नेपाल के भूकंप ने बदल दी लोगों की आस्था

25 वर्षीय निश्चल गुरुवाचार्या अब ईश्वर में विश्वास नहीं करते। काठमांडू के चमेटी के नया बाजार इलाके के इस 25 वर्षीय युवा ने शनिवार को आए भूकंप से ढहे मकान में अपने 52 सदस्यों वाले परिवार में से आधे से ज्यादा को खो दिया। उस दिन उनके परिवार ने घर में ‘साप्ताहिक पूजा’ का आयोजन किया था, जिसमें उनके लगभग सभी रिश्तेदार शामिल हुए थे।

गुरुवाचार्या ने कहा, ‘एक पूरी पीढ़ी खत्म हो गई। मेरे दादा, मेरी मां, उनकी सभी बहनें, मेरे भाई, सब चले गए। उस समय घर में 40 लोग थे, उनमें से सिर्फ नौ ही बचे हैं। हम लोग भगवान को खुश करने के लिए पूजा कर रहे थे, लेकिन हमें उसके बदले उनका क्रोध मिला।’

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वहां से कुछ किलोमीटर दूर दरबार एरिया कैंप में चोटों के निशान और सिर में लगी चोट से उबर रहे माहेश्वर राज ख्वांजू भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे हैं। भोतैती में भूकंप के दौरान जब उनकी इमारत ढही तो उनका परिवार पांच मंजिला नीचे आ गिरा लेकिन इस घटना में उनके पत्नी और बच्चों को छोड़कर बाकी सभी मारे गए।

उनकी 10 साल की बेटी अस्मिता झटके से बेहोश हो गई क्योंकि उसने पहली बार भूकंप को महसूस किया था, लेकिन उसके शरीर पर चोट की एक खरोंच तक नहीं आई। यहां तक कि उनका कुत्ता टॉमी भी लंगड़े पैर के साथ भी बच गया। ख्वांजू ने कहा, ‘यह भगवान की कृपा है, पशुपतिनाथ की शक्ति।’

इन दोनों कहानियों के बीच एक ही समानता है और वह है सरकार की अनुपस्थिति का रोना और भारत द्वारा उपलब्ध कराए गए राहत और बचाव कार्यों के प्रति आभार। भगवान के क्रोध और पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुकी नेपाल सरकार की मदद को सबसे पहले आगे आए भारत ने नेपालियों के दिल में जगह बना ली है, बावजूद इसके की दुनिया के लगभग सभी बड़े देश नेपाल की मदद के लिए आगे आए हैं।

गुरुवाचार्या ने कहा, ‘NDRF के लोग पिछले तीन दिनों से यहां बिना पलक झपकाए दिन-रात काम कर रहे हैं। मुझे पता है कि मेरे परिवार का कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं बचा होगा। लेकिन कम से कम इन लोगों की बदौलत उन्हें सम्मानजनक अंतिम संस्कार मिल सकेगा।’ हालांकि ख्वांजू को स्थानीय युवकों ने बचाया था लेकिन भारतीय सेना द्वारा लाई गई राहत सामग्री और दवाओं से ही वह कैंप में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं।

नेपाल की वास्तुकला विरासत को हुए जबर्दस्त नुकसान को झेलने वाले शहर हनुमान ढोका के 30 वर्षीय कपड़ा व्यापारी श्रीकृष्णा खरेल ने लोगों की मदद के लिए एक कैंप लगाया है। इस भयंकर भूकंप के बाकी पीड़ितों की तरह वह भी सरकार से नाराज हैं। उन्होंने कहा, ‘ये लोग हमारे लिए कुछ नहीं करेंगे। पहले दिन पानी, खाना, दवाएं कुछ नहीं थीं। हम एक दूसरे की मदद करके जिंदा बचे हैं। यहां सबसे पहले आने वालों में भारतीय थे, चीन से भी पहले। हमनें यहां किसी अमेरिकी को नहीं देखा है।’

हालांकि नेपाल सरकार अपनी पूरी ताकत से राहत कार्यों में जुटी है और उसने 90 फीसदी सेना को बचाव कार्यों में लगा दिया है। हालांकि आपदा की गंभीरता को देखते हुए सेना की संख्या पर्याप्त नहीं है। भारत ने मंगलवार को एनडीआरएफ की 3 और टीमें भेजी जिसे मिलाकर राहत कार्यों में जुटी एनडीआरएफ टीमों की संख्या 16 हो गई है। पूरी दुनिया से आ रही सहायता के बीच यहां के त्रिभुवन इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर भारत द्वारा टनों भोजन, पानी, कंबल और टेंट पहुंचाए गए।

अपने निजी नुकसान से परे नेपाली लोग जिस बात से ज्यादा दुखी हैं वह है उनके सांस्कृतिक विरासत को हुआ नुकसान। टूरिजम पर निर्भर इस देश में लोग बस यही कह रहे हैं, ‘अब नेपाल कौन आएगा।’

टैक्सी ड्राइवर बोस केसी कहते है, ‘क्या आप जानते हैं कि हनुमान ढोका क्षेत्र के मंदिरों की प्रत्येक ईंट जोकि अब मलबे में ढेर हो गई हैं, पर उन राजाओं के नाम अंकित थे जिन्होंने इसके निर्माण में योगदान दिया था। आपको लगता है कि इन्हें फिर से बनाया जा सकता हैं, इनकी मौलिकता बरकरार रखी जा सकती है, बिल्कुल नहीं। गुथीभैरव मंदिर हमारा ताजमहल था, वह नष्ट हो गया। हमने दुनिया को दिखाई जा सकने वाली सभी चीजें खो दी हैं।’
source:http://navbharattimes.indiatimes.com

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