक्त होना चाहता है, जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है । उपनिवेश से मुक्त होना दण्डनीय अपराध है तो महात्मा गाँधी अपराधी हैं, जर्ज वासिङ्गटन अपराधी हैं, सन यात्सेन तथा मेअज्जबुर रहमान आदि भी अपराधी होना चाहिए ।
हम बुद्ध, गाँधी और मण्डेला के शान्तिपूर्ण राहों के अनुशरण से ही मधेश स्वराज लायेंगे, आजाद मधेश पायेंगे और स्वतन्त्र हम हो जायेंगे । जिनको आजादी से नफरत है, वे बुद्ध, गाँधी और मण्डेला से सवाल करें ।

“मधेश की धरती है हमारी, अब हम न दिखायें लाचारी,
इनकी मुक्ति शान हमारी, है हमारी पहचान जो प्यारी ।”
“नेपाली उपनिवेश अन्त हो, मधेश देश स्वतन्त्र हो ।”

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