नेपाल और भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु के रूप में हिन्दी : डा. श्वेता दीप्ति

s-2 (2)( विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर काठमाण्डू मे आयोजित भव्य कार्यक्रम मे उप-राष्ट्रपति महामहिम परमानन्द झा प्रमुख अतिथि थे । कार्यक्रम के अध्यक्ष भारतीय राजदूत महामहिम रंजीत रे थे । इसी अवसर पर त्रि वि वि हिन्दी विभाग की अध्यक्ष डा श्वेता दिप्ति ने अपना कार्यपत्र प्रस्तुत किया ।)

काठमाणडू ,१२, जनवरी २०१५ । नेपाल, सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौन्दर्य का धनी देश । विभिन्न जाति, भाषा और परम्पराओं का सम्मिलन है यह देश और कई मायने में अपने पड़ोसी देश भारत के करीब भी । कुछ बातें और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें जोड़ने के लिए प्रयास की आवश्यकता नहीं होती है वह स्वतः जुड़ता चला जाता है । कुछ ऐसा ही आत्मीय रिश्ता है नेपाल और भारत का । कहते हैं आप जिनके जितने करीब होते हैं, तकरार भी वहीं अधिक होती है किन्तु यह तकरार दूरियाँ नहीं बढाती बल्कि  रिश्ते को और भी मजबूती ही प्रदान करती है । नेपाल की सांस्कृतिक विरासत सदियों की है और भारत vh-1से रिश्ता भी तब से ही । हमारे धर्म, हमारे वेद, हमारे पुराण, उपनिषद सब एक हैं । हमारी संस्कृति, हमारी परम्परा इन पर टिकी हुई है और यही दोनों देशों की साँझी विरासत है । कोशिशों के बावजूद इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हमारी नींव कहीं ना कहीं एक ही है । भौगोलिक सीमाएँ अलग हो सकती हैं, पर हम एक दूसरे के सुख और दुख में एक ही हैं ।
संस्कृति, सभ्यता और भाषा ये तत्व हर समाज में मौजूद होते हैं । इन पर प्रत्येक समाज और देश की आधारशिला टिकी होती है । सभ्यता का आन्तरिक प्रभाव संस्कृति है । सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अन्तर के विकास का । सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा–असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर, सभ्यता चंचल है और संस्कृति स्थायी । जिस तरह गृहनिर्माण सभ्यता है तो गृहप्रवेश के अवसर पर होने वाले अनुष्ठित पूजा पाठ संस्कृति और इन सबकी संवाहक होती है भाषा । आज चर्चा का विषय है नेपाल और भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु के रूप में हिन्दी । यहाँ मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगी कि सिर्फ सांस्कृतिक क्षेत्र में ही नहीं हिन्दी यहाँ के हर क्षेत्र चाहे वो सामाजिक हों, धार्मिक हों, राजनैतिक vh-2हों, आर्थिक हों, शैक्षिक हों, साहित्यिक हों या फिर मनोरंजन का हो अपना स्थान बनाए हुए है ।  मैं पहले ही स्पष्ट कर चुकी हूँ कि हमारी सीमाएँ जुड़ी हुई हैं और हमारी परम्पराएँ भी लगभग समान हैं । इस एकता को स्थापित करने में भौगोलिक परिवेष्ठ काफी मायने रखते हैं । भारत के गया, अयोध्या, वृन्दावन, चित्रकूट, देवघर, बासुकीनाथ, हरिद्वार ये सभी तीर्थस्थल ऐसे हैं जो नेपाल के बहुत करीब हैं । सांस्कृतिक रूप से जोड़ने में इन तीर्थस्थलों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । दोनों देशों के हजारों तीर्थालु रोज यहाँ आते और जाते हैं और इनकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है हिन्दी । चाहे पूजा में गाई जानेवाली आरतियाँ हों या ईश्वर के गुणगान के रूप में गाए जाने वाले भजन ये हिन्दी में होते हैं और भक्तगण भाव विभोर होकर इसे गाते हैं उस वक्त उनकी भावनाएँ ना तो भारतीय होती हैं और ना ही नेपाली वो सिर्फ और सिर्फ भक्त होते हैं । सीमाएँ हमारी बनाई हुई हैं पर इतिहास गवाह है कि इन दोनों देशों की संस्कृति ने इसे हमेशा नकारा है । राम ने अयोध्या में जन्म लिया पर शादी जनकनन्दिनी से हुई सिद्धार्थ ने जन्म लुम्बिनी में लिया किन्तु बुद्धत्व उन्हें गया में प्राप्त हुआ, ये वो उदाहरण हैं जो हमारी सांस्कृतिक विरासत की गहराई को बताता है  ।  विद्यापति से लेकर कबीर, सूर, तुलसी तथा आधुनिक हिन्दी साहित्य के स्वरूप निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तक सभी नेपाल की सीमा से सटे हिदी भाषी क्षेत्र से vh-3किसी ना किसी रूप में सम्बद्ध रहे है. और यही कारण है कि इनकी रचनाएँ भारत के साथ साथ नेपाल के जनमानस पर भी अपना प्रभाव जमाए हुए है । सूर की राधा का सौन्दर्य भारत की जनता को ही  नहीं भाता है, वह नेपाल के मानस को भी भाता है । इस समानता ने नेपाल और भारत के बीच ऐसा सहज और आत्मीय वातावरण पैदा कर दिया है जो दोनों ही देश के लोगों में बधुत्व की भावना को जगाती है ।
यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि नेपाल में हिन्दी लेखन की सुदीर्घ परम्परा रही है और यह यहाँ की संस्कृति में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती रही है । लगभग हजार वर्ष पूर्व सिद्धों और नाथों ने अपभ्रंश में जो रचनाएँ रची वे आज भी काठमान्डू में चर्या गीत के रूप में जाने जाते हैं और मनोयोग से गाए भी जाते हैं । नेपाल की रमणीय भूमि ने सिद्धों और संतो को अपनी ओर खींचा, हिमालय की शांत और उन्नत शिखाओं ने उन्हें प्रेरित किया और नेपाल उनकी साधना स्थली बनी यह वह महत्वपूर्ण कारण है जो नेपाल की संस्कृति में हिन्दी के स्थान को निर्धारित करती है । मत्सयेन्द्रनाथ, गोरखनाथ, महात्माशूरकिशोर आदि का नेपाल कार्यक्षेत्र रहा । इन संतों ने अपने धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए जिस भाषा को चुना वह भाषा हिन्दी थी । हिन्दी अपनी सहजता और सरलता के कारण नेपाल की जनता के मन  को कल भी छूती थी आज भी छूती है । ये वो भाषा है जिसे सीखने के लिए किसी भाषा स्कूल में जाने की आवश्यकता नेपाली जनता को नहीं होती है । जापान जाना है तो जापानी कोचिंग, चीन जाना है तो चीनी, अन्यत्र कहीं भी जाना है तो वहाँ की भाषा सीखनी आवश्यक होती है पर भारत जाना है तो हिन्दी सीखने की आवश्यकता नहीं है और न ही भारतीय जनता को नेपाल आने के लिए कोई भाषा सीखनी होती है क्योंकि उन्हें यहाँ कोई असुविधा नहीं होती है । दूरदर्शी संतों ने हिन्दी की इस क्षमता को आँक लिया था इसलिए उन्होंने धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए हिन्दी को चुना ताकि जन जन तक उनकी आवाज पहुँच सके । इस प्रकार धर्म और संतवाणी ने हिन्दी का प्रचार प्रसार यहाँ किया और दोनों देशों की संस्कृति में इसका व्यापक असर पड़ा । गोरखनाथ और उनके शिष्य परम्परा में रतननाथ जैसे योगियों का हिन्दी साहित्य पश्चिमी नेपाल में प्राप्त होता है । मध्यकालीन नेपाल के नाटक साहित्य में समकालीन हिन्दी भाषा का प्रयोग हुआ है । उत्तर मध्यकाल में नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में जोसमणि निर्गुण सम्प्रदाय तथा कृष्णप्रणामी सम्प्रदाय का हिन्दी रचित साहित्य प्रचारित हुआ । इसी समय नेपाल के तराई जनकपुर में रामभक्ति की श्रृंगार और वात्सल्य भावना वाली साहित्य विपुल परिमाण में रचा गया । और जब धर्म और काव्य एक हो जाय तो वहाँ परम्पराएँ स्वयं जुड़ जाती हैं ।
नेपाल और भारत के रिश्तों की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन दोनों देशों का उल्लेख एक दूसरे के धर्म ग्रन्थों में भी प्राप्त हैं । स्कन्दपुराण में  नेपाल का विस्तार से वर्णन मिलता है । इस ग्रन्थ के हिमवन्तखंड में नेपाल महातम्य नाम से नेपाल का विशद वर्णन किया गया है । भगवान एक साथ भारत और नेपाल की भूमि में रमते थे तो भला हमारी संस्कृति में साम्यता कैसे ना होती ? संस्कृत की क्लिष्टता से हटकर हिन्दी की सहजता लोगों को भाती है और यही कारण है कि यह माना गया कि हिन्दी जन जन की भाषा है । इसे ना तो कोई बाँध सकता है और ना ही कोई रोक सकता है ।
हिन्दी और नेपाली दोनों देशों की संस्कृति एक है आर्यावर्त की आर्दश हिन्दू संस्कृति जिसके विषय में दोनों देशों के निवासी गर्वपूर्वक कहा करते है ः एतछेश प्रसूतस्य सकासाद् अग्र जन्मन ः । स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन पृथित्या ः सर्व मानवा ः ।। मनुस्मृति की यह घोषणा दोनों देशों के निवासी समान रूप से अपने गौरव का कारण समझते है और एक ही सांस्कृतिक परंपरा में जीते है । इस सांस्कृतिक धारा में उत्पन्न ज्ञानराशि के कण ही साहित्य है । जैसा कि हम जानते है कि ज्ञानराशि के संचित कोष का नाम साहित्य ह,ै तो वह साहित्य हमें अपने सांस्कृतिक परिवेश से ही प्राप्त होता है । जब दोनों देशो का यह सांस्कृतिक परिवेश एक है तो दोनों भाषाओं के साहित्य में एकता या समानता होना नितांत स्वाभाविक है । यह समानता किस सीमा तक पाई जाती है यह विचार का अलग पक्ष हो सकता है परंतु एक सांस्कृतिक धरातल पर विकासमान और विद्यमान होने से उनमें सांस्कृतिक रूप से अभिन्नता विद्यमान है । आर्दश, परंपरा, निष्ठा, आस्था आदि जीवनमूल्यों में समानता होने के कारण दोनों साहित्य चेतना की समानभूमि पर प्रतिष्ठापित है । निकटतम पड़ोसी होने के कारण जिस तरह ये दोनों राष्ट् राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से जुड़े हैं उसी प्रकार एक सांस्कृतिक सूत्र में निबद्ध होने के कारण भावनात्मक रूप से भी एक दूसरे से जुड़े हैं । नेपाल का तराई क्षेत्र और पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्र भारत की सीमाओं से जुड़ा हुआ है । जिसकी वजह से हिन्दी यहाँ बोली जाती है और समझी जाती है । यह तो निश्चित है कि जब हम किसी भाषा से लगाव महसूस करते हैं तो उससे सम्बद्ध हर एक बातें हमारी अपनी ही होती है । नेपाल की संस्कृति में ही नहीं यहाँ की राजनीतिक और शैक्षिक क्षेत्र में भी हिन्दी का योगदान सर्वविदित है किन्तु इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में नेपाल और नेपालवासियों का योगदान कितना महत्वपूर्ण है खासकर तराई से जुड़े व्यक्तियों का । स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेताओं को नेपाल में पनाह मिलती थी और जाहिर सी बात है कि उनके बीच जिस भाषा में संवाद होता था वो हिन्दी ही थी । यहाँ तक कि वहाँ के आन्दोलन से प्रभावित होकर जब यहाँ की राजनीतिक परिदृश्य में हलचल शुरु हुई तो उनके भाषण और अभिव्यक्ति हिन्दी में ही हुआ करते थे । और यह तभी होता है जब आप अपने आपको उसमें सहज पाते हैं । हिन्दी साहित्य ने यहाँ के जनमानस में भी जागरुकता के भाव जगाए । नेपाल में प्रजातान्त्रिक जागरण लाने में हिन्दी भाषा साहित्य ने असाधारण योगदान दिया है । तत्कालीन महान नेतागण वीपी कोईराला, मातृका प्रसाद कोईराला, डिल्लीराज रेगमी, रामराजा सिंह आदि ने खुले दिल से हिन्दी भाषा का व्यवहार किया है और इसमें रचनाएँ भी की हैं । प्रजातंत्र के लिए संघर्षकाल में हिन्दी और नेपाली दोनों ही भाषाओं का खुल कर प्रयोग किया गया । यहाँ तक की राजा भी अपने भाषण का हिन्दी अनुवाद तराई क्षेत्रों में सुनवाया करते थे ।
हिंदी भाषा और साहित्य चिरकाल से नेपाल राष्ट्र में समादृत रहे हैं । नेपाल राष्ट्र की जनता और साहित्यकारों ने हिंदी और नेपाली दोंनो भाषाओं में, साहित्य की रचना सामान दक्षता से की है । उन लोगों के बीच नेपाली को भाषा और हिंदी के लिए पक्की भाषा या खड़ी बोली नाम प्रचलित था । नेपाली साहित्य और नेपाली साहित्यकार हिन्दी साहित्य और साहित्यकार से प्रभावित थे । नेपाली साहित्य में आधुनिक युग प्रारम्भ करने वाले कवि मोती राम भट्ट भारतेन्दु मण्डल के कवि थे और वहीं से उन्होंने निज भाषा उन्नति का मूलमंत्र ग्रहण किया ।  लेखनाथ, कवि व्यथित, भवानी भिक्षु जैसे महान नेपाली साहित्यकारों ने हिन्दी भाषा में रचनाएँ की और हिन्दी क्षेत्र में स्थापित भी हुए । आज भी हिन्दी साहित्य यहाँ पढ़े जाते हैं और पसन्द भी किए जाते हैं । फणीश्वरनाथ रेणु का नाम तो नेपाल के राजनीतिक और साहित्यिक दोनों ही क्षेत्र में विशेष रूप से स्पृहणीय और अविस्मरणीय है । जिस व्यक्ति ने यहाँ के सौ वर्षों के क्रूर तानाशाही राणा शासन के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई में स्वयं सक्रियता के साथ भाग लिया और जिन्होंने उस कठिन संक्रमण काल में स्वतन्त्र रेडियो नेपाल के सलाहकार और अनुवादक के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया उन्हें भुलाया नहीं जा सकता है । रेणु ने नेपाली क्रान्ति कथा लिखकर यहाँ के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास को अमर बना दिया ।
किसी भी राष्ट्र की उन्नति वहाँ की जनता और शिक्षा पर निर्भर करती है । शैक्षिक विकास के क्रम में नेपाल के इतिहास में हिन्दी भाषा के योगदान को तो चाहकर भी नकारा नहीं जा सकता है । भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही उसका प्रभाव नेपाल में भी पड़ा । विक्रम सं. २००७ में विगत १०४ वर्ष से चले आ रहे राणा शासन का अन्त हुआ । इसके बाद ही देश में विकास हेतु कुछ कदम परिचालन हुए, इसी के तहत वि. सं. २००९ में शिक्षा समिति का गठन किया गया । सरदार रुद्रराज की अध्यक्षता में ४६ सदस्यों का एक आयोग गठन किया गया और यह तय हुआ कि पाँच वर्षों के भीतर देश में एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी । राजा त्रिभुवन की यह हार्दिक इच्छा थी कि ऐसा हो पर विभिन्न कारणवश यह परिकल्पना मूत्र्त रूप नहीं ले पाई । उनके इस स्वप्न को साकार करने हेतु बडा महारानी कान्तिराज लक्ष्मी देवी ने वि. सं. २०१२, चैत्र महीने के १८ गते को त्रिभुवन विश्वविद्यालय योजना आयोग की घोषणा की जिसमें ८ सदस्य शामिल थे । इस आयोग ने त्रिभुवन विश्वविद्यालय सम्बन्धी पहले चरण का कार्य राजा त्रिभुवन के १२वें जन्मोत्सव पर शुरु किया । तत्पश्चात् ५३वें जन्मोत्सव पर स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरु हुई । विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले  एस. एल. सी बोर्ड और स्नातक तह की परीक्षा बिहार के पटना बोर्ड से संचालित होती थी । काठमान्डू स्थित त्रिचन्द कालेज भी पटना विश्वविद्यालय से ही सम्बन्धन प्राप्त था । प्रायः सभी शिक्षक भी भारतीय मूल के ही थे । तराई के सभी विद्यालयों में अध्ययन का माध्यम हिन्दी ही थी ।
सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक और शैक्षिक क्षेत्र के साथ ही नेपाल में हिन्दी का सबसे अधिक प्रभाव रहा है मनोरंजन के क्षेत्र में । शास्त्रीय  एवं हिन्दी सुगम संगीत का नेपाल में प्रसार बहुत पहले से रहा है । भक्तिकालीन संतों के मधुर संगीत का प्रभाव पूरे दक्षिण भारत तक पहुँचा था ऐसे में पड़ोसी देश नेपाल इससे कैसे अछूता रह सकता था । भजनाश्रमों में ये भजन नियमित रूप में गाए जाते थे । यहाँ के राजदरबार में तो विशुद्ध हिन्दी उर्दु के गीत गाए जाते थे ।
भारत में जब सवाक फिल्मों का दौर आया तो हिन्दी गाने हर जुवान पर चढ़ने लगे जिसका असर यहाँ भी हुआ और यह जादू आज तक बरकरार है । फिल्मी गीतों के प्रारम्भिक अवस्था से ही सिर्फ तराई क्षेत्र ही नहीं बल्कि पहाड़ों पर भी इन गीतों ने सभी के मन को मोह लिया था । जमाना रेडियो का था और विविध भारती के गीत हर घर में गूँजते थे । ये गीत अपनी सरलता और सहजता के कारण हर जुवान पर आसानी से चढ़ जाते थे । समय बदला विज्ञान ने गीत, संगीत की दुनिया में क्रांति ला दी कोई क्षेत्र इसकी पहुँच से बाहर नहीं है । हिन्दी फिल्मों की तो बात ही मत पूछिए । शुक्रवार को रिलीज होने वाली हिन्दी फिल्म उसी दिन यहाँ भी रिलीज होती है और थियटर में लोगों की भीड़ बताती है कि यहाँ की जनता उसे कितना पसन्द करती है । टीवी की दुनिया में भी गृिहणियों की पसन्द हिन्दी धारावाहिक ही हैं । उसके साथ ही उनका समय कटता है । वास्तव में देखा जाय तो हिन्दी गीत संगीत और गजल आदि ने यहाँ के जनमानस में हिन्दी के प्रति गहरी आत्मीयता पैदा करने में सहयोग दिया है । आजकल तो पंजाबी गाने भी यहाँ काफी लोकप्रिय हो रहे हैं साथ ही सूफी संगीत को भी नई पीढ़ी अत्यन्त पसन्द कर रही है । धर्म के बाद हिन्दी से किसी ने यहाँ के जनमानस को अगर सबसे अधिक किसी ने जोड़ा है तो वह है मनोरंजन का क्षेत्र । ये सारी बातें इस तथ्य को जाहिर करती हैं कि हिन्दी यहाँ के जन जन में कुछ इस तरह समाहित है कि उसे कोई भी कारण विलगा नहीं सकता है । नेपाल में हिन्दी का विस्तृत प्रयोग इस बात का प्रमाण है कि यहाँ हिन्दी के प्रति सदा अपनेपन का भाव रहा है । संस्कृत की मुख्य अधिकारिणी के रूप में भी हिन्दी को यहाँ मान सम्मान मिलता रहा है । और आज तो सारे विश्व में भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी ने हिन्दी का झण्डा ही गाड़ दिया है । हिन्दी और नेपाली के बीच जो अत्यन्त सामीप्य और आन्तरिक साम्य मिलता है, उसके आधार पर दोनों भाषाओं के सम्बन्ध को नेपाली मुहावरे के अनुसार सहोदर सम्बन्ध कहा जा सकता है । और जो रिश्ते सहोदर होते हैं, वो कभी समाप्त नहीं होते, चाहे कोई कितनी भी कोशिश कर ले । आनेवाला कल इन दो देशों के रिश्ते को और भी मजबूती प्रदान करे यही हमारी शुभेच्छा है ।
सुझाव के लिये :
डा. श्वेता दीप्ति
विभागीय प्रमुख,
हिन्दी केन्द्रीय विभाग,
त्रिभुवन विश्वविद्यालय, कीर्तिपुर । [email protected]; [email protected]

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