नेपाल के दलितों में चमार

चमार अथवा ‘मोची’, ‘हरिजन’, ‘चर्मकार’, नेपाल में पायी जाने वाली जात समूह है । वर्तमान में यह जाति दलितवर्ग की श्रेणी में आती है । यह जाति अस्पृश्यता की कुप्रथा का शिकार रही है । इस जाति के लोग परम्परागत रूप से चमड़े के व्यवसाय से जुड़े रहे हैं । नेपाल में चमार जाति दलितवर्ग में अधिक संख्या में पायी जाने वाली जाति है, जिनका मुख्य व्यवसाय, चमड़े की वस्तु बनाना तथा व्यापार करना है । चूंकि उनका कार्य उन्हें चमड़े से निर्मित वस्तुओं का व्यापार करना था । इन्होंने संघ–संस्था, स्थानीय शासन, संसद आदि क्षेत्रों में मजबूत स्थिति बनाई है ।
प्राचीन साहित्य में ‘मोची’, ‘कर्मकार’, ‘चर्मकृत’, ‘पादुकार’, ‘पादुकृत का भी उल्लेख मिलता है । ब्राह्मण ग्रन्थों, मनु संहिता तथा प्राचीन विधि पुस्तकों, महाभारत, रामायण और विष्णुपुराण में खाल तथा चमड़े से बने जूत्तों का उल्लेख मिलता है । पेशे के लिहाज से कल जिन्हें चर्मना अथवा चर्मला तथा चर्मकार कहा जाता था आज वे लोग चमार कहलाते हैं । अद्यतन रिर्पोट के मुताबिक चमार मछुवारा जाति के व्यक्ति द्वारा चाण्डाल (समाज का सबसे निम्नतम वर्ग, जो ब्राह्मणी माता और शूद्र पिता की संतान होता है) औरत से उत्पन्न माना जाता है । इसके अलावा, उसे मल्लाह और चाण्डाल का पुत्र भी कहा जाता है । किन्तु यथार्थ में इनमें से किसी भी परम्परा का चमारों की उत्पत्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है । जितनी भी सम्भावनाएं प्रतीत होती हैं, उनकी तुलना में वे अपने उच्चतर जन्म का दावा करते हैं ।
चमारों की उत्पत्ति के बारे में कहा जाता है कि एक परिवार में चार भाई थे । एक बार ऐसा हुआ कि एक दिन एक गाय मर गयी और शाम तक वह आंगन में पड़ी रही । जब कोई भी उस मरी हुई गाय को हाथ लगाने को तैयार नहीं हुआ तो तीनों बड़े भाईयों ने मिलकर यह फैसला किया कि उनका छोटा भाई उस मरी हुई गाय को घर के बाहर ले जाएगा और उसके बाद स्नान करने पर वे उसे पूर्व की तरह समानता का दर्जा देंगे । इस पर वह सहमत हो गया । काफी मेहनत मशक्कत के बाद वह जैसे–तैसे उस मरी हुई गाय को घसीटकर जंगल तक ले गया । लेकिन जब वह स्नान करके लौटा तो उसके भाईयों ने उसको स्वीकार करने से इन्कार कर दिया और उसको उनसे दूर रहने को बाध्य किया । उसने इस बात का बहुत प्रतिरोध किया । किन्तु उसका प्रतिरोध बेकार गया । उन्होंने उससे कहा कि अब से वह चमार का काम करेगा अर्थात् मृत पशुओं की खाल निकालने और चमड़ा तैयार करने तथा चमड़े की वस्तुएं बनाने का काम करेगा । तीनों भाईयों ने उसे वचन दिया कि इन कार्यों को करने के बदले में वे उसकी देखभाल करेंगे । इस प्रकार चमार जाति अस्तित्व में आयी ।
एक अन्य किंवदन्ती आजकल के अग्रवाल बनियों से सम्बन्धित है, जिसके अनुसार एक राजा था जिसकी दो बेटियां थी– चामू और बामू । दोनों के दो पुत्र थे जो बहुत बलिष्ट थे । एक दिन राजा के बाड़े में एक हाथी मर गया । राजा उसके टुकड़े करना नहीं चाहता था । उसने लोगों से पूछा था कि क्या कोई इतना बलिष्ट व्यक्ति है, जो इस मृत हाथी को बाहर ले जाकर इसे दफना सके । चामू के बेटे ने यह कार्य कर दिया । इस पर बामू के बेटे ने उसको जाति बाह्य घोषित कर दिया ।
हालांकि प्राचीन और आधुनिक इन दोनों में से किसी भी परम्परा से चमारों का उद् भव नहीं हुआ है । इनसे केवल इतना ही पता चलता है कि किस तरह कुछ लोगों को चमड़े का कार्य करने वाले समूह में अप्रतिष्ठित किया गया था । चमार जाति के उद्गम का मूल स्रोत प्राचीन काल में गांवों की सीमा पर रहने वाला वर्ग था जो चमड़े का काम करता था । इस समूह ने जो निश्चित रूप से अनार्य था, सदियों तक अपने इस परम्परागत पेशे को बनाए रखा । किन्तु आज यह जाति बहुत बड़ी है और केवल इस आधार पर यह कहना कठिन होगा कि इस जाति ने स्वतः अपना विस्तार किया है ।
राष्ट्रीय दलित आयोग ने भौगोलिक दृष्टिकोण से चमारों को पहाड़ी और मधेशी दो भागों में बांटा है । हालांकि आयोग द्वारा चमारों को चमड़ा सम्बन्धी काम गर्ने वाले समुदाय के अन्तर्गत रखा गया है । पहाड़ी इलाकों में चमड़े सम्बन्धी कार्य करने वाले समुदाय सार्की, चर्मकार, मिजार से पहचाने जाते हैं । सार्की इन नामों से पहचाने जाते हैं, जैसे– अच्छामी, उप्रेती, कमार, किसान, कोइराला, खतिवड़ा, गिरी, गैरे, गैरिपिपल, गाथे, घिमिरे, चन्द, गोतामे, चुड़ाल, चुहान, ठगुन्ना, दाउलाकोटी, धैलाकोटी, दावे, दाहाल, दुलाल, धमेल, धमला, नघाली, पुर्कोटी, पुलामी, पौडेल, बसेल, बमरेली, बयलकोटी, बिशुंखे, वस्ताकोटी, वोगटी, भेयल, भूल, भुर्तेल, भिपाल, मंग्राती, मजाकोटी, माल्वोक, मुदेल, रम्तेल, रुचाल, राउत, रोका, लमजेल, लम्साल, शाही, श्रीमाली, सिरौते, सुर्खेती, संयल, सेजवाल, हमाल, हितांग आदि । जबकि तराई–मधेश के बसनेवाले चमार, राम, मोची, हरिजन, रविदास÷रैदासी÷रैदास, महरा, महर, मेहरा आदि नामों से पहचाने जाते हैं । इनकी भी काफी उपजातियां हैं । जैसे– राउत, भगत, दास, बजर, बाध, धुसिया, दशवतिया, मधेशिया, रैदासी, पुरबिया, अहरबार, सतनामी, लस्करिया आदि । पहाड़ के सार्की और तराई–मधेश के चमार के बीच रहन–सहन, संस्कार, संस्कृति, वेशभूष आदि में काफी अन्तर है ।
जातीय परिषद्
चमारों की एक अच्छी संगठित और प्रभावशाली परिषद् या पञ्चायत होती है । लोगों में जातीय पञ्चायत का बहुत भय रहता है । और अपने क्षेत्र में इसका बहुत जबरदस्त प्रभाव होता है । इसके अतिरिक्त सामान्य व्यवहार में सारा गांव या मोहल्ला, समूह या चमारों की उपजातियां और इसके अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत आनेवाले सभी व्यक्ति शामिल होते हैं । अपने कम तीव्र रूप में यह वह निकाय है जो गांव के समूह के परिवारों का प्रतिनिधित्व करता है । और इसमें सभी बूढ़े व्यक्ति होते हैं । आमतौर पर प्रतिनिधित्व परिवारों के आधार पर होता है । कहीं–कहीं एक उपसमिति भी बनाई जाती है, जिसमें प्रायः पाँच या सात या नौ व्यक्ति होते हैं, जो बड़े निकाय को दिशा–निर्देश देते हैं और उस पर नियन्त्रण रखते हैं । अन्य जातियों की तरह चमारों के बीच भी जातीय पञ्चायत एक स्थायी निकाय होती है । मुखिया÷प्रधान÷मैंजन चुना जाता है । कहीं–कहीं तो जीवनभर के लिए चुना जाता है । इसका कार्यालय आमतौर पर वंशानुगत होता है ।
पञ्चायत का अधिकार क्षेत्र स्थानीय होता है, लेकिन एक पञ्चायत के फैसले को दूसरी पञ्चायत अपने यहां लागू कर सकती है । पञ्चायत निम्न लिखित प्रकार के मामलों में अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर सकती है–
१. अवैध यौन संबंधों के, जैसे कि विधवा का गर्भवती होना पाया जाना, पर–गमन या व्यभिचार के मामले । यदि मामला अधिक गम्भीर न हो तो दोषियों को दण्ड और धमकी देकर छोड़ दिया जाता है, लेकिन यदि अनियमितता एक सार्वजनिक बुराई हो तो उसकी जांच की जाती है । २. वैवाहिक विवादों के, जैसे विधवाओं की विक्री, और वे मामले जिनमें विवाह में मंगनी के बाद लड़की नहीं दी जाती । ३. छोटे झगड़ों के, जो सरकारी अदालतों के अन्तर्गत नहीं आते हैं, जैसे– लड़ाई और झगड़े आदि । ४. पैतृक अधिकारों से संबंधित मामले, ५. जाति के कल्याण को प्रभावित करने वाले मामले, ६. काम, पैसों के सौदे और अन्य को प्रभावित करनेवाले मामले आदि ।
ऐसे अवसर भी होते हैं, जैसे सभी प्रकार के जाति भोज, जब व्यक्ति पञ्चायत के समक्ष मामला उठाने के लिए एक मात्र समूह का लाभ उठाते हैं । विवाहों के अवसर पर परिषद् की बैठकें नहीं होती हैं, लेकिन अंत्येष्टि के दौरान प्रायः बैठकें होती हैं ।
सामाजिक जीवन
चमार लोगों में अपने इलाके में से ही, अपने ग्राम समूह से बाहर किन्तु अपनी उपजाति के ही शादी–ब्याह करने का रिवाज है । लेकिन परिवार समूह (कुल, गोत) के सदस्यों के बीच विवाह निषिद्ध है । हालांकि चचेरे, फुफेरे लागों के बीच आपस में विवाह का रिवाज नहीं है किन्तु इसके उदाहरण भी मिलते हैं । आमतौर पर रिवाज यही है कि इस तरह की रिश्तेदारी चाहे कितनी पुरानी अथवा दूर की क्यों न हो, उनमें आपस में विवाह नहीं होता है । कुछ स्थानों पर उन परिवारों के साथ विवाह संबंध स्थापित करने की प्रथा नहीं है, जिन परिवारों से मां, दादी या पड़दादी आयी हो । विवाह संबंध हमेशा दोनों पक्षों के माता–पिता अथवा रिश्तेदारों द्वारा तय किए जाते हैं । औरतें विवाह तय नहीं करती हैं । लेकिन विवाह सम्बन्धी निर्णयों में महिलाओं की सलाह अवश्य ली जाती है और उनकी राय को महत्व दिया जाता है । विवाह को एक धार्मिक संस्कार समझा जाता है न कि एक समझौता । चमारों में बाल–विवाह की प्रथा सब जगह और समस्त उपजातियों में पायी जाती है । सगाई बहुत जल्दी, प्रायः १३–१४ वर्ष की आयु होते–होते विवाह कर दिया जाता है । आमतौर पर विवाह तब उत्कृष्ट माना जाता है, जब वर की आयु २० हो ।
घरेलु रीति–रिवाजः जन्म
चमार औरतें बांझपन को बहुत बड़ा दुर्भाग्य मानती है और बाझपन से मुक्त होने के लिए वे प्रसिद्ध तीर्थ–मन्दिरों पर जाती हैं तथा चढ़ावा चढ़ाती हैं । किसी साधु की धूनी से भभूत ली जाती है । कमी कभी कई भगतों को बुलाया जाता है और वे सबके सब अपने–अपने ढंग से झाड़–फूंक करते हैं । अभी भी चमार लोग विशेष रूप से जादू–टोना के चक्कर में पड़े रहते हैं । गर्भावस्था के दौरान औरतें अपने गले में भगत द्वारा दिया गया ताबीज बांधती हैं ।
बच्चा पैदा होने के छह दिन या नौ दिन में छठी किया जाता है । छठी के दिन रीति कर्म करने के अलावा बच्चे के जन्म के दसवें, ग्यारवें और चौदवें दिन भी विभिन्न रीति–कर्म किए जाते हैं । यह खुशी का दिन होता है, यद्यपि बच्चे का नामकरण उसके छठी के दिन ही कर दिया जाता है । बहुत से लोग बच्चे के दो नाम रखते हैं, पहला यह कि बच्चा जादू–टोना तथा बुरे प्रभावों से सुरक्षित रहेगा, दूसरे यमराज द्वारा उसकी उपेक्षा किए जाने की अधिक सम्भावना रहेगी । दूसरा नाम माता–पिता द्वारा या परिवार के किसी बड़े–बुजुर्ग आदमी द्वारा रखा जाता है और आमतौर पर उसे इसी नाम से पुकारा जाता है ।
विवाह
विवाह प्रयाः बेटी को कम उम्र में ही कर देने का रिवाज देखा जाता है । माता–पिता द्वारा इस बात का निश्चित कर लेने के बाद कि पुत्र अथवा पुत्री का विवाह कर देना चाहिए, परिवार के पुरुषों द्वारा इस पर सलाह–मशविरा किया जाता है । उसके बाद बच्चे के लिए उपर्युक्त वर या वधू की तलाश की जाती है । इस दौरान एक विचौलिया नियुक्त किया जाता है । विचौलिया दोनों परिवारों को एक दूसरे के विषय में जानकारी देता है । विचौलिया द्वारा आवश्यक जानकारी दे दिए जाने के बाद दोनों पक्षों के पिता एक–दूसरे से खूद बात करते हैं । इस अवसर पर दोनों पक्षों के वंश और गोत के विषय में पूछताछ की जाती है । यदि हां–हम्बै हो जाती है तो यह जानने के लिए कि यह सम्बन्ध सही रहेगा या नहीं तथा सगाई की रम्स की लगन निकलवाने के लिए किसी पुरोहित की सलाह ली जाती है । इसके बाद ही सगाई होती है ।
विवाह के तीन मुख्य भाग होते हैं । पहला भाग है– मंगनी, जिसका आशय होता है एक दूसरे से बंध जाना । दूसरा भाग है– शादी या विवाह, जो आमतौर पर कम उम्र में होता है । और तीसरा भाग है– गौना । यह तब होता है, जब वर–वधू परिपक्व हो जाते हैं ।
विवाह–संस्कारों के दौरान विभिन्न नाते–रिश्तेदारों द्वारा किए जाने वाले सामान (उपहार) का बड़ा सही–सही हिसाब रखा जाता है । ताकि जब उनके यहां विवाह हो, तो उस समय उस ‘न्यौते’ को उचित रूप से लौटाया जा सके । इस न्यौते की राशि को न्यौता देनेवाले के घर में विवाह होने पर उसे दोगुने रूप से लौटाया जाना होता है ।
मृत्यु
चमार अपने मुर्दों को दफनाते भी हैं और जलाते भी हैं, ऐसा कोई तय नियम प्रतीत नहीं होता, जो मुर्दाें को जलाने अथवा दफनाने के मामले में लागू होता है । गरीब लोग अपने मुर्दाें को किसी जलधारा में विसर्जित कर देते हैं । किन्तु आम प्रथा मुर्दे को जलाने की प्रथा होती है ।
भोज और रस्म–क्रियाओं के सम्बन्ध में अलग–अलग प्रथाएं प्रचलित हैं । कुछ जगहों पर कुछ रस्में मृत्यु के दसवें दिन अदा किया जाता है । इसी तरह कहीं–कहीं महाभोज तेरहवें दिन में भी किया जाता है । मृत्यु की पहली पुण्यतिथि पर पिण्ड अर्पित किए जाते हैं और परिवार रात में भोज का आयोजन करता है । जैसा कि भोज के अवसरों पर किया जाता है ।
सामाजिक स्तर पर चमारों का स्थान बहुत निम्न है । उन्हें अछूत समझा जाता है । यह अंशतः अज्ञानता, उससे अधिक उनकी गरीबी और उससे भी अधिक उनके नीची जाति का होने के कारण है । चमारों के प्रति घृणा की भावना उनके परम्परागत धन्धे के कारण भी उपजती है । उनका नाम उन्हें मरे हुए जानवरों से जोड़ता है । एक और निर्विवाद घृणा की बात यह है कि उनके समुदाय (स्थानीय अपवादों को छोड़कर) की औरत को ‘चमारिन’ के रूप में जाना जाता है । ‘चमारिन’ शब्द का प्रयोग कभी–कभी उनकी औरतों के पर्याय के रूप में किया जाता है । उनके काम को अत्यधिक अपवित्र समझा जाता है ।
चमारों की एक कड़वी सच्चाई उनकी दयनीयता और गरीबी है । आर्थिक रूप से विपन्न और सर्दी में ठिठुरते हुए, रहने को ठीक घर नहीं है । यद्यपि उनमें कुछ सम्पन्न हैं और कुछ तो अच्छे खाते–पीते भी हैं, मगर अधिकांश चमार दिन–हीन हैं । २० में से कोई एक परिवार ही होगा, जिसके पास नियमित काश्तकसी है, और वह भी छोटी–छोटी जोतों में हैं ।
चमारों में शिक्षा का अत्यंत अभाव है । चमारों में पढ़ने या लिखने मात्र क्षमता की तुलना में अज्ञानता ने अधिक जड़ जमा रखी है । पीढि़यों से चमारों को ज्ञान÷शिक्षा का प्रकाश तक ही मिला है, बल्कि आज भी अधिकांश चमारों को नहीं मिल रहा है । जो कि गांव में और व्यक्तियों को उपलब्ध है, जिसके कारण उनके मस्तिष्क लगभग अकुशल हैं । इन स्थितियों में, कुछ क्षेत्रों में, जहां शिक्षा पर बल दिया गया है, मामूली सुधार हुआ है ।
शिक्षा सम्बन्धी सुविधाओं और बौद्धिक अकुशलता के साथ–साथ जिस परिवेश में चमार रहते हैं, वह भी उनकी प्रगति में बाधक है । उनके पड़ोसी, जो अधिकांश समय उन्हें अपने अधीन रखते हैं, उन्हें नियमित रूप से विद्यालय जाने देने के इच्छुक नहीं रहते है । यही भावना सर्वव्याप्त है कि अज्ञानी चमार ही उपयोगी चमार होता है । ज्ञान ही कुछ हद तक व्यक्तिगत महत्ता और स्वतन्त्र होने की इच्छा जगाता है और यह सब चमारों के परिवेश में प्रतिकूल है । इस विशाल जाति का बौद्धिक उत्थान एक जबरदस्त समस्या है, लेकिन पूरे देश की प्रगति के लिए उनका बौद्धिक उत्थान विशेष महत्व का विषय है ।

 

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