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नेपाल और मधेश के सम्बन्ध में विश्व महाशक्तियों की रणनीति : कैलाश महतो


कैलाश महतो, नवलपराशी | नेपाल शराब के नशे मेंं ही स्वतन्त्र मुल्क है । इसकी गरिमा और ज्यादा तब बढ जाती है, जब नेपाली कहलाने बाले लोग भोले बाबा का भांङ्ग खा लेते हैं । भांङ्ग के नशे में वे और उनके इतिहास यह कहने लगते हैं कि संसार में नेपाल और नेपाली ही ऐसे देश और देशबासी हैं, जो कभी कि सी के गुलाम नहीं हुए ।
२७१ ई.पू. में नाम प्राप्त नेपाल आज भी खस आर्यों का गुलाम है । नेपाल नेपालियों का रह ही नहीं गया है । जिन महापुरुषों ने नागदह को नेपाल बनाया ‐सत्यवती, सांग्रिला, नागदह, नेपाल और काठमाण्डौ), उनके सन्ततियों के पहुँच से काफी दूर है नेपाल । और दुःख की बात तो यह है कि जिस भूमि के शासक ही गुलाम हों, उस भूमि की स्वतन्त्रता कैसी ? नेपाल किसी शासक के शासन में है, अपने भूमिपूत्र के हाथों में नहीं । शासक हमेशा बाह्य होता है । उसका मूल ध्येय उस भूमि को लुटने में होता है । भूमिपूत्र अपने भूमियों पर शासन नहीं, उसकी सेवा करता है । इसिलिए तो नरेन्द्र मोदी जी अपने को शासक नहीं, सेवक कहते हैं ।
लुट, फरेब, बेइमानी और सीमा बिस्तार से शुरु हुए गोर्खा और नेपाल राज्यों की कहानी आज भी ज्यों का त्यों है । जिन गोर्खा और नेपाल के शासकों ने नेपाल और गोर्खा को गुलाम बनाया, वे खुद आज भी दुनियाँ के गुलाम बने हुए हैं । कहते हैं न कि बुरों का कभी भला नहीं हो पाता, वही हाल नेपालियों का है । वे हर किसी के गुलामी में हैं । वे अपने स्वार्थ पूरा करने के लिए दुनियाँ को अपना तन, मन, आत्मा और जमीरतक को सौंप देता है । जिस नेपाल ने न तो कभी किसी को जित पाया, न हरा पाया और न कभी स्वतन्त्र शासक बन पाया, वह सबसे ज्यादा “हटी होइन, डटी लडने, नेपाली को बानी हुन्छ” रटता रहता है । आश्चर्य की बात यह भी है कि जो नेपाली ही नहीं है, वह नेपाली होने में गर्व करता रहता है ।
चोर का अपना कोई जग नहीं होता, ठग को अपने उपर कोई भरोसा नहीं होता और धुर्तों का अपना कोई नीति नहीं होता । आज के नेपालियों का तो वास्तव में अपना देश भी नहीं है । उसका अपना अगर देश होता तो उसकी रक्षा और विदेश नीति अपनी होती । उनपर उनका पूर्ण अधिकार होता । कोई उनको अपने जिम्मे लेने के बात नहीं करते । देश की सुरक्षा की सारी नीतियाँ उसकी अपनी होती । वो भारत या चीन के छायाँ में नहीं, अमेरिका और यूरोप के दया में नहीं, उसकी अपनी ही छवि और छायाँ होता, उसका अपना नेपाल नयाँ होता ।
वैसे भी सन् १९२३ से पहले नेपाल कोई देश ही नहीं था । वह ब्रिटीशों का रखैल था । उसने उसे सन् १९२३ में देश की मान्यता दे दी । मगर हुकुमत अपने पास ही रखी जो आज पर्यन्त कायम है । वह काम आज ब्रिटीशों के जगह कोई और करता है ।
अंग्रेजों ने अपने फायदों के लिए मधेश को अपने गुलाम नेपाल के अधिन कर दी । हकिकत यह हैं कि मधेश को अंग्रेजों ने भी नहीं जिती थी । मगर उन्होंने मधेश को जितने बाले मुगलों को भी जीत ली और मुगल शासित मधेश पर अपना आधिपत्य बना ली, यद्दपि मधेश में मधेशी राजा महाराजा तथा महारानियों की राज कायम थे । सन् १८१४–१८१६ के अंग्रेज–नेपाल युद्ध के समय भी तिरहुत मिथिला मधेश के महाराजा छत्र सिंह बहादुर थे । सन् १८५०–१८६० तक मिथिला मधेश का महाराजा महेश्वर सिंह बहादुर ‐ठाकुर), हिज हाइनेस महाराजा सर लक्ष्मीश्वर सिंह बहादुर ‐सन् १८६०–१८९८) और सन् 11 February 1856 – 8 July 1859 तक पश्चिमी मधेश पर लखनउ की बेगम हजरत महल की शासन रही थी । वैसे ही वि.सं. १८०० में दाङ्ग के राजा दंङ्गीशरण रहे थे । मधेश नेपाल का न होने का यथेष्ट प्रमाण सन् १८१४, १८१५, १८१६, १८६०, १९२३ में हुए नेपाल और इष्ट इण्डिया कम्पनी के सरकार बीच हुए सन्धियाँ और नेपाल तथा स्वतन्त्र भारत बीच सम्पन्न १९५० के सन्धि सम्झौतों के साथ ही नेपाल और मधेश बीच सन् १९५१ तक कायम रहे पारपत्र प्रणाली से भी दिखता है ।
नेपाल से पीडित मधेश आज अधिकार नहीं, आजादी की माँग कर रही है । सन् १९५१ से २००७ तक अधिकार की बातें करने बाला मधेश आज स्वतन्त्रता की आवाज उठा रही है । स्वतन्त्रता की यह आवाज किसी कल्पना की उपज न होकर धरातलीय यथार्थ बन चुका है । संसार चाहे कोई भी तरकीब लगा लें, मधेशियों को अब आजादी ही चाहिए बाली मानसिकता बन चुकी है । देर सबेर झापा से लेकर कंचनपुरतक की मधेशी भूभागों को आजाद होना ही होगा ।
नेपाल सम्बन्ध में विश्व शक्तियों की रणनीतियाँ भी सुनी जा रही हंै । नेपाल में उठ रहे अधिकार और स्वतन्त्रता आन्दोलनों को दर किनार करने और एक निष्कर्षपूर्ण परिणाम देने के लिए संभवतः विश्व के अमेरिका, ब्रिटेन और चीन जैसे महाशक्तियों द्वारा अपने अपने तरीकों से हल निकालने के रास्ते ढूँढे जा रहे हंै जिस पर कुछ विश्व राजनीतिक विश्लेषकों का विश्लेषण बाहर आने लगे हैं । वे विश्लेषक कितने दमदार हैं, यह तो समय ही बतायेगा । मगर उनके अनुसार अमेरिका चाहता है कि किसी कालखण्ड में भारतवर्ष में ही रहे मधेश लगायत नेपाली भूभागों को भारत में ही सामेल कर नेपाल को जम्मू काश्मिर के तरह भारत का एक स्वायत्त क्षेत्र बना दिया जाय । इससे अमेरिका को प्रत्यक्ष रुप से भारत जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के जरिये अपने लक्ष्य के शक्तियों से उचित डील करने का अवसर प्राप्त हों ।
ब्रिटेन, जो यह मानता है कि नेपाल और इष्ट इण्डिया कम्पनी के सरकार के बीच हुए सँझौतों के अनुसार नेपाल को मधेशियों के साथ किसी भी प्रकार का विभेद न करने के जो सम्झौते हुए थे, उसे नेपाल ने पालन नहीं की है । उसके कारण मधेश अपने को अपमानित महशुश करता रहा है । मधेश के अपमान में कहीं न कहीं, किसी न किसी रुप में बेलायत भी अपने को जिम्मेबार महशुश कर रहा है । एक्कीसवीं शदी में भी नश्लभेदी शासन के मार्फत मधेशियों के प्रति नेपाल का जो अमानवीय विभेद है, उससे निपटने का एक सबसे मजबूत उपाय मधेश को आजाद कराना ही है । क्योंकि वैसे भी मधेश नेपाल का अभिन्न अंग नहीं रहा है । यह होने से ब्रिटेन के मानव अधिकार सम्बन्धि मान्यताओं पर विश्व सकारात्मक होगा और उसकी छवि और निखर सकती है ।
वैसे ही तीसरे तरफ चीन है जिसे फिलहाल अपने विश्व व्यापार और उसके बाजार के आलावा किसी और मसलों पर प्राथमिक ध्यान नहीं देना है । वह चाहता है कि नेपाल के जरिये पहले वह भारतीय सीमातक अपना व्यापारी सिकंजा फैलायें । वह इस बात से वाकिफ है कि संसार में हथियारों से लडना उसके लिए अब कोई मुश्किल काम नहीं है । वह चाहता है कि लोगों को पहले अपने उत्पादनों का दीवाना बना लें । फिर उसे हथियारों के इस्तेमालों में ज्यादा माथा नहीं लगाना पडेगा । उसके पास करोडों उसके उपभोतmा होंगे, उसके पास संसार को खरीदने के लिए पैसे होंगे और जब पैसे रहेंगे तो संभावित किसी भी युद्ध का रिजल्ट भी उसी के पक्ष में होने का संभावना प्रवल रहेगा ।
अभी उसे न नेपाल से मतलब है, न मधेश से । प्रथमतः उसे विश्व स्तर पर अपना व्यापार फैलाना है । व्यापार के जरिये अमेरिका के भाँति या हो सके कि उससे भी शतिmशाली रुप में संसार पर अपना राजनीति कायम करना है । लेकिन वह यह जानता है कि उसके प्रतियोगी से ज्यादा प्रत्यक्ष होने में नेपाली शासन से अच्छा और कोई नहीं हो सकता ।
उन विश्लेषक को मानें तो उनका विश्लेषण आधारहीन भी नहीं लगता । क्योंकि हाल फिलहाल अमेरिका, भारत और चीन के बीच में हथियारबन्द युद्धों से ज्यादा गम्भीर व्यापार युद्ध शुरु हो चूका है । यह युद्ध किसी भी मायने में किसी विश्वयुद्ध से कम भयंकर नहीं हो सकता ।

मधेश के अपमान में कहीं न कहीं बेलायत भी अपने को जिम्मेबार महशुस कर रहा है ।

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