नेपाल के आन्तरिक संकट में पड़ोसी देशों का प्रभाव

बाबुराम पौड्याल :नेपाल के दूसरे संविधानसभा ने १८ सितम्बर २०१५ को बहुप्रतिक्षित संघीयगणतन्त्रात्मक संविधान जारी कर दिया । पहला संविधानसभा भारी राजनीतिक विवादों के चलते संविधान बनाने में विफल रहा और विघटित हो गया था । फिर भी जारी संविधान पर असन्तुष्टों ने तराई के अधिकांश हिस्से में आन्दोलन छेड़ रखा है । आन्दोलन अब जनप्रदर्शन से आगे बढ़कर भारत नेपाल बीच के व्यापारिक नाकाओं पर रुकावट और राजपथ पर अवरोध तक आ पहुंचा है । कुल मिलाकर आन्दोलन के चार माह बीतने को हैं । इतने दिनों से तराई के अधिकांश हिस्से में आम जनजीवन अत्यन्त कष्टकर हो चला है । सभी उद्योग धन्धे और शिक्षण संस्थाएं बन्द पड़े हंै । सभी आर्थिक गतिविधियां रुक गर्इं हैं । अब तक तकरीबन पचास से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी है । सरकार का आन्दोलनकारियों के साथ संवाद काफी धीमी गति से चल रहा है । परन्तु अब तक कोई खास प्रगति नहीं हो पा रही है । ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों पक्ष वार्ता को किसी परिणाम पर ले जाने की बजाय वार्ता विरोधी होने के आरोप से बचने का नाटक कर रहे हंै । सत्तापक्षीय और आन्दोलनकारी नेताओं की बयानबाजी से ऐसा लगता है कि दोनों के बीच राजनीतिक समस्या से कहीं अधिक व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की समस्या भी है । जो भी हो यह नेपाल का एक बिल्कुल अन्दरुनी सवाल है । जिसे सरकार और सभी राजनीतिक दलों को विना किसी देरी के समाधान कर लेनी चाहिए ।
सरकार और तराई के आन्दोलनकारी राजनीतिक दलों के बीच चल रही रस्साकस्सी में सवाल तब और पेचीदा लगने लगा जब भारत ने २१ सितम्बर को नेपाल के तराई में बढ़ती असुरक्षा के प्रति चिन्ता प्रकट किया । और, दूसरे दिन से ही आन्दोलन से प्रभावित वीरगंज—रक्सौल नाके को छोड़कर अन्य नाकों से भी ईंधन और दवाओं जैसी सामानों को नियमित मात्रा से बहुत कम परिमाण में भारत ने नेपाल भेजना शुरु कर दिया । जिससे अकेले तराई में ही नहीं समूचे देश में समस्याएं खड़ी हो गर्इं हंै । जाहिर है नेपाल तकरीबन अस्सी फीसद आयात अकेले भारत से करता आ रहा था । भुपरिवेष्टित देशों को अन्तरराष्ट्रीय तौर पर मिलनेवाली पारवहन सुविधा के तहत भारत के बाहर से नेपाल आनेवाले सामानों से लदे वाहनों को भी सरहद पर ही रुकना पड़ा । इन्धन लेने के लिए भारत पहुंचे नेपाली टैंकरों को भी कई बार डिपो से खाली ही लौटाया गया । भारत भले ही इसे अपनी ओर से नाकाबन्दी कहने से ईन्कार करता आ रहा है फिर भी हालात इसके ठीक विपरित दिखाई देते हंै ।
इसी साल अप्रैल २५ तारीख को आये विनाशकारी भूकम्प की पीड़ा से नेपाल अभी उबर ही नहीं पाया है । उस पर इस समय पुनर्निमार्ण और पीडि़तों की स्थाई पुनरस्थापन जैसे महत्वपूर्ण कार्य की ओर शीघ्र आगे बढ़ने का दवाव भी है । इन परिस्थितियों में विश्व के कई केन्द्रों की दिलचस्पी इस क्षेत्र में बढ़ी है । संयुक्त राष्ट्रसंघ ने नेपाल की मौजुदा हालातों से भूकम्प पीडि़तों पर पड़नेवाली संभावित दुष्प्रभाव के प्रति चिन्ता प्रकट किया है । हाल ही में युनिसेफ ने भी अत्यावश्यक सामानों के अभाव से नेपाल में पांच साल से कम उम्र के तीस लाख बालबालिका मौजुदा परिस्थिति से जोखिम में बताया है । यूरोपियन युनियन और नेपाल के अन्य दाता राष्ट्रों और संगठनो ने भी नेपाल के मौजुदा प्रतिकूल परिस्थिति पर अपने–अपने नजरिए से चिन्ता जताई है । कुछ अन्य ताकतों की भी इस समय यहां सक्रियता के संकेत दिखाई दे रहे हैं । इन में जरुरी नहीं कि सभी अच्छे नीयत से प्रेरित हों । दिल्ली और काठमांडू के बीच चल रहे तनावपूर्ण माहोल के बीच नेपाल का उत्तरी पड़ोसी देश चीन भी नाकाबन्दी से उत्पन्न समस्या को मानवीय संकट मानते हुए नेपाल सरकार को हर संभव सहयोग करने का आश्वासन दे रहा है । चीन के इस कदम से दिल्ली और भी सशंकित दिखाई देता है । भारत के ही कुछ विद्वान और कुछ नेताओं ने अपनी सरकार की नेपाल पर उठाए गए कदम को अदूरदर्शी कदम बताते हुये कहा है कि, दिल्ली ने नेपाल को चीन के शरण में जाने के अलावा सभी विकल्पों को बन्द कर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारी है । इससे नेपाल की ओर से भारत पर सुरक्षा संवेदनशीलता और भी बढ़ सकता है । ऐन मौके पर सत्तारुढ दल के एक सांसद ने तो नेपाल की तराई को भारत का अंग बताने का आपत्तिजनक बयान दिया है । इससे नेपाल में सनसनी फैल गयी है । बताया जाता है संविधान बनाने के लिए नेपाल के चार बड़े दलों के बीच ८ जून को सोलह एजेण्डों में जो सहमति हो गई थी उसपर भारत काठमांडू से नाखुश है । वह एक ओर खुद को तराई में सुरक्षा को लेकर चिन्तित बता रहा है तो दूसरी ओर काठमांडू की सत्ता पर तराई आन्दोलन की माँगों को पूरा करने के लिए दवाव डालने का काम भी एक साथ कर रहा है । नेपाल को हर तरह से भारत के साथ अच्छे सम्बन्ध रखने की तरफदारी करते आ रहे नेपाल के कुछ लोग भी अब भारत निर्भरता देश के लिए घातक होने की शंका करने लगे हैं ।
नेपाल के सन्दर्भ में दोनों पड़ोसी देशों के नजरिए में विरासत से ही जमीन आसमान का फर्क दिखाई देता है । चीन नेपाल में हुए सन् १९६१, सन् १९९० और सन् २००६ की सियासी बदलाव में काठमांडू की सत्ता को ही औपचारिक सहयोग करता आ रहा है । जाहिर है इसबार भी वह अपनी पुरानी नीति की ही हिमायत कर रहा है । वह नेपाल के अन्दरुनी मामलों से खुद को अलग दिखाना चाहता है । इसका मतलब यह नहीं कि चीन नेपाल में जो कुछ घटता है उससे बेखबर होता है । वह अपने कूटनीतिकों और अन्य स्रोतों के जरिए सूचनाआें पर पैनी नजर रखता है । नेपाल की संघीय गणतन्त्र में रूपान्तरण के बाद की संभावित स्थिति के प्रति पहले से ही बेइजिङ दिलचस्पी लेता आ रहा है । नेपाल के हर एक द्विपक्षीय कूटनीतिक और राजनीतिक मुलाकातों में सलाह मसविरे के रूप में पिछले कुछ सालों से रखता आया है । पहले से ही संघीयता के सवाल पर नेपाल में उसकी व्यवहारिकता को लेकर उसे संदेह है । वह कम और चीन और भारत से जुड़नेवाले शान्त प्रदेश नेपाल के लिए उपयोगी बताता आया है । चीन ने इसे दवाव नहीं अपना सुझाव तक ही सीमित रखा है । चीन का यह सुझाव नेपाल के नेपाली कांगे्रस और नेकपा एमाले से ठीक उसी तरह समान है जिस तरह भारत और नेपाल की तराई आन्दोलन की माँगें समान हैं । इसे महज एक संयोग नहीं माना जा सकता है ।
भारत, नेपाल के हर बडेÞ राजनीतिक बदलाव में काठमांडू की सत्ता के विपक्षियों को ही साथ देता आ रहा है । कई लोग मानते हैं कि बदलाव के बाद काठमांडूं की सत्ता को भारत अपने अनुकूल रखने की ईच्छा से प्रेरित होकर ही यह सब करता है । इसलिए दिल्ली पर नेपाल में सभी सुक्ष्म प्रबन्धनों पर भी हस्तक्षेप का आरोप है । कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है, नेपाल की जलसंपदा को भारत अपने हित में प्रयोग और नेपाल की ओर अपने लिए सुरक्षा की गायरेन्टी चाहता है । राजनीतिक बदलाव के दिनों को छोड़कर अगर देखा जाए तो भारत के साथ नेपाल के सम्बन्धों में भारी उतार चढाव देखने को मिलता है ।
भारत के साथ नेपाल के सम्बन्ध बहुत पुराने हैं । अन्तरराष्ट्रीय रूप में भारत और नेपाल के साथ जो औपचारिक सम्बन्ध हैं उससे कहीं महत्वपूर्ण दो देश के बीच का जनसम्बन्ध है । चीन नेपाल सम्बन्ध भी पुराने जरुर हैं परन्तु इसकी औपचारिकता के इस साल साठवां वर्षगांठ मनाया जा रहा है । विगत में जब नेपाल ने चीन के नजर में साम्राज्यवादी अमेरिका, सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत संघ जैसे देशों के साथ भी दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो चीन ने नाराजगी जाहिर किया था । उसके वाद चीन के साथ नेपाल के रिश्तों में बड़ी समस्या नहीं है । इसलिए नेपाल में इस बार तराई के कुछ हिस्से को छोड़ कर चीन की लोकप्रियता का पारा शिखर पर है । ऐसा चीन की अपनी किये से कहीं ज्यादा नेपाल भारत के बीच बनते बिगड़ते रिश्ते के कारण होता दिखाई देता है । नेपाल में कई लोग मानते हंै पिछली बार जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नेपाल आए तब नेपाल मे भारत की लोकप्रियता अभूतपूर्व रूप से बढ़ गई थी । लोकप्रियता की वह लहर साल भर भी कायम नहीं रह सका ।
जो भी हो, नेपाल में चल रहे संकट में दिल्ली और बेईजिङ दोनों ने अपने अपने मोरचे खोल लिए है । चीनी राष्ट्रपति सिजिनपिङ ने २९ सितम्बर को संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा को संबोधित करते हुये विना किसी के नाम लिए बडेÞ और शक्ति सम्पन्न देशों के द्वारा छोटे और विपन्न देशों पर हस्तक्षेप करना गलत बताया । उनका साफ संकेत नेपाल की वर्तमान स्थिति पर ही था । इस तरह नेपाल में चल रहे संकट में तराई का आन्दोलन और काठमांडू की सत्ता के बीच चल रहे अन्दरुनी अन्तरविरोध एक ओर हंै तो दूसरी ओर काठमांडू और दिल्ली का टकराव है । इसके साथ–साथ बेइजिङ और दिल्ली बीच की पारम्परिक सशंकित मानसिकता की पृष्ठभूमि भी अस्तित्व में दिखाई देता है । आन्दोलन की उचित मांगों और सरकार की जायज चिन्ता दोनों पर काली छाया पड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है । यह हिमालय के गोद में बसा नेपाल के लिए ही अशुभ संकेत हो सकता है ।
चीन ने नेपाल में जो नरमी दिखाई है यह उसकी विदेश नीति का समुचा स्वरूप नहीं है । विश्लेषकों का मानना है कि वह जितना विशाल है उतना ही कठोर और अडि़यल भी है । अब तक अपने आप में केन्द्रित चीन आर्थिक रूप से प्रगति करने के बाद अब पिछले कुछ समय से अपना कूटनीतिक, आर्थिक और सामरिक प्रभाव के विस्तार में दिलचस्पी ले रहा है । हिमालय से सटे उस पार पाकिस्तानी सरहद तक चौड़ी सडक संजाल को व्यवस्थित कर चुका है । अब चीन हिमालय के आसपास दु्रत गति से चलनेवाली रेलमार्ग का तेजी से विस्तार कर रहा है । उसने अपने रेलमार्ग से काठमांडू को जोड़ने की इच्छा भी दिखाई है । तिब्बती शहर सिगात्से से नेपाल के सोलुखुम्बु तक रेलमार्ग के लिए २ सौ ३० किलोमिटर लम्बी टनेल का सर्वै किया जा चुका है । एशियाई सड़क, सिल्क रोड जैसे योजनाओं पर चीन तेजी से काम कर रहा है । यह सब उसके प्रभाव विस्तार करने की मानसिकता को दर्शाता है ।
चीन पेट्रोलियम को निर्यात की चीज नहीं मानता फिर भी इस समय वह नेपाल को इंधन देने को राजी हो गया है । लेकिन उसके लिए अब और समय की जरुरत है । हिमालय का तापक्रम, दुरुह भौगोलिक स्थिति, नेपाल की ओर की जीर्ण सड़कें और आवश्यक पुर्वाधार के अभाव में तत्काल पेट्रोलियम नियमित रूप से लाने में कठिनाई है । इसी को देखते हुए चीन केरुङ से रसुवागढी होते हुए अनुदान में काठमांडू ईंधन भेजकर कठिनाई को जीतने का संदेश देना चाहता है । चीन में नेपाली राजदुत महेश मास्के ने मीडिया को बताया है कि चीन से पेट्रोलियम नेपाल लाने मे कुछ प्रारम्भिक कठिनाइयां तो हैं पर असम्भव नहीं । कयास लगाया जा रहा है कि लम्बी दूरी के कारण चीन से र्इंधन लाने में भारत से मंहगा पड़ सकता है । चीन से लाने में पेट्रोल १ सौ ५० रुपये और डिजेल १ सौ ३० रुपये प्रतिलीटर का प्रारम्भिक अनुमान लगाया जा रहा है । इसपर अब भी दोनों देशों के बीच काम हो रहा है । इस समय नेपाल ने चीन के साथ करों पर छूट को लेकर बातचीत हो रही है । नेपाल से लगी उसकी सीमा पर कई नाकों को व्यापारिक रूप से खोलने की समझदारी भी हो रही है । मुस्ताङ जिले का कोरला नाके से निर्माणाधीन कालीगण्डकी कोरीडोर सड़क नेपाल में चीन से भारत बीच का सबसे कम दूरीवाला सड़क होगा । व्यापारिक हिसाव से देखें तो लगता है चीन भारत के बाजारों में अपने उत्पादनों को पहुंचाने के लिए पूर्वाधार खड़ा करना चाहता है । यह तभी संभव है जव भारत के साथ उसके अच्छे ताल्लुकात हों । भारत भी आर्थिक रूप से तीव्र विकास कर रहा देश है । चीन की तरह वह भी दुनिया के बडेÞ बाजारों में एक है । उसकी महत्वाकांक्षाओं को चीन से कम नहीं आंका जा सकता है । दोनों ने सीमा विवाद जैसी पेचीदा सवाल को एक ओर रखकर व्यापारिक साझेदारी के लिए हाथ बढ़ाया है । सिक्किम के नथुला नाके से दोनों ने व्यापार करना शुरु कर दिया है । निःसन्देह ऐसी स्थिति बनी रहती है तो नेपाल और आसपास के देश भी फायदे में रहेंगे । बीते मई १५तारीख में बेइजिङ में व्यापारिक प्रयोजन के लिए चीन और भारत ने इकतालिस एजेण्डों पर सम्झौेते किए हैं । जिस में लिपुलेक को व्यापारिक नाके के रूप में उपयोग करने की बात भी है । लिपुलेक भारत और नेपाल के बीच विवादास्पद त्रिदेशीय स्थल है । इस पर नेपाल ने आपत्ति प्रगट की है । भारत ने भले ही खुले तौर पर कुछ नहीं कहा है परन्तु चीन ने नेपाल को उसकी सार्वभौमिकता पर असर न डालने का आश्वासन दिया है । यह सब किसी अन्य रणनीति के तहत हो रहा है तो नुकसानदेह भी हो सकता है ।
नेपाल के लिए भौगोलिक और संस्कृतिक रूप से भारत के साथ सम्बन्ध रखने में जितनी सहजता है उतनी सहजता चीन के साथ नहीं है । इस बात को सिंहदरवार भी भली भांति जानता है । तभी तो सिंहदरवार की चीन से ईधन आयात करने और अन्य नाकाओं को खोलने की बातों में जो तदारुकता दिखती है वह व्यवहार में नहीं । लगता है अभी भी दिल्ली का दामन छोड़कर बेईजिङ का हाथ पकड़ने की मानसिकता काठमांडू की बन नहीं पायी है । दिल्ली ने नेपाल को सहायता देने के मसले पर कुछ दिन रुकने के लिए बेईजिङ को मनाने का प्रयास भी किया था परन्तु चीन ने इसे मानने से इन्कार कर दिया । संविधान घोषणा को कुछ समय के लिए टालने के लिए दवाव नेपाल सरकार को भी दिल्ली ने दिया था और बेइजिङ पर भी नेपाल के सहयोग के लिए कुछ दिन रुकने का प्रस्ताव रखना संदेह को पैदा करता है । उसका “कुछ समय” का क्या राज था कहना मुश्किल है । क्या भारत नेपाली सत्ता को आन्दोलन के आगे घुटने टेकने के लिए विवश करने के लिए समय चाहता था या फिर सरकार और आन्दोलनकारियों के बीच मध्यस्थता कर ८ जुन को चार प्रमुख दल नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, नेकपा एमाओवादी और मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिक के बीच सम्पन्न सम्झौते से गिरी अपनी साख को फिर से और मजबूती के साथ स्थापित करना चाहता था ?

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