नेपालियों ने विदेशों में मधेश को बदनाम करने का नया सूत्र खोजा है : सुजित कुमार झा

सुजित कुमार झा, अमेरिका , २८ नोभेम्बर |

मामला हो आंतरिक प्रदर्शन विदेश में

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अपने आंतरिक मामला और स्वाभिमान पर नाज करने बाले पहाड़ी मूल के नेपालियों ने अब विदेशों में मधेश और भारत को बदनाम करने का नया सूत्र आविष्कार किया है। उन्हें लगता है ये सूत्र से वे पूर्ण रूप से मधेश आंदोलन को दबा सकते हैं। पूर्ण तैयारी कर गत २२ नवंबर को वहइट हाउस के सामने और बराक ओबामा को जगाने के लिए वहइट हाउस के सामने प्रदर्शन करने पहाड़ी समुदाय जब उतरी तो अपने सामने मधेसी प्रदर्शनकारियों को देख उनके योजनाओं पर पानी फिरता दिखा। मधेशीयों ने वहइट हाउस के मूल द्वार पर “स्टा‘प स्टेट टेररिज्म“, “स्टा‘प फंडिंग तो नेपाल पोलिस एंड आर्मी“ और “ब्ला‘कएड नोट बाई इंडिया“ जैसे नारा के साथ प्रदर्शन पट्ट लिए नारेबाजी किया। हालाँकि यहाँ भी पहाड़ियों ने मुठभेड़ की चेष्टा की किन्तु मौजूदा अमेरिकी पोलिस ने ऐसा परिस्थिति आने नहीं दिया।

एसोसिएशन आफ नेपाली तेराइअन इन अमेरिका और मधेशी ह्यूमन राइट्स के संयुक्त प्रदर्शन में विभिन्न अमेरिकी राज्यों से आये करीब एक सौ मधेशीयों का उपस्थिति था। मधेशीयों ने श्वेत कपÞmन पर खून का छीटा जैसा रंग लगा कर सड़क पर सो कर प्रदर्शन किया । प्रदर्शनकारियों में से एक मधेशी ह्यूमन राइट्स के सदस्य राम मनोहर शाह जी से उनके मांग और मकशद पूछने पर उनका कहना था की “अघोषित नाकाबंदी नेपाली आर्मी और पुलिस ने किया है। जब मधेशी अपने जमीन पर आंदोलन कर रहे थे तो उनपर गोली बरसा कर भागने पर मजÞबूर किया और जब वे सीमा पर आंदोलन कर रहे हैं तो उसे भारतीय अघोषित नाकाबंदी का झूठा आरोप लगाया जा रहा है, और ऐसा वो इसलिए कर रहे की उन्हें अब डर है कि उन्हें मधेशीयों के मांग को ले लेकर अंतराष्ट्रीय सुझाव आना न शुरू हो जाएँ “ ।

एक बात तो सापÞm हो ही गया कि पहाड़ियों के लिए आंतरिक मामला और राष्ट्रीयता सिर्फ एक दिखावा है । नहीं तो अमेरिकी नागरिकता धारियों को किसी दूसरे देश (नेपाल) के मामलों में किसी तीसरे देश (भारत) के खिलाप प्रदर्शन करने का कोइ उद्देश्य नहीं होना चाहिए । अगर उनके मन में इतने सहनुभूतियां हैं तो वे और देशों के लिए भी करें जिसकी हालत नेपाल से भी नाजुक है । आज तक नेपाल के पहाड़ी सरकारों ने मधेशीयों पर ये आरोप लगाते आ रही है ये आंदोलन उनका है जिनके पास भारत के भी नागरिकता हैं । लेकिन मधेशीयों का तर्क ये है कि अगर ऐसा होता तो वे आंदोलन कभी न करते क्योंकि भारत का नागरिकता नेपाल के नागरिकता से कहीं लाभदायी होता क्यूंकि नेपाल के जनजीवन से भारत का जनजीवन कहीं बेहतर है। उनका कहना ये भी है की अगर पहाड़ियों नेअमेरिकी, अस्ट्रेलियाई या फिर कोई भी देश का नागरिकता लेने के बाबजूद भी वे नेपाली की कहलाता है लेकिन नेपाल के मधेशी नेपाल के नागरिक होने का बाबजूद भी उन्हें पहाड़ी आँखे भारतीय देखती हैं।

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मधेश आंदोलन भले ही संबिधान जारी होने के बाद जोर पकड़ा हो लेकिन इन बातों को कभी भी नकारा नहीं जा सकता कि मधेश आंदोलन का बीज नेपाल सरकार ने ही बोना शुरू किया था। नेपाल सरकार ने दूसरी संबिधान सभा में संबिधान बनाने के तरफ कम बल्कि संबिधान के बाद संभावित आंदोलन से निपटने कि तैयारियां करते नजर आयी। रक्सौल अमलेशगंज पाइप लाइन और सेवा केंद्र का बिस्तार का नेपाल सरकार का प्रयास संभावित आंदोलन से निपटने कि सिर्फ तैयारियां थी, और अब जब मधेश आंदोलन ने नेपाल सरकार को सोचने पर मजबुर करती नजÞर आ रही है तो अन्तर्राट्रीयकरण और अघोषित नाकाबंदी जैसे शाब्दिक बाण चलाकर मधेशी मांग और भारत को बदनाम कर अपने निरंकुश शासन को बरकार रखना चाहती है।

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