नेपाल की शिक्षा नीति

यह कहना कि अस्थाई शिक्षक में योग्यता कम है, गलत होगा । किसी की क्षमता या व्यत्तित्व के उपर लांक्षण लगाने वाली बात होगी । जब अस्थाई शिक्षक शिक्षण लाइसेन्स लिया जा चुका है, शिक्षण तालिम का पुष्ट खुराक लिया जा चुका हो तो कैसे वे सब काबिल नही हुए ? बातें बहुत हैं । फिर भी, अस्थाई शिक्षक का मुद्दा शिक्षा जगत मे राष्ट्रीय समस्या का रूप ले चुकी है ।

रणधीर चौधरी
नेपाल मे शिक्षा की स्थिति क्यों दिन–ब–दिन बिगड़ती जा रही है, आज यह एक अहम सबाल बन चुका है । नेपाल की शिक्षा नीति की कमजोरी है या नीयत की । ये सब अनुसन्धान का भाग हो सकता है । पिछले कई सालों से नेपाल मे अस्थाई शिक्षकाें का आन्दोलन जारी है । पिछले मरतबे जब नेपाल के शिक्षा मंत्री गिरिराज मणी पोखरेल थे और नेपाली शिक्षा नीति में आठवाँ संसोधन किया गया । उस संसोधन ने फिर एक बार अस्थाई शिक्षकों के उपर कहर ढा दिया । पिछले कई दिनो से अस्थाई शिक्षकों के द्वारा देश भर के स्कूलों में ताला लगाया गया है । छात्राें की पढ़ाई लिखाई एक बार फिर से प्रभावित हो गयी है ।
देश की शिक्षा नीति की ही कमजोरी हो सकती है कि बीस हजार से अधिक अस्थाई शिक्षक हैं नेपाल में और उनका व्यवस्थापन सही तरीके से नहीं हो पाया है । आन्दोलित शिक्षकों के अनुसार उन लोगो को अपरिपक्व शिक्षा नीति का शिकार बनाया जा रहा है ।
आठवा संसोधन
नेपाल राजपत्र में प्रकाशित शिक्षा एन २०२८ मे संशोधन हेतु २०७३ असार १५ तारीख के दिन शिक्षकों को विचलित करने के लिये या कहे तो स्वेक्षिक अवकाश लेने के लिये बाध्यात्मक अवस्था सृजना की गयी । यह आम मानना है आन्दोलित शिक्षको के वृत में । नेपाल के संविधान के धारा १६ (१) द्वारा प्रत्याभूत किया गया सम्मान पूर्वक बचने के हक से संबंधित हक १७ (१) कानून द्वारा प्रदत्त किये गये कानून बमोजिम किसी भी व्यक्ति को उसको वैयक्तिक स्वतन्त्रता से वंचित नही किया जायेगा । वैसे ही संबिधान के धारा १८ (१) द्वारा दिए गए कानून की नजर में सभी नागरिक समान होंगे, उसका भी उल्लंघन किया जा रहा है । वैसे ही धारा ३३ (१) द्वारा दिया गया नागरिको को रोजगार का हक, धारा ३८ (१) में प्रत्याभूत किया गया रोजगार के हक का भी उल्लंघन किया गया है कई मायनों में ।
बर्षो से अध्यापन करा रहे अभी के अस्थाई शिक्षको की न्यूक्ति किसने की क्या यह बिषय अनुसंधान का विषय नही है ? जिस तरह आज शिक्षक विद्यालय से बाहर सड़क पर आन्दोलन कर रहे हैं । इस से न केवल विद्यार्थियों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है बल्कि विश्व स्तर से लोग नेपाल की शिक्षा नीति की निंदा भी कर रहे हैं ।
शिक्षक पद के लिए आवश्यक न्युनतम योग्यता पुरा करने वाले प्रतिनिधी को ही शिक्षक सेवा द्वारा शिक्षण कराने का कानुनी लाइसेन्स दिया गया है, जो की अस्थाई शिक्षको के पास भी है । शिक्षा एन २०२८ के दफा ११ ङ के उपदफा १ के मुताबिक यह एन प्रारम्भ होने के बाद शिक्षक सेवा द्वारा ली जाने वाली शिक्षण लाइसेन्स की परीक्षा की व्यवस्था की गई है । और अभी के आन्दोलित शिक्षको के पास शिक्षण लाईसेन्स उपल्बध है । कानून कोई भी नियुक्ति के पश्चात ६ महीने से ले कर १ साल तक के समय को परिक्षणकाल माना जाता है । परंतु आन्दोलित अस्थाई शिक्षको के हक मे ये क्यों लागु नही हो पाया । नियुक्ति के ५ और २७ साल तक निरंतर शिक्षण के बावजूद भी उन लोगों को नियुत्ति नही दिया गया ।
जैसे कि हमे पता है, संविधान से कन्ट्राडिक्ट करने वाला कोई भी नियम कानून स्वीकारा नही जा सकता ऐसा माना जाता है । तो उपर उल्लेखित संसोधन जो की शिक्षा नियमावली २०२८ में किया गया है वो कैसे लागु हो पाएगा ? उतना ही नही । नेपाल जैसे लिखित संविधान स्वीकारने वाले देश में राज्य के तीनो अंग का काम, कर्तव्य और अधिकार भी अलग अलग तरीको से नही बनाया जा सकता यानि की संविधान से कंट्राडिक्ट या ह्युमन राइ्टस कन्भेन्ट से विपरीत न होने वाला कोई भी कानून बनाया जा सकता है । अर्थात ह्युमन राइ्टस कन्भेन्ट से विपरीत का कानून नहीं बनाया जा सकता है । वैसे कानून का कोई औचित्य नहीं माना जा सकता । तो ऐसे में अस्थाई शिक्षकों के द्वारा जो शिक्षा एन २०२८ के आठवें संशोधन का विरोध किया जा रहा है वो कई मायनाें मे सही माना जा रहा है कानुन व्यवसायियों के द्वारा ।
पिछले दिनाें मेरा ध्यान भी केन्द्रित हुआ अस्थाई शिक्षक आन्दोलन की ओर । पिछले महीने जब में अपने गृह जिला गया व्यक्तिगत काम से तब मैंने देखा जिला शिक्षा दफ्तर के प्रवेशद्वार पर ताला लगा कर करीब सौ की संख्या में अस्थाई शिक्षक लोग आन्दोलन पर बैठे नजर आये । स्वाभाविक रूप से मेरे कदम रुके । मै आंदोलित शिक्षकों के समीप गया और बात किया उन लोगों से । शिक्षक सुनिल चौधरी, राधेश्याम झा, प्रिता झा और कृष्ण कुमार चौधरी से । महेत्तरी मे तीन सौ के करीब अस्थाई शिक्षक हैं । उसकी अध्यक्षता राधेश्याम झा, द्वारा की जा रही है । उनका मानना था कि अगर अस्थाई शिक्षकाें के जीवन से खेला गया तो यह आन्दोलन बहुत आगे जा सकता है । सरकार से बात करने पर बस आन्दोलित शिक्षको को सिर्फ मौखिक आश्वासन दिया जाता है । परंतु अब मौखिक ललिपप से काम नही चलने वाला शायद सरकार को यह पता नही । वैसे ही आन्दोलन के उपाध्यक्ष कृषण कुमार चौधरी महिला अस्थाई शिक्षक आन्दोलनकारी प्रिता झा और सुनिल चौधरी इन सभी के द्वारा एक ही आवाज सुनने को मिला कि अगर सरकार वाकई में अस्थाई शिक्षको का समस्या समाधान करना चाहती है तो सर्वोच्च अदालत द्वारा जारी किया गया परमादेश तुरन्त लागु करे । सिर्फ महोत्तरी ही नही बल्कि देश भर के अस्थाई शिक्षक बिसं २०६६ मे जारी उस परमादेश को मानने के लिये तैयार है ।
यह कहना कि अस्थाई शिक्षक में योग्यता कम है, गलत होगा । किसी की क्षमता या व्यत्तित्व के उपर लांक्षण लगाने वाली बात होगी । जब अस्थाई शिक्षक शिक्षण लाइसेन्स लिया जा चुका है, शिक्षण तालिम का पुष्ट खुराक लिया जा चुका हो तो कैसे वे सब काबिल नही हुए ? बातें बहुत हैं । फिर भी, अस्थाई शिक्षक का मुद्दा शिक्षा जगत मे राष्ट्रीय समस्या का रूप ले चुकी है । तो आन्दोलनकारियाें द्वारा स्वीकृत समाधान की राह यानि कि बिसं २०६६ मे जारी परमादेश जिसमें कहा गया है कि अस्थाई शिक्षकों का आन्तरिक प्रतिस्पर्धा से हल ढूँढा जाय ।

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