नेपाल के गतिरोध को कैसे हटाया जाय

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राकेश सूद

राकेश सूद:नेपाल में संविधान घोषणा को एक महीने से ज्यादा हो गए हैं । संविधान आना था और आया भी, लोगों ने राहत की साँस भी ली । यह सोच कर की चलो सात वर्ष के लम्बे अभ्यास के बाद अन्ततः संविधान आ ही गया, भले ही इसकी शुरुआत गलत ही हुई हो । इस संविधान में कुछ को अपनी जीत नजर आई तो कुछ ने हार को महसूस किया । हारने वालों में मधेशी, जनजाति और थारु थे जो कि विप्पन वर्ग मे पड़ते हैं । ये वो वर्ग हैं जो नए संविधान में खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं ।
बीते हपm्ताें में, जब काठमाण्डु केन्द्रित नेता सरकार में जाने के लिये प्रतिबद्ध थे वहीं तराई सुलग रहा था और अब अलगाव की भावना जड़ पकड़ने लगी है । ४५ से अधिक लोगों की जानें जा चुकी हैं । मधेश के आन्दोलन को भारत का आन्दोलन कहकर एक वर्ग भारत के विरोध में डटा हुआ है । मधेश के द्वारा किए गए नाकाबन्दी को भारत की नाकाबन्दी कही जा रही है । नाकाबन्दी के कारण नेपाल पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो चुका है ।

बहुत सारे मधेशी नेता जो आज आन्दोलन को नेतृत्व कर रहे है वे लोग कलंकित थे । उनपर भ्रष्ट और अवसरवादी का आरोप लग चुका है । आज वही नेता आन्दोलन के माध्यम से फिर सामने आ रहे हैं । जो आन्दोलन मे शहादत प्राप्त करते हंै उसे शहीद कहा जाता है और शहीद “कारण” का निर्माण करता है । एक मधेश एक प्रदेश की माँग को छोड़कर मधेशियों ने मधेश में दो प्रदेश को स्वीकार कर लिया है । आज के दिन में असहमति अगर है तो वो ५ जिलाें का है । तीन पूर्व ( सुनसरी, मोरङ, झापा) और दो पश्चिम में (कन्चनपुर, कैलाली) । सुनसरी को छोड़ कर बिराटनगर जो कि बार्डर टाउन और कोशी बेसिन जबकि कैलाली में थारुओं की जनसङख्या विशाल है और यह कोई हारने योग्य मांग भी तो नही है ।
संयम की आवश्यकता
नेपाल मे नयी सरकार बनी है जिसकी बागडोर प्रधानमंत्री के.पी ओली के हाथ में है । नया राष्ट्रपति, नया सभामुख निर्वाचित हो चुके है । इसी के साथ नेपाल मे नयी राजनीति व्यवस्था उभरती दिखाई दे रही है । अब के समय में सभी पक्षाें को— नेपाल सरकार, राजनीतिक नेतागण, आन्दोलित मधेशी और भारतीय पक्ष सभी को बयानबाजी से परहेज कर के खुला संवाद को अपनाकर समस्या का समाधान करना चाहिये ।
सन १९४८ से लेकर अब तक नेपाल को चार संविधान और दो अन्तरिम संविधान मिल चुका है । फिर भी २०१५ का संविधान थोड़ा हट कर है क्यूँकि इसने पहली बार “संघीय गणतंत्र” को संस्थागत किया है । संविधान निर्माण २०१० तक ही हो जाना चाहिये था परंतु माओवादी की उदार संघीयता और मुख्य रूप से रुढि़वादी हिन्दु राष्ट्र के विचार को एक साथ मिलाने में ही पाँच वर्ष लगे ।
इस अवधि में नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादी ने प्रधानमंत्री के कुर्सी पर अपना अपना ध्यान केन्द्रित किया । कांग्रेस से गिरिजा प्रसाद कोइराला, सुशिल कोइराला, तो पुष्पकमल दहाल ‘प्रचंड’ और बाबुराम भट्राइ माओवादी से ; माधव नेपाल और झलनाथ खनाल एमाले से २००८ से ले कर अब तक सरकार चला रहे हैं । इस बीच माओवादी और मधेशी ताकत जो कि “संघीय गणतंत्र” की माँग को उठाया था, कमजोर पड़ रहा है । भूतपूर्व प्रधानमंत्री सुशिल कोइराला ने स्वीकार किया था कि वो प्रधानमंत्री पद अपने गठबंधन मित्र के लिये छोड़ देंगे, और इस को ले कर ओली को अधीर कर दिया ।
तीन बड़ा दल कांग्रेस, एमाले और माओवादी के पास संख्या थी और इसी के सहारे ओली ने फास्ट टे«क की प्रक्रिया शुरु कर दी । और एक समझौते के तहत इन्होंने एकता की । ओनसरी घरती मगर, माओवादी नेता बर्षमान पुन की बीबी (प्रचंड का बफादार) को सभामुख पद देने का निर्णय किया ।
समझौते के बावजूद प्रधानमंत्ती के पद के लिए सुशील कोईराला ने अपनी उम्मीदवारी और ओली ने भी अपनी उम्मीदवारी दी और प्रधानमंत्री के पद को पाने में कामयाब हुए । राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी, राजावादी समुह, २५ सीटाें के साथ जिन्होंने इस संविधान को स्वीकारने से अस्वीकार किया था और मधेशी जनाधिकार फोरम लोकतांत्रिक के विजय गछदार जिन्होंने अन्य मधेशी समुहों के साथ सेशन को नकारा था, २४ सीटाें के साथ ओली केबिनेट में शामिल हुए ।
ओली एक व्यवहारिक और निर्णायक नेता हैं जो एक प्रभावशाली गृहमंत्री और बाद मे कर्कश परराष्ट्र मंत्री हुए और उसी वक्त उसने दिल्ली के साथ अपना अच्छा सम्बन्ध बनाया था । नक्सली सिद्घान्त को अपना कर सन १९७० मे अपना राजनीतिक कैरिअर शुरु किया था । १४ बर्ष जेल मे रहे और १९९० मे एमाले के एक होनहार नेता के रूप में उभर के आए । प्रजातन्त्र के प्रति प्रतिबद्घता रखा और आज की तारीख में एक दक्षिणपंथी के रूप में ज्यादा दिखाई दे रहे हंै ।
अक्टुबर २८ को विद्या भण्डारी के राष्ट्रपति चुनाब के बाद प्रधानमंत्री ओली का रसूख बढ़ा है । १९९३ मे विद्या भण्डारी के पति मदन भण्डारी के कार दुर्घटना मे हुई मौत के बाद सक्रिय राजनीति में आई थी और तभी से वो ओली के नजदीकी राजनीतिक कामरेड के रूप में पहचानी जाने लगी । १९९० के पहले प्रजातान्त्रिक आन्दोलन के बाद बहुदलीय प्रजातन्त्र की स्थापना में अहम भूमिका खेला था । मदन एक करिश्माइ नेता थे और एमाले के महासचिब थे । मदन भण्डारी की मौत के बाद विभिन्न षंडयन्त्र सिद्घान्त पैदा हुआ परंतु उस घटना के छानबीन के लिये बने आयोग ने उस घटना को दुर्घटना बताया ।
२००९—१० मे विद्या भण्डारी रक्षामंत्री बनी थी, माधव नेपाल के सरकार में जिसके लिए यह कहा गया कि विद्या को ओली के सिफारिस पर मंत्री बनाया गया था ।
अभी तक देखा जाय तो तराई की अवस्था बहुत बिगड़ चुकी है । आर्थिक क्रियाकलाप पिछले दो महीनों से ठहराव की स्थिति में आ गई है । कारखाना, स्कुल, कालेज, अस्पताल सब प्रभावित हंै । पेट्रोलियम पदार्थ की आपुर्ति रुकावट के कारण लोग जलावन पर खाना बनाने को बाध्य हैं । अपनी अपनी साइकल को लोग आवागमन का माध्यम बना रहे हैं । यूँ कहें तो लोगो का त्योहार का मौसम पूर्णरूप से प्रभावित है । इन सभी परिस्थितियाें के बावजूद भी मधेशी अपने आन्दोलन को निरन्तरता देने में लगे हैं । अपनी नाराजगी को और कड़े रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं ।
बहुत सारे मधेशी नेता जो आज आन्दोलन को नेतृत्व कर रहे है वे लोग कलंकित थे । उनपर भ्रष्ट और अवसरवादी का आरोप लग चुका है । आज वही नेता आन्दोलन के माध्यम से फिर सामने आ रहे हैं । जो आन्दोलन मे शहादत प्राप्त करते हंै उसे शहीद कहा जाता है और शहीद “कारण” का निर्माण करता है । एक मधेश एक प्रदेश की माँग को छोड़कर मधेशियों ने मधेश में दो प्रदेश को स्वीकार कर लिया है । आज के दिन में असहमति अगर है तो वो ५ जिलाें का है । तीन पूर्व ( सुनसरी, मोरङ, झापा) और दो पश्चिम में (कन्चनपुर, कैलाली) । सुनसरी को छोड़ कर बिराटनगर जो कि बार्डर टाउन और कोशी बेसिन जबकि कैलाली में थारुओं की जनसङख्या विशाल है और यह कोई हारने योग्य मांग भी तो नही है ।
दुसरा मुद्दा है निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ा हुआ । २०१५ के संविधान ने समानुपातिक के आँकड़े को कम किया है । तराई मे ५१ प्रतिशत जनसङख्या है परंतु हिसाब किया जाय तो अभी कुल १६५ में से एफ.पी.टी.पी (जो पहले निर्वाचित होगा) सिर्फ ६२ सीट ला सकता है जब की ८३ होना चाहिये, जनसंख्या के आधार पर । ‘जनसङख्या और भुगोल’ का जो मानक है निर्वाचन क्षेत्र के निर्धारण के लिये उसका मकसद है हिमाली जिला, जहाँ कि जनसङख्या कम है वो प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया से बाहर न हो जाय । निवर्तमान सरकार का ने जो काम किया था कि हिमाली ६ जिलाें को महत्व देते हुए तराई में निर्वाचन क्षेत्र की संख्या को बढ़ा कर ७९ तक ले जाया, इस चीज को ध्यान मे रख ओली को इसको पुनर्जीवित करना चाहिये ।
नागरिकता और पहचान
मधेश के मुद्दों में नागरिकता की समस्या बहुत पहले से भावपूर्ण रहा है जैसे वे ज्यादातर भारत मे शादी करते हंै खास कर दक्षिणी जिला बिहार और यू.पी में और भारत से ब्याह कर लाई गई पत्नी नेपाल में अंगीकृत नेपाली नागरिक बन जाती है । लेकिन ऐसी शादी के बाद जो बच्चा जन्म लेगा उसके लिये विभेदकारी नीति है । नेपाली पुरुष जो कि विदेशी महिला से शादी करेगा उसके बच्चे को वंशज नागरिकता दी जाएगी वहीं अगर नेपाली महिला जो विदेशी पुरुष से शादी करेगी उसको अंगीकृत नागरिकता दी जाएगी और ऐसे बच्चों को संबैधानिक पदो पर पहुँचने से रोकती है नागरिकता की यह नीति । इस नीति से महिला वर्ग आन्दोलित हैं क्योंकि उनके अनुसार यह नीति समानता के हक के विपरीत है । तथापि अगर काडमाण्डु सिर्फ अपना समय गंवाना चाहता है तो मधेशी मांग तीव्रता लेनी शुरु कर देगी और बाद में उनसे समझौता मंहगा साबित होगा ।
जब कभी भी नेपाल की आन्तरिक राजनीति धु्रविकृत होती है तो उसमें भारत को बलि का बकरा बनाया जाता है । वर्तमान में हुए नाकाबन्दी को भारत के द्वारा लगाया गया कहा जाना बिल्कुल गलत है । ये न तो नेपाल भारत सम्बन्ध के लिए अच्छा है और न ही मधेश के लिए । पिछले सप्ताह में हुए कमल थापा के भारत भ्रमण के बाद भी इस मुद्दे में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा है । नेपाल सरकार की इस समस्या को सुलझाने की क्या नीति या योजना है वह दिखाई नहीं दे रहा और न ही कोई गम्भीरता दिखाई दे रही है ।
जब की ओली द्वारा चीन कार्ड का खेल आरम्भ हो गया है । चीन से एक हजार मेट्रिक टन पेट्रोलियम पदार्थ लाने की जो बात हुई है उससे नेपाली राष्ट्रीयता को क्षणिक भर के लिये भावुकता प्रदान कर सकता है । परंतु ओली ये भलिभाँति समझते हंै कि दैनिक सैकड़ो टेंकर जो बीरगंज होते हुए भारत से नेपाल आता है उसका विकल्प चीन से लाए जाने वाला हजार मेट्रिक टन पेट्रोलियम पदार्थ नहीं हो सकता ।
दूसरी ओर, मौजुदा भारत विरोधी धारणा शायद ही संगत है भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘पड़ोसी पहले’ की निती से । नेपाली अभिजात वर्ग को इस तथ्य को नही भूलना चाहिये की नेपाल के हरेक आन्दोलित समुह, चाहे सन १९५० में नेपाली कांग्रेस हो या १९९० में माओवादी इन सबों ने नेपाल—भारत बीच के १८०० कि.मी. खुली सीमा का फायदा न लिया हो । सभी भारत में जाकर शरण लिये है और भारत से हस्तक्षेप की भी आशा किया है । इस हालात में आज सिर्फ मधेशी सहयोग की आकांक्षा कर रहे हैं यह कैसे हो सकता है ?
जनजाति की मांग भी अलग नहीं है, जबकि सिर्फ मधेश आन्दोलन को केन्द्र में रखा जा रहा है । मधेशी जो हथियार को दूर रखता है, जनजाति जो कि माओवादी में रहकर लड़ा करता था । उनका एक बड़ा हिस्सा माओवादी के कार्यकर्ता भी थे । आज वही अधिकार की माँग कर रहे हैं । भौगोलिक दृष्टिकोण से थारुओं की जो स्थिति है अगर वो अपनी पर आ गए तो नेपाल की स्थिति को बदल सकते हैं ।
ओली को सबसे पहले मधेशी, थारु और जनजाति की भावना में जो दरार पड़ी है उसे सम्बोधन करना चाहिए । इसके बाद ही समस्या का समाधान खोजना आसान हो सकता है । ऐसे में भारत भी मददगार बन सकता है और बनना चाहिये । मोदी को भी अपना ट्रेक परिवर्तन करना चाहिये । उनका अभी का जो क्षेत्रिय रौब का रू है उसे पहले जैसा बनाना चाहिए जिससे एक सदाशय पड़ोसी और सहयोगी छवि सामने आ सके । द हिन्दू से साभार, (अनुवादकः रणधीर चौधरी)

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