नेपाली कांग्रेस और मधेशः एक झलक

आखिर मधेशी चुनाव लड़े तो लड़े कहाँ से ? जवाब मे बिपी ने कहा– “इस बार रेग्मी बाबु को आप लोग जिताइये और मैं वादा करता हूँ अगली बार एक मधेशी को पहाड़ से जीत दिलाऊँगा” । बिपी को ये बात कहे हुए लगभग ५५ साल पूरा हो चुका है
रणधीर चौधरी :नेपाली राजनीति गलियाराें में नेपाली कांग्रेस की तेरहवी महाअधिवेशन की चर्चा ने नेपाली राजनीति के बहुत सारे आयामों को ढक कर रख दिया है । चाहे बात हो मधेश आन्दोलन के सेफ लेन्डीङ की या फिर असफल दिख रही ओली सरकार के विरुद्घ मे प्रतिपक्ष के भूमिका की आवश्यकता । ये सभी चीज महाअधिवेसन की चर्चा तले सुस्त दिखाई दे रही है । महाअधिवेसन के लिए कांग्रेस की पिछली घोषणा असफल हुई थी और अब जो ये नई तारीख निर्धारित की गई है इसमें कैसी और क्या चुनौतियाँ आ सकती हंै खासकर मधेश मे और कांग्रेस मे मधेशियों के अस्तित्व को लेकर— इन्ही बिषयों पर एक नजर ।
मधेश एक वोट बैंक
आखिर मधेशी चुनाव लड़े तो लड़े कहाँ से ? जवाब मे बिपी ने कहा– “इस बार रेग्मी बाबु को आप लोग जिताइये और मैं वादा करता हूँ अगली बार एक मधेशी को पहाड़ से जीत दिलाऊँगा” । बिपी को ये बात कहे हुए लगभग ५५ साल पूरा हो चुका है । इस दौरान दर्जनों चुनाव हुए परंतु अभी तक पहाड़ से चुनाव जीतना तो दूर किसी मधेशी ने न तो पहाड़ से अपना नोमिनेसन देने का साहस किया न ही पार्टी ने स्वंय इसमें कोई अग्रसरता दिखाई है । इतना ही नहीं । नेपाली राजनीति में सन्त नेता के नाम से पहचाने जाने वाले कृष्णप्रशाद भट्टराइ जो की नेपाली कांग्रेस के संस्थापक नायक में से एक है । वे अपने जीवन काल में एक मात्र प्रत्यक्ष निर्वाचन जीत पाये थे । और इसमें खास बात यह है कि वह जीत उनको पर्षा जिलावासियों ने दिलाई थी, जो की मधेशी वर्चस्व के क्षेत्र में से एक है ।
मधेश में नेपाली कांगेस का तब अस्तित्व तब दिखा जब नेपाली राजनीति में सन् १९९ ३÷९४ में विराटनगर जूट मिल से मजदूर आन्दोलन का उद्घोष हुआ सन । स्वाभाविक है उस आन्दोलन के प्रजातान्त्रिक उर्जा का फैलाव सारे नेपाल में हुआ था और अगर यह कहा जाय कि मधेश तो प्रजातन्त्रमय हो गया था, तो यह बिलकुल गलत साबित नही होगा । जिसका प्रमाण है मधेस मे अब तक कांग्रेसियों की जोरदार पकड़ । भले ही कांग्रेस के नेतृत्व मे रही सरकार के दौरान दर्जनों मधेशियों की हत्या हुई हो, संविधान मे दिन दहाड़े ठग लेना । कांग्रेस में लगे मधेशियाें को भले ही उस पार्टी मे एक “नौकरीकर्ता” के रूप मे ही क्यों न देखा जाय । केन्द्रीय समिति में आने के लिये भले ही चापलुसी करनी पड़े । परंतु कांग्रेस के लिये वो जान देने के लिए तैयार रहते हंै । खास कर कसबों मे रहे कांगे्रसी जन तो कांगे्रस के खिलाफ बोलने वालों से लड़ने के लिये भी तैयार रहते हैं । यह अनुभव इस पंक्तिकार का अपना है । बात है सन १९५८ की । कांग्रेस के मधुकर बाबु रेगमी ने अपना नोमिनेसन सिरहा के एक निर्वाचन क्षेत्र से दिया था, जो कि मधेशी बाहुल्य क्षेत्र था और आज भी है । उसी दौरान उनके विरुद्घ में तराई कांग्रेस से वेदानन्द झा ने भी अपना नोमिनेसन करवाया था । लगे हाथ कुछ मधेशियों ने विश्वेसर प्रसाद कोइराला (बिपी) से सवाल किया । पहाड़ से भी पहाड़ी लोग ही चुनाव लड़े और मधेश से भी वही । आखिर मधेशी चुनाव लड़े तो लड़े कहाँ से ? जवाब मे बिपी ने कहा– “इस बार रेग्मी बाबु को आप लोग जिताइये और मैं वादा करता हूँ अगली बार एक मधेशी को पहाड़ से जीत दिलाऊँगा” । बिपी को ये बात कहे हुए लगभग ५५ साल पूरा हो चुका है । इस दौरान दर्जनों चुनाव हुए परंतु अभी तक पहाड़ से चुनाव जीतना तो दूर किसी मधेशी ने न तो पहाड़ से अपना नोमिनेसन देने का साहस किया न ही पार्टी ने स्वंय इसमें कोई अग्रसरता दिखाई है । इतना ही नहीं । नेपाली राजनीति में सन्त नेता के नाम से पहचाने जाने वाले कृष्णप्रशाद भट्टराइ जो की नेपाली कांग्रेस के संस्थापक नायक में से एक है । वे अपने जीवन काल में एक मात्र प्रत्यक्ष निर्वाचन जीत पाये थे । और इसमें खास बात यह है कि वह जीत उनको पर्षा जिलावासियों ने दिलाई थी, जो की मधेशी वर्चस्व के क्षेत्र में से एक है । विडंबना यह है कि कोई भी मधेशी नेता पहाड़ से उम्मीदवारी दे और जीत ले, शायद ये बात अनेक आश्चर्य में से एक हो । इस से यह भी पुष्टि होती है कि पहाड़ के जो समुदाय (पर्वते) हैं पार्टी उन्हें मधेश के साथ बाँटना नहीं चाहती जबकि वो देश के मूल्य और मान्यताओ को एक सही आकार प्रदान करना, हरेक व्यक्ति को हरेक समुदाय से जोड़ना, राजनीतिक हारमोनी को एक जेनरेसन से दूसरे जेनरेसन में हस्तान्तरण करना; ये सब राजनीतिक दलों के प्राइम कार्यसुची मे पड़ता है । परंतु नेपाली राजनीति की जो वर्तमान परिपाटी है वो अजीबो गरीब है । तथाकथित बड़े राजनीतिक दल कोई भी निर्णय को नीचे तबके के नेताओं पर इम्पोज (जबरदस्ती लादना) करते हैं । वो ये भूल जाते हैं कि प्रजातान्त्रिक निर्णय प्रक्रिया तो वही होती है जो कि बृहत छलफल के बाद ली गई हो । और ऐसे में नेपाली कांग्रेस को अलग नहीं रखा जा सकता है । १३ वीं महाअधिवेसन की तारीख घोषणा करने से पहले तथाकथित महामहिम लोगों ने शायद मधेश मे चल रहे आन्दोलन को अवश्य नजरअन्दाज किया है । मधेशी मोफसल की कांग्रेसी जन से शायद काठमाण्डुवासी कांग्रेसियो ने को–कन्सलटेशन नहीं किया था । इसी सन्दर्भ में कांग्रेस के महोत्तरी जिला कार्य समिति के सदस्य बजरंग नेपाली का कहना है कि इस परिस्थति में जहाँ मधेश जल रहा है ऐसे में जिला और क्षेत्र में अधिवेसन को समपन्न करना लोहे के चने चबाने से कम नहीं । यहाँ तक कि जो विशुद्घ रूप से कांग्रेस समर्थित मधेशी हैं वे भी कांग्रेसी नेताओं को प्रश्न करते हंै कि कांग्रेस के नेतृत्व में लाए गए संविधान मे मधेशियाें को क्यों ठगा गया, जब सुशिल कोइराला प्रधानमंत्री थे उस वक्त क्यों आन्दोलनरत मधेशियो के सर और सीने मे गोली ठोकी गइ ? इसी तरह नेपाल विद्यार्थी संघ के केन्द्रीय सदस्य उदयकान्त यादव का मानना है कि वर्तमान परिस्थिति मे कांग्रेस के महाअधिवेसन को मधेश में शान्तिपूर्ण सम्पन्न करवाना बहुत ही कठिन है । जनता में जो आक्रोश है वो कभी भी कनफ्रन्टेशन को दावत दे सकता है । नेपाली और यादव दोनों की अभिव्यक्ति यही सिद्घ करती है कि कांग्रेस अब नाम मात्र की प्रजातान्त्रिक पार्टी रह गई है ।
कांग्रेस में कौमतंत्र
समय–समय पर काठमाण्डौवादी कांग्रेसी नेता का बयान आना कि मधेश और कांग्रेस एक दूसरे का पर्यायवाची है, ये महज एक लालीपॉप है और दूसरा कुछ नही है । पहला मधेश आन्दोलन के पश्चात मधेशी राजनीति की डायनामिक्स मे आमुल परिवर्तन आया था । नव गठित मधेशी दलाें ने जबरदस्त बहुमत हासिल किया था मधेश में, तब भी कांग्रेस दूसरे स्थान पर था । २०१३ की पिछली संविधानसभा में कांग्रेस को फिर मधेशियो ने पहले पावदान पे पहुँचाने मे मदद किया है । परंतु क्या कारण हो सकती है कि नेपाली कांग्रेस की केन्द्रीय कार्य समिति में मधेशियो को स्थान नहीं मिल पाता है ? कांग्रेस के दशकाें के इतिहास मे क्यों मधेशी जन कांग्रेस के सभापति नहीं बन पाये ? क्या मधेशियाें को इसपे पुनर्विचार करने का वक्त नही आ गया ? अगर सतही रूप में देखा जाय तो और कुछ नही कांग्रेस जो कि अपने आपको प्रजातन्त्र का ठेकदार समझते हैं दरअसल वो कौमतन्त्र के कमरे में करवटें बदलने में आनंद महसूस करते हैं ।
नींद से बाहर आना जरुरी
कहने को बातें बहुत हैं मधेश और नेपाली कांग्रेस के सन्दर्भ में । परंतु वर्तमान सन्दर्भ में इतना कहा जा सकता है कि जिस तरह कांग्रेस के सुप्रिमो ने महाअधिवेसन की तारीख तय किया है साफ पता चलता है कि मधेश के जिला और क्षेत्र के कांग्रेसी जन को उन्होंने अवरलुक किया है । हाल ही में किए गए संविधान संसोधन से अगर काठमांडूबादी कांग्रेसी ये सोचते हैं कि मधेशियाें की जो असन्तुष्टि है वह खत्म हो गया, तो वे सोचे । अन्धकार में अगर वो जीना चाहते हैं तो कौन उनको रोक सकता है ? परंतु इस आलेख के माध्यम से में इतना जरुर कहना चाहुँगा कि कोई ऐसा मुद्दा जो जनता के दिलो दिमाग में बैठ जाता है तो उसको उखाड़ फेकना या दबा देना असम्भव होता है । जी हाँ, सीमांकन का मुद्दा मधेशियों के दिमाग मे कुछ इसी तरह बैठी हुई है, जिसे निकालना असम्भव है । और इसको कोई गलत भी साबित नहीं कर सकता । इसी के साथ हम यह भी जोर सकते हंै, जनसंख्या के आधार में जो निवार्चन क्षेत्र निर्धारण के संशोधन की अपवाह फैलायी जा रही है और संसोधन का ढिंढोरा पीटा जा रहा है उसको कैसे पुष्टि कर पाएँगे ये तीन दल ? जनता को कैसे समझायेंगे कि जब आप मधेश को पाँच टुकड़ों मे पहले ही बाट दिए हंै तो मधेशी का सीट ८० कैसे पहुँच पाएगा ? प्रदेश नम्बर २ में लगभग ४१÷४२ लाख जनसंख्या है और मधेश के १२ जिलों को आप पहले ही पहाड़ में जा कर जोड़ दिये हैं । समावेशी समानुपातिक का जो मजाक उड़ाया गया था संविधान में उसी की निरंतरता संसोधन में भी दिख रही है, सिवा आदिवासी को हटाने के । इस संविधान ने खस÷आर्य को संवैधानिक समुदाय के रूप में प्रमाणित किया है और इन सभी कपट पूर्ण निर्णय का एक निर्णायक पार्टी कांग्रेस भी है ऐसी परिस्थिति में जब हर हाल में मधेशियों में यह भावना है कि वो ठगे गए हैं और इस ठगे जाने की रणनीति में कांग्रेस बराबर की हकदार है तो आप किस आधार पर कांग्रेस का अधिवेसन मधेश में सफल होते दिख रहे हैं ? इसको कतइ नकारा नहीं जा सकता कि राजनीति एक आर्दश, मुद्दा और विचारों की होती है । किसी को ये कहना कि आप इस पार्टी को छोड़ कर कोई दूसरी पार्टी में शामिल हो जाएँ परंतु ये न कहना कि आप राजनीति को अपना पेशा मत बनाओ, राजनीति से अपना घर चलाना है, ऐसी मानसिकता मानस पटल से हटा लो । खास कर कांग्रेस में लगे मधेशी मित्र को सोचना चाहिये कि वो कहाँ हैं ? उनका अस्तित्व क्या है ? अपने आत्मस्वाभिमान को दाव पर लगाने के बाद भी उनको मिलता क्या है ? कम से कम इस महाधिवेसन मे आप इस मुद्दे को जोर शोर से उठाइए कि कांग्रेस जैसी प्रजातान्त्रिक पार्टी (भले ही नाम मात्र की क्यों न हो ) में एक मधेशी को केन्द्रीय सदस्य बनने के लिये इतनी मशक्कत क्यों करनी पड़ती है ? क्या आने वाले दशकों मे कोई भी मधेशी इस पार्टी का सभापति का पद पा सकता है ? संसदीय दल के नेताओं मे अपनी जगह बना सकता है ? नेपाली कांग्रेस में लगे मधेशी नेता एवं कार्यकर्ताआें से इस पंक्तिकार का व्यत्तिगत सुझाव, अगर उपर उल्लेखित प्रश्न रखते वक्त आपको आपके सुप्रिमों से कोई व्हीप आई कि ऐसी बात न की जाय या फिर आप की अपनी “फियर साइकलोजी ” ऐसी बात करने से रोके तो एक बात दिमाग में रख लीजियेगा— वोलटायर का विचार जो विलायत के संसद के बाहर लिखा गया है जिसमें कहा गया है कि, “मै आप के विचार से असहमत हो सकता हूँ, लेकिन आपको अपना विचार न रखने दूँ तो अपना सर कटवा लूँ ।”
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