नेपाली कांग्रेस में नेतृत्व की खींचतान और वत्र्तमान चुनौतिया“

कुमार सच्चिदानन्द :सत्ता राजनीति के केन्द्र में होती है और इसमें सक्रिय होनेवाले हर व्यक्ति का काम्य भी राजनैतिक अवसरों को प्राप्त करना होता है । लेकिन इसके मूल में कहीं न कहीं जनसेवा की भावना भी होती है । समस्या तब उत्पन्न होती है जब मूल को छोड़कर अवसरों को साध्य मान लिया जाता है । यहीं से राजनीति में विडम्बनाओं का दौड़ प्रारम्भ होता है और इससे नेपाल के प्रायः सभी राजनैतिक दल प्रभावित हैं । यह सच है कि नेपाली काँग्रेस नेपाल का सबसे पुराना और महत्वपूर्ण राजनैतिक दल है और देश को निरंकुश तानाशाही के अंधकारयुग से निकालने में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है । लेकिन पार्टी के लोकतांत्रीकरण के नाम पर इसमें जो एक दूसरे का पैर खींचने की प्रवृत्ति देखी जाती है या दूसरे शब्दों में कहें तो सिर फुटौव्वल की अवस्था देखी जा रही है, उसे किसी भी हाल में सकारात्मक नहीं माना जा सकता । किसी न किसी रूप में यह देश की राजनैतिक अस्थिरता की जमीन पैदा करती हैं । क्योंकि इन घटनाओं से यह साफ हो जाता है कि अन्य दलों की तरह इसमें भी व्यक्तित्व की स्वीकार्यता नहीं है । यह प्रवृत्ति अनावश्यक प्रतिस्पद्र्धा को प्रोत्साहित करती है । विगत महाधिवेशन जो राजनैतिक महासमर का एहसास करा रहा था, उसकी शायद जरूरत नहीं थी । पार्टी की वैधानिकता के लिए महाधिवेशन जरूरी था लेकिन नेतृत्व के चयन के लिए चुनाव की शायद आवश्यकता नहीं थी और इसे सर्वसम्मत बनाया जा सकता था । अगर ऐसा होता तो व्यक्तित्वों के टकराव के जिस दौड़ से नेपाली काँग्रेस गुजर रहा है, वह शायद नहीं आता ।
एक दार्शनिक ने राजनीतिकर्मी की तुलना केकड़े से की है । इसकी यह प्रकृति होती है कि किसी बत्र्तन में अगर दस जिन्दा केकड़े हैं और एक अगर निकलने या आगे बढ़ने की कोशिश करता है तो दूसरा पैर पकड़कर खींच देता है । यह सब जानते हैं कि काँग्रेस विभाजन की पीड़ा से गुजर चुका है । समय की माँग पर एकता की आवश्यकता को समझते हुए इसका एकीकरण भी हुआ । एकीकरण के पश्चात नेपाली काँग्रेस के वयोवृद्ध नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला ने पार्टी की कमान सँभाली और जनान्दोलन तक का नेतृत्व किया । शेरबहादुर देउबा पार्टी में दूसरे नम्बर पर स्थापित रहे । लेकिन प्रथम पद की उनकी महत्वाकांक्षा समाप्त नहीं हुई थी और होनी भी नहीं चाहिए थी । क्योंकि विभाजित काँग्रेस के एक खेमा का नेतृत्व उन्होंने किया था । इसलिए संयुक्त रूप में पार्टी का नेतृत्व की सोच को उनकी कोई नाजायज मानसिकता नहीं कही जा सकती । लेकिन महाधिवेशन में उनसे प्रतिद्वन्द्विता करने वाले एक नहीं दो–दो उम्मीदवार सामने थे । यहाँ रामचन्द्र पौडेल की उपस्थिति तो कुछ हद तक क्षम्य भी थी क्योंकि संस्थापन पक्ष के अन्य वरिष्ठ नेता वे थे । लेकिन कृष्ण सिटौला का इस दौर में प्रवेश उनकी हास्यास्पद स्थिति को प्रकट करता है और पार्टी के भीतर महत्वाकांक्षाओं का संसार ढो रहे लोगों के चरित्र को भी यह स्पष्ट करता है । दूरगामी रूप में नेताओं की यह प्रवृत्ति न तो पार्टी के हित में है और न देश के हित में । क्योंकि असंतोष जहाँ अधिक होता है वहाँ पथ से विचलन की संभावना भी सहज होती है ।
यह सच है कि नेपाली काँग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी है और लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध भी है । उसकी यही प्रतिबद्धता नेपाल के विभिन्न साम्यवादी दलों को भी किसी न किसी रूप में लोकतांत्रिक पद्धति अपनाने के लिए बाध्य करती है । यह सच है कि समाजवाद एक पृथक राजनैतिक विचारधारा के रूप वैश्विक स्तर पर जगह बना चुका है लेकिन इसकी वैचारिक जमीन किसी न किसी रूप में साम्यवादी आर्थिक चिंतन पर आधारित है । इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह तानाशाही व्यवस्था को नकारता है लेकिन इसका दुरुपयोग भी हुआ है । विभिन्न तानाशाहो. ने भी अपने अपने दलों के समाजवादी नाम दिये हैं । वास्तव में समाजवाद एक ऐसा राजनैतिक हम्माम है जिसमें अनेक राजनैतिक विचारधाराएँ चाहे वे अतिवादी और तानाशाही ही क्यों न होे, नंगी दिखलाई देती हैं । लोकतांत्रिक दलों के लिए तो यह ऐसा पावन मन्त्र है जिससे या तो वे अपने कुकर्मों को ढकते हैं या स्वयं को पवित्र करने की कोशिश करते हैं । नेपाली काँग्रेस को भी आज इन आरोपों से वरी नहीं किया जा सकता क्योंकि लोकतांत्रिक सरकारों का लम्बे समय तक इसने प्रतिनिधित्व किया और इनके नेतृत्व में जो संविधान आया उसके प्रतिक्रिया स्वरूप देश में व्यापक आन्दोलन हुआ और एक तरह से नव संविधान की बहुजन स्वीकार्यता पर ही इसने प्रश्नचिह्न लगा दिया ।
अगर अतीत को देखा जाए तो नेपाल का समाजवादी आन्दोलन कुछ अर्थों में भारतीय समाजवादी आन्दोलन का पूरक या उससे प्रभावित रहा है । कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नेपाली योद्धाओं ने अपना योगदान दिया और कभी भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने नेपाल के राणाशाही के विरुद्ध नेपाली काँग्रेस को सहयोग दिया । जयप्रकाश नारायण, वीपी कोईराला, राममनोहर लोहिया, सूरज नारायण सिंह आदि नेताओं की वैचारिक एकता से सब परिचित हैं और इनका कार्य क्षेत्र विराटनगर से बनारस तक रहा है । स्पष्ट है कि नेपाली काँग्रेस की वैचारिक जमीन को भारतीय समाजवादी आन्दोलन से अलग कर नहीं देखा जा सकता । भारत के समाजवादी दलों पर यह आरोप रहा है कि केन्द्रीय स्तर पर ये कभी भी स्थिर सरकार नहीं दे पाए और इसके शीर्षस्थ नेताओं में वैमनस्यता का भाव अधिक गहरा रहा है और राजनैतिक अनुशासन की कमी रही है जिसके कारण सरकारें बनी और गिरीं । क्या माना जा सकता है कि नेपाल में काँग्रेस में जो अपने ही दल की सरकार गिराने की प्रवृत्ति रही है, इसी का नतीजा है और साम्यवादी दलों की यह प्रवृत्ति भी इसी का सुसंस्कृत रूप है । मैं समझता हूँ कि चाहे समाजवाद हो या साम्यवाद हो, इनके नेतृत्व में व्यक्तित्व के सम्मान के भाव का अभाव होता है । इसलिए इनमें व्यक्तिवादी और अवसरवादी प्रवृत्ति अधिक हावी होती है । यही कारण है कि इन्हें लड़ने और अपना घर फोड़ने में दुःख नहीं होता । नेपाल में अस्थिर सरकार के इतिहास का मूल शायद यही है । इस महाधिवेशन में जो गुटबाजी प्रकट हुई है वह इसी प्रवृत्ति की निरन्तरता है ।
नेपाली काँग्रेस आज जिस जमीन पर खड़ा है, आज उनके समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं । एक ओर तीव्रता से विकास की गति ले रहे दो पड़ोसी देशों के साथ अपने कदमों को तीव्र विकासोन्मुख बनाना और विभेद के जिन मुद्दों को केन्द्र मे रखकर क्षेत्रीय स्तर पर अनेक व्यापक आन्दोलन हुए हैं और भविष्य में फिर होने की संभावना हैं, उसे सम्बोधित करना है । क्योंकि विगत दो दशकों में नेपाल ने आन्दोलनों के देश के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी छवि प्रस्तुत की है जिसके कारण अशांति का वातावरण समय–समय पर सृजित होता रहा है, इसे भी दूर करना नेपाली काँग्रेस का लक्ष्य होना चाहिए । इसके बिना नेपाल के तीव्र विकास की बातें कपोल कल्पना मात्र कही जा सकती है । लेकिन इसे प्राप्त करने के लिए नीतिगत स्तर पर उसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ सकते और अपने दल के कार्यकर्ताओं के साथ–साथ जनता को भी विश्वास में लेना पड़ सकता है । दूसरे शब्दों में कहें तो विदेश तथा गृह नीतियों का पुनर्निर्धारण करना पड़ सकता है । उन्हें यह समझना होगा कि पारम्परिक नीतियों की बदौलत तीव्र विकास के नवीन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है ।
इस बात को तो स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि अपने अन्तिम दिनों में गिरिजा प्रसाद कोइराला नेपाली काँग्रेस के लगभग सर्वमान्य नेता थे ओर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी विश्वसनीय छवि थी क्योंकि कुछ उलझे मुद्दों पर भी वे अपने बेबाक विचारों को प्रकट करते थे । उनकी मृत्यु के बाद इस दृष्टि से जो खाली जगह पैदा हुई है उसे दूसरी पीढ़ी के नेता नहीं भर पाए हैं । क्योंकि आन्तरिक समस्याओं के समाधान में उनकी क्रियाहीनता, क्रूरता या तटस्थता एक तरह से उनकी अन्तर्राष्ट्रीय छवि को प्रभावित करती है और इससे नेपाल के प्रायः सभी दल प्रभावित हैैं । मधेश के महीनों लम्बे आन्दोलन को जिस तरह इन नेताओं ने अपनी गलत बयानी से प्रभावित किया उससे भी उनकी अन्तर्राष्ट्रीय छवि प्रभावित हुई है । तथ्यों के विश्लेषण की नेपाली राजनीति का अपना नजरिया हो सकता है लेकिन वैश्विक स्तर पर उसके अलग मानदण्ड हैं । २१ वीं शताब्दी के दूसरे दशक में जहाँ पूरा विश्व एक गाँव बन गया है वहाँ कुतर्कों से आप दूसरों की आँखों में धूल नहीं झोंक सकते । पिछले दिनों नेपाल में मधेश ने लम्बा आन्दोलन प्रस्तुत किया लेकिन इस आन्दोलन को सम्बोधित करने की दिशा में इसके शीर्षस्थ नेतृत्व के स्तर पर जो प्रयास हुए उसे नाकाफी ही माना जा सकता है । इससे भी अन्तर्राष्ट्रयि स्तर पर उनकी विश्वसनीयता पर प्रभाव पड़ा है । यह सच है कि नेपाल प्राकृतिक सौन्दर्य से भरा हुआ देश है । प्राकृतिक संसाधनों की अल्पता के बाबजूद जलशक्ति की दृष्टि से यह एक समृद्ध देश है । इस दृष्टि से अपनी क्षमताओं के पूर्ण उपयोग के लिए अन्तर्राष्ट्रीय तकनीक और आर्थिक सहयोग की निहायत आवश्यकता है । इसके बिना तीव्र विकास के सपनों को अधूरा ही माना जा सकता है और यह तब ही संभव है जब देश में विश्वास का वातावरण पैदा हो ।
आन्तरिक स्तर पर नेपाल की तराई मधेश में नेपाली काँग्रेस का सबसे अधिक जनाधार माना जाता रहा है और आज यह दूसरी पार्टी बनी भी है तो इस क्षेत्र में अपना पारम्परिक जनाधार टूटने के कारण ही बनी है । लेकिन देश की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व कर रहा यह क्षेत्र आज भी अशांत है और किसी भी दिन फिर यहाँ आन्दोलन की आग लपट का रूप धारण कर सकती । अगर आन्दोलन का यह धुआँ मधेश में बरकरार रहा तो आनेवाला समय नेपाली काँग्रेस के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है । इसलिए आज जो इस दल का शीर्षस्थ नेतृत्व है उसे आपसी खींचतान की मनःस्थिति से निकलकर समग्र रूप में इस बात का चिन्तन करना चाहिए कि किस तरह वे इस बात का संकेत दे सकते हैं कि वे सम्पूर्ण देश का प्रतिनिधित्व करने वाले हैं और किसी भी प्रकार के भेदभाव का वे विरोध करते हैं । नेपाली काँग्रेस के लिए राजनैतिक स्तर पर पहले की और आज की स्थिति में भिन्नता है । पहले मध्यममार्गी राजनीति के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर एक मात्र नेपाली काँग्रेस का नाम नेपाल की जनता के जेहन में आता था लेकिन आज ‘नई शक्ति’ के रूप में एक नया राजनैतिक दल नेपाली काँग्रेस के मध्यममार्गी साम्राज्य में सेंध लगाने के लिए तैयार हैै । मधेश का बागी मनोविज्ञान और नई शक्ति की ओर लोगों के बढ़ते आकर्षण के बीच आज यह दल कैसे अपना आधार मजबूत करेगा, यह उसकी महत्वपूर्ण चुनौती है ।
नेपाली काँग्रेस का महाधिवेशन सम्पन्न हुआ । इसकी वृहत्त कार्यकारिणी में मधेशियों का जो प्रतिनिधित्व है कि उससे साफ है कि आज भी यह दल व्यावहारिक स्तर पर राष्ट्रीय रूप धारण नहीं कर सका है । क्योंकि जो क्षेत्र देश की आधी आबादी होने का दाबा कर रहा है उसके प्रतिनिधियों की गणना के लिए महज एक हाथ की अँगुलियाँ भी पर्याप्त हैं । निश्चित ही मधेश के ऐसे लोगों को धन्य कहा जा सकता है जो जनप्रतिनिधि होते हुए भी आन्दोलन के बाद के राजनैतिक वातावरण में इस दल में सक्रिय और इसके प्रति प्रतिबद्ध हैं । लेकिन विमलेन्दु निधि, अजय चौरसिया जैसे काँग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को इस बात के लिए पार्टी पर दबाब बनाना ही चाहिए कि वे अपनी नीतियाँ और कार्यक्रम इस ढंग से अग्रसारित करे कि इसमें तराई मधेश के आमलोग भी अपनत्व का एहसास करे । चाटुकार कार्यकर्ताओं की दलीलों के आधार पर बनाई गई नीतियों से उन कार्यकर्ताओं का कल्याण तो हो सकता है जिनका चुनाव जीतना संभव नहीं । मगर जनता के वास्तविक प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं को चुनाव के समय तो लोहे के चने चबाने होंगे । मुझे लगता है कि श्री निधि को महाधिवेशन के क्रम में जनकपुर की यात्रा और अपनी स्थिति का ज्ञान भलीभाँति होगा ।
निश्चित ही नेपाली काँग्रेस नेपाल का सबसे पुराना और सर्वाधिक जिम्मेवार राजनैतिक दल है और अपनी लम्बी राजनैतिक यात्रा में इसमें नेतृत्व भी विकसित हुआ है । मगर मौजूदा सन्दर्भों में नीतिगत स्तर पर जिस आमूल–चूल परिवर्तन की अपेक्षा इस दल से की जा रही है, अभी नहीं हो पाया है । इसका कारण है कि नेतृत्व के स्तर पर जिस व्यापक सोच की आवश्यकता है उसे यह दल अंगीकार नहीं कर पाया है और कहीं न कहीं राजनीति के पारम्परिक मनेविज्ञान से ग्रसित है । लेकिन यह भी सच है कि इस तरह के मनोभाव से नवीन चेतना का वहन नहीं किया जा सकता । पहले नेपाली काँग्रेस को साम्यवादी दलों से चुनौतियाँ मिलती थी लेकिन आज उसके सामने विभिन्न क्षेत्रीय दल भी हैं और राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे दल तैयार हो रहे हैं जो उनके आधारों को क्षीण कर सकते हैं । इसलिए वर्तमान परिवेश में अगर नेपाली काँग्रेस स्वयं को सशक्त करना चाहती है तो सबसे आवश्यक है कि वे अन्दरुनी खींचतान की स्थिति से निकलकर प्रतिद्वन्द्वी दलों न्यायसम्मत मुद्दों को अपने एजेण्डे में शामिल करे । व्व्व्

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