नेपाली राजनीति में सबसे विवादित चेहरा, केपी ओली का : डा.मुकेश झा

डा. मुकेश झा , जनकपुर , 17 कार्तिक |
हिन्दू दर्शन के अनुसार आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर मे घूमते हुए चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते रहता है। यह क्रम तब तक चलते रहता है जब तक मुक्ति न मिलजाए। आत्मा जिस शरीरको त्यागकर मनुष्य शरीरको धारण करता है उसमे उसके पिछले जन्म के शरीर का संस्कार प्रतिविम्बित होते रहता है। अगर कोई इंसान अकारण ही गुस्सा करके सांप की तरह फुंफकारने वाला होता है अर्थात गुस्सा करने वाला होता है तो वह पिछले जन्म में सांप रहा हो, कोई अकारण ही उछल कूद मचाते हो तो वह पिछले जन्म में बन्दर रहा हो ऐसा माना जाता है। इसी तरह मानव के गुणों और व्यवहारों के आधार पर वह पिछले जन्म में क्या था यह कहा जा सकता है।
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कितने मनुष्य अपने इस जीवन में संगत, शिक्षा, वातावरण को अपने अनुकूल बनाकर उच्च अवस्था को प्राप्त करते हैं तो कई लोग वर्तमान के अवस्था से भी निचे की ओर जाते हैं। जिसने अपने जीवन का महत्व समझा है वह अपने लिए, परिवार के लिए समाज एवम् राष्ट्र के लिए सत्कार्य करता है परन्तु जिसने यह नहीं समझा वह ज्यादातर नकारात्मक कार्य में ही अपना सामर्थ्य लगाता है। ऐसे कार्य पिछले जन्म के संस्कार बहुत प्रवल होते हैं परन्तु इसको बदला जा सकता है। जिस मनुष्य को इस जन्म में सुसंस्कारित वातावरण मिला है वह अपने पिछले जन्म के संस्कार को बदल कर सर्वमान्य जीवन जिते हैं परन्तु जिसको वैसा सुसंस्कारित माहौल नहीं मिला वह अपना जीवन को विवादित बना कर नर्क पूर्ण जीवन जिते हैं।
नेपाली राजनीति में आज के समय में सबसे विवादित चेहरा अगर कोई है तो वह है खड्ग प्रसाद शर्मा ओली उर्फ़ के पी ओली, खास कर मधेस के मामला में तो वह उग्र मधेस विरोधी ही है। वैसे तो नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी एमाले के लगभग सभी वरिष्ट केंद्रीय पदाधिकारी मधेस विरोधी ही हैं परन्तु उसमे ओली जी का स्थान सब से ऊँचा है और वह अपना स्थान उसी ऊंचाई पर बनाये रहना चाहते हैं। मधेसी के “म” अक्षर से भी सभी एमाले नेताओं को तो जैसे घृणा ही हो गया है, उसमे भी एमाले अध्यक्ष को तो सब से ज्यादा घृणा है जिसकी वजह से वह सबसे बड़े मधेस विरोधियों के कतार में सबसे आगे हैं। के पी ओली में कुछ विशेषताए हैं जिससे उन्होंने अपना यह स्थान बनाने में सक्षम हैं।
, सबसे पहली विशेषता तो यह है कि ओली जी मधेस और मधेसी को कुछ गिनते ही नहीं, उनके नजर में मधेसी की हैसियत मच्छर मक्खी से भी गिरा हुवा है। उनके इस सोच के कारण वह जो बोलते हैं, किसी भी बौद्धिक स्तर के व्यक्ति के लिए पचने योग्य नहीं होता। पर उनके ऐसे ऐसे समर्थक मिडिया, सहयोगी हैं जो उनके मधेस विरोधी वक्तव्य को राष्ट्रवाद का संज्ञा दे कर ओली जी को सबसे बड़े राष्ट्र भक्त की तरह प्रस्तुत करते हैं। ओली जी के मधेस विरोधी उक्ति को महिमामंडित करते हुए उनकी गौरव गाथा गाते हैं। ओली जी के इस करतूत से ऐसा प्रतीत होने लगा है जैसे एक ही सीमा के भीतर दो राष्ट्र हों।
२, ओली जी को अपने आप के उपर ज्यादा ही विश्वास है और इसके पीछे है उनका पीएचडी होने का घमण्ड जो उन्हें हर मामले में टांग अड़ाने के लिए मजबूर कर देता है। किसी विश्वविद्यालय से उन्हें मानार्थ पीएचडी की डिग्री मिला है परन्तु उन्हें मानार्थ का सही अर्थ पता नहीं इसिलिए तो निर्वाचन के लिए दी जाने वाली आवेदन पत्रमे शिक्षा वाले शीर्षक में उन्होंने “पीएचडी” लिख दिया। अब ऐसे महान् बुद्धिमान पार्टी के अध्यक्ष को देश के हर निर्णय में अपना बुद्धि लगाने का नैसर्गिक अधिकार है चाहे उस बुद्धि से देश की वर्तमान और भविष्य भले ही अन्धकार में क्यों न चला जाए।
३, ओली जी की दूसरी विशेषता है मुहावरा। हर स्थान पर कोई न कोई मुहावरा द्वारा लोगों का चित्त अपने तरफ आकर्षित करने में माहिर हैं ओली जी। उनका कहना है कि मुहावरा से चित्त प्रसन्न होता है, तनाव कम होता है। परंतु अपना या अपने समर्थकों का चित्त प्रसन्न और तनाव कम करने के लिए कई बार वह ऐसे शब्द प्रयोग करते हैं जो सर्प दंश से भी भयानक पीड़ा पहुँचाने वाली होती है।
 ४, ओली जी की चौथी विशेषता द्वन्द फैलाना है। वह इस विधा के माहिर खिलाडी हैं। राष्ट्र के लिए जो भी अहितकर हो वही उनको प्यारा लगता है। महाभारत के समय जब भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से कहा कि तुम भी तो उसी गुरु के शिष्य हो, तुमने भी तो वही विद्या अध्ययन किया है जो युधिष्ठिर ने किया है फिर तुममे यह अधर्म भाव क्यों ? क्या तुम धर्म और अधर्म में अन्तर नहीं जानते ? तो दुर्योधन ने कहा जानामि धर्मम् न च में प्रवृत्तिं जनाम्यधर्मम् न च में निवृत्तिं। हे केशव मैं धर्म क्या है यह जानता हूँ लेकिन उसमे प्रवृत्ति नहीं हो सकता, अधर्म क्या है यह भी मैं जानता हूँ पर उससे निवृत्ति नहीं हो सकता। मेरे अंदर ऐसा कोई बैठा है जो बलात् मुझे अधर्म की ओर घसीटता है। वह कुछ और नहीं उसके पूर्व जन्म का संस्कार था जो उसे धर्म में प्रवृत्त नहीं होने दे रहा था क्योकि पिछले जन्म में वह असुर योनि में था। ठीक इसी तरह के पी शर्मा ओली जी भी जानते हैं नेपाल के हित में क्या होना चाहिए, मधेसिओं को अधीकार से वंचित किया गया है, उनके साथ धोखा किया गया है, राज्य में समानुपातिक अधीकार, सीमांकन, जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र आदि जो भी विषय अंतरिम संविधान में उल्लेखित था उन सबसे वंचित किया गया है, मधेसी के साथ अन्याय हुवा है फिर भी वह न्याय में प्रवृत्त नहीं हो पा रहे हैं।
जिस संविधान में अधीकार नहीं, अपनत्व नहीं, पहिचान नहीं उस संविधान को अपना कैसे कह सकते हैं ? जिस संविधान में “मधेसी” शब्द का ही कहीं जिक्र नहीं वह संविधान मधेसी के लिए कैसे हो सकता है, मधेसी के साथ क्या और कैसे न्याय कर सकता है ? मधेसिओं के साथ सिर्फ इसी संविधान में ऐसा किया गया है ऐसी बात नहीं, नेपाली सत्ता द्वारा बारम्बार मधेसिओं के साथ इसी तरह का विभेद किया जाता रहा है। यह मानते हैं कि उस समय एकात्मक सत्ता प्रणाली थी जिसमे ऐसा दुर्व्यवहार और विभेद किया गया परन्तु ओली जी की मानसिकता और कार्यशैली देखें तो वह भी उसी तरह मधेस को दवाकर रखना चाहते हैं जैसे राजा महेन्द्र। उन्हें शायद यह पता नहीं या वह शायद भूल गए हैं कि नेपाल से राणा और ताना से मधेसिओं ने जब लोहा लिया तो ओली जी का मनमाना कब तक ? एक व्यक्ति के कारण सारा देश ठप्प पड़ा रहे यह बात जनता कब तक वरदास्त करेगी।
अभी सिर्फ और सिर्फ एमाले के हठधर्मी के कारण ही संविधान संसोधन करके मधेसिओं के हक को सुनिश्चित नहीं किया जा रहा है। जब के पी ओली जी की सरकार थी उस समय मधेसी मोर्चा और सरकार के बीच ३६ बार बैठक हुई जिसका कोई परिणाम नहीं निकला परंतु ओली जी के सचिव योगेश भट्टराई जी का मोर्चा के ऊपर आरोप है कि ओली सरकार ने मोर्चा को वार्ता के लिए चार बार पत्र दिया पर मोर्चा ने वार्ता से इंकार किया। क्या इतने बड़े राष्ट्रिय पार्टी के सचिव को यह बात पता नहीं कि किसीको भी वार्ता में बुलाने से पहले उस तरह का माहौल बनाना पड़ता है ? एक तरफ सरकार गोली चलाता रहे, लाशें बिछाता रहे, हजारों हजार मधेसी को घायल बनाता रहे और दुसरे तरफ वार्ता के लिए बुलाता रहे तो यह वार्ता में बुलाना हुआ ?
 जितने भी एमाले के केन्द्रिय समिति के वरिष्ट पदाधिकारी जैसे ओली जी, वामदेव गौतम, शंकर पोखरेल, योगेश भट्टराई जो भी हैं सब के सब अपना पहिचान मधेस विरोधी बनाकर ही अपने आपको राष्ट्रवादी प्रमाणित करने में लगे हुए हैं। इन सब के कारण देश दिन प्रतिदिन गर्त में जा रहा है परन्तु उसका परवाह किया बिना कुछ पत्रकार और मिडिया एमाले के हठधर्मी को ही सही ठहरा रहा है जिससे नेपाल में मधेस विरोधी गतिविधि को बढ़ावा मिले। ओली जी का कहना है कि इस संविधान में सभी को सब अधीकार मिला है, संविधान में समानुपातिक समावेशी का अधीकार दिया गया है। क्या ओली जी ने अपने एमाले पार्टी के केन्द्रिय समिति में यह लागू किया है ? क्या ओली जी के समय में जो भी नौकरियां दी गई , जितने भी राजदूत नियुक्त हुए उसमे संविधान के समानुपातिक सिद्धान्त को लागु किया गया ? विल्कुल नहीं। अगर कोई भी नियम, कानून या अधिकार सिर्फ पन्नों पर लिखा हो, किताबों में बंद हो और उस अनुसार कार्य नहीं हो तो उस लिखावट के अक्षरों का कोई महत्व नहीं। परन्तु यह बात इन मानार्थ पीएचडी ओली जी को समझाए कौन?
मिलाजुलाकर बात एक ही है शायद ओली जी पूर्व जन्म में जिस प्राणी के शरीर में रहे होंगे वैसी हरकत कर रहे हैं, क्षमता रहते हुए भी अपने पूर्व जन्म के संस्कारवश नेपाल का भलाई करने में असमर्थ हैं। परंतु अगर वह चाहे तो इस संस्कार को परिमार्जन कर सकते हैं, संविधान संसोधन करके अंतरिम संविधान के मर्म को स्थापित कर सकते हैं और देश को सही निकाश दे सकते हैं । उम्मीद है जैसे वर्तमान सरकार ने छठ तक संविधान प्रस्ताव दर्ता कराने की बात किया है वैसा हो और एमाले संविधान संसोधन में पूर्ण रूपेण सहयोग करे। इस कार्य में ओली जी को ही यह निर्णय करना है कि वह अपना मधेस विरोधी छवि हटाएंगे या उसे बरकार रखेंगे।
 
 
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