नेपाली संस्कृति निर्माण में अवध संस्कृति

सच्चिदानन्द चौवे:पुण्य सलिला भागीरथी सदृश अनेक हिमशैवालनियो से सिंचित सहस्रशः निर्झरों की मादक ध्वनि से, निनादित, नगाधिराज हिमालय की वर्ण्र्ाातीत प्राकृतिक सुषमा की गोद में बसा, सौर्न्दर्य और शान्ति का भण्डार आर्य संस्कृति से सुसंस्कृत हिन्दू वाहुल्य देश हमारा महान राष्ट्र नेपाल है जो कि अपने अञ्चल में विविध, जाति, वर्ण्र्ााधर्म, भाषा, संस्ंकृति, समुदाय, परम्परा, सम्प्रदाय एवं संस्कारों को समेटे हुए हैं। ठीक इसी प्रकार भारत का उत्तर प्रदेश, जिसके २० जनपद अवध क्षेत्र कहे जाते हैं, ये भी सभी पावनतोया गंगा, यमुना, सरयू, गोमती शारदा एवं अचिरावती के पावन जल से सिंचित कृषि प्रधान क्षेत्र है। यहाँ भी विविध, जाति, धर्म भाषा, सम्प्रदाय, संस्कृति का सौहादर््रपर्ूण्ा समन्वय है। समस्त अवधि प्रान्त में सभी धर्मों के अनुयायी अपने अपने तिथि पर्व त्यौहार उत्सव, सस्ंकार, पूजा, पाठ, हवन यज्ञ, कर्ीतन, भजन प्रवचन अपनी अपनी लोक संस्कृति के अनुसार सब हिल मिलकर सद्भावपर्ूण्ा वातावरण में मनाते हैं। हमारा देश नेपाल भी धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक देश घोषित हो चुका है। परिवर्तन के दौर में अभी यहाँ के नेता अनुभवशून्य हैं। यहाँ की सम्पर्ूण्ा राजनीति पर पडÞोसी राष्ट्रो का बहुत बडÞा प्रभाव पडÞता है। नेपाल की धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षिक, साहित्यिक, सास्ंकृतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक समस्त विधाओं पर अवध संस्कृति का प्रभाव परोक्ष-अपरोक्ष रुप में अनादिकाल से पडÞता आ रहा है। इसके अतिरिक्ति यहाँ की न्याय प्रणाली, प्रशासनिक प्रणाली सैन्य प्रणाली, स्वास्थ्य, संगीत नाट्य, कला आदि भी अवधी संस्कृति से अनुप्राणित हैं। अवध क्षेत्र में पुरातन काल से वैदिक संस्कृतिका चलन रहा फिर आर्य संस्कृति चली वाद में सनातन और हिन्दू सस्ंकति का आविर्भाव हुवा। अब थोडÞा विचार कर लें कि वास्तव में संस्कृति है क्या चीज – संस्कृति, सभ्यता और संस्कारो में क्या अन्तर होता है – इस पर संक्षेप में जानकारी देना आवश्यक है।

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नेपाली संस्कृति निर्माण में अवध संस्कृति

वास्तव में किसी देश या राष्ट्र का प्राण ‘संस्कृति’ ही होती है। विना संस्कृति के किसी राष्ट्रका अस्तित्व नहीं रहता। संस्कृति मानव जीवन में होनेवाली लौकिक, पारलौकिक धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, अभ्युदय के उपयुक्त देहेन्द्रिय, मन, वुद्धि, अहंकार आदि की भूषण भूत सम्यक चेष्टाँए एंव हलचल संस्कृति कहलाती हैं।
संस्कृति से संस्कारो का उद्भव होता है। दर्शन शास्त्र के अनुसार, संस्कार रुपी वीज के ही अनुरुप कर्मरुपी वृक्ष उत्पन्न होता है। पर्ूव संस्कारो के अनुसार ही कर्मों का निर्माण होता है। आर्यो का प्राचीन रहन-सहन, आचार-विचार धर्मर्-कर्म, सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था, शास्त्रीय सिद्धान्त शिक्षा प्रणाली आदि जिसके अवलम्वन हों, वही हमारी सनातन आर्य संस्कृति कही जा सकती है।
संस्कृति है मानव की जीवन शक्ति, प्रगतिशील साधनाओं की विमल विभूति, राष्ट्रीय आदर्श की गौरवमयी मर्यादा और स्वतन्त्रता की वास्तविक प्रतिष्ठा। प्राकृतिक विधान के अनुरुप संस्कार की हर्ुइ पद्धति ही संस्कृति है। इसी संस्कति के एक अंश को सभ्यता कहते हैं। संस्कृति नित्य और सभ्यता परिवर्तनशील होती हैं। किसी देश काल की सभ्यता किसी के लिए अहित कारी भी हो सकती है। किन्तु संस्कृति र्सवदेश र्सवकाल में सभी के लिए हितकारी ही होती है। संस्कृति किसी मानव की उपज नहीं, प्रत्युक्त खोज है। जो देश काल भौगोलिक संरचना एवं वातावरण के अनुसार निर्मित होती है। इसी कारण यह नित्य है।
संस्कृति रुपी भूमि में धर्म रुपी वृक्ष शोभा पाता है। जिस प्रकार वृक्ष में फल, फूल, पत्ते, शाखँाए आदि अनेक अंग हैं उसी प्रकार धर्मरुपी वृक्ष के सभी सम्प्रदाय अङ्ग है। र्सार्वभौम र्सार्वजनिक साधन का नाम धर्म और व्यस्थित साधन का नाम “सम्प्रदाय” है। संस्कृति युक्त धर्म ही वास्तव में सनातन धर्म कहा जाता है। यही प्रधान सनातन धर्म अवध और नेपाल की पावन भूमि पर अनादिकाल से विद्यमान है। जो वर्णों और आश्रमों की व्यवस्था में निष्ठा रखने वाला, गोसेवक श्रुति एवं वेदों को मातृवत् आदर करने वाला तथा सब धर्मो पर निष्ठा आस्था रखने वाला। देव मर्ूर्ति की जो अवज्ञा नहीं करता, पर्ुनर्जन्म पर विश्वास करने वाला, और पर्ुनर्जन्म के आवागमन से छुटकारा पाने की चेष्टा करने वाला जो सदा सब जीवो पर अनुकूल वर्ताव को अपनाता है, हिंसा से जिसका चित्त दुःखी होता है, वही हमारा सनातन धर्म है जो एक सा दोनो देशों में माना जाता है।
अवध की पावन भूमि जिस प्रकार तर्ीथ, धाम एंव धर्मस्थलो से सुभोभित हैं, उसी प्रकार नेपाल भी मदिंरो और धार्मिक स्थलों से सुशोभित है बहुत धार्मिक स्थल भारत के, जहाँ जाना सामान्य लोगो को मुश्किल था ऐसे धार्मिक मन्दिरो की स्थापना नेपाल में भी की गई। जैसे शिव मन्दिर, कृष्ण मन्दिर, राम मन्दिर, गणेश मन्दिर हनुमान मन्दिर एंव देवी के मन्दिर महाकाली, लक्ष्मी, सरस्वती, विष्णु एवं भैरवनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ -मच्छेन्द्रनाथ), गोरखनाथ, भीम आदि देवी देवता एंव प्राकृतिक देवता र्सर्ूय, चन्द्र, वायु, इन्द्र, वरुण, वृहस्पति शनि अग्नि आदि के भी मन्दिर बनाए गए। नेपाल का राष्ट्रीय ध्वज हमारे सनातन धर्मका प्रतीक है जिसमें र्सर्ूय चन्द्र अंकित हैं वागमती के तट पर आर्य घाट हमारी आर्य संस्कृति का प्रतीक है।
प्राचीन भूगोलवेत्ताओ ने नेपाल की भोगौलिक विशेषताओं का सावधानी से अध्ययन किया था। उनके अनुसार हिमालय की पट्टयिाँ बताई गई है। क्रमशः उनके नाम इस प्रकार है- १ वहिर्गिरि २ अन्तर्गिरि ३ ‘उपगिरि’ हिमालय की सबसे ऊँची चोटियों वाले क्षेत्र को ‘वहिर्गिरि’ कहाँ गया। शेरपा, भोटिया, यक्ष आदि जातियो के निवास स्थान वाले भूभाग को अन्तर्गिरि कहा गया है। इनकी भाषा “याखा” कहलाती है। यह नेपाल का मध्य पर्वतीय क्षेत्र है। इस भू-भाग में अनेकों नदियो की घाटियँा है इसी भू-भाग में काठमाँडू पडÞता है। भारत के नैनीताल, मंसूरी सिमला आदि इसी पट्टी पर पडÞते हैं। ‘पालि’ साहित्य में यह प्रदेश “चुल्य हिमवंत” अर्थात् छोटा हिमालय के नाम से जाना जाता है।
नेपाल की प्रथम पट्टी ‘उपगिरि’ की है यहाँ के निवासी कभी ‘उपगिरिय’ नाम से प्रसिद्ध थे। प्राचीन भारत में यह सम्पर्ूण्ा भाग “मध्यदेश” के अर्न्तर्गत था। तर्राई प्रदेश का यही भूभाग जिसे नेपाली लोग ‘मधेश’ कहते हैं। यह प्रदेश एक पतली पट्टी के रुप में पश्चिम में महाकाली से लेकर पर्ूव में मेची तक ८००० वर्ग मील में विस्तृत है। वस्तुतः यह प्रदेश गंगा यमुना के मैदान का एक भाग है जो कुछ नीचा और कहीं-कहीं दलदली होने के कारण एक भिन्न नाम “तर्राई” के नाम से भी प्रसिद्ध है। अपनी अत्यधिक उपज और वन्य संपदा के कारण यह ‘नेपाल का भण्डार’ भी कहलाता है इस प्रदेश के निवासी लगभग उन्ही जातियों के हैं जो उत्तर भारत में निवास करते हैं।
जगज्जननी जानकी का जनकपुर गौतम वुद्ध का कपिलवस्तु और लुम्बिनी इसी तर्राई प्रदेश में है। यह प्रदेश और इसके कुछ और उत्तरी भाग प्राचीन काल में भारत के ही अंग थे। नेपाल उपत्यका के दक्षिण में लिच्छवी मल्ल, कोलीय शाक्य तथा कोशल नरेश प्रसेनजित के राज्य थे। प्रसेनजित का राज्य नेपाल के पर्वतीय प्रदेशो तक विस्तृत था। इस तर्राई प्रदेश के जिले क्रमश पूव- पश्चिम तक गए है। १ मोरंग, २ सप्तरी, ३ महोत्तरी, ४ र्सलाही, ५ रौतहट, ६ बारा, ७ परसा, ८ वुटवल, ९ बाँके, १० वर्दिया, ११ कैलाली, १२ कंचनपुर, ये सब भारत के उत्तरी क्षेत्र सेेेेेेे जुडÞे हैं, इन सभी क्षेत्रों में हिन्दी भाषा लिखी पढÞी और समझी जाती है परन्तु इनमें बोली जाने वाली थारु अवधी भोजपुरी और मैथली क्षेत्रीय मातृ भाषाएँ है। इन सभी जनपदो में अनादि काल से अवध भूमि से नाता बना रहा है। भगवान राम अवध से जनकपुर विवाह करने आए थे तब से लेकर अब तक इन दोनों देशो में रोटी और बेटी का नाता जुडÞता आया है। हर वर्षनेपाल से भारत और भारत से नेपाल में अपनी रोजी रोटी के लिए लोग आते जाते हैं।
हर वर्षकुम्भ जैसे तमाम महापर्वों पर लोग प्रयाग, काशी, मथुरा, नैमिषारण्य, अयोध्या, गया आदि तर्ीथ, धामों की यात्रा करते हैं। इसीप्रकार भारत से हजारों लोग शिवरात्रि में पशुपतिनाथ, मुक्तिनाथ, जनकपुर, लुम्बिनी, आदि तीर्थों में जाकर पूजा पाठ अर्चना यज्ञ आदि करके अपना लौकिक एवं पारलौकिक जीवन सुखमय बनाते हैं। इन दोनांे देशों के आवागमन से एक दूसरे की संस्कृति का आदान-प्रदान होता है।
भ्ाारत एवं नेपाल में साँस्कृतिक, धार्मिक और भौगौलिक दृष्टि से बडÞी समानता है। इसीलिए आज के सौ वर्षपहिले नेपाल राष्ट्र निर्माता पृथ्वीनारायण शाह ने नेपालको चार वर्ण्र्ाात्तीस जाति की फुलवारी कहकर इसे ही खास हिन्दुस्तान बताया था। -नेपालको ऐतिहासिक इतिहास साहित्य, मुरलीधर भट्टर्राई पृष्ट २९ में उल्लेखित) नेपाल और भारत अवध की मूल सभ्यता आर्य सभ्यता ही है -नेपाली सभ्यता में कहीं कहीं अनार्य सभ्यता का भी प्रवेश मिलता है। पर आर्य संस्कृति का ही बाहुल्य दृष्टिगोचर होता है।
प्ा्राचीन आर्यावर्त के अर्न्तर्गत नेपाल का भी भू भाग आता था ‘मनुस्मृति’ में लिखा है ः
आ समुद्रात वे पर्ूवादास समुद्रात पश्चिमात्
तयोरेतान्तर में गिर्योरायावते विदर्ुर्बुधा।।
अर्थात् पर्ूव समुद्र से पश्चिम समुद्र पर्यन्त, हिमालय से विन्ध्याचल के बीच में जो देश है उसे विद्वान लोग आर्यावर्त कहते हैं।
इसी क्षेत्र में आर्यों का वास था और यहीं से आर्य संस्कृति एवं सभ्यता का विकास हुआ भारत की अपेक्षा हिमालय नेपाल से अधिक निकट है। अतः इस भूमि से ही जिस आर्य सभ्यता का विकास हुआ, यह भारत के साथ नेपाल की भी संस्कृति हर्ुइ। हमारे अनेक देवी-देवताओं, महापुरुषो, ऋषि मुनियो की लीला कर्म चिन्तन की भूमि यही हिमालय की पावन भूमि रही है। जलप्लावन के समय इसी हिमिगिरि के किसी उच्च शिखर पर मनु को आश्रम मिला था। इसी भूमि के शान्त शीतल स्थल में पार्वती जी ने अपनी वाल लीला की थी। कौशिक ऋषि विश्वमित्र की वहिनी कोशिका -कोशी) का उद्गम नेपाल ही है। इसी के तट पर कौशिक मुनि ने तपस्या की थी।र्
वर्तमान नेपाल का दक्षिणी भाग भारतीय जनपदों के अर्न्तर्गत था। कोशल नरेश प्रसेनजित का राज्य उत्तर में पर्वतीय क्षेत्र तक फैला हुवा था और इन सब प्रदेशों की उस समय की बोली जाने वाली भाषा अवधी थी। इन सभी प्रदेशो में हर क्षेत्र में अवधी संस्कृति का ही वाहुल्य था। इसके अतिरिक्ति नेपाल में जितने भी प्रमुख वंशों ने राज्य किया उन सबका भी मूल स्थान भारत ही था। ये लोग जब नेपाल में प्रवेश किए, इनके साथ थारु आदि जातियां भी आई। अतः उन जातियों की संस्कृति का प्रभाव नेपाली जन जीवन पर पडÞा।
नेपाल उपत्यका जहाँ नेवार जाति का बाहुल्य था, मल्ल शासन काल में उनमें भी अवध क्षेत्र जैसी वर्ण्र्ाायवस्था बनाई गई। ‘वज्राचार्य’ लोग उनके धर्मगुरु बने और उनलोगों ने वौद्ध धर्म को अपनाया। बुद्ध का जन्म भले ही लुम्बिनी नेपाल में हुवा पर उन्हें ज्ञान बौद्ध गया -सारनाथ) में मिला। वे प्रत्येक वर्षके चार महीने अवध प्रान्त में अवस्थित श्रावस्ती में विताते थे। कपिलवस्तु इनकी राजधानी थी, जहाँ पर्ूण्ा रुपेण अवधी भाषा संस्कृति का प्रचार था और इसी अवधी संस्कृत मिश्रति शब्दों में ‘चर्या पदों’ का निर्माण हुआ।
मोरंग में इसी काल में तमाम तंत्र(मंत्र का सृजन अवधी भाषा में ही हुआ। वौद्धिक आदर्श के अनुसार चर्मकारेभ्यो नमः नथ कारेभ्यो नमः कुलालेभ्यो नमःएत्तेनानां पतये नमः कहकर हमे केवल चमार, बर्ढइ कुम्हारों को मात्र नमस्कार करना नहीं सिखाया बल्कि पतितो को भी नमस्कार करना सिखाया है। इस आदर्श को पालन करने के लिए काठमाडू में ंभी जगन्नाथ जी का मन्दिर निर्माण कराया, जिस में पुजारी अन्त्यज जाति के रक्खे गए। जिनके हाथ का प्रसाद सभी वर्ग के लोग खाते थे। आर्य संस्कृति की सबसे बडÞी विशेषताएँ माता, पिता, गुरु, अतिथि का सम्मान, गौ, व्राम्हण, संत, महात्माओँ का अभिनन्दन, जप तप, यज्ञ, दान पुण्य की प्रधानता समस्त समाज में जैसी अवध क्षेत्र में थी, वेसै ही नेपाली जनजीवन में भी व्याप्त हो गई। यहाँ के पर्ूव संविधान में गौ(व्राम्हण का बध करना जघन्य अपराध माना जाता था। ब्राहृमण अपराधीको मृत्युदण्ड के बदले देश निष्काशन की सजा दी जाती थी। यहाँ गो रक्षक क्षेत्र ‘गोरखा’ कहा जाता था, जिसके प्रचारक बाबा गोरखनाथ थे।
भारत के समान नेपाल में भी धर्मपरायणता की भूख जाग्रत हर्ुइ। भारत में जितने धर्म सम्प्रदाय बने, उनका प्रभाव नेपाल में शीध्र पडÞा। पाशुपत, भागवत, शाक्त, कोल, गोरख और बौद्ध सम्प्रदाय के अनुयायी हुए। जैन, कवीरपंथी, मुस्लिम, सिक्खर् इर्साई आदि ने जब भारत में अपना धर्म सम्प्रदाय फैलाया तो इनकी संस्कृति, भाषा का भी पर्ूण्ा प्रभाव नेपाल पर पडÞा। नेपाल जनसंख्या के अनुपात से हिन्दू वाहुल्य देश है। पर इधर दो तीन दशकों से यहाँ अंग्रेजी का आधिपत्य बढÞता जा रहा है। नई संतति में अंगे्रजियत एवं फैशनपरस्ती की प्रक्रिया बढÞती जा रही है। गरीबी के कारण लोगर् इर्साई धर्मान्तरण करने के लिए बाध्य हो रहे हैं। इसका मुख्य कारण हिन्दू ही अपने धर्म पर कुठाराघात कर रहे हैं। देश से ‘संस्कृत’ ‘हिन्दी’ ‘नैतिक शिक्षा’ जैसे विषयों को हटा दिया गया, मंदिरो में पूजा पाठ पर रोक लगा दी गई, लोगों को अन्तिम संस्कार करने में दण्ड दिया जाने लगा तथा बिना किसी आधार के देश को धर्म निरपेक्ष घोषित कर दिया गया। जो हिन्दू समाज सभी जाति वर्ग मिलकर आपस में अपने रीति रिवाज धर्म कर्म तिथि त्यौहार मनाते थे। वे आज अलग अलग जाति संगठनो में विभाजित कर दिए गए, सामाजिक संरचना जो एकता पर निर्भर थी उसे अलग अलग समूहो, पार्टियों, संगठनो में विभाजित कर दिया गया है। यह देश के लिए एक बहुत ही दर्ुभाग्यपर्ूण्ा निर्र्ण्र्ाा लिया गया।
यहाँ सभी वर्ग अवध संंस्कृति के अनुसार जो होली, दिवाली, दशहरार्,र् इद, बकरीद, संक्रान्ति, छठ, श्रार्द्धकर्म, ऋषि पंचमी, गुरु पूणिर्मा, वैशाखी आदि पर्व मनाते थे सब आपस में गले मिलते थे उनमें अब राजनीतिक खटास पैदा कर दी गई है।
दोनों देशोें के तर्ीथ स्थान एक दूसरे देशकी एकता को दर्शाते हैं। यहाँ के नगर, गाँव, स्त्री-पुरुषो के नाम अवध क्षेत्र के अनुसार रखे गए, पुरुषों के नाम राम कृष्ण आदि देवता के नाम पर और स्त्रियों के नाम सीता, सावित्री, पार्वती दर्ुगा, लक्ष्मी आदि के नाम पर रखे गए। नदियों। पहाडों, तीर्थों के नाम पर भी नाम रखे गए है, गंगा प्रसाद, जमुना प्रसाद, हिमालय शमशेर, प्रयागदत्त, काशी प्रसाद आदि राम नगर, कृण्ण नगर, शिवपुर, गंगाापुर, भवानीपुर, आदि ऐसे हजारांे नाम पशु पक्षियों के भी रखे गए। फल फूल वनस्पति, सरसामान, धर्मग्रन्थ, ऋषि, मुनि, सन्तों के नाम पर भी नाम रखने की प्रथा चली। अवध के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त के समस्त १६ संस्कारों को मनाने का प्रचलन यहाँ भी चला, गर्भाधान, पुंसंवन, जन्म षष्टी, वरहीँ -नामकरण), अन्न प्राशन, विद्यारम्भ, उपनयन, चूडÞा कर्म, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास आदि संस्कार दोनों देशो में मनाने का प्रचलन है। मुस्लिम संस्कृति एंवर् इर्साई संस्कृति का प्रभाव भाषा भेष एंव भोजन पर अधिक पडÞा। हजारों अरबी, फारसी एंव अग्रेजी के शब्दो का आयात हुआ। न्याय प्रणाली, कर्मचारी में इन शब्दों का प्रयोग अत्यधिक मात्रा में देखने को मिलता है। जैसे अदालत, उजूरी, फैसला, इंसाफ, सरजमीन, मौका, जंगी निजामती, सजा, दस्तखत, अर्जी, दरख्वास्त, तहरीर, मजमून, आदि, अंग्रेजी के ब्यारेक, क्यापटेन मैलेट्री, वटालियन, बालीबाल, फुटवाल, बाडी, ट्रेन, लालटेन, हिटर, रेस, आफिस, बैँक, रोड, आदि हजारो शब्द हमारी बोल चालकी भाषा में सामान्य हो गए है। पैँट, र्सट, कोट, र्टाई शू, कैप, अन्डरवियर मफलर आदि शब्द पहनावे में आम प्रयोग होने लगे हैं। इस तरहसे खाने पीने में भी भेजीटेरियन, नानभेजीटेरियन, होटेल, ट्मैटो, मीट, प|mाई, कार्नपलेक्स, वाटर, हृवीस्की, वियर एवं, आमलेट आदि शब्द इन शब्दों की गणना में किताब बन जायेगी। अतः कहना यह है कि अवध संस्कृति का नेपाली संंस्कृति पर स्थायी प्रभाव पडा है। जो अमिट है। पर सभ्यता पर जो प्रभाव पडÞा, उससे यहाँ की सभ्यता में परिवर्तन आ गया है। लोगों का आचार-व्यवहार, रहन सहन, सब धीरे-धीरे बदलते जा रहे हैं। बाल विवाह, बहुविवाह, अनमेल विवाह, विधवा विवाह, दहेज प्रथा ने मधेश को एकंागी बनाया है। स्त्रियाँ घर के चूल्हा-चौका तक ही सीमित है। वे अपने अधिकार के लिए आज भी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं।
दोनों देशो के निवासी चारो धाम, गया, काशी, प्रयाग एंव शंकराचार्य के महात्म्य को शिरोधार्य करते हैं। वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत, आयर्ुर्वेंद, ज्योतिष आदि ग्रन्थों पर दोनों देशो के निवासियों की आस्था है। ये सभी ग्रन्थ भारत भूमि पर निर्मित हुए। नेपाली और अवधी भाषा, दोनों की लिपि देवनागरी है। यहाँ संस्कृति के जितने भी विद्वान् हुए उनका अध्ययन काल बनारस में ही बीता। यहँँा के जितने भी प्रवासी नेता हुए, सबने भारत में जाकर शरण ली। महाराज त्रिभुवन ने भी भारत में शरण लेकर नेपाल में प्रजातन्त्र की घोषणा की। वी.पी. कोइराला का बहुत काल भारत में बीता। इन सबके ऊपर भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियों की छाप पडÞी। लोकतन्त्र का बीजारोपण २००७ साल में ही हो गया था। और उसका फल जाकर अब प्राप्त हुआ है। परन्तु अब भी नेताओं में स्वार्थ की भावना विद्यमान है, राजतन्त्र समाप्त हो गया। परन्तु निरंकुश तन्त्र अब भी सोच में व्याप्त है।
नेपाली और अवधी दोनो समाज में ‘नारी’ की इज्जत अब भी बरकरार है। उसे गृहलक्ष्मी या सुवासिनी -स्वास्नी) कहने का चलन है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता “हमारी आर्य संस्कृति ने स्त्री को अर्द्धर्ाानी का स्थान दिया है, जिस घर में स्त्रियों की इज्जत, मान सम्मान होता है, वहाँ देवताओ का वास होता है। हमारी संस्कृति में स्त्री के तीन रुप होते हैं, बेटी, पत्नी और माँ। जितने रिश्ते नाते है, सब दोनों देशों में एक जैसे है वर्ण्र्ााौर जाति, आश्रम, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की व्यवस्था वहँँा जैसी यहाँ भी है।
नेपाल भारत के साहित्य में एंव भाषा में बहुत समानता है। छन्द, काव्य, गजल, गीत कथा, कहानी, उपन्यास , नाटक आदि लिखने की शैली एक जैसी है और यह शैली अवध साहित्यकारों की देन है।अवध के साहित्यकार, सूरदास, तुलसीदास, कबीर, भारतेन्दु, हरिश्चन्द्र, निराला, प्रसाद, पंत, जायसी, प्रेमचन्द्र, मीरा, वात्स्यान, रामचन्द्र शुक्ल, प्रतापनारायण मिश्र, माखनलाल चतर्ुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, रहीम रसखान, हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि हुए। जिनके लिखे काव्य, छन्द, चौपाई, दोहा, कथा, उपन्यास, आदि विधाओं की पुस्तकें, आज भी नेपाली वर्ग में बडÞे चाव से पढÞते हैं और इन्ही की शैली में लिखने का प्रयास करते हैं। संस्कृृत भाषा का सदा से नेपाल में सम्मान रहा है। लिच्छवी काल में संस्कृत नेपाल की राज भाषा थी। यहाँ नेपाल में जितने भी शासक हुए, उनमें से बहुत कवि एव साहित्यकार भी हुए हैं। जिन्होने अवधी, हिन्दी, संस्कृत, मैथिली भाषा में अपने भावों को काव्य में लिख कर व्यक्त किया है। नेपाल में सैकडÞों लेखक, साहित्यकार र्सजक हुए हैं। जिन्हांेने हिन्दी, अवधी, मैथिली में बहुत सारी रचनाएं की। जिनमें कुछ उल्लेखनीय रचनाकारों का नाम उल्लेख करना चाहता हूँ।
सन् १९६र्०र् इ. तक के कुछ हिन्दी अवधी के गद्यकार लेखको का नाम इसप्रकार हैः
१ केदार शमशेर, लेखनाथ पौड्याल, शम्भूप्रसाद ढुंगेल, शुक्रराज शास्त्री, पं. मुरलीधर भट्टर्राई, दिल्ली रमण रेग्मी, मातृकाप्रसाद कोइराला, विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला, हृदयचन्द्रसिंह प्रधान, धर्मरत्न यामि, रावरानी, पुष्पा कुमारी, पर्ूण्ाप्रसाद व्राम्हण, रामवरन शर्मा, युगल किशोर ‘व्रजेश’, काशीप्रसाद श्रीवास्तव, विश्वनाथप्रसाद गुप्त, महावीरप्रसाद गुप्त, बब्रुवाहन सिंह, रामहरिजोशी, जनकनन्दन प्रसाद वर्मा आदि लेखक तथा पत्रकार हुए। जिन्होने हिन्दी भाषा में अपने उद्गार व्यक्त किए। इनमें कुुुुछ लेखक और जैसे खगनारायण दास, गोकुल शर्मा, विश्वनाथ अग्रवाल, युगेश्वर प्रसाद वर्मा, नित्यानन्द अक्षोम्येश्वरी, प्रताप मिश्र, अंजनीप्रसाद कर्ण्र्ााधर्म किशोर लाला श्री वा, योगेश्वर मिश्र आदि ऐसे ही केदार मान व्यथित सहित सैकडों हैं, जिनका नाम उल्लेख करने में कई पृष्ठ भर जायेगे। कहने का तार्त्पर्य यह है कि ये सभी लोग अवधी हिन्दी साहित्य से अनुप्रमाणित थे। इन लोगो ने प्रगातिशील धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय आदि विधाओं पर कविताएँ, कथाएँ, एंव लेखो के माध्यम से देश में जन जागृति लाने का कार्य किया। देश में जनव|mान्ति लाने का प्रमुख श्रेय इन्ही लेखकांे, पत्रकारों को जाता है।
नेपाली संस्कृति, भाषा, साहित्य एवं स्थापत्य, वास्तु, नृत्य, चित्र, नाट्य आदि कलाओं पर भी अवधी संस्कृति की छाप पडÞी हैं। नेपाल-भारत की कला, मर्ूर्तिकला में अत्यधिक सामञ्जस्य है। राम, शिव, कृष्ण, वौद्ध आदि के मन्दिर दोनांे देशों में एक ही शैली से निर्मित है।
हिमालय प्राचीन काल से ही दोनो देशों के लिए प्रहरी का काम कर रहा है। दक्षिण से आने वाली मानसून को रोक कर भारत और नेपाल दोनों देशों पर उपकार कर रहा है। हिमालय से जलरुपी अमृत लेकर निकलने वाली नदियाँ भारत और नेपाल निवासियों का समान रुप से पोषण कर रही हैं। नेपाल की काली गण्डकी से निकलने वाले शालग्राम भारत के घर-घर में पूजे जाते हैं।
नेपाल की सम्पर्ूण्ा योजनाओं में भारत का ४० प्रतिशत का योगदान है। दोनों देशो में आर्थिक सम्बन्ध, संस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक सम्बन्ध पुरातन काल से है। दोनों देशो में आपसी प्र्रेम सौहाद्र, सद्भाव की भावना है तथा हर क्षेत्र में एक दूसरे पर निर्भर हैं। खासकर नेपाल भूपरिवेष्ठित देश होने के कारण अपने पडÞोसी राष्ट्रों पर विशेष निर्भर है।
उपर्युक्त तथ्यांे से ज्ञान होता है कि नेपाली संस्कृति पर अवधी संस्कृति की पर्ूण्ारुपेण छाप पडÞी है। वर्तमान काल में हिन्दी, संस्कृत, नैतिक शिक्षा के प्रति भले ही उपेक्षा की जा रही है। परन्तु इस वैज्ञानिक युग में इन्टरनेट टी.वी. प्रशारण, एफ एम, एंव विभिन्न पत्रपत्रिका समाचार माध्यमों के द्वारा दुनियां बहुत छोटी हो गई हैं। एक मिनट में दुनियाँ भर की साँस्कृतिक झाकियाँ देखी जा सकती है और इनका समस्त जन जीवन पर प्रभाव पडÞ रहा है। हिन्दी फिल्में नेपाल में अत्यन्त अभिरुचि के साथ देखी जाती हैं।
और कलाकार इन अभिनेताओं अभिनेत्रियों का अनुकरण करके अभिनय करने का प्रयास करते हैं। वाद्य वादन, संगीत, नृत्य का भी प्रभाव पडÞ रहा है। आज विश्वकी राजनीति बदल रही है और उसके प्रभाव से नेपाल अछूता नहीं रह सकता।
-लेखकः अवधी साँस्कृतिक विकास परिषद, बाँके नेपालगंज के अध्यक्ष हैं।)

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