नेपाल की सोच और भारत का रवैया

सुजित कुमार ठाकुर:एक बार एक कार्यक्रम में नेपाल के लिए एक पर्ूव राजदूत से मेरा प्रश्न था, ‘साहब, नेपाल के कुछ पहाडÞी लोग के मन में भारत के लिए कही न कही विष भरा पड हैं, जबकि  मधेशी लोग भारत के शुभचिंतक रहे हैं फिर भी भारत सरकार हमेशा पहाडÞी लोगो और उन की सत्ता को तबज्जो देती आई है, मैं समझता हूँ भारत ऐसा इसलिए करता हैं क्योंकि भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा की चिंता हैं, जो की जायज भी है, अब आते हैं नेपाल के परम्परागत शासन के भारत प्रति के रबैये का एक संक्षिप्त विश्लेषण की तरफ बहुत दिन नहीं हुए जब कि एक भारतीय राजदूत के ऊपर नेपाल के पहाडÞी क्षेत्र में जुता उछाला गया । वह घटना अगर मैं मान भी लँू कि कुछ विक्षिप्त मानसिकता वाले लोगों का काम हैं तो मुझे यह समझ में नहीं आता हैं कि भारत नेपाल के बीच के फुटबाँल मैच में भारत के हारने के बाद पूरा स्टेडियम कैसे भारत विरोधी एवं रंगभेदी नारों से गूंजने लगता हैं, क्या ऐसे घटना को भारत विरोधी नहीं मानती भारत की सरकार और वहां के लोग –
कुछ साल पहले त्रिभुवन विश्वविद्यालय के मैदान में एक क्रिकेट का मैच देखने को मिला भारत -अन्डर१९) और नेपाल -अन्डर१९) के बीच, जब भारत उस मैच को जीत गया तो वहां भारतीय र्समर्थक के हाथ से तिरंगा छीन के जमीं पर लातो तले रगडÞने की घटना निश्चय ही खेल भावना के विपरीत थी और अवश्य ही भारत के लिए सम्मान का भाव नहीं था उस घटना में  ।
नेपाल के त्रिभुवन विमानस्थल से भारतीय विमान का आसानी से अपहरण हो जाता हैं, क्या यह माना जाये की उस घटना में जिस किसी नेपाली अधिकारी ने मदद की होगी क्या वह सिर्फपैसे के लिए  होगा –
२००० में हुए ऋतिक रोशन कांड में जिन भारतीयों एवं मधेशीयों के ऊपर सांघातिक आक्रमण किये गए वह भी भारत विरोधी नहीं था – आये दिन नेपाल के राष्ट्रवादी पत्र पत्रिका में भारतीय विस्तारबाद मर्ुदाबाद कह के जो प्रोपेगंडा चलाया जाता हैं वह भी क्या एक मित्र राष्ट्र के धर्म का हिस्सा हैं  – नेपाल में भारत और नेपाल के बीच १९५० की संधि के ८ नवम्बर के प्रावधान को आधार बना के बृहत्तर नेपाल के पक्ष में आंदोलन चलाया जाता हैं, क्या यह भी भारत विरोधी नहीं हैं – नेपाल के हर क्षेत्र, हर मोर्चे पर भारतीयों से समानता एवं समीप्यता रखने के कारण मधेशियों के साथ जो दर्ुर्व्यवहार किया जाता हैं, क्या वह भी भारत के साथ नेपाली सत्ता और उस के पुजारी के द्वारा सद्भाव दिखाने के लिए किया जाता हैं –
१८५७ के सिपाही विद्रोह को दबाने के लिए नेपाल के सेना के द्वारा किया गया बर्बर कार्य भारतीयों को याद नहीं हैं – यह उसी समुदाय की सेना थी जिस को खुश करने के लिए भारत जी जान से लगी हर्ुइ हैं और बोर्डेर पर बसे अपने स्वजन मधेशियों के साथ सौतेला व्यव्हार कर रही हैं ।  आज भारत के रबैये से  बार्ँडर पर बसे मधेशी को बार्ँडर पर के अपने स्वजनो से मिलने में परेशानी होती हैं । ्र भारत और मधेश के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धो को तोडÞने का भरपूर प्रयास किया जा रहा हैं, क्या भारत इन घटनाक्रमो को साधारण प्रक्रिया मानता हैं –
अब देखा जाये अभी हाल में घटित घटना को,  इस में कोई दो राय नहीं हैं कि मधेश की जनता भारत को अपना मानती हैं, बल्कि मैं यह कहूँगा कि मजबूरी में नेपाली नागरिकता को ढोने के लिए मजबूर अधिकांश मधेशी के मन में काठमांडू से कही अधिक श्रद्धा नई दिल्ली से है, जिस को मैं गलत नहीं मानता,  भारतीय प्रधानमंत्री जिनकी लगभग पूरी दुनिया में चर्चा हैं, मधेश के लिए भी एक आशा की किरण हैं । श्री नरेंद्र मोदी का जनकपुर भ्रमण कई मायनो से खास होना स्वाभाविक हैं । मधेशियों का यह मानना हैं कि अगर मोदी जनकपुर आते हैं तो जनकपुर एवं मधेश का अर्ंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक नयी पहचान बनेगी, यहाँ के पर्यटन को एक मजबूत र्समर्थन मिलेगा, साथ में मोदी के आगमन से आर्थिक प्रगति भी होने की सम्भावना बढÞेगी । जनकपुर की जनता इन सब आाशओं के साथ श्री मोदी के स्वागत के लिए आतुर थी लेकिन हमेशा की तरह रास्ता का रोडÞा बनी मधेश एवं भारत विरोधी नेपाल की सांप्रदायिक सरकार एवं मीडिया  । फिर क्या हुआ यह सबको पता है । इसके बावजूद अगर भारत का नजरिया नहीं बदलता है तो मधेश को अपना नजरिया बदलना होगा ।

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