नेपाल के राजनीतिक आन्दोलन में मधेसी समुदाय का योगदान “राणा–राजा से गणतन्त्र” तक

नेपाल में राणा शासन विरोधी प्रजातान्त्रिक आन्दोलन में विराटनगर के आन्दोलन और सत्याग्रह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । वि.सं. २००५ साल में विराटनगर जूट मिल और मोरङ कॉटन मिल से नेपाल के इतिहास में पहला मजदूर हड़ताल हुआ । इस हड़ताल का नेतृत्व वी.पी. कोइराला, गिरिजा प्रसाद कोइराला, मनमोहन अधिकारी, नैनालाल बोहरा, दिनेश दुबे, मुन्नीलाल चौधरी, इन्द्रप्रताप सेन, बंशीधर दास, रघुनाथ गुप्ता आदि ने किया था । इस आन्दोलन में पंचानन्द दास, पुरन सिंह का भी काफी योगदान रहा । विराटनगर मजदूर आन्दोलन में ६ मजदूर शहीद हुए ।

jp-gupta
डा. जयप्रकाश गुप्ता
नेपाल की शासन व्यवस्था कोे प्रजातान्त्रिककरण करने में मधेसी समुदाय का ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण योगदान रहा है । नेपाल का पहला विद्रोह कहें या जन आन्दोलन वह १०४ वर्ष पुराना राणा शासन विरोधी संघर्ष ही था जिस ने नेपाल को नई दिशा दी । वि.सं. २००७ साल का राणा शासन के खिलाफ में हुए मुल्क के इस पहले आन्दोलन का केन्द्र मधेस ही रहा था । इस में मधेसी समुदाय के योगदान को कदापि भी अनदेखा नही किया जा सकता है । साथ ही इस आन्दोलन में भारत की भूमिका सिर्फ प्रेरक ही नही अपितु भारतीय जनगण का सक्रिय योगदान भी रहा है ।
ब तक भारत ब्रिटिश शासन से मुक्त नही होगा, नेपाल में राणाओं से मुक्ति नही मिलेगी । इस तथ्य को मनन कर नेपाल के वी.पी. कोइराला, डा. डिल्लीरमण रेग्मी, कृष्ण प्रसाद भट्राई, मातृका प्रसाद कोइराला, गणेश मान सिंह, सुवर्ण शमसेर राणा, महेन्द्र विव्रmम शाह के साथ साथ मधेस के भद्रकाली मिश्र, महेन्द्र नारायण निधी, रामेश्वर प्रसाद सिंह, गजेन्द्र नारायण सिंह, काशीप्रसाद श्रविास्तव सहित कई नेताओं ने अपने छात्र जीवन और संघर्ष के दौरान भारत में रहकर नेपालियों को संगठित करने का काम किया था । इन में से कई भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में जेल भी गये । वही जय प्रकाश नारायण, डा. राम मनोहर लोहिया, आचार्य जे.बी.कृपलानी, अशोक मेहता, विजयलक्ष्मी पण्डित, श्रीपद अमृत डांगे, सी. नम्बूदरीपाद, मधु दण्डवते, सुरेन्द्र मोहन, मोहन धारिया, अरुणा आसफ अली, प्रेम भासीन, सरयु प्रसाद मिश्र, सुरज नारायण सिंह, अच्युत पटवर्धन, काशी प्रसाद सिंह, फणिश्वर नाथ रेणु, रामबृक्ष वेणीपुरी जैसे भारतीय राजनीतिक–साहित्यिक हस्तिओं ने नेपाली प्रजातान्त्रिक आन्दोलन में खुल कर हिस्सा लिया । इस का अपना ही एक अलग इतिहास और लम्बी फेहरिस्त है ।
वि.सं. २००७ साल की व्रmान्ति में मधेसी की भूमिका
नेपाल में राणा शासन के उत्कर्ष के दौरान वि.सं. १९९७ में चार व्रmान्तिकारियों को मृत्युदण्ड दिया गया था । इस में से एक शुव्रmराज शास्त्री थे । शहीद शुक्रराज शास्त्री स्वयं आर्य समाज के शिष्य थे । उन्हाेंने भारतीय आर्य समाज से प्रेरणा लेकर ही नेपाल में राजनीतिक सुधार की मांग की थी । भारत में आर्य समाज आन्दोलन के प्रणेता स्वामी दयानन्द सरस्वती से प्रभावित होकर नेपाल के मधेस क्षेत्र में राजालाल आर्य, भगवान दास, रघुनाथ प्रसाद गुप्ता एवं उदयराज लाल जैसे सुधारकों ने बीरगंज, लुम्बिनी सहित के क्षेत्रों में राणा शासन का सक्रिय विरोध किया था । भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान महात्मा गांधी से प्रभावित होकर जनकपुर में पं. रामाकान्त झा के अगुवाई में बोध प्रसाद उपाध्याय, देवशंकर गिरी, श्रीकान्त ठाकुर, बौएलाल झा, अनिरूद्ध प्रसाद सिंह, कमलकान्त चौधरी, जमुना प्रसाद सिंह, बलभद्र चौधरी, रामदुलार साह, पं. रामचन्द्र झा, राजेश्वर निधी, महंथ गोेकुल गिरी, गंगेश्वर झा तथा गुलाब नारायण झा समेत के लोगाें ने राणा विरोधी मुहिम को आगे बढ़ाया । बाद में जब नेपाली राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ तब पं. रामाकान्त झा इसके संस्थापक सदस्य भी बने । नेपाली राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में महोत्तरी के सरोज कोइराला, नरेन्द्र रेग्मी और सप्तरी के रूद्र प्रसाद गिरी, विराटनगर के दयाशंकर गुप्ता, नेपालगंज के योगेश्वर मिश्र आदि लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है ।

राजा महेन्द्र का सैनिक तानाशाही : मधेसियों ने लड़ी लड़ाई

नेपाल का राणा विरोधी आन्दोलन में सप्तरी जिले का हनुमाननगर जेल प्रकरण को भुलाया नही जा सकता है । सन् १९४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन में गिरफ्तारी से बचकर नेपाली भूमि से आन्दोलन का संचालन करने के लिए प्रसिद्ध भारतीय नेतागण जय प्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, काशी प्रसाद सिंह तथा दो तीन लोग सप्तरी जिला स्थित कोइलाड़ी गँंव में आए थे । ब्रिटिश अधिनस्थ हिन्दुस्तान की पुलिस तथा गुप्तचर उनके पीछे लगी थी । बाद में ब्रिटिश सरकार के दबाव में इन्हें गिरफ्तार कर हनुमाननगर के जेल में रखा गया । तब सप्तरी के मधेसियों ने हनुमाननगर जेल पर सशस्त्र आक्रमण कर सभी व्रmान्तिकारी भारतीय नेताओं को छुड़ाया था । इस पूरे अभियान में नेपाल के जयमंगल प्रसाद सिंह, चतुरानन सिंह, तारिणी प्रसाद सिंह, रामेश्वर सिंह, दल बहादुर आदि की मुख्य भुमिका रही थी । उस घटना में नेपाली गारद का एक संतरी भी मारा गया था । इसका असर यह हुआ कि नेपाल की पुलिस का नेपाली व्रmान्तिकारियों पर और ज्यादा आतंक बढ़ गया । गिरफ्तारी और दमन शुरू हुआ । इस प्रकरण में २२ लोगाें को गिरफ्तार कर काठमाण्डू चलान किया गया और १२७ व्यक्ति को राजविराज जेल में रखा गया । काठमाण्डू जानेवालों में सर्वश्री रामेश्वर प्रसाद सिंह, चतुरानन सिंह, जयमंगल सिंह, मीन बहादुर सिंह, तारिणी प्रसाद सिंह, रामजी सिंह, शत्रुध्न प्रसाद सिंह, विन्देश्वरी प्रसाद सिंह, अखण्ड नारायण सिंह, रामदत्त कोइराला, जे.सी. समर बहादुर प्रजापत, कामानन्द मिश्र, नेबू मण्डल, अब्दुल मियां, कृष्णवीर कामी, किसन दुसाध, विष्णुध्वज श्रेष्ठ, बैजनाथ उपाध्याय, आनन्दी प्रसाद सिंह, चन्द्र नारायण सिंह, देवनारायण सिंह, सेवक माझी थे । इन्हाेंने कठोर कारावास की सजा का भुक्तान किया । अब्दुल मियां और कृष्णवीर कामी तो जेल में ही शहीद हुए ।
नेपाल में राणा शासन विरोधी प्रजातान्त्रिक आन्दोलन में विराटनगर के आन्दोलन और सत्याग्रह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । वि.सं. २००५ साल में विराटनगर जूट मिल और मोरङ कॉटन मिल से नेपाल के इतिहास में पहला मजदूर हड़ताल हुआ । इस हड़ताल का नेतृत्व वी.पी. कोइराला, गिरिजा प्रसाद कोइराला, मनमोहन अधिकारी, नैनालाल बोहरा, दिनेश दुबे, मुन्नीलाल चौधरी, इन्द्रप्रताप सेन, बंशीधर दास, रघुनाथ गुप्ता आदि ने किया था । इस आन्दोलन में पंचानन्द दास, पुरन सिंह का भी काफी योगदान रहा । विराटनगर मजदूर आन्दोलन में ६ मजदूर शहीद हुए ।
वि.सं. २००३ साल में कलकत्ता में नेपाली राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ । इसके स्थापना सभा में नेपालगंज के सुविख्यात नेता जागेस्वर मिश्र ने भाग लिया था । इस के बाद वि.सं. २००४ साल में बिराटनगर के सीमावर्ती जोगबनी में नेपाली राष्ट्रीय कांग्रेस का सम्मेलन हुआ । जिसमें मातृका प्रसाद कोइराला को कार्यवाहक सभापति बनाया गया । इस सम्मेलन में महेन्द्र नारायण निधी और पं. रमाकान्त झा सहित कई मधेसी व्रmान्तिकारी सम्मिलित थे । यहीं से देश व्यापी सत्याग्रह आन्दोलन की घोषणा की गयी । मधेस के आन्दोलनकारियों ने विराटनगर, वीरगंज, लुम्बिनी आदि स्थानों पर सत्याग्रह आन्दोलन को तीव्र किया । लुम्बिनी क्षेत्र के सत्याग्रह में भोलानाथ शर्मा, दयाशंकर मुन्शी, काशीनाथ गौतम आदि को बन्दी बनाकर पहाड़ के जेल में डाल दिया गया । नेपालगंज क्षेत्र में कुंवर कल्लु सिंह ने आन्दोलन को बढ़ाया । सत्याग्रह आन्दोलन के क्रम में जनकपुर धाम में सरयुग चौधरी, सुन्दर झा शास्त्री, आशीष भगत, मिश्रीलाल गुप्ता, लक्ष्मण साह, मेध प्र. उपाध्याय, भीष्मजंग केसी, दिगम्बर झा, बच्चा झा, बल बहादुर मगर, निर्गुण यादव आदि लोग गिरफ्तार हुए । कुछ महीने बाद सरोज कोइराला, महेन्द्र नारायण निधी, नकुल बहादुर सिंह तथा पण्डित रामाकान्त झा और वीरगंज में नथुनी शाह, ठाकुर कुमार आदि गिरफ्तार हुए । वीरगंज में ही सचेन्द्र नारायण चौधरी और हंसराज ठाकुर सव्रिmय थे । धनुषा–महोत्तरी क्षेत्र में भद्रकाली मिश्र और रामनारायण मिश्र ने लोकसेवा संघ स्थापना की । इस अभियान के दौरान ज्ञानी शंकर गिरी, महावीर शर्मा, श्याम सुन्दर शर्मा, आनन्दी लाल झुनझुनवाला, राधा प्रसाद चौधरी आदि पकडेÞ गए । वि.सं. २००६ साल में जलेश्वर जेल तोड़कर निर्गुण यादव फरार हो कलकत्ता पहुंचे ।

सिरहा के कपिलेश्वर यादव २००४ साल में ही नेपाली राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य हुए थे । वे बैरगनिया सम्मेलन के भी एक सव्रिmय सहभागी थे । वि.सं. २००७ साल के जनव्रmान्ति में सिरहा जिला में देवनाथ दास यादव, राजदेव गोइत, कुलानन्द झा, बलदेब दास यादव, मित्रलाल गिरी जैसे व्यक्तिओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह किया था । इस व्रmम में र्र्विर्दया में राधाकृष्ण थारु, दांग में परशु नारायण चौधरी और कपिलवस्तु में शिव प्रताप शाह आदि ने ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह किया ।
राणा शासन को अन्त करने के लिए महत्वपूर्ण फैसला भी मधेस में ही लिया गया । वि.सं. २००७ साल आश्विन १० गते रौतहट जिला के सीमा पार बैरगनिया में नेपाली कांग्रेस का अधिवेशन हुआ । इस अधिवेशन में राणा शासन के खिलाफ सशस्त्र व्रmान्ति करने का निर्णय लिया गया । यही से राणा शासन विरोधी आन्दोलन में उफान आया । सब से पहले बीरगंज में फिर बिराटनगर और फिर सर्वत्र मुक्ति सेना ने राणा फौज पर सशस्त्र आव्रmमण किया । अनेकों मोर्चों पर मधेसी लोग भी साथ–साथ लडेÞ । सशस्त्र आन्दोलन के दौरान पश्चिमी क्षेत्र में काशी प्रसाद श्रीवास्तव, डा. के. आई. सिंह, खड़ग बहादुर गुरूङ, गोविन्द प्रसाद शर्मा, लक्ष्मी नारायण अधिकारी, बासदेव त्रिपाठी, प्रेमचन्द्र अग्रवाल, कृष्णदास भक्त, उदयराज लाल, रामवरन शर्मा, दशरथ प्रसाद एवं भाग्यनाथ दुबे का योगदान उल्लेखनीय है । मधेसी महिलाओं की भी एक विद्रोही सेना कौशलपति मिश्र तथा यमुना देवी के नेतृत्व में गठित हुई थी । व्रmान्ति सम्बन्धी तथ्यों का प्रचार–प्रसार करने के लिए काशी प्रसाद श्रीवास्तव ने नई दिल्ली से “फ्री नेपाल” नामक अंग्रेजी पत्र के प्रकाशन की व्यवस्था की । कु“वर कल्लू सिंह ने नेपालंज में आन्दोलन छेड़ा । बारा तथा रौतहट जिलों के विद्रोहियों ने भागवत यादव तथा शिव प्रसाद सिंह के नेतृत्व में कलैया एवं गौर बजार पर आधिपत्य जमाया । विद्रोहियों के नेता रति सन्यासी और नन्दू साह के साथ बीसों विद्रोही गौर बजार में राणा सैनिकों की गोलियों के शिकार बने । इसी व्रmान्ति के दौरान जनकपुरधाम मेें राणा की फौज से लड़ते हुए मुक्ति सेना के प्रेम सिंह और कंचन मुखिया शहीद हुए । वीरगंज के मोर्चा पर बीसों शहीद हुए । पश्चिम के सशस्त्र कारवाही में राणा फौज ने गोलिया बरसाई जिसमें मदन पाण्डेय, रामानुज पाण्डेय, कृपा दयाल सिंह तथा कृष्णदास भक्त जैसे लोग शहीद हो गये ।
वि.सं. २००७ साल के सशस्त्र व्रmान्ति में कई भारतीयों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा था । बिहार फारबिसगंज निकट के निवासी फणीश्वर नाथ रेणु एक विख्यात रचानाकार थे । कोलकाता निवासी भोला चटर्जी एक सुप्रसिद्ध पत्रकार थे । ये दोनों ही २००७ साल के व्रmान्ति में सशस्त्र व्रmान्तिकारी योद्धा के रूप में लडेÞ थे । इस युद्ध में जोगवनी के भावुक गुरूजी, फेकन चौधरी, बिहार वीरपुर के डी.पी. शर्मा, पटना के देवेन्द्र प्रसाद सिंह, लखनलाल कपूर, पूर्णिया जिला सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव नरसिंह नारायण सिंह, कमरेड भोला नाथ मण्डल, बिहार फारबिसगंज के सरयु मिश्र को भुलाया नही जा सकता है । भारतीय नागरिक डाक्टर कुलदीप झा कुशहा के मोर्चा पर शहीद हुए थे ।
मधेसी किसानों का बलिदान
सशस्त्र आन्दोलन के दौरान ही वि.सं. २००६ श्रावण के ६ गते को नेपाल–भारत के बीच शान्ति एवं मैत्री संधि हुई । वि.सं. २००७ साल फागुण ७ गते निरंकुश राणा शासन का अन्त हुआ । किन्तु मधेसी जनता को कोई अधिकार नहीं दिया गया । देश की आधी आबादी होने के बावजूद पहले अन्तरिम सरकार में (वह भी भारत के दबाव पर) भद्रकाली मिश्र को मंत्री बनाया गया । राणा शासन की समाप्ति के बाद नेपाल के मधेस में भी नई जागरण का प्रभाव पड़ा । मधेस के किसानों ने अपने बेहतर जीवन के लिए कई जिलों में किसान आन्दोलन किया । इन आन्दोलनों को सैनिक बल पर कुचला गया । कई मधेसी किसान शहीद हुए । वि.सं. २००७ साल में ही रौतहट में किसान आन्दोलन के नेता शिव प्रसाद सहित अनेक किसानों की हत्या की गयी । वि.सं. २००९ साल में रौतहट के अशर्फी शाह, २०११ साल में सिरहा के बहादुर सदा, बारा के मुगालाल महतो और २०१४ साल में सप्तरी के अधोरी यादव शहीद हुए । वि.सं. २००८ साल बैशाख २० गते वर्दिया में किसानाें ने जमीन्दाराें के विरूद्ध संघर्ष किया । जिसमें सरकार की गोलियाें ने कई किसानों को मौत के घाट उतार दिया ।
पहली जन निर्वाचित सरकार और मधेसी समुदाय
राणा शासन की समाप्ति के वर्षाें बाद वि.सं. २०१५ साल फागुण के महीने में प्रथम आम निर्वाचन हुआ । इस प्रथम आम निर्वाचन में नेपाली कँंग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त होने पर वी.पी.कोइराला के नेतृत्व में सरकार गठित हुई । नेपाल के इतिहास में पहली बार जन निर्वाचित सरकार में कुछ मधेसियों को भी सहभागी बनाया गया । जिसमें रामनारायण मिश्र, परशुनारायण चौधरी, सूर्यनाथ दास यादव और शिव प्रताप शाह मंत्रिमण्डल में पहु“चे । इस सरकार के कार्यकाल में नेपाली भाषा के साथ साथ हिन्दी को भी द्वितीय राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिया गया । संसद के दोनों सदनों में तराई के प्रतिनिधियों को हिन्दी भाषा में अपने विचार रखने का मौका मिला । रेडियो नेपाल से भी हिन्दी में प्रसारण करने की स्वतन्त्रता प्रदान की गई । श्री उमाकान्त दास के सम्पादकत्व तथा प्रकाशकत्व में हिन्दी दैनिक नेपाली समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ हुआ । परन्तु मधेसी के प्रति नीतिगत रूप से विद्यमान रहे भेदभाव और असमानता समाप्त करने के दिशा में कोई ठोस कार्य नही किया गया ।

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz