नेपाली मिडिया ने कसम खा ली है कि मधेश विरोधी समाचार ही सम्प्रेषित करेगी : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू, ९ दिसिम्बर | (भिडियो सहित सुषमा स्वराज, डा. करण सिंह, शरद यादव )

‘अँधेर नगरी चौपट राजा’ इसे हम अपनी खुशकिस्मती कहें या बदकिस्मती कि हम पर वो शासन कर रहे हैं जो शोषक तो बन रहे हैं किन्तु शासक नहीं । सबसे बड़ी बदकिस्मती तो ये है कि इन शोषकों को जो यथार्थ का आइना दिखा सकता है, वही आइना धुँधला हो चुका है । कलम की ताकत आज बिक गई है । वो कलम जो किसी भी तंत्र को नंगा करने की क्षमता रखती है, वही आज अपने पेशे को नंगा कर रही है । पत्रकारिता के अपने कुछ उसूल होते हैं, जिसमें सबसे पहली और महत्वपूर्ण शर्त होती है कि पूर्वाग्रह या दुराग्रह से प्रेरित समाचार का सम्प्रेषण न किया जाय, ऐसे समाचार जो विभेद या विद्वेष की भावना को उकसाए उसे सम्प्रेषित न किया जाय । सत्य तथ्य को लाने के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों को जनता के समक्ष लाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पत्रकारों की होती है । किन्तु नेपाल का संचार माध्यम ने तो जैसे कसम खा ली है कि बस एकतरफा समाचार सम्प्रेषित कर यहाँ के जनमानस में विषवृक्ष का बीजारोपण किया जाय । यह समाचार चाहे अपने ही देश के एक हिस्से का हो, या देश से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी जो नेपाल के हर सुख दुख में साथ रहा है, उसका हो ।

मधेश के वरिष्ठ नेताओं के भारत भ्रमण की बात क्या सामने आई, ऐसा लगा मानों एक भूकम्प और आ गया हमारे देश में । कोई नेता पहली बार भारत तो नहीं गया है । हाँ, यह जरुर हुआ कि इस बार भारत ने उसे बुलाया, जिसे बहुत पहले उसे बुला लेना चाहिए था । अगर केन्द्रीय नेता अपनी हर समस्या को लेकर भारत जा सकते है, अगर पिछला जनआन्दोलन भारत की ही पहल पर समाप्त किया जा सकता है, जनयुद्ध के लिए गणमान्य नेता भारत की धरती, वहाँ की सत्ता का सहारा ले सकते हैं, तो आज अगर सदियों से शोषित एक वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर भारत पहुँचा है, तो यह वक्रदृष्टि क्यों ? क्या पूर्व में हुई किसी संधि में यह भी लिखा है कि भारत जाने का अधिकार खस शासकों का है मधेश का नहीं ? नेपाल के कई पत्र पत्रिकाओं ने भारत के राज्य सभा में, नेपाल पर हुए चर्चा को बड़ी सुर्खियों के साथ छापा है । अच्छी बात है, सामयिक विषयों को अच्छी जगह मिलनी ही चाहिए, किन्तु इसमें बेइमानी तो नहीं होनी चाहिए न ? भारत के प्रमुख विपक्षी दल काँग्रेस के नेताओं ने बड़े जोरदार शब्दों मे अपने विपक्षीय अधिकार का उपयोग किया । विपक्ष का अधिकार बनता है कि वो सरकार से किसी भी विषय पर सवाल करे और सरकार उसे अपने जवाब से संतुष्ट कर, वैसे यह गुण हमारे ही देश में देखने को नहीं मिलता । यहाँ तो बिना बहस के संविधान तक लागू किए जा सकते हैं, खैर । विपक्ष ने चिन्ता जताई, वह चिन्ता सम्पूर्ण नेपाल के लिए थी । उसमें पहाड़ भी था और तराई भी । विपक्ष की ओर से सवाल करने वालों में से राजधानी या नेपाली मीडिया को किसी ने सबसे अधिक प्रभावित किया तो वो थे मणिशंकर अइयर । स्वाभाविक था, क्योंकि उन्होंने वो कहा जो यहाँ का एक समुदाय सुनना चाहता था लग रहा था मानो भारत के राज्यसभा में एमाले का प्रवक्ता बोल रहा हो । यह दीगर बात है कि अब यह खुलासा हो रहा है कि उनके भाषण को नेपाल सरकार की ओर से लाबिंग पर गए कनकमणि दीक्षित ने तैयार किया था । इस खुलासे के बाद तो कुछ और कहने की आवश्यकता ही शेष नहीं रह जाती । पर गौर करने वाली बात यह है कि भारत सरकार की ओर से क्या कहा गया । नेपाल की जनता तक वह पहुँचना चाहिए था और ज्यों का त्यों पहुँचना चाहिए था । नेपाली मीडिया शायद यह नहीं समझ पाई कि, बहस के बाद जो निष्कर्ष निकला वो साझा था और उसमें यह माँग की गई कि भारत को एक जिम्मेदार भूमिका का निर्वाह कर इस समस्या का समाधान यथाशीघ्र निकालना चाहिए । जरुरत हो तो नेपाल में एक शिष्ट मंडल को भी भेजा जाना चाहिए ताकि नेपाली जनता अभाव की जिस पीड़ा से जूझ रही है और मधेश वर्षों से शोषण की जिस पीड़ा को झेल रहा है उसका निदान निकल सके । पर अफसोस यह नहीं होता है यहाँ । हम उसे जी भर कर गाली दे रहे हैं जिसने सिर्फ छः महीने पहले उस वक्त सहारा दिया था, जिस वक्त पहाड़ पूरी तरह असहाय था । पर ठीक है इस मानवता या सहृदयता को भूलना चाहते हैं, भूल जाइए, परन्तु एक कटु सत्य है कि आप पड़ोसी नहीं बदल सकते । आपके घर की आग पड़ोसी ही बुझाएगा कोई गैर नहीं । आप इस सच को भी भूलना चाहते हैं तो भूल जाइए, पर क्या अपने ही देश के एक हिस्से को, वहाँ की जनता को भी आप भूलना चाहते हैं ? अगर आपने उनकी समस्याओं को सुना होता, तो कोई और क्यों आपके घर की आग में अपना हाथ डालता ?

नाकाबन्दी का सहारा लेकर जी खोलकर, कभी मानवता के नाम पर कभी नैतिकता के नाम पर, तो कभी अन्तरराष्ट्रीय नियम कानूनों के नाम पर भारत को गाली दी जा रही है । किन्तु जब उसी भारत की ओर से यह आरोप लग रहा है कि वो यहाँ की सरकार से दवाओं की लिस्ट माँग रही है, पहुँचाने की सुविधा देने को तैयार है, यहाँ तक कि जिस कम्पनी से मंगवाना चाहें आपको उसकी सुविधा भी देने को तैयार है, पर हमारी सरकार इनमें से कुछ नहीं कर रही । तो क्या यहाँ की जनता या मीडिया को यह सरकार से नहीं पूछना चाहिए कि वो क्यों पहल नहीं कर रही ? क्यों बार बार औषधि अभाव को दिखाकर जनता को भड़का रही है ? यहाँ कौन मानवताविहीन काम कर रहा है ? यह निर्णय आप करें ।

भारत के राज्यसभा में हुई चर्चा में जो डा. करण सिंह ने कहा वो इतनी शिद्दत के साथ सामने क्यों नहीं आ रहा जितनी मणिशंकर की बात सामने आ रही है ? क्योंकि करण सिंह ने संविधान की उन कमजोरियों को दिखाया जो मधेशियों के हक में नहीं है ? काँग्रेस के ये वही नेता है जिनकी सरकार ने एक बार नहीं दो दो बार नाकाबन्दी की और वो भी घोषित नाकाबन्दी । ये वही हैं जिनकी सरकार ने श्रीलंका में सेना परिचालन कराया था । मणिशंकर २०१४ के लोकसभा चुनाव में जिनकी जमानत जप्त हुई थी | ये आज दूध के धुले कैसे हो गए ? आज भारत ने नाकाबन्दी की होती तो यहाँ त्राहि–त्राहि मच गई होती । सामान आज भी आ रहा है, परन्तु एक व्यवस्थित कालाबाजारी की तहत अभाव दिखाया जा रहा है । दोगुने तीनगुने कीमत पर सामान सहज उपलब्ध है, यहाँ किसकी नैतिकता या मानवता पर उँगली उठेगी ?

दाग खुद के दामन पर है और देखा कहीं और जा रहा है । आत्मविश्लेषण करें, चिन्तन करें और सम्भव हो तो देश और जनता के प्रति ईमानदार बने समाधान स्वयं होगा किसी मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं होगी ।

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