नेपाली राज और उसकी राजनीति, जातीय विभेद एवं नस्लीय उदण्डता का पराकाष्टा है : कैलाश महतो

कैलाश महतो, पारसी, २८ ,अगस्त
chankyaविश्व प्रशिद्ध प्राचीन कुटनीतिज्ञ तथा अर्थशास्त्र के जन्मदाता आचार्य चाणक्य का कहना है, “राजा, शासक या शासक वर्ग के अधिकारियों का अपना व्यक्तिगत कोई इच्छा, महत्वाकांक्षा और स्वार्थ नहीं होना चाहिए । उनकी बस्, एक ही कार्य होता है – देश की सुरक्षा, जनता की राज्य से नाता जोडने की कुशलता, शान्ति एवं विकास में एकरुपता, अवसर में समानता । विभेदपूर्ण राज्य की जीवन बालुओं का ढेर और पानी की रेत समान ही होता है ।” चाणक्य के इस महवाणी के ठीक विपरीत नेपाली राज्य मधेशियों के साथ व्यवहार करते आ रहे हैं सदियों से उसी के भूमि पर ।
चाणक्य के बौद्धिक सन्तान हैं हम । प्राचीन काल से आधुनिक कालों तक किसी भी राजा, महाराजा, शासक या अधिकारियों को सम्बन्धित राज्य और जनता ने तब ही अपना राजा, शासक या अधिकारी माना है, जब वे चाणक्य के सर्वकालिन वैज्ञानिक सूत्रों के अपने शासन का आधार स्तम्भ बनाया है । सत्य युग में महापुरुष भगवान् विष्णु द्वारा समाज की सेवा हेतु राजा बनाये गये पृथु को मानव जाति का प्रथम राज्य का प्रथम राजा बनाये जाने के बाद उनके कई पुस्तों ने राज्य का संचालन कुशलतापूर्वक करने के कारण ही उनके सम्मान में समाजों ने इस भूमि का नाम भी पृथ्वी रखा । लेकिन उन्हीं पृथु के कुछ वंशों के उछृखल शासन शैलियों के विरुद्घ तत्कालिन राज्य और समाजों ने आवाज उठायी और पृथु वंश के स्थान पर मनु वंश के वैवश्वत मनु को राजा बनाया, जिन्होंने इस पृथ्वी पर पहली बार अपने देश का सीमा निर्धारण उत्तर में हिमालय के गोद में अवस्थित महाभारत श्रृंखला, दक्षिण में विन्ध्याचल तथा विशाल गंगा नदी की तट, पूरब के प्रयागनाथ से लेकर पश्चिम के सतलज-सरस्वती नदीयों तक के मध्य (बीच) के भूमिबाले अपने देश के क्षेत्र को ही मध्यदेश कहा, जिसकी चर्चा हमारे हर पौराणिक धर्म ग्रन्थ, ऐतिहासिक ग्रन्थ, वेद, पूरण, रामायण, महाभारत, बुद्घ ग्रन्थ से लेकर आज के काठमांडू कहे जाने बाला पौरा०िाक सत्यवती, संग्रीला, नागदह, नेपाल के रजोटो के साथ साथ गोर्खाली अत्याचारी शासक पृथ्वीनारायण शाह से लेकर जंङ्ग बहादुर राणा के नेपाल के पहला मुलुकी ऐन की कानुनी किताब से लेकर वि. सं. २०१५ तक भी नेपालियों के लेखनी और बोलनी दोनों में मधेश शब्द का ही प्रयोग होना, मधेश से काठमांडू -नेपाल जाने के पूर्व मकवानपुर के चिसपानीगढ़ी में नेपालियों द्वारा प्रवेशपत्र (भिसा) की व्यवस्था की गयी थी । विदेशी इतिहासकार तथा लेखकों के दस्तावेजों लगायत के प्रमाणों के आधार पर भी मधेश अलग देश होने की सत्य तथ्य है तो फिर मधेश नेपाल में होने की दावा करना नेपालियों की बेतुक की काशिशें हैं । इससे एक और थप प्रमाण स्थापित यह भी होता है कि हम और हमारे पूर्खे अन्यायी तथा अत्याचारी शासकों के विरुद्घ हमेशा आवाज उठायें हैं, लड़े है और अपनी भूमि पूनप्राप्त किया है, अत्याचारियों को खदेड भगाया है ।
खस नेपाली शासक, उनके अधिकारी, पृथ्वीनारायण और महेन्द्र पथीय खस बुद्घिजिवी और कुछ चट्टू पट्टू मधेश विरोधी अध्ययनहीन लाल बुझक्कर मधेशी नेता लोग भी अखण्ड नेपाल की फिजूल की बातें करके स्वतन्त्र मधेश के अभियान के रास्तों में बाधा उत्पन्न करने की चेष्टा कर रहे हैं, जो स्वभावतः और प्रमाणतः गलत है ।
प्रश्न उठता है कि दुनिया में ऐसी कौन सी चीज अखण्ड है ? बच्चे अपने पिता के शरीर को छोड़ कर वीर्य के रुप में माता के गर्भ में चला जाता है, वहा से नौ महीने के बाद वह माता से अलग होकर बाहर आ जाता है, जवान होकर अपना अलग एक नया संसार बना लेता है, करोडो अरबों के बीच वह अलग एक पहचान बना लेता है और पाकृतिक रुप से ही अलग होकर वह संसार से विदा हो जाता है । और वैसे भी ब्रम्हा ने एक ही ब्रह्माण्ड बनाया, एक ही संसार बनाया और एक ही उन्होंने देश बनाया । उन्होंने न कोई धर्म बनाया, न कोई जात बनाया, न समुदाय बनाया, काले गोरे जो बना सबको वो इंसान बनाया । लेकिन लोगों ने विज्ञान बनाया, विज्ञान में भी सुत्र बनाया, जात, पात और धर्म बनाया और साथ में अपना देश बनाया । किसी ने भारत बनाया, किसी ने बेलायत, किसी ने अमेरिका बनाया तो किसी ने जापान । किसी ने समाजवाद बनाया, किसी ने साम्यवाद, किसी ने उदावाद बनाया तो किसी ने क्या क्या वाद ।

CK Raut

डा.सी.के. राउत

सबाल खडा होता है कि आखिर परमात्मा के एकत्रित संरचना तथा नियमों को तोड कर इतने राज्य, इतने जात धर्म और इतने वादों की जन्म और परवरिश क्यों हुई ? ये सब करने बाले जर्ज वासिंङ्गटन महान् है, ली क्वान यग्रेट६ हैं, सन यात्सेन राष्ट्रवादी हैं और महात्मा गाधी महामानव हैं तो अपने तथा अपने मधेशी वर्ग और समुदायों को नेपाली उपनिवेश, नेपाली उत्पीडन तथा उसके विभेदों के विरुद्घ मधेशी तथा अन्य उत्पीडीत समुदायों को मुक्ति दिलाने के लिए लोकतान्त्रिक एवं शान्तिपूर्०ा मार्गोंं से आवाज देने बाला सी. के. राउत तथा उनका आजाद मधेश का अभियान अपराधी क्यों और कैसे ?
डा.सी. के. राउत को संविधान नहीं बन जाने तक उनके ही घर में कैदी के रुप में रखने की सरकारी नियत से यही प्रतित होता है कि मेरा शासन ही लोकतन्त्र, मेरा मानना ही लोकतन्त्र और मेरी उपस्थिती ही लोकतन्त्र है की भावना और मनोदशा के नेपाली राज और उसकी राजनीति गैर लोकतान्त्रिक तथा जातीय विभेद एवं नस्लीय उदनडता का पराकाष्टा है जो किसी भी लोकतान्त्रिक समाज या सरकार के आचरण के खिलाफ है ।
नेपाली सरकार की नश्लीय तथा विभेदपूर्०ा रबैयों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकारवादी संस्थायें, कुटनैतिक नियोग, नागरिक समाज, संचार क्षेत्र, बार एशोशिएशन लगायत के हिदायतों के कारण डा. सी. के. के उपर नेपाल सरकार द्वारा लगाये जा रहे आजीवन कारावास के मुदेको अन्ततः जैसे सम्माननीय विशेष अदालत ने खारिज कर लोकतन्त्र के खलनायकों को न्यायायिक थप्पर मारा, वही अवस्था निर्मा०ा नहीं करने के लिए वे सावधान रहें ।

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