नेपाल का दशहरा

विजयादशमी का पर्व संसार के विभिन्न देशों में विभिन्न जातियों व समुदायों द्वारा अपने-अपने विशिष्ट ढंग से मनाया जाता है। वैसे तो यह दिवस अच्र्छाई की बुर्राई पर विजय का प्रतीक है, जिसका आरंभ माँ दर्ुगा द्वारा महिषासुर के संहार पर हुआ था और बाद में राम की रावण पर विजय को दशहरे का रूप दे दिया गया, लेकिन यह पर्व मुख्यतः क्षत्रिय पर्व ही माना जाता है। तभी तो गोरखा या नेपाली समाज इसे बहुत ही उल्लासपर्ूवक मनाते हैं।
नेपाल में विजयादशमी -टीका) के आगमन की भनक के साथ ही एक पारंपारिक गीत सुनाई पडÞने लगता है –index
‘दशैं आयो, खाऊंला-पिऊंला।
कहाँ पाउला – चोरी ल्याऊंला।
धत् पाजी, परै बसौंला !’
अर्थात् दशमी आ गई, खाएंगे-पीएगें, पर कहाँ से लाएंगे – चोरी करके लाएंगे। धत् पाजी, तुझ से दूर ही रहेंगे। अंतिम पंक्ति में नेपाली लोगों कर्ीर् इमानदारी जाहिर होती है, जो भूखे को चोरी करने से रोकती है।
बच्चों का गीत
नेपाल में दशमी आने के पहले माताएँ-दादियाँ बच्चों को गोद में बिठाकर उनकी छोटी-छोटी पाँचों अँगुलियाँ अपने हाथों में लेकर एक-एक अँगुली पकडÞकर यह गीत सिखाती हैं। पहले कानी अँगुली पकडÞकर कहेंगी -दशैं आयो। फिर उसके बाद वाली -अनामिका) अँगुली पर खाऊँला-पिऊँला, मध्यमा अंगुली- कहाँ बाट ल्याऊँला – उसके बाद तर्जनी यानी चोर अँगुली कहेगी- चोरेर ल्याऊँला। इस पर अँगूठा दूर हटता हुआ कहेगा- धत् पाजी, पर जा !
दशहरा आते ही नेपाल के घर-घर में चहल-पहल शुरु हो जाती है। नेपाली दशमी के आगमन का आभास नागपंचमी से ही हो जाता है। दशमी ऐसे ही नहीं आती। नागपंचमी से लेकर और भी कई त्यौहार उसे पास खींच लाते हैं -जैसे त्यौहारों का राजा विजयादशमी।
होली या फाग का भी नेपाली जनजीवन में महत्त्व बढÞता जा रहा है। दशमी त्यौहारों का राजा है और अन्य त्यौहार इसके दरबारी ! अन्य त्यौहार आते हैं तो मनाए जाते हैं, उन अवसरों पर कोई खास तैयारी नहीं होती, लेकिन दशमी को बुलाया जाता है और इसके स्वागत की तैयारी धूमधाम से होती है। गरीब सीमित ढंग से और अमीर असीमित ढंग से, लेकिन है यह सबका त्यौहार। इस अवसर पर मदिरा का भोग लगाना जरूरी होता है और बलि भी दी जाती है। घर में आनेवालों को ‘भुट्नबजी’ -भुना हुआ गोश्त, चिवडÞा) के साथ चावल का ‘ऐला’ -र्ठरा) पेश करने की परंपरा है।
सेनाएं और कालरात्रि
नेपाल या गोरखा सेनाएँ बहुत ही अद्भुत ढंग से दशहरा मनाती हैं। वहाँ माँ काली तथा माँ दर्ुगा की पूजा नौ दिनों तक की जाती है। नवरात्रि के प्रथम दिन विशाल मैदान में विशेष रूप से निर्मित पूजा-गृह में जौ की बिजाई के पश्चात माँ दर्ुगा की मर्ूर्ति के सामने पाँच फलों, जिनमें पेठा विशेष होता है, की बलि दी जाती है। इसके आठवे दिन कालरात्रि का आयोजन होता है। मध्य रात्रि में बारह बजे बैंड, शंख, नगाडÞे आदि कालरात्रि के आगमन की सूचना देते हैं जो पशु-बलि के लिए निर्धारित समय के द्योतक हैं। कालरात्रि को पाँच फलों की बलि के पश्चात पशु बलि दी जाती है। शांति के संदेश के लिए कबूतरों को आकाश में भी छोडÞा जाता है। महिषासुर के प्रतीक एक हट्टे-कट्टे भैंसे की बलि के साथ यह समारोह चरमावस्था पर पहुँचता है। इस प्रकार विजयादशमी शस्त्रपूजा या महाबलिदान के रूप में मनाई जाती है।
प्राचीन परम्परा अनुसार गोरखा दरबार से सैनिकों की एक टुकडÞी सप्तमी के रोज फूलपाती लेकर हनुमान ढोका काठमांडू में पहुँचती है। उस टुकडÞी का भव्य स्वागत करते हुए फूलपाती को हनुमानढोका के अन्दर तलेजु भवानी के पास रख कर पूजा की जाती है। गणतन्त्र आनेसे पहले नेपाल में विजया दशमी के रोज राजारानी के हाथों से टीका-प्रसाद ग्रहण करने के लिए जनता उमडÞ पडÞती थी। इसके लिए देश के दूरदराज जगहों से र्सवसाधारण लोग काठमांडू आते थे। लेकिन अब यह परम्परा राष्ट्रपति के द्वारा निर्वाह की जा रही है। पर्ूव राजा भी इस परम्परा को अभी तक निर्वाह करते आ रहे हैं।र्
पर्व की एकरूपता
नेपाल में ही नहीं, नेपाली संसार में कहीं भी हों, दशहरा समान रूप से मनाते हैं। नेपाल में खासकर काठमांडू में इसका रूप कुछ और भव्य हो जाता है राजकीय समारोहों से। जनता में लोकप्रिय होने के लिए शाहवंश के राजाओं ने काठमांडू की कई धार्मिक परंपराओं को अपना लिया था और ये परंपराएँ जनजीवन, देश की सांस्कृतिक धरोहर का एक मुख्य अंग बन गई हैं, जैसे कुमारी जात्रा, खडग पूजन, कोतबलि, टीका आदि। वहाँ पर किसी धार्मिक समारोह में वह राजा नहीं रह जाता। रहेगा भी तो कुछ दिन, कुछ मास या कुछ साल। स्थायी नहीं रह सकता। कुमारी देवी का टीका राजगद्दी का नवीनीकरण है। हर वर्षकरना ही होगा। उसी प्रकार टीका -विजयादशमी) वाले दिन राज दरबार में राजा प्रजा को अबीर, चावल, दही का टीका लगाते हैं। कोई जरूरी नहीं है कि सब काम छोडÞकर आप पहले राजा से टीका लगवाने जाएँ। आपको जब भी अवकाश मिले, आप जाएँ। राजा बैठे रहते हैं, लोग आते रहते हैं। नेपाली जनजीवन का यह दर्शन खुलकर दशहरे में सामने आता है। खाओ, पीओ, जीओ बस, और कुछ नहीं। कितनी साधारण-सी बात हर साल तुतलाते बच्चों को सिखाई जाती है, लय में – ‘दशैं आयो, खाऊँला-पिऊँला’ और यह नेपाल में ‘सांस्कृतिक ध्वनि’ बन गई है। हर वर्षदशहरे के समय में निरंतर प्रतिध्वनित होती है। विशेषतः काठमांडू निवासी नेवार समुदाय में दशहरा मनाने का कुछ अलग तरीका है। उनकी गुठियों -ट्रस्टों) द्वारा प्रतिपदा से लेकर विजया नवमी तक प्रतिदिन सायंकाल में ढोल, मृदंगों के साथ जनसमुदाय हरेक मन्दिर में जा जा कर देवी के प्रति भक्ति अर्पित करते हैं। िि
रिणवीर सिंह सेठी

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