नेपाली राजदूत को बुलाना और भारतीय राजदूत के निष्कासन की चर्चा ने सबका ध्यान आकर्षित किया

श्वेता दीप्ति, काठमांडू ,१० मई |

नेपाल की राजनीति में पिछला सप्ताह काफी नाटकीय और दिलचस्प रहा । देउवा और प्रचण्ड की साझेदारी में सत्ता परिवर्तन का नाटक और  फिर नाटकीय परिदृश्य में इसका पटाक्षेप । इस पूरे नाटक में कठपुतली की डोर प्रचण्ड के हाथ में थी । नेपाली राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति जताने और महसूस कराने का इससे अच्छा अवसर उनके लिए नहीं हो सकता था । जिसका भरपूर फायदा उन्होंने उठाया भी । रातो रात बात बदल गई और ओली सरकार अपनी कुर्सी बचाने में सफल रही । किन्तु इसके बाद जिस तरह प्रधानमंत्री का रुख सामने आ रहा है, उससे सरकार एक बार फिर सवालों के घेरे में आ रही है । कुर्सी बचने के तत्काल बाद राष्ट्रपति विद्या भण्डारी की तयशुदा भारत भ्रमण का रद्द होना पहली कड़ी है सरकार की बदलते रुख का । वैसे तो राष्ट्रपति का भ्रमण धार्मिक भ्रमण था जिसे राजनैतिक भ्रमण बनाने की कोशिश की जा रही थी किन्तु उसे यह कह कर रोक दिया गया कि मध्यप्रदेश में प्राकृतिक आपदा आई हुई है इसलिए राष्ट्रपति का जाना उचित नहीं है । अब इस बात में कितना दम है इसे विश्लेषित करने की आवश्यकता नहीं है । किन्तु यह तो समझ में आ रहा है कि वर्तमान राजनीति बहुत हद तक व्यक्तिगत होती जा रही है जहाँ निर्णय तथ्य और देश के हित के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत आधार पर लिए जा रहे हैं ।

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ओली सरकार ने भ्रमण रद्द होने के तुरन्त बाद भारत से नेपाली राजदूत दीपकुमार उपाध्याय को वापस बुला लिया | उनकी गलती इतनी थी कि  उन्होंने राष्ट्रपति का भ्रमण रद्द करने का विरोध किया था | उपाध्याय ने फोन करके प्रधानमन्त्री को कहा था कि राष्ट्रपति का भ्रमण रद्द हमारे हित में नही होगा | क्योकि इसकी पहल नेपाल ने की थी | इसके बाद भारतीय राजदूत के निष्कासन सम्बन्धी चर्चा ने सबका ध्यान आकर्षित किया । भारतीय राजदूत के निष्कासन के लिए ओली साहब ने एटर्नी जेनरल को बलुआटार में बुलाकर बिचार विमर्ष भी किया था | यह खबर दिल्ली में बड़ी तेजी से फैल गयी | दिल्ली स्थित विदेश मंत्रालय में सम्पर्क करने पर सीधा जवाब था कि उन्हें यह पता है और वे इंतजार कर रहें हैं वाद प्रतिक्रिया देगें | लेकिन रात में कमल थापाजी ने अपने ट्वीट के जरीये इस खबर को गलत बता दिया | इसतरह एक बड़ी दर्घटना होने से बच गई | कई एक तोहमत भारतीय राजदूत पर लगाए गए जिसमें मधेश आन्दोलन को शह देना, नेपाल की शांति भंग करना, वर्तमान सरकार को सत्ताच्यूत करना और भी ना जाने क्या क्या । पर सवाल यह है कि अचानक ये सारी तोहमतें क्यों ? क्या इसके पहले सरकार इन वाकयों से अनभिज्ञ थी या किसी मनचाहे परिणाम के इंतजार में थी ? इतना ही नही अब ओली सरकार ने अपने लोगों से खुलकर भारत से हए समझौते का विरोध करना शुरू करवा दिया है | उनके सभासद ने संसद में पी डी ऐ और पी पी ऐ ख़ारिज करने का भी प्रस्ताव दर्ता करवा दिया है |

मधेश आन्दोलन को तो शुरुआती दौर से ही भारतीय आन्दोलन कहा गया । जबकि यह आन्दोलन पूरी तरह देशी था विदेशी नहीं । आन्दोलित जनता यहाँ की थी, मरने वाली जनता भी यहाँ की थी और नेतृत्व करने वाले नेता भी यहीं के थे फिर भी इस आन्दोलन को आयातित ही कहा गया । खैर, यह तो मधेश का पूर्व निर्धारित भविष्य है जिसे बार बार साबित करना पड़ता है कि मधेश इसी देश का हिस्सा है । एक बात तो तय है कि मधेश के लिए बोलने वाले या सोचने वाले को किसी ना किसी रूप में सरकार के कोपभाजन का शिकार होना ही होगा । चाहे वो मधेशी जनता हो, या विदेशी पत्रकार(रोबर्ट पैनर) या फिर भारतीय या भारत की सरकार । परन्तु प्रश्न यह है कि भारतीय सरकार पर अगर ओली सरकार खुन्नस निकालने के मूड में है, तो यह देश के कितने हित में है ? क्या हम सक्षम हैं इसके परिणाम को भुगतने के लिए ? वो नेपाल जो फिलहाल प्राकृतिक ही नहीं, आर्थिक दृष्टिकोण से भी पूरी तरह हिला हुआ है और इतना ही नहीं घरेलु मुद्दे को भी सुलझा पाने में असफल सिद्ध हो रहा है क्योंकि मधेश मुद्दा आज तक यथावत है । सत्तापक्ष मधेश का नाम भी सुनने के पक्ष में नहीं है । वैसे सरकार ने एकबार फिर मधेशी मोर्चा को वार्ता के लिए आह्वान किया है जिसे मोर्चा ने मानने से इनकार कर दिया है । इस हालात में देश क्या फिर से किसी दुष्परिणाम को झेल पाने की स्थिति में है ? अगर आज की परिस्थिति किसी शह या इशारे पर निर्मित किए जा रहे हैं तो आम जनता यह आश्वासन तो जरुर चाहेगी कि उनकी रोजी रोटी या नियमित जीवन शैली पर कोई प्रभाव ना पड़े ।

इस बीच वत्र्तमान सरकार ने नेपाली जनता को योजना और नीति की सुन्दर सी फेहरिस्त थमाई है । सपने दिखाने की आदी वत्र्तमान सरकार ने उसी सपने को इन योजनाओं में हवा दी है । एक घर एक नौकरी, सर्टिफिकेट के आधार पर ऋण, हवा से बिजली, घर घर गैस की पाइप आदि खुशफहमियाँ इन योनाओं में शामिल हैं । १० हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने का सपना कभी बाबुराम भट्टराई ने भी दिखाया था उसे फिर दोहराया गया है | सरकार छे महीने चलेगी या नही लेकिन योजना और नीति १० वर्ष बाद तक की लाई गई है | एक घर एक नौकरी, किन्तु यह नौकरी कहाँ देगी सरकार यह पता नहीं, सर्टिफिकेट के आधार पर ऋण, फिलहाल बैंकरों ने इसे नकार दिया है, हवा से बिजली उत्पादन, पानी के स्रोत से सम्पन्न देश पानी का तो उपयोग कर नहीं पा रहा, हवा को कब तक और कैसे प्रयोग में लाएगा पता नहीं, अब सवाल गैस का है तो फिलहाल जनता गैस के लिए महीनों लाइन में लग कर अपनी बारी का इंतजार करने के लिए विवश है आगे खुदा मालिक । वैसे अगर ये दावे सच होते हैं तो नेपाल की जनता के भी अच्छे दिन आने वाले हैं यह माना जा सकता है ।

नेपाली राजदूत को बुलाना और भारतीय राजदूत के निष्कासन की चर्चा ने सबका ध्यान आकर्षित किया

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