नेपाल की प्रजातांत्रिक यात्रा और हिन्दी

नेपाल में हिन्दी प्यार की भाषा, तकरार की भाषा, स्नेह-सम्मान-अपमान की भाषा, घृणा-द्वन्द्व-संर्घष्ा की भाषा, ज्ञानर्-धर्म-सर्ंपर्क की भाषा है। यह सच है कि नेपाल में हिन्दी किसी न किसी रूप में जीवित नहीं पल्लवित और पुष्पित हो रही है और दो परस्पर विरोधी पाटों से गुजरकर अपनी यात्रा कर रही है। यद्यपि यह भी सच है कि विश्व मानचित्र पर नेपाल ऐसे महत्वपर्ूण्ा देश के रूप में सूचीकृत है जहाँ के लोकजीवन में हिन्दी बहुप्रयुक्त और बहुप्रचलित भाषा है। सर्म्पर्क भाषा के रूप में यह न केवल पर्ूर्वी और पश्चिमी तर्राई को जोडÞती है वरन तर्राई और पहाडÞ को भी जोडÞती है। लेकिन भाषा के नाम पर इस देश में इतनी राजनीति हर्ुइ है कि इस भाषा की संभावनाओं का यहाँ सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है। इसके बावजूद इतना तो माना ही जा सकता है कि इस देश में हिन्दी के प्रयोगकर्त्तर्ााे साथ-साथ एक अच्छा पाठकर्-वर्ग भी है, जिसका प्रमाण भारत और नेपाल से प्रकाशित हिन्दी अखबारों की विक्री और वितरण से मिलता है।
नेपाल में हिन्दी की परम्पराएँ गहरी हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास से आदिकाल के नेपाली कवि साहित्यकारों के योगदान को निकाल दिया जाए तो यह काल एक तरह से अधूरा माना जाएगा। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित ‘नेपाल का हिन्दी साहित्यकार र तिनका कृति’ में गोपाल अश्क ने यह तथ्य प्रस्तुत किया है कि नेपाल में हिन्दी लेखन की परम्परा जोसमनी सन्तों से चली आ रही है। आधुनिक नेपाल के राष्ट्र-निर्माता पृथ्वीनारायण शाह नाथ सम्प्रदाय के उन्न्ाायक, हिन्दी के सुपरिचित कवि तथा उत्तर भारत में हिन्दू संस्कृति एवं धर्म के महान रक्षक योगी गोरखनाथ के अनन्य भक्त थे और स्वयं भी हिन्दी के उत्कृष्ट कवि थे। उनके द्वारा हिन्दी में लिखे गए भजन आज भी लोकप्रिय हैं। इनके अतिरिक्त रणबहादुर शाह, राजेन्द्रविक्रम शाह, उपेन्द्रविकंम, सुरमाया, शशिधर, जगत मंगल, दलजीत मंगल, अभयानन्द आदि ने भी हिन्दी में कलम चलायी। सन् १७६८ में पृथ्वीनारायण शाह के राजवंश की स्थापना से पर्ूव भक्तपुर के राजा सुमति जयजीतमित मल्ल, जगज्र्योति मल्ल्ा, जगत प्रकाश मल्ल, भूपतीन्द्र मल्ल, योगेन्द्र मल्ल और श्रीनिवास मल्ल द्वारा दर्जन से अधिक हिन्दी नाटक लिखे गए।
नेपाल में खडÞीबोली हिन्दी-लेखन के आरम्भकर्त्तर्ााे रूप में भवानी भिक्षु तथा केदारमान व्यथित का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इस परम्परा को आगे बढÞाने में अर्थात् दूसरी पीढÞी के हिन्दी लेखकों में डाँ. कृष्णचन्द्र मिश्र, राजेश्वर नेपाली, कुमार सच्चिदानन्द सिंह, नवीन मिश्रा, पल्लवी ठाकुर, आशा सिंह, धुस्वाँ सायमी, डाँ. गौरी शंकर सिंह, डाँ. रामदयाल राकेश आदि कवि-लेखकों का नाम आता है। शहीद शुक्रराज शास्त्री, वी. पी. कोईराला, बालचन्द्र शर्मा, पं.रमाकान्त झा, सुन्दर झा शास्त्री, काशी प्रसाद श्रीवास्तव, रामस्वरूप प्रसाद बी. ए., रामहरि जोशी, डाँ.र्सर्ूयनाथ गोप, डाँ. शिवशंकर यादव आदि अनेक लेखकों की लेखनी ने नेपाल के हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। आज भी अनेक साहित्यकार और कवि हैं, जो निष्काम भाव से हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं।
अगर ऐतिहासिक सर्न्दर्भ में देखा जाए तो हिन्दी की दृष्टि से राणा शासन काल तक कोई भाषिक समस्या नहीं थी। हिन्दी शिक्षा का माध्यम थी और प्रशासनिक काम काज की भाषा भी। वि.सं. २००७ के बाद शिक्षा के क्षेत्र में तीव्र प्रगति हर्ुइ। लेकिन प्रजातंत्र के आगमन पर राष्ट्रभाषा-राजभाषा सम्बन्धी विवाद पैदा हुआ। न केवल नेपाली राजनीति बल्कि भाषा और शिक्षा सम्बन्धी नीतियों पर भी पश्चिमी देशों का हस्तक्षेप प्रारम्भ हुआ। उन्होंने यह व्याख्या की कि हिन्दी नेपाल के लिए विदेशी भाषा है और संस्कृत मृतभाषा। इस भाषा विवाद को समाप्त करने के लिए प्रजातांत्रिक नेपाल के प्रथम प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद से लेकर पंचायती व्यवस्था के प्रथम प्रधानमंत्री तुलसी गिरि तक ने स्वीकार किया कि हिन्दी नेपाल के लिए विदेशी भाषा नहीं है। लेकिन इस विवाद में अन्ततः पराजय हिन्दी की हर्ुइ। ‘हाम्रो भाषा, हाम्रो भेष’ की परिधि में राष्ट्रीयता की परिभाषा दिये जाने के कारण क्रमशः हिन्दी के प्रति नकारात्मक वातावरण तैयार होने लगा और लोग औपचारिक रूप में हिन्दी बोलने से भी डरने लगे।
यह सच है कि नेपाल में हिन्दी विवाद का दूसरा नाम है। विदेशी भाषा के रूप में इसे चिन्हित कर एक नकारात्मक वातावरण इसके प्रति पैदा कर दिया गया है। यद्यपि हिन्दी के पक्ष में नेपाल के पर्ूव प्रधानमंत्री मातृकाप्रसाद कोईराला, कृष्णप्रसाद भट्टर्राई, मनमोहन अधिकारी और यहाँ तक कि महाराज वीरेन्द्र विक्रम शाहदेव द्वारा भी समय-समय पर सकारात्मक टिप्पणियाँ की गई है। सार-संंक्षेप में हिन्दी को विदेशी भाषा कहकर नेपाल में उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता, तथापि राजनैतिक रूप से एक नकारात्मक वातावरण तो हिन्दी के लिए यहाँ तैयार है ही। इसके बावजूद यह कहा ही जा सकता है कि नेपाल की प्रजातांत्रिक यात्रा में हिन्दी ने अपना योगदान दिया ही है। इसे मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि विक्रम संवत् २०४६ का जनान्दोलन भारत के राजनैतिक और नैतिक र्समर्थन के आधार पर सफल हुआ था। उस समय निरंकुश पंचायती व्यवस्था के विरोध में भारत के शर्ीष्ास्थ नेताओं चन्द्रशेखर, सुब्रहृमण्यम स्वामी आदि नेताओं द्वारा दिए गए भाषण अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे और इनकी भाषा हिन्दी ही थी। उस समय जो भी नेता नेपाली राजनीति के केन्द्र में थे और वे हिन्दी बोल सकते थे तो तर्राई में उनकी भाषा हिन्दी ही होती थी।
अभी भी राजनैतिक स्तर पर विरोध चाहे जितना हो लेकिन तर्राई की लोकप्रिय भाषा के रूप में हिन्दी चिन्हित की जाती है और हमारे जो नेता हिन्दी बोल सकते हैं, अपनी राजनैतिक सभाओं में बेहिचक हिन्दी बोलते हैं, चाहे वह वि. सं. २०६३-६४ का जनान्दोलन-२ हो या उसके बाद का विभिन्न चरणों में हुए तर्राई आन्दोलन। तर्राई आन्दोलन की तो एक तरह से भाषा ही हिन्दी बन गई थी। यद्यपि इस आन्दोलन में विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं को भी माध्यम बनाया गया लेकिन इसका प्रयोग क्षेत्रीय नेताओं द्वारा अधिक हुआ। तर्राई-मधेश के मुद्दे पर राजनीति कर रहे जो भी बडÞे नेता थे, जब भी वे भाषायी सीमा-क्षेत्र का अतिक्रमण करते तो अपनी राजनैतिक सभाओं में हिन्दी का ही प्रयोग करते। शायद इसी उत्साह में हमारे उपराष्ट्रपति महामहिम परमानन्द झा ने अपनी पहली शपथ मधेशी वेश और मधेश की लोकप्रिय भाषा हिन्दी में ली। यद्यपि इसके लिए उन्हें जो जलालत झेलनी पडÞी, उसे सब जानते हैं। यह हिन्दी भाषा और उसकी लोकप्रियता का उद्घोष ही था कि २०६४ फागुन १६ गते की रात लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के हुए आठ सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं नेपाली राजनीति के वयोवृद्ध नेता गिरिजा प्रसाद कोईराला ने हिन्दी में अपना वक्तव्य दिया था।
यह सच है कि नेपाल में हिन्दी को राजनैतिक रूप से पंगु बनाने का प्रयास किया गया, लेकिन यह भी सच है कि आज भी इसकी जडÞें यहाँ सूखी नहीं है। हालांकि रोजगार से सीधा जुडÞाव न होने के कारण इसका व्यावसायिक स्वरूप यहाँ विकसित नहीं हो पाया है। लेकिन अपनी लोकप्रियता और साहित्यिक समृद्धि के कारण यह लोगों के हृदय में जडÞें जमाए हर्ुइ है। निश्चय ही नेपाली यहाँ की राष्ट्रभाषा है, अतः इससे उसकी कोई प्रतिद्वन्द्विता नहीं। हिन्दी उस सांस्कृतिक परम्परा की भाषा है जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात करती है। इसलिए यह विश्वभाषा बनने के कगार पर है और इसी आधार पर नेपाल में अपने लिए उर्वर भूमि तैयार होने की आशा करती है। िि
-कुमार

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