नेपाली समाज–संरचना के परिप्रेक्ष्य में दलित वर्ग

एक ही प्रकार के अथवा बहुत कुछ मिलते–जुलते या समान धर्मवाले व्यक्तियों का समूह अथवा श्रेणी वर्ग कहलाती है (समाजशास्त्र कोश) । एक वर्ग की सामाजिक–आर्थिक परिस्थिति, रहन–सहन का ढंग तथा स्तर अन्य वर्गों से भिन्न होता है । ऐसे वर्गों की भिन्नता में अनुभव, धन संपदा, शिक्षा, राजनीतिक प्रभाव, जीवन शैली आदि में स्पष्ट अंतर होता है । समान्यतया ये एक से अधिक वर्ग प्रगतिशील और रुढि़वादी जैसे सामान्य विरोधी दलों में बँटे हुए होते हैं । निम्न एवं दलित वर्ग उच्च एवं सुविधाभोगी वर्गों के शोषण एवं प्रभुत्व से स्वतन्त्र होने तथा उच्च वर्गों द्वारा अपने प्रभुत्व एवं सुविधाओं को बनाए रखने के कारण दोनों में ऐतिहासिक संघर्ष निरंतर होते रहे हैं ।
कार्लमाक्र्स ने अपनी बहुप्रसिद्ध कृति ‘कम्युनिष्ट मेनीफेस्टो’ में लिखा है कि ‘आजकल विद्यमान सभी समाजों का इतिहास वर्ग–संघर्ष का इतिहास रहा है । वस्तुतः इस प्रकार का संघर्ष प्रत्येक युग में उच्च, धनवान, शासक और शोषक वर्ग एवं पीडि़त, दलित तथा निर्धन के बीच विद्यमान रहा है । प्राचीन काल में यह संघर्ष स्वामी और दास के बीच, मध्यकाल में सामंत और खेतीहर मजदूर तथा बेगार करनेवाले निम्न वर्ग के बीच और आधुनिक युग के विकासशील औद्योगिक समाजों में पूँजीपति और श्रमिकों के मध्य निरंतर चल रहा है । मध्युगीन के सामंत और खेतीहर मजदूर तथा बेगार करनेवाले, प्राचीन काल के स्वामी और दास तथा आधुनिक युग के पूँजीपति और श्रमिक नेपाली संदर्भों में प्रायः उच्च द्विज वर्ग और निम्न शूद्र वर्ग ही है । यह संघर्ष और शोषण की प्रक्रिया युगानुरूप अपने विवि– रूपों और विधियों द्वारा प्रकट होती रही है ।
अपने को उच्च, विशेषाधिकार प्राप्त समाज में एक ओर निम्न वर्ग और दूसरी ओर उच्च शोषक वर्ग के जीवन स्थितियों, राजनीतिक विचारों, आचरण, भाषा, वेशभूषा और व्यवहार में काफी अंतर होता है । आय प्राप्ति की विधि और आय की मात्रा की दृष्टि से दलित वर्ग और उच्च विशेषाधिकार प्राप्त एवं शासक वर्ग में मूल अंतर है । प्रायः अधिकांश उत्पादन जनसाधारण निम्न वर्ग ही करता है, मगर समाज का उच्च प्रतिष्ठित वर्ग सार्वजनिक संपदा का अधिकांश भाग हथिया लेता है क्योंकि उत्पादन के साधनों पर वह नियंत्रण रखता है । इस स्थिति के कारण ही वह सामाजिक और अर्थ व्यवस्था में प्रभुत्व की स्थिति ग्रहण करता है, जससे उसे निम्न, दलित, पीडि़त, असहाय, निर्धन वर्ग का शोषण करने और उसके परिश्रम और उत्पादन को हथियाने की संभावना और अवसर प्राप्त होता है ।
नेपाल में प्राचीन काल से यहां का सवर्ण–द्विज उच्च वर्ग समाज के एक बड़े समुदाय–वर्ग का जातीय आधार पर दमन–उत्पीड़न करता रहा है । यह दमित–उत्पीडि़त वर्ग जो शूद्र नाम से जाना गया है, विभिन्न असमानताओं, अन्याय और उत्पीड़न का शिकार रहा है । समाज का प्रभुता संपन्न वर्ग वस्तुतः परिश्रम करने से बचता है तथा बिना परिश्रम किए ही उपलब्– सभी सुख–सुविधाओं का उपभोग करने का अभ्यस्त होता है । मध्ययुगीन सामंतवादी समाज में वर्ग–व्यवस्था का पूर्ण रूप से जाति व्यवस्था में परिणत हो जाने पर पीडि़त–दमित निम्न शूद्र वर्ग का सामाजिक जीवन स्तर उत्तरोत्तर निम्नतम होता चला गया । इस उत्पीडि़त दलित वर्ग की स्थिति अधिक दयनीय हो गयी थी । मनुष्य की श्रेष्ठता जातिगत और पूर्वनिर्धारित विधि के अनुसार निर्धारित होती थी ।
जाति और वंशगत श्रेष्ठता की कटु आलोचना और प्रखर विरो– का सर्वप्रथम सूत्रपात महात्मा बुद्ध ने किया तथा कर्म और श्रम द्वारा ही व्यक्ति की श्रेष्ठता का मानदंड स्थापित किया । सामंती समाज में वर्ण और जाति दोनों ही शब्द परस्पर समानार्थक अथवा पर्यायवाची हो गए थे । आज स्थिति यह है कि शूद्र जाति के नाम से कोई जाति, उपलब्– नहीं है तथापि शूद्र जाति के अन्तर्गत आनेवाली अनेक जातियों का अस्तित्व उनके नाम से प्राप्त होता है । आज शूद्र के नाम से अलग जाति न होने के बावजूद शूद्रों की सामाजिक स्थिति और जाति प्रथा तथा अछूतों–दलितों की सामाजिक स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं है ।
जाति व्यवस्था में मनुष्य का अस्तित्व उसके जन्म पर निर्भर था, न कि उसकी योग्यता एवं सम्पत्ति पर । जाति व्यवस्था, पदानुक्रमित श्रेणी श्रृंखला आबद्ध थी, इसलिए सामाजिक और आर्थिक, विषमता पर आधारित थी । सामाजिक पिरामिड में शीर्षस्थ ब्राह्मण जाति के ही लोग धार्मिक और सामाजिक क्रिया–कलाप में पुरोहित का कार्य कर सकते थे और उच्च धार्मिक या धर्म निरपेक्ष शिक्षा या ज्ञान की प्राप्ति के एक मात्र अधिकारी भी वे ही थे । इस पिरामिड के निम्नतम धरातल पर शूद्रों, अछूतों–दलितों की जगह नीयत थी, जिन्हें धर्म द्वारा प्रनीत घोषित और राज्य की अवपीड़क सत्ता द्वारा समर्पित हिन्दू समाज ने अन्य जातियों की सेवा करने और हलखोर, चमार, डोम, पोडे आदि की तरह निम्न कार्य करने के लिए बाध्य कर दिया था । अछूतों पर दृष्टिपात होने मात्र से लोग अपवित्र हो जाते थे । इस प्रकार वर्ण व्यवस्था में जो स्थिति शूद्रों की थी, वही स्थिति जाति व्यवस्था में बहुत दिनों तक बनी रही । पदानुक्रमित श्रेणी, सामाजिक असमानता, जातीय ब्याह, भोजन पर प्रतिबंध, पेशे के चुनाव में स्वतंत्रता का अभाव ये ही जाति व्यवस्था के प्रमुख लक्षण बन चुके थे । फलतः नेपाली जनता के आर्थिक अस्तित्व के विकसित होने के कारण जाति प्रथा सदियों तक फलती–फूलती रही ।
व्यक्ति का सामूहिक रूप समाज कहलाता है, जो परस्पर सामाजिक संबंधों में बने रहते हैं । मनुष्य संगठित समाज में ही जन्म लेता है और अपना जीवन–यापन करता है । जिस धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश में वह रहता है, वही उसके अनुभवों को, जिनसे उसकी जिंदगी बनती है, गति और दिशा प्रदान करता है । मनुष्य जिस समाज में रहता है, उस समाज की सुचारु व्यवस्था के लिए उसके कुछ नियम और कानून होते हैं, जिनका पालन सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य के लिए अनिवार्य है । प्रत्येक समाज विभिन्न समुदायों, वर्गों और समूहों में विभक्त रहता है ।
समाज के कार्य सुचारु रूप से चलने के लिए प्राचीन काल में ही आर्यों ने कुछ निश्चित नियम और कानून निर्धारित कर रखे थे । समाज में उचित व्यवस्था बनी रहने के लिए आर्यों ने वर्णाश्रम धन का सूत्रपात किया था । इसकी महत्वपूर्ण चातुर्वण्र्य की व्यवस्था आर्यों की देन थी, जिसके अनुसार नेपाली समाज को चार वर्णों में बांट दिया गया था । प्रत्येक वर्ण की निश्चित व्यवस्था थी । उस समय यह व्यवस्था कर्म पर आधारित थी । परंतु कालांतर में मनुष्य की स्वार्थ लोलुपता के कारण उसमें विकृति आकर यह जन्म पर आधारित होकर जाति व्यवस्था में परिणत हो गई, जो बाद में शोषण का माध्यम बनी । वर्ण व्यवस्था में अभिजात कुलीन ब्राह्मण और क्षत्रिय विशिष्ट माने जाते थे और उन्होंने समाज की समस्त सुविधाएं स्वायत्त कर ली थी । इनके बाद व्यवसायिक वाणिज्य में संलग्न वैश्यों का स्थान था । इस व्यवस्था में सबसे निम्न स्तर अनार्य शूद्रों का था । मध्य युग में उच्च वर्ग ने अपनी परम्परागत प्रभुता को बनाए रखने के लिए धर्मशास्त्रों का सहारा लिया । इससे समाज का उत्पादक, शिल्पी और श्रमिक वर्ग आगे चलकर नीच और अस्पृश्य समझा गया । ये अस्पृश्य मेहनतकश थे और उत्पादक वर्ग होते हुए भी इनकी दशा दासों जैसी हो गयी थी । इनके स्वयं के कोई अधिकार नहीं थे । इनका कर्तव्य केवल द्विजों की सेवा शुश्रुषा और उनके लिए उत्पादन करना था । मध्यकाल में आकर इस दलित वर्ग का निरंकुश शोषण हुआ । इस दलित–पीडि़त वर्ग के साथ सामंती व्यवस्था के पोषक और समाज को उच्च एवं निम्न वर्ग में बांटने वाले पशुवत् व्यवहार करने लगे । शोषक वर्ग ने स्वयं उत्पादन की हुई धार्मिक कुप्रथाओं और बाह्याडंबरों की आड़ में दलित वर्ग का निरंकुश शोषण किया । उन्हें सभी मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया, जिससे दलित वर्ग नारकीय जीवन भोग रहा था ।
अछूत सामाजिक दृष्टि से पूर्णतः शोषित एवं दलित हैं । इन्हें सैकड़ों वर्षों से शोषित–पीडि़त एवं दलित रखा गया है । इसके लिए शिक्षा के द्वार बंद कर दिए गए हैं । यह इंसानियत रूपी हैवानियत की जिंदगी के रूप में पशुओं की भांति इधर–उधर विचरण कर रहे हैं । आधुनिक युग तक समाज द्वारा तिरस्कृत और दुखित दलित वर्ग अनेक अत्याचारों और शोषण का शिकार रहा है । आधुनिक काल में अनेक सुधारवादी संगठनों, मानवाधिकार कर्मियों और समाज सुधारकों के अथक प्रयत्न से दलित वर्ग की स्थिति में पर्याप्त अंतर आया है । आज नेपाली समाज में दलित वर्ग घुल–मिल–सा गया है । दलित वर्ग की स्थिति को सुधारने के लिए नेपाल के नये संविधान में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और अधिकार प्रदान किए गए हैं । लेकिन व्यावसायिक स्तर पर अभी भी दलित वर्ग की शोषण प्रक्रिया रुकी नहीं है । शहरों में दलित वर्ग की स्थिति कुछ संतोषजनक है । शहरों में कुछ हद तक अस्पृश्यता कम हो गई है लेकिन दूसरी ओर चमार, डोम, पोडे, हलखोर जातियों का बना रहना दलितों की दुखी स्थिति को भी प्रकट कर रहा है । शहरों में दलित वर्ग की शोषण प्रक्रिया का स्वरूप बदला है लेकिन पूँजीपति और उत्पादन के स्वामियों के द्वारा श्रमिकों के रूप में दलित वर्ग का आज भी अप्रत्यक्ष रूप से शोषण हो रहा है । दलित वर्ग आज भी धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विधि–विधानों की चक्की में पिस रहा है, उसका उत्पीड़न और शोषण जारी है ।

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