नेपाल की चिकित्सा शिक्षा माफियाओं की क्रीड़ा भूमि, टूटा डॉ. केसी का व्रत : कुमार सच्चिदानन्द


३२ गते सावन । २३ दिनों के बाद डॉ. गोविद केसी ने अन्ततः अपना अनशन तोड़ा और यह मौजूदा प्रधानमंत्री के सीधा हस्तक्षेप के बाद संभव हुआ । उनकी माँगों को संबोधित करने के उद्देश्य से बनायी गयी सरकारी समिति जब १९ दिनों के बाद भी ठोस निर्णय नहीं दे सकी तब प्रधानमंत्री ने स्वयं हस्तक्षेप कर इस अनशन को समाप्त करवाया ।
उन्होंने केसी द्वारा उठायी गयी माँगों के संबोधन के लिए विगत मंगलवार को चार महत्वपूर्ण निर्णय करवाए । शाम पाँच बजे सरकार द्वारा आकस्मिक रूप से मनमोहन मेडिकल कॉलेज की खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए मुख्य सचिव के संयोजकत्व में एक कमिटिका गठन किया गया जिसमें अर्थ, शिक्षा तथा स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिवों को सदस्य बनाया गया ।

ज्ञातव्य है कि शिक्षा विधेयक पारित कराने के लिए मनमोहन मेडिकल कॉलेज के कारण कठिनाई हो रही थी । लेकिन अन्ततः सरकार के सकारात्मक प्रयास से एक ईमानदार एवं संवेदनापूर्ण व्यक्ति की जान बच सकी अन्यथा इस बार तो ऐसा लगने लगा था कि चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार के उनके इस प्रयास को कहीं अन्तिम ही बना देने का षड्यंत्र तो हमारी राजनीति के द्वारा नहीं हो रही ?

यद्यपि इस बार डॉ. केसी का सरकार के साथ न तो कोई समझौता हुआ और न ही उनकी माँगें पूर्ण रूप से संबोधित ही की गई । हलाँकि उनकी माँगों के विभिन्न बिन्दु सम्बोधित हो चुके हैं लेकिन कुछ अन्य हैं जिनका सम्बोधित होना शेष है । लेकिन देश में बाढ़ और भूस्खलन से ऊपजी विपदा को देखते हुए यह तर्क देकर उन्होंने अनशन वापस लिया कि इससे सरकार का ध्यान दूसरी ओर बँटेगा जो वर्तमान अवस्था में राहत और पुनुरुद्धार पर केन्द्रित होना चाहिए । निश्चित ही डॉ. केसी का यह एक जिम्मेवार कदम माना जा सकता है । लेकिन इससे सरकार के माथे का बल अभी खत्म नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि अगर सरकार और राजनैतिक परिस्थितियाँ उनकी माँगों के प्रति अब भी असंवेदनशील रही तो फिर से डॉ. केसी का अनशन प्रारम्भ हो सकता है ।
ज्ञातव्य है कि नेपाल की चिकित्सा शिक्षा माफियाओं के लिए क्रीड़ा भूमि है और इनका सम्बन्ध किसी न किसी रूप में विभिन्न राजनैतिक दलों से भी है । अगर नियमों और कानूनों के द्वारा उसके नामांकन आदि की प्रक्रिया को पूर्ण रूप से पारदर्शी बना दिया गया तो इन्हें खेलने का अवसर नहीं मिलेगा । ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इनमें सुधार नहीं हुए हैं लेकिन यह भी निश्चित है कि जितना सुधार की जरूरत है, वह नहीं हो पायी है ।
यह भी सच है कि डॉ. गोविन्द केसी के श्रृंखलाबद्ध अनशन–आंदोलन ने अनेक बार देश के मिजाज में उबाल भरा है जिससे प्रभावित होकर अनेक चरणों में विभिन्न सरकारों द्वारा इनका नियमन करने का प्रयास किया गया है । लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इन नियमों और कानूनों की अवहेलना कर निजी चिकित्सा महाविद्यालयों द्वारा काम किया जा रहा है । इसलिए डॉ. केसी की माँगों को असान्दर्भिक तो किसी भी रूप में नहीं कही जा सकती ।
एक बात और गौर करने की है कि वत्र्तमान समय में नेपाल में पूर्ण शिक्षा स्वास्थ्य (मेडिकल) को ही माना जाता है । हर सक्षम अभिभावक की पहली प्राथमिकता इसमें बच्चे को भेजना होता है । यह भी सच है कि कुछ सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों में नामांकन की प्रक्रिया बिल्कुल पारदर्शी है । लेकिन छात्र अपनी प्रतिभा के आधार पर इन प्रतियोगिताओं में सफल नहीं हो पाते तो निजी महाविद्यालय बेहतर विकल्प बनकर उभरता है जहाँ सामान्य अहत्र्तांक प्राप्त कर लेने के बाद छात्र नामांकन के योग्य हो जाता है और फिर मोटी रकम की शर्त पर उन्हें नामांकन मिल भी जाता है ।
चिकित्सा सेवा के प्रति आम लोगों के आकर्षण का कारण यह भी है कि छात्र अगर डॉक्टर बनकर आते हैं और सरकारी स्तर पर उनका नियोजन होता या नहीं होता तो भी निजी क्लिनिकों के संचालन के द्वारा वे समाज में अपना उच्च आर्थिक स्तर और प्रतिष्ठा कायम कर सकते हैं । बेरोजगारी किसी रूप में उन्हें प्रभावित नहीं कर सकती । लेकिन एक बात तो समझनी ही चाहिए कि तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता उसमें उच्च प्रतियोगिता के आधार पर होती है और मौजूदा जो व्यवस्था है उसमें प्रतियोगिता का स्तर घट जाता है । फिर जो छात्र लाखों–करोड़ों का निवेश कर डॉक्टर बनते हैं उनमें सेवा भाव का कम होना एक मनोवैज्ञानिक सच है जिसका प्रभाव किसी न किसी रूप में समाज पर पड़ता ही है । इसलिए डॉ. गोविन्द केसी सान्दर्भिक हैं जो इस संदर्भ में देश की राजनीति को दिशा देने में सक्षम हैं । यह ईश्वर का लाख–लाख शुक्र है कि उनकी जान बची या बचायी गयी ।

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