नेपाल और भारत की साझा भाषाएं
प्रा.डा. योगेन्द्रप्रसाद यादव

पृष्ठभूमि
नेपाल और भारत की जैविक विविधता उनकी साँस्कृतिक तथा भाषिक विविधता से मिलती-जुलती है। नेपाल की भूआकृति अत्यधिक धनी और विविधता से युक्त है। इस प्रकार का आबोहवा और भौगोलिक विविधता रहे क्षेत्रों में १०० से ज्यादे औपचारिक रूप में निर्धारित जाति तथा जनजाति बसोबास करते हैं। ये करीब १०० भाषायें बोले जाने का तथ्याङ्क भी जनगणना -२०५८), यादव र टुरिन -सन् २००७) में उल्लेखित है किन्तु एथ्नोलग -सन् २००९) ने तो १२७ तथा नूनन -२००५) ने १४० भाषाएँ का तथ्य प्रस्तुत किया है।
भौगोलिक और भाषिक रूप में भी भारत में ज्यादे ही विविधता पाई जाती है। वहाँ औपचारिक रूप में की गई। पहले की जनगणनाओं ने भी प्रायः १६४२ जितनी भाषाएँ बोले जाने का तथ्याङ्क प्रस्तुत किया है।
उत्तर भारत में बोली जाने वाली बहुत भाषाएँ नेपाल में भी बोली जाती हैं। किसी-किसी सर्न्दर्भ में देखा जाय तो एक ही भाषा बोलने वाले भाषिक समुदाय दो देश -नेपाल और भारत) में विभक्त हुआ और इसको समुदाय ने भी स्वीकार किया है। लेकिन किसी-किसी सर्न्दर्भ में खुली सीमाना के कारण एक देश के भाषिक समुदाय के व्यक्ति दूसरे देश में स्थानान्तरण होते भी देखा जा सकता है। ऐसी अवस्था में उक्त भाषाएँ दोनो देश में बोली जाती हैं और इसी से यहाँ पर इन्हें ‘अंतरसीमावर्ती भाषाएँ’ कही गयी है। इसको जरा अलग तरीका से परिभाषित करने पर ‘सीमा की भाषाएँ’ को ऐसी भाषाएँ के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जहाँ परम्परागत भौगोलिक क्षेत्र राजनैतिक कारण से एक वा एक से ज्यादे सीमाओ में विभाजित होता है, अथवा उन भाषाभाषी इतिहास के काल-खण्ड में स्थानान्तर होकर दूसरे क्षेत्र में बसोबास करने लगते हैं। एक अन्य अर्थ में, ‘सीमावर्ती भाषाएँ’ को स्पष्ट रूप में गलत नामाकरण हुआ है, जहाँ उस भाषाभाषी अपने को विभाजित महसूस नहीं करते। उदाहरण के लिए सन् १८८४-१८८५ में यूरोपेली शक्ति के आधार पर स्थापित हुआ बर्लिन सम्मेलन ने एक औपनिवेशिक सीमा विभाजन किया। इसने बहुत से बडÞे बडÞे अप्रिmकी जातीय समुदाय और उनका भाषिक समुदाय में विभक्त किया। इधर नेपाल और भारत की सीमाओं में भी उसी तरह की घटनाएँ पाई जाती हैं। इसके बाबजूद, ‘सीमावर्ती साझा भाषाएँ’ पारिभाषिक शब्द से नेपाल और भारत जैसे दो पडÞोसी देशों की सीमा में बोली जानी वाली भाषाओं का सत्य-तथ्य पता लगाने के लिए अच्छा सहयोग करता है। इतना ही नहीं, बल्कि इससे सीमा के दोनों क्षेत्रों में बोली जानीवाली किसी-किसी भाषा में अन्य भिन्न भाषाओं का सर्म्पर्क के कारण से होनेवाले भाषिक संसृत और अपसृत -अयलखभचनभलअभ बलम मष्खभचनभलअभ) जैसा परिणाम और उसका कारण उक्त भाषा के शब्द, ध्वनि, रूप, वाक्य और अन्य तह में भिन्नता पायी जाती है जैसे कारणों का पता लगाने के लिए भी उपयोगी होता है। इसीलिए, प्रस्तुत लेख में नेपाल और भारत की सीमा में बोली जाने वाली भाषाओं का संक्षिप्त परिचय अर्न्तर्गत इन्ही वातों को समाहित करने का प्रयास किया गया है।
निर्धारण
एथ्नोलग -सन् २००९), राष्ट्रिय तथ्याङ्क विभाग -२०५८) र यादव -सन् २००३) के विभिन्न तथ्याङ्कों को देखने पर नेपाल और भारत में साझा रूप में बोली जानी बाली भाषाएँ जम्मा ४७ हैं। ये भाषाएँ हैंः अङ्गकिा, अवधी, बघेली, बज्जिका, बङ्गाली, भोजपुरी, बोदो -मेचे), ब्याँसी, चौदङ्सी, दर्मीया, धन्वार -दनुवार), धिमाल, जोङ्खा, पश्चिमी गुरुङ, हिन्दी, खालिङ, कुलुङ, कुरुख -उरावँ, धाँगड, झाँगड), लेप्चा -लाप्चा), ल्होमी, लिम्बू, पर्ूर्वी मगर, मैथिली -थेन्ठी), माझी, मारवाडी, मुगोम, मुन्डारी, नेपाली, नेवारी, राजवंशी, राउटे, रावत, र्राई-किरात भाषाएँ, साद्री -किसान), सन्थाली, शर्ेपा, पर्ूर्वी तामाङ, थामी, चितवनीया थारू, दंगौरीया थारू, कठोरीया थारू, कोचिला थारू, राना थारु, थुलुङ, तिब्बती, उर्दू, याक्खा।
ऊपर के नक्शे में दिखाया गया है कि नेपाल-भारत के सीमा-क्षेत्र की भाषाओं में नेपाल के तर्राई-क्षेत्र में मात्र कितना पडÞता है।
इसके अतिरिक्त, नेपाल और भारत की पर्ूर्वी सीमा में लिम्बू तथा र्राई किराती भाषाएँ साझा भाषाएँ के रूप में बोली जाती हैं जबकि पश्चिमी सीमा में ब्याँसी भाषा प्रयोग में है।
कुछ मुख्य विशेषताएं
क) वंशानुगत सम्बन्ध
अधिकांश सीमावर्ती भाषाएँ भारोपी परिवार के भारतीय-आर्य उपशाखा से आबद्ध हैं। कुछ भाषाएँ भोटर्-बर्मेली, आष्ट्रिक और द्रविड परिवार से आबद्ध हैं। यह नेपाल-भारत सीमा क्षेत्र को भाषिक विविधता से धनी होने की वात की पुष्टि करता है।
ख) भाषिक नाम को स्थानीयकरण
नेपाल और भारत में किसी-किसी भाषा का नामाकरण अलग-अलग तरीके से किया गया है। उदाहरण के लिए, भारत में ‘बोडो’ भाषा नेपाल में ‘मेचे’ कही जाती है। वैसे ही, भारत में ‘कुरुख्’ भाषा को नेपाल में ‘उराँव’, ‘झाँगरु’, धान्गरु कहा जाता है। भारत की ‘शाद्री’ भाषा को नेपाल में ‘किसान’ नाम से पुकारा जाता है, आदि। भाषा का इस प्रकार का स्थानीयकरण करेने की प्रवृत्ति से नेपाल में भाषिक समुदाय जातीय पहचान और चेतना के लिए अपनी भाषा को भी एक आधार मानने की वात स्पष्ट होती है। अलग जातीय पहचान स्थापित होने पर राष्ट्र की ओर से सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक प्रोत्साहन और संरक्षण उपलब्ध होता है, जैसे नौकरी और चुनाव में आरक्षण, आर्थिक प्रोत्साहन, आदि।
ग) भाषिक संसाधन
अधिकांश सीमान्तर भाषाएँ अभी भी कथ्य परम्परा में ही सीमित हैं। प्रायः ऐसी सभी भाषाओं में लम्बे अवधि से एक पीढÞी से दूसरी पीढÞी में निरन्तर चले आ रहे लोक कथा, लोक गीत जैसी मौखिक सम्पत्ति पायी जाती है। इसीलिए ये भाषाएँ लोक-साहित्य में धनी और समृद्ध पाई जाती हैं। ऐसा होते हुए भी इन भाषाओं में विद्यमान इन कथ्य रूपों की कथाएँ साक्षरता और भाषिक स्थानान्तरण
-कजषत) के बढÞते परिवेश से लोप होती जा रही हैं। इसी कारण से इन भाषाओं को लोप होने के पर्ूव ही उनका अभिलेखन करने का समय आ रहा है। इन भाषाओं में बहुत ही न्यून लेख्य परम्परा पाया जाता है। इस प्रकार के भाषाओं में नेपाली, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, तिब्बती, नेवारी, लिम्बू, बङ्गाली, झोङ्खा, हिन्दी, तामाङ और लेप्चा रहे हैं। इन भाषाओं की लम्बी और स्पष्ट लेख्य परम्परा है और इसके लिए इन भाषाओं में विभिन्न लिपियाँ का प्रयोग होता आया हैं। उदाहरण के लिए, तिब्बती और शर्ेपा में प्राचीन लेख्य अभिलेख विद्यमान है, जिसकी पुष्टि भ्यान डि्रम -सन् २००१ः४२८) में भी दर्शाया गया है। तिब्बती लिपि तो सातवीं शताब्दी के मध्य में संस्कृत भाषा में लिखा गया गुप्त अथवा ब्राहृमी लिपि से विकसित होकर आया है। नेपाल और भारत की सीमा में बोली जाने बाली भाषाओं में प्रयोग हो रहे लिपियाँ इस प्रकार हैंः देवनागरी -नेपाली, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु, राजवंशी, तामाङ, मगर, नेवार आदि), मिथिलाक्षर-तिरहुता -मैथिली), कैथी -भोजपुरी, मैथिली), सिरिजङ्गा -लिम्बू), अक्खा -मगर), गुरुमुखी -पन्जाबी), रञ्जना-प्रचलित -नेवार), सम्बोटा -तिब्बती, शर्ेपा), ताम्हिक -तामाङ), पर्सर्ााअरेबिक र्-उर्दू), लाटिन् -सन्थाली), ओल चिचिरसाधारण ओल -सन्थाली), बङ्गाली -बङ्ला)।
सम्प्रति अन्य कुछ भाषाओ ने भी लेख्य परम्परा का विकास प्रारम्भ किया है। इस प्रकार के विकास के लिए विभिन्न भाषिक समुदाय और भाषाविद् द्वारा प्रयास किया गया है। उन्होंने समुदाय को व्यावहारिक रूप में मान्य होनेबाली और सम्बन्धित भाषा की ध्वनि व्यवस्था के अनुरुप होने योग्य लेख्य व्यवस्था का विकास किया है। इस प्रकार की शुरूवात की गई भाषाओं में थारु, राजवंशी ओर सन्थाली हैं। वर्तमान समय में इन भाषाओं ने लेख्य परम्परा का विकास कर विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रपत्रिकाएँ, बालबालिका और प्रौढ के लिए तैयार की गयी पाठ्यसामग्रियों और लोकसाहित्य के लेखन में भी प्रयोग किया गया है।
घ) भाषा प्रयोग क्षेत्र
नेपाली और हिन्दी के अलावा सीमावर्ती साझा भाषाएँ दूसरे तह -कभअयलम तष्भचु) में पडÞते हैं और इनको किसी भी कार्यालय के उद्देश्य के लिए औपचारिक माध्यम की भाषा बनाया नहीं गया है। इसके परिणामस्वरूप एक तरफ इन भाषाभाषी को राज्य द्वारा प्रदत्त फायदे लेने की पहुँच के भीतर नहीं पडÞना और दूसरी तरफ अपनेको राज्य के मूल धार के भीतर समावेश न होने का दर्द महसूस करते हैं।
सीमावर्ती भाषाओं में भारत की तुलना में नेपाल की ज्यादातर भाषाएँ आधारभूत शिक्षा में प्रयोग हुइ हैं। नेपाली और मैथिली के अलावा शिक्षा के माध्यम के रूप में शिक्षण होनेबाली अन्य भाषाओं में भोजपुरी, अवधी, लिम्बू, उर्दू, गुरुङ, खालिङ, उराँव, सन्थाली, राजवंशी, नेवार, सर्ेपा, तामाङ और थारु पडÞती हैं। तथापि भारत में हिन्दी भाषा माध्यम और विषय के रूप में आधारभूत शिक्षा में शिक्षण होने की लम्बी परम्परा पाई जाती है।
भाषिक लोपोन्मुखता
भाषिक रूप में विविधता रहे नेपाल और भारत जैसे देशों में थोडÞी जनसंख्या द्वारा बोली जानीे बाली भाषाएँ धीरे-धीरे लोप होती जायेंगी। क्रस -सन् १९९२ः७) द्वारा किया गया एक अध्ययन के अनुसार २१ वीं शताब्दी के अन्त तक ९०५ मानव भाषाएँ लोप होने का अनुमान है। स्पष्ट रूप में कहा जाय तो क्रिस्टल -सन् २०००ः१८) के अनुसार विश्व में बोली जानी बाली ६९०० से ज्यादा भाषाओं में जम्मा ६९० -अर्थात १०५) भाषाएँ सुरक्षित हैं और बाँकी भाषाएँ सन् २१०० तक लोप होने की आशंका है। विश्वव्यापी रूप में आयी भाषिक लोपोन्मुखता की इस प्रकार की प्रवृत्ति से नेपाल और भारत जैसे बहुभाषी देश भी मुक्त नहीं हो सकते।
कोई भी मानवीय भाषा लोप होते जाने का कारण सीधा और स्पष्ट है। मातृभाषी वक्ताओं द्वारा वदलते परिवेश में सामञ्जस्य रखने पर और अपनी भाषा उन्हें उतना फलदायी नहीं होने पर वे लाभदायी होनेबाली भाषा ही सीखा करते हैं। किन्तु क्यों भाषा लोपोन्मुखता की अवस्था में पहुँचती है यह प्रश्न अत्यन्त गहन और जटिल दिखता है। इसे समझने के लिए जटिलता में संलग्न महत्त्वपर्ूण्ा घटक अथवा तत्त्वों का निर्धारण होना चाहिए और ये तत्व कैसे भाषा लोपोन्मुखता की प्रक्रिया में संग्लग्न हैं इस विषय का मूल्याङ्कन होना चाहिए। इसके लिए अभी हाल ही में नेपाल के भाषाविज्ञान के क्षेत्र में अभ्यास हो रहे भाषिक सबलता -बिलनगबनभ खष्तबष्तिथ) मोडेल उपयुक्त होगा ऐसा विश्वास किया जाता है।
सारांश
भाषिक विविधता केवल एक समस्या नहीं बल्कि एक अवसर भी है। यह समाज के लिए महत्त्वपर्ूण्ा संशाधन भी है। इसीलिए इसे अन्य भौतिक संसाधन जैसे उचित सामाजिक विकास के लिए प्रभावकारी तरीके से प्रस्तुत करना चाहिए। अभी नेपाल और भारत की सीमावर्ती भाषाओं का भी उचित अध्ययन और अभिलेखीकरण नहीं हो सका है। इनका विस्तृत अध्ययन और अभिलेखन होना चाहिए। समय की इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए भाषाविद् और भाषिक कर्ता -बिलनगबनभ बअतष्खष्कतक) सहित का भारत और नेपाल का एक संयुक्त आयोग गठन होना चाहिए जिससे इसका उचित अध्ययन करने का मोडेल तैयार कर सकें, प्राथमिक क्षेत्रों का निर्धारण कर सकें और इस सम्बन्धी कोई क्रियाकलाप कर सकें। ±±±
सर्न्दर्भ सूची
CBS.2001. Population Census, Kathmandu: NPC.
Crystal, David.2000. Language Death, Cambridge: Cambridge University Press.
Krauss, Michael.1992.The world’s languages in crisis.Language 68 4-10.
Lewis, Paul.2009. Ethnologue: Languages of the World, Dallas, Texas: Summer Institute of Linguistics, Inc.
van Driem, George.2001. Languages of the Himalayas: An Ethnolinguistic Handbook of the Greater Himalayan Region, containing an Introduction to the Symbiotic Theory of Language (2 volumes), Leiden: Brill
Yadava, Yogendra P.2003. “Language”, Population monograph, vol.1, Kathmandu: Central Bureau of Statistics, pp.137-171
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