नेपाली कांग्रेस नेतृत्व में तीसरे विकल्प की तलाश : पंकज दास

पंकज दास, काठमांडू,२३,फरवरी

पंकज दास

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मधेश आन्दोलन पर अल्पविराम लगने के साथ ही देश भर में नेपाली कांग्रेस के महाधिनेशन की गहमा गहमी शुरू हो गई है। कांग्रेस के वर्तमान अभिभावक की अवसान के कारण कुछ दिनों के लिए धीमी पडी पार्टी की चुनावी प्रक्रिया एक बार फिर से पुरानी रफ्तार में वापस लौट रही है। वार्ड वार्ड से शुरू हुई चुनावी प्रक्रिया गांव-गांव से होते हुए क्षेत्र, नगर और जिला तक पहुंच गई है। सबको इंतजार है केन्द्रीय महाधिवेश का। हम कांग्रेस और एमाले पार्टी के विचारों, मूल्य मान्यताओं, सिद्धांतों से भले ही असहमत हों लेकिन लोकतंत्र की सबसे बडी खुबसूरती जो कि चुनावी प्रक्रिया होती है उसको इन दोनों पार्टी ने आज भी जीवित रखा है। नेपाल के किसी राजनीतिक दल ने अपनी पार्टी में आन्तरिक लोकतंत्र की जीवंतता को बनाए रखा है तो वह कांग्रेस और एमाले ही है।
 
कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रहे सबसे बडे महापर्व पर सबकी नजर महाधिवेशन पर ही है। पार्टी का नेतृत्व कौन संभालेगा? कौन देश की सबसे पुरानी पार्टी की विरासत को आगे बढाएगा? कौन होगा जिसके कंधों पर सबसे बडी पार्टी की जिम्मेवारी आने वाली है? इन सवालों पर हर गली मुहल्ले चौक चौराहों से लेकर चाय की दुकान तक चर्चा हो रही है। सभी अपने अपने तरीके से इस पर विश्लेषण कर रहे हैं। अब तक जिन उम्मीद्वारों के नाम पर सर्वाधिक चर्चा चल रही थी उनमें शेर बहादुर देउवा और रामचन्द्र पौडेल का नाम प्रमुख है। वैसे बीच बीच में कृष्ण सिटौला भी अपने आपको सभापति का उम्मीद्वार के रूप में पेश करते रहते हैं। लेकिन सिटौला की उम्मीद्वारी पर खुद उनके निकट के लोग ही गम्भीरता से नहीं लेते हैं। 
 
इसी बीच अचानक प्रकाशमान सिंह ने सभापति पद पर अपनी दावेदारी पेश कर सबको चौंका दिया है।कांग्रेस पार्टी के ही कार्यकर्ताओं में अब नए कोण से विचार विश्लेषण शुरू हो गया है। जो लोग अब तक सिर्फ देउवा पौडेल सिटौला के त्रिकोणीय मुकाबले पर बहस कर रहे थे वे अब प्रकाशमान की उम्मीद्वारी को लेकर भी गम्भीर बन गए हैं। राजनीतिक पंडित भी अपने भविष्यवाणी को लेकर विचार बदलने लगे हैं। इसके पीछे कई कारण है। प्रकाशमान की उम्मीद्वारी पर सबका ध्यान आकृष्ट होने के पीछे भी कई महत्वपूर्ण पहलू है। पहला उनकी निर्विवाद छवि। दूसरा सर्वमान्य नेता गणेशमान सिंह की विरासत, तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उनको कांग्रेस के पर्याय रहे कोईराला परिवार के अधिकांश सदस्यों का समर्थन। खुद शशांक कोईराला के द्वारा उनके नाम का प्रस्ताव करना, सुजाता कोईराला का समर्थन मिलना उनकी दावेदारी को देउवा से भी मजबूत बनाता है। पार्टी संगठन पर उनकी मजबूत पकड, कार्यकर्ताओं के साथ उनके अच्छे संबंध, विवादों से हमेशा दूर रहने वाले और पार्टी में महामंत्री हो या उपसभापति हर जिम्मेवारी को बखूबी निभाने वाले प्रकाशमान कार्यकर्ताओं की पहली पसन्द बन सकते हैं। 
 
Nepali-congress-Flagगणीतीय हिसाब से भी देखा जाय तो प्रकाशमान की दावेदारी में दम दिखाई दे रहा है। काग्रेस महाधिवेशन प्रतिनिधि सबसे अधिक काठमांडू उपत्यका से ही चुन कर आते हैं। काठमांडू के ही उम्मीद्वार होने के कारण एकमुष्ट मतदान उनके पक्ष में जा सकता है। इसके अलावा कोईराला परिवार से सहानुभूति रखने वाले और गणेशमान सिंह के अतुलनीय योगदान का स्मरण रखने वाले सभी कांग्रेसी जनों की सहानुभूति और समर्थन दोनों प्रकाशमान सिंह को ही मिलने वाला है। 
 
इस बार के महाधिवेशन में मधेश आन्दोलन की ख़ुमारी भी छाई रहेगी। मधेश से आने वाले हजारों प्रतिनिधि यह अच्छी तरह जानते हैं कि संविधान में मधेशी को अधिकार से वंचित रख कर जबरन संविधान बनाने के लिए देउवा, पौडेल और सिटौला की भूमिका रही है। आम मधेशी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में भी देउवा, सिटौला और पौडेल को लेकर अच्छी छवि नहीं है। देउवा और सिटौला के ही कारण सीमांकन का विवाद अभी तक नहीं सुलझ पाया है। कैलाली-कंचनपुर में देउवा की जिद और झापा को लेकर सिटौला का अडान संविधान को विवादित बना दिया है और मधेश आन्दोलन होने का भी यही कारण है। मधेश के कांग्रेसी कार्यकर्ता प्रथम मधेश आन्दोलन के दौरान ५३ मधेशी को गोली मारने का आदेश देने वाले सिटौला को अभी तक भूले नहीं हैं। इसी तरह मधेश मुद्दे को लेकर देउवा का अख्खड स्वभाव भी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से छुपा नहीं है। ऐसे में तीसरे विकल्प के रूप में उभर कर सामने आए निर्विवाद छवि के प्रकाशमान सिंह के पक्ष में ये सब बातें जा सकती है। 
 
वार्ड से लेकर क्षेत्र तक और नगर से लेकर जिला तक अधिकांश जगहों पर परिणाम आ चुका है। अगर इन परिणामों पर गौर किया जाए तो देउवा पक्ष में महज २० से २५ प्रतिशत में ही सिमट कर रह गया है। पौडेल और सिटौला तो कहीं गिनती में भी नहीं हैं। संस्थापन पक्ष कहे जाने वाले कोईराला परिवार के पक्षधर प्रतिनिधियों की जमात करीब ४० से ५० प्रतिशत दिखाई दे रही है। जो कि देउवा, सिटौला या पौडेल के पक्ष में नहीं जा सकता। शशांक और सुजाता के प्रकाशमान को समर्थन करने की वजह से करीब ३५-४० प्रतिशत कांग्रेसी प्रकाशमान को समर्थन कर सकते हैं। इस बार स्थानीय स्तर पर जो अधिवेशन हुआ है उसमें २०-२५ प्रतिशत नए चेहरे आ रहे हैं। नई युवा पीढी की जमात निकल कर सामने आई है जिनकी भूमिका महाधिवेशन में महत्वपूर्ण बनने वाली है। ये देउवा के पक्ष में जाते हैं तो उनकी दावेदारी और मजबूत हो सकती है लेकिन प्रकाशमान के पक्ष में जाते हैं तो उनकी जीत सुनिश्चित हो सकती है। 
 
इस समय भले ही यह दिख रहा हो कि संस्थापन पक्ष बंटा है, तीन-तीन दावेदारी आ गई है लेकिन इसके पीछे की वास्तविकता जानना भी जरूरी है। देउवा यह जानकर खुश हो रहे होंगे कि उनका विरोधी खेमा कई गुटों में बंटा है। जिसका सीधा सीधा फायदा उनको मिलेगा। परन्तु यह जगजाहिर है कि ना तो पौडेल की और ना ही सिटौला का अपना कोई आधार है। यह बात ये दो नेता भी अच्छी तरह जानते हैं। पौडेल के पास अगर ३-४ सौ वोट होंगे भी तो सिटौला के पक्ष में तो उतना भी नही है। और इन दोनों की छवि भी ऐसी है कि सब जानते हैं दोनों सिर्फ और सिर्फ बारगेनिंग करने के लिए ही अपनी दावेदारी की ताल ठोंक रहे हैं। पौडेल का कभी पार्टी नेतृत्व में कोई दिलचस्पी रही नहीं। उनका एक ख्वाब अधूरा रह गया है वह है प्रधानमंत्री बनने का। और इस पद के लिए उन्हें देउवा के तरफ से खल्लम खुल्ला ऑफर आ चुका है। चूंकि पौडेल हमेशा ही देउवा विरोधी खेमा का नेतृत्व करते रहे हैं इस वजह से देउवा के पक्ष में जाना उनकी नैतिकता को गंवारा नहीं होगा। तो संभव है महाधिवेशन के अन्त तक और उम्मीद्वारी का नामांकन भरने से पहले वो संस्थापन पक्ष में एकजुटता दिखाने के लिए अपनी दावेदारी को वापस ले ले। क्योंकि अगर प्रकाशमान भी जीतते हैं तो प्रधानमंत्री पद के असली दावेदार पौडेल ही होने वाले हैं।
 
पौडेल की तरह सिटौला भी बारगेनिंग कर रहे हैं। वो दोनों पक्ष से ही गुपचुप तरीके से बारगेनिंग कर रहे हैं। देउवा के साथ पैनल में वो महामंत्री पद की उम्मीद्वारी पर अपना दावा कर रहे हैं। क्योंकि देउवा पक्षधर महामंत्री के आकांक्षी बिमलेन्द्र निधि को सह अच्छी तरह मालुम है कि उनका प्रत्यक्ष निर्वाचित महामंत्री बनना असंभव है। भले ही कितनी मजबूत दावेदारी का वो दावा क्यों ना कर रहे हों। इसलिए देउवा पैनल से महामंत्री के लिए कृष्ण सिटौला और खुम बहादुर खड्का दोनों ही लॉबिंग कर रहे हैं। लेकिन बडी ही चतुराई से दोनों नेता प्रकाशमान सिंह के संपर्क में भी हैं। चूंकि प्रकाशमान के पक्ष में शशांक कोईराला पहले ही महामंत्री पद के लिए उम्मीद्वारी दे दी है इसलिए यहां मनोनीत महामंत्री के लिए दोनों लॉबिंग कर रहे हैं। हालांकि सिटौला का ध्यान अगली सरकार में उप प्रधानमंत्री सहित गृहमंत्री पर भी है।
 
इस बार के क्षेत्रीय अधिवेशन में कांग्रेस के कई क्षत्रपों की असलियत सामने आ गई है। जिन नेताओं ने मीडिया मैनेज कर के अपने को सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के रूप में प्रचारित कराया था ऐसे नेताओं की हवा निकल गई है। गगन थापा पक्षधर नेताओं का उनके ही गृह जिला में सूपडा साफ हो जाना, देउवा की पकड वाले जिला में संस्थापन पक्ष के नेताओं की जीत होना, काठमांडू में बडी बडी डिंगे हांकने वाले नेताओं का जिले में करारी हार होना कांग्रेस में बेहतर बदलाव के संकेत हैं। आम कांग्रेसी कार्यकर्ता अब देउवा पौडेल और सिटौला की गुटबन्दी से बाहर निकलना चाह रहा है। अधिकांश कांग्रेसी प्रतिनिधि तीसरे विकल्प की तलाश में है। ऐसे में देश की सबसे पुरानी और सबसे मजबूत आन्तरिक लोकतंत्र वाली पार्टी का नेतृत्व प्रकाशमान सिंह ने अगर यह जिम्मेवारी संभालने का बीडा उठाया है तो उन्हें सबको साथ में समेट कर ले जाने का हुनर दिखाना होगा। पार्टी के शीर्ष नेता और कार्यकर्ताओं के बीच जो दूरी बढ गई है उसको निरन्तर संवाद और संपर्क से कम करना होगा। सरकार और संगठन को अलग अलग रखते हुए संविधान के विवादित मुद्दों को सलटाने में अभिभावकीय भूमिका खेलनी होगी। मधेश के कई मुद्दों पर अपनी राय स्पष्ट ढंग से रखनी होगी। उन्हें देउवा सिटौला और पौडेल की तरह मधेश के बारे में अपनी नकारात्मक सोच और नकारात्मक बयान से बचना होगा। मधेश की जनता कैसे इस देश में अपनापन महसूस कर सके, उसे कैसे सम्मान और स्वाभिमान महसूस हो सके इसको अत्यन्त ही गम्भीरता से लेना होगा। 
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