नेपाल के हिन्दी साहित्यकार एवं उनकी रचनाओं पर विहंगम दृष्टि

रमेश झा:नेपाल की प्राकृतिक अलौकिक छटा से अभिभूत हो डा. शिवमंगल सिंह सुमन ने ‘ हिमालय दर्शन’ कविता लिखी-‘बडÞा सौभाग्य है मेरा/कि प्रातः नित्य खिडÞकी से/तुम्हारा रूप पीता हूँ/अलौकिक लोक के उन्माद का/क्षण एक जीता हूँ।’ नेपाल और भारत के बीच प्रेम का आधार प्रकृति का निरालापन ही नहीं अपितु भाषिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक रूप से भी दोनों के सम्बन्ध अन्तरंग और निर ाले हैं।

इन दो देशों के साहित्यकारों के बीच भी स्थापित एकात्मकता को राजनीति की रेखा नहीं तोडÞ पाती। इसी एकात्मकता को बारि की से स्पष्ट करते हुए कवि मोदनाथ प्रश्रति ने ‘मैं तुम्हें बुद्ध देता हूँ’ जैसी कविता लिखी। इनकी इस कविता के माध्यम से नेपाल-भार त के अन्तरसम्बन्धों को देखा परखा जा सकता है- ‘मैं तुम्हें सगरमाथा की ऊँचाई देता हूँ/तुम मुझे महासागर की गहर्राई दो/मैं गर्वोन्नत स् वाभिमानी जागरूक सिर देता हूँ /तुम प्रेमोन्मत्त भाव भीना गंभीर हृदय दो/…….. /मैं तुम्हें अपना बुद्ध देता हूँ /तुम मुझे शान्ति और अनाक्रमण दो। यह कविता आम नेपाली के अर्न्तर्मन की मुक्त पीडÞा का बयान तो करती ही है साथ ही स्पष्ट रूप से यह संकेत देती है कि राजनीतिज्ञ दोनों देशों के बीच चाहे जितनी भी दरारें पैदा करने की कोशिश करें पर साहित्यकारों की लेखनी नेपाल-भारत की धडÞकनों को जोडÞने की ही कोशिश करती है। इसी का परिणाम है कि इन दो देशों के बीच समय-समय पर साहित्यिकारों की संगोष्ठियाँ, कवि सम्मेलन होते रहते हैं।

किसी भी भाषा का अपना महत्व होता है। भाषा और बोली कमोबेश समाज और देश के प्राणों के स्पन्दन को प्रकट करते हैं। एक ऐसा देश जो बहुभाषी हो, उसे एक ऐसी भाषा की जरूरत होती है, जो समूचे देश को एक सूत्र में बाँध सके। सचमुच हिन्दी नेपाल के लिए ऐसी ही भाषा है। भले ही भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है, पर नेपाल में सर्म्पर्क भाषा के रूप में अपनी भूमिका निर्वाह करती आ रही है। नपे ाल म ंे हिन्दी का पय्र ागे एव ं साहित्यिक रचनाआ ंे की पा्र चीन लम्बी परम्परा अद्यावधि जीवित ह।ै नपे ाल म ंे हिन्दी भाषा आरै साहित्य विद्वेष का शिकार होते हुए भी स्वाध्याय और व्यक्तिगत रुचि क े आधार पर हरके क्षत्रे क े लागे ा ंे -सन्त, राजा, मन्त्री, नेता, कवि, लेखक, पत्रकार आदि) ने भाषण, सम्बोधन, उपदेश, कविता, साहित्यिक कृ ितया ँ आदि हिन्दी म ंे लिख कर हिन्दी भाषा आरै साहित्य म ंे यागे दान दिया ह।ै हिन्दी म ंे शाधे की दृ िष्ट स े नपे ाल म ंे पा्र प्त सामग्रि्र ा ँ महइभ्वपण्ू ार् ह।ंै सिद्धा-ंे नाथा ंे की कविता का सकं लन नपे ाल म ंे पा्र प्त हअु ा, जा े उनकी दर्ीघकालीन परम्परा और प्रभाव क्षेत्र रहा है। यही आगे जाकर ‘जोशमणि’ नामक योग सम्प्रदाय पहल े हिन्दी तथा बाद म ंे नपे ाली कवि परम्परा का े विकसित किया। जाशे मणि निर्णर्र्ुिणया साहित्य म ंे उद्धारक श्री जनकलाल शमार् क े मतानसु ार ८४ सिद्धा ंे म ंे स े अधिकाशं नपे ाल क े ही थ।े मत्स्यन्े दन्र ाथ, गारे खनाथ आदि महापरुु षा ंे की जन्मभूमि नेपाल तो नहीं रही पर इनका कर्मक्षेत्र दर्ीघकाल तक नेपाल भूमि ही रही। नाथ संतो की अधिकांश रचनाएँ नेपाल के अनेक स्थानों,

तथा अनुयायियों के पास मौखिक या लिखित रूप में संरक्षित हैं। नाथपंथी साहित्य में रतननाथ का उल्लेख हुआ है। दाङ जिला के रतननाथ मठ से प्राप्त इनके उपदेशों का कुछ अंश अत्यन्त परिष्कृत शैली के सुन्दर पुर ाने हिन्दी-गद्य का नमूना है। नाथ सिद्धों की परम्परा में ही जोशमणि निर्गुण सम्प्रदाय का विकास नेपाल में ही हुआ है। जोशमणि सम्प्रदाय को व्यापकता प्रदान करने वाले संत शशिधर को ही संस्थापक माना जाता है। इस सम्प्रदाय में अनेकानेक संत हुए हैं। धरनीदास, ज्ञान दिलदास, प्रेम दिलदास धर्म दिलदास आदि इन सभी ने हिन्दी साहित्य लेखन परम्परा को आगे बढÞाया है। शशिधर ने हिन्दी में कई रचनाएँ की हैं- सच्चिदानन्द लहरी, पाखण्ड-अखण्ड शब्द, गुरूपञ्जा भजनमाला आदि। नेपाल में १९वीं शताब्दी का ‘बडÞा पंडित’ वाणी विलास पाण्डे ने नारायणहिटी शिलालेख में व्रजबोली हिन्दी में ही पदों की रचना की है। विद्यारण्य केशरी ने तो नेपाली के साथ-साथ मुख्य रूप से हिन्दी में ही काव्य रचना की है।hindi dibas-himalini hindi magazine

आधुनिक नेपाल के निर्माता पृथ्वीनारायण शाह, गोरखनाथ के परमभक्त थे। इन्होंने अपने गुरु की स्तुतिपदों की रचना की है-‘बाबा गोरखनाथ सेवक सुख दाये भजहूँ तो मन लाये।’ नेपाल की ऐतिहासिक मिथिला नगरी जनकपुर में रचित भक्ति साहित्य का नेपाल के हिन्दी साहित्य में महइभ्वपर्ूण्ा योगदान है। पावनभूमि जनकपुर में रामभक्ति शाखा की काव्य रचनाएँ विगत ३०० वर्षों से साधु-सन्तों द्वारा अनवरत रची जा रही है। महात्मा ‘सूर किशोर’ जनकपुर के संस्थापक माने जाते हैं। इन्होंने कई धार्मिक ग्रन्थों का प्रणयन किया है, परन्तु खेद की बात यह है कि एक ही लघु काव्य ‘मिथिला विलास’ उपलब्ध है। ‘सीतायन’ प्रबन्ध काव्य रचना का सम्बन्ध ‘सूर किशोर’ से ही मानते हैं। दूसरे संतो में श्री किशोरी शरण, महन्थ गोकुल गिरि, पं. जानकी रामाचार्य, सिया रघुनाथशरण, महन्थ अवध किशोर दास ‘उमंग’, स्वामी रामप्रिया शरण, श्री गुरुदेव स् वामी प्रेमनिधि आदि हैं। इन साधु-संतो की र चनाओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि हिन्दी भाषा का प्रयोग यहाँ अविरल रूप से हुआ है। मध्यकालीन काठमाडं ू उपत्यका म ंे तत्कालीन मल्ल राजा कला-साहित्य पमे्र ी थ।े उस समय यह उपत्यका भारत से आनेवाले पं िडता ंे एव ं कविया ंे की आश्रयस्थली थी। आनवे ाल े पं िडता ंे म ंे सवार्र् िक सख्ं या मै िथला ंे की थी। आश्रति पं िडता-ंे कविया ंे द्वारा रचित मल्लकालीन साहित्य नाटका ंे की हस्तलिखित पाण्डु िलपिया ंे स े राष्ट्रीय अभिलेखालय भरा पडÞा है।

इस समय क े नाटका ंे म ंे सस्ं कतृ आरै स्थानीय भाषाआ ंे का खलु कर पय्र ागे हअु ा ह।ै नाटका ंे क े गीत तथा साधारण पात्रा ें की भाषा क े रूप म ंे मै िथली भाषा का प्रयोग अधिक लक्षित होता है। इतिहासविद् श्रीसयर्ू विक्रम ज्ञावली क े अनसु ार मल्ल राजाआ ंे की भाषा दृष्टि उदार थी। अतः इस समय के

अब दूसरी ओर नेपाल में नेपाली भाषा के अनेक कवियों और लेखकों ने भी हिन्दी में साहित्य रचना कर अपना हिन्दी प्रेम व्यक्त किया है। वैसे तो हिन्दी में छोटी-मोटी कविता, लघु काव्य, निबन्ध, गीत, गजल रचने वाले अनगिनत हैं। इन सब की चर्चा करना यहाँ सम्भव नहीं। इसके बावजूद कुछ नाम उल्लेखित किए जा रहे हैं- मोतीराम भट्ट- नेपाली साहित्य आधुनिक युग पर््रवर्तक मोतीराम भट्ट भारतेन्दु मण्डल के कवि थे। भारतेन्दु की प्रेरणा से भट्ट ने ‘ निज भाषा उन्नति’ का व्रत लिया था। ये हिन्दी में समस्या पर्ूर्ति करते थे। इनकीर् कई चिÝयिां हिन्दी में उपलब्ध हैं। इनकी दो रचनाएं ‘गलम शनोवर’ -आख्यान) ‘ हुश्न अफरोज आराम दिल’ -नाटक) हैं। इन्होंने हिन्दी-ऊर्दू में ४०० शेर लिखे थे, जो उपलब्ध नहीं हैं।

शम्भुप्रसाद ढुंग्याल- ये आशु कवि के रूप में जाने जाते हैं। देवकीनंदन खत्री से प्रभावित हो प्रेमकान्ता एवं प्रेमकान्ता सन्तति, दो उपन्यास तथा ‘दानवीर कर्ण्र्ाानाटक हिन्दी में लिखे हैं। देवीप्रसाद शर्मा- हिन्दी में इन्होंने बहू अम्बालिका देवी, राजपूत रमणी, सुन्दर सरोजिनी – उपन्यास) हृदयोद्गार -शोक काव्य) लिख कर हिन्दी साहित्य की सेवा की है।

गिरीश बल्लभ जोशी- ये नेपाली हिन्दी भाषा में समान रूप से रचना करते दिखाई देते हैं। हिन्दी में गिरीशवाणी -उपन्यास), गोलो चरित -नाटक), सीताराम विलाप -नाटक) जैसी रचनाएँ उपलब्ध हैं।

रामप्रसाद सत्याल- इन्होंने नेपाली के अतिरिक्त हिन्दी भाषा में प्रेमलता, अनन्त तथा किर ण शशि नामक किताबें लिखकर हिन्दी को आगे बढÞाने का काम किया है।

कविकेशरी चित्रधरहृदय’- इनकी कई रचनाएं हिन्दी में उपलब्ध हैं। कलकत्ता की ‘तरंग’ पत्रिका में दो रचनाएँ ‘तरंग’ और ‘स्वागत होने आई है’ प्रकाशित हैं।

लेखनाथ पौड्याल- नेपाली साहित्य में कवि शिरोमणि उपाधि से विभूषित पौड्याल ने संस्कृत-नेपाली के अतिरिक्त हिन्दी में ‘र ाधाकृष्णकेलि’ तथा ‘भवितव्य’ जैसी रचनाएं लिखी हैं।

शुक्रराज शास्त्री- काशी के दूधविनायक महल्ले में जन्मे काठमांडू के सुसंस्कृत नेवार परि वार में पालित शुक्रराज शास्त्री हिन्दी के सिद्धहस्त लेखक हैं। इन्होंने हिन्दी भाषा में ‘नेपाल की झलक’ तथा ‘शहीद की कलम से’ जैसी दो रचनाएं र्सर्जित की थी। इनके अनुज वाकपति राज शास्त्री तथा बहन चन्द्रकान्ता देवी ने भी हिन्दी में रचनाएं की थी, ऐसा साक्ष्य है।

युद्धप्रसाद मिश्र- नेपाली साहित्य में लब्ध प्रतिष्ठित लेखक कवि मिश्रजी ने हिन्दी में कोई स्वतन्त्र रचना नहीं की है, पर हिन्दी में फुटकर कविताओं का र्सजन किया है।

रमाकान्त झा- प्रजातन्त्रवादी एवं सेनानी झा सुप्रसिद्ध हिन्दी कवि हैं। इनकी कविता पढÞने से भुजाएँ फडÞक उठती हैं-‘आज देख लो जगत भरा है, क्रन्दन अत्याचारों से।’

लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा- महाकवि उपाधि से विभूषित देवकोटा नेपाली-पश्चिमी साहित्य के साथ-साथ हिन्दी साहित्य का भी अच्छा ज्ञान रखते थे। इनको राहुल सांकृत्यायन ने पन्त, प्रसाद एवं निराला का समवेत रूप माना है। इनकी हिन्दी में सृजित कविता का नाम है-मृत्यु शैय्या से।

सिद्धिचरण श्रेष्ठ- नेपाली साहित्य के ख्यात्रि्राप्त लोकप्रिय छायावादी कवि हैं। हिन्दी में ‘ अकेला चलने का मन करता है’ नामक कविता इन्होंने लिखी है।

गोपलसिंह नेपाली- हिन्दी गीतिकाव्य के इतिहास में कवि नेपाली का स्थान अद्वितीय है। हिन्दी सिनेमा में इन्होंने कई गीत लिखे हैं। पंछी, रंगीनी, उमंग, नीलिमा आदि अनेक कृतियाँ प्रकाशित हैं।

भवानी भिक्षु- भिक्षु ने हिन्दी से ही लेखन पर म्परा का शुभारम्भ किया था। इनकी हिन्दी कहानियाँ आज, माधुरी, हंस, प्रताप, एवं सुधा आदि पत्रिका में प्रकाशित हैं। इनकी हिन्दी कृति का नाम है- नेपाल-पहाडÞ और तर्राई।

विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला- यह नाम साहित्य क्षेत्र में आख्यानकार के रूप में प्रसिद्ध है। कोईराला की र्सवप्रथम रचना हिन्दी में र ची गई, जो ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित हर्ुइ।र् कई कहानियाँ ‘हंस’ और सरस्वती पत्रिका में छपी हैं। इनकी हिन्दी रचनाएं इस प्रकार हैं- पथिक, अपनी ही तरह, मैयादाई और विशाल भारत।

केदारमान व्यथित- व्यथितजी नेपाली, नेवारी और हिन्दी में समान रूप से लिखते थे। हिन्दी में इन्होंने हमारा देश, हमारा स्वप्न, अग्नि श्रृंगार, त्रयी और तेवर। ‘कविता का सर्न्दर्भ आज का’ काव्य संकलन है। हृदयचन्द्रसिंह प्रधान- इनकी एक रचना हिन्दी में हैं- ऐसा मैं सोचता हूँ।

उमाकान्त लालदास- हिन्दी दैनिक पत्रिका के सम्पादक दासजी लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार थे। इनकी एक बडÞी ही सशक्त हिन्दी कविता है- कौन बिगाडÞ सकता है तेरा।

सरयुग चौधरी- जनकपुर निवासी चौधर ी सत्याग्रह आन्दोलन -राणाविरुद्ध) के सहयात्री हैं। ये गीत-गजल भी हिन्दी में लिखते हैं, साथ ही इनकी एक कविता है- दुःखमयी कहानी।

पन्नालाल गुप्त- नेपालगंज से निकलने वाली ‘किरण’ साप्ताहिक पत्रिका के सम्पादक गुप्तजी हिन्दी में कविता लिखते हैं। ‘हमारी पहचान’ इनकी कविता का नाम है।

डिल्ली रमण रेग्मी- राजनीतिज्ञ एवं इतिहासकार रेग्मी ने हिन्दी में एक कृति लिखी है- नेपाली भाषा और हिन्दी साहित्य। इस कृति से रेग्मी का हिन्दी के प्रति प्रेमभाव प्रदर्शित होता है।

ऋषिकेश शाह- ये परराष्ट्रनीति के ज्ञाता होने के साथ साथ लेखक भी हैं। इनकी हिन्दी में कृति है- नेपाल राजनीतिक व्यवस्था एवं परराष्ट्र नीति।

परशु प्रधान- ये नेपाली के कवि, कथाकार और उपन्यासकार हैं। इनकी निबन्ध रचनाएं र्’नई धारा’ और ‘आज’ पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। पिनाकी आचार्य- पेशा से चिकित्सक हैं पर ये हिन्दी में भी कविता लिखते थे।

धुस्वाँ सायमी- ये नेपाली, नेवारी एवं हिन्दी में समान रूप से लिखते हैं। इनकी पहली हिन्दी कथा- ‘आज का इन्सान’ है। अन्य हिन्दी रचनाएँ कादम्बिनी, दिनमान, धर्मयुग एवं साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिकाओं में छपी हैं। मैं दासी मैं सराय, रेत की दरार, एक चिथडÞा आदमी और जलजला उपन्यास प्रकाशित हैं। शब्दों का आकाश’ और कविता का जंगल’ इनकी दो काव्य कृतियाँ हैं।

डा. कष्ृ णचन्द ्र मिश्र- डा. मिश्र त्रि.वि क े कन्े दी्र य हिन्दी विभाग के अध्यक्ष थे। ये हिन्दी विकास के अथक योद्धा थे। हिन्दी इनकी आजीविका थी और हिन्दी भाषा-साहित्य के विकास के लिए समपिर्त थ।े मिश्रजी क े सम्पादकत्व म ंे साहित्य लोक एवं नव नेपाल हिन्दी मासिक पत्रिका भी पक्र ाशित हर्इर्ु थी। इन्हानंे े ‘दशे गीत’ नामक गीत भी लिखा है। ज्ञद्ध हिमालिनी

l जनवरी/२०१४ यदि आप बहुत अधिक लोगों पर निर्भर रहते हैं तो इससे आपके निराश होने के अवसर बढÞ जाते हैं।

रामहरि जोशी- ये भाषायी एकता के पक्षधर एवर्ंर् इमानदार राजनीतिज्ञ हैं। इनकी हिन्दी रचनाएँ हैं- रैन वसेरा -कविता संग्रह), नेपाल हिन्दी गद्य संग्रह, नेपाल हिन्दी गद्य पराग, नेपाल के अमर शहीद, देवकोटा र चित अंग्रेजी में वापू का हिन्दी अनुवाद।

सुन्दर झा शास्त्री- ये मैथिली, नेपाली एवं हिन्दी के समान रूप से कवि-लेखक थे। इनकी काव्यकृति हिन्दी में ‘परवशता’ प्रकाशित है। इनकी ‘तुलसी-चतुष्पदी’ बहुत प्रसिद्ध है।

बुन्नीलाल सिंह- हिन्दी में विशेषाधिकार प्राप्त लेखक हैं। इनकी दो हिन्दी कृतियाँ- नेपाल की हिन्दी कहानियाँ और नयन कर दरिभाव -उपन्यास) है। दो आने पैसे हिन्दी नाटक है तथा ‘परदेशी पिया की आस’ हिन्दी रचना प्रकाशित है। ‘सीकी की डलिया’ कविता संग्रह भी प्रकाशित है। डा. राजेन्द्र विमल- ये नेपाली, मैथिली एवं हिन्दी के लेखक हैं। ‘हिन्दी और नेपाली नाटकों का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया है। ये हिन्दी में गीत-गजल भी लिखते हैं। चन्द्रदेव ठाकुर- ये हिन्दी के सफल कवि थे। कुमारसम्भवम् के आधार पर इन्होंने हिन्दी में ‘शैलवाला’ खण्डकाव्य लिखा है, जो प्रकाशित है। लोकेन्द्रबहादुर चन्द- राजनीतिज्ञ होते हुए भी नेपाली सााहित्य में आख्यानकार हैं। इनकी हिन्दी कृतियाँ इन्द्र धनुष, बाह्रौं खेलाडÞी – हास्य निबन्ध संग्रह) तथा नेता का साथी प्रकाशित हैं। मोहनराज शर्मा- नेपाली साहित्य के समीक्षक, कथाकार, उपन्यासकार शर्मा की १५ हिन्दी कविताएँ ‘ऋचाएं’ नामक कृति में संग्रहित हैं। इन्होंने विनियोग पत्रिका का सम्पादन भी किया है। मोदनाथ प्रश्रति- प्रश्रति नेपाली साहित्य तथा वामपंथी राजनीति के चर्चित व्यक्तित्व हैं। इनकी हिन्दी कविता-नेपाली बहादुर है। फुटकर हिन्दी कविताएं भी इन्होंने लिखी हैं। डा. र्सर्ूयनाथ गोप- हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व गोपजी की महत्वपर्ूण्ा कृति है- नेपाल में हिन्दी और हिन्दी साहित्य। इनकी कविता है- पीडÞा का साम्राज्य। राजेश्वर नेपाली- नेपाली हिन्दी सेवा में समर्पितर् कर्मठ व्यक्तित्व हैं। ये ‘लोकमत’ पत्रिका के सम्पादक हैं। नेपाल में हिन्दी को संवैधानिकता दिलाने के लिए संर्घष्ाशील हैं। इन्होंने हिन्दी के उत्थान के लिए राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का सफल आयोजन १२- १३ बार करा चुके हैं। इनकी हिन्दी रचनाएँ हैं- नेपाल के हिन्दी कवि और कविताएँ तथा नेपाल में हिन्दी की अवस्था। ‘सम्पर्ूण्ा क्रान्ति बाँकी है’ एक कविता है। शेषराज शर्मा रेग्मी- इन्होंने मल्लिनाथ टीका कृत कुछ संस्कृत ग्रन्थों का हिन्दी में सशक्त टीका सहित अनुवाद प्रकाशित किया है। हिन्दी में इनकी अनेक अनूदित कृतियाँ हैं। कृष्णप्रसाद घिमिरे- घिमिरे ने नेपाली एवं हिन्दी में कई ग्रन्थ लिखे हैं। इनकी हिन्दी कृतियाँ हैं- श्री कृष्ण चरितामृत हिन्दी टीका गतिविधियों की रूपरेखा, श्री रामविलाप तथा नचिकेताम् हिन्दी टीका सहित। मुकुन्द आचार्य- वतर्म ान समय म ंे य े ‘हिमालिनी’ हिन्दी मासिक पत्रिका के कार्यकारी सम्पादक ह।ंै य े मख्ु यतः व्यग्ं यकार ह।ंै नपे ाली, भाजे परु ी तथा हिन्दी म ंे व्यग्ं य कविताए ं तथा निबधं लिखत े ह।ंै हिन्दी स े भाजे परु ी म ंे अनवु ाद ‘ मधशु ाला’ पक्र ाशित ह ंै । डा. उषा शर्मा- हिन्दी विभाग में कार्यरत डा. उषा शर्मा हिन्दी में कई रचनाएं लिख चुकी हैं- टूटते-जुडÞते रिश्ते, आत्मदाह ये दो कहानी और पन्त काव्य की सामाजिक चेतना विषय पर इन्होंने समीक्षा प्रस्तुत किया है और कुछ दिनों तक हिमालिनी की प्रधान संपादक रही हैं। चेतन कार्की- कार्की नेपाली सिने और साहित्य जगत में चर्चित व्यक्तित्व हैं। इन्होंने ‘ कल्पना टूट चुकी है’ नामक एक काव्यकृति की रचना की है। दूसरी कविता इनकी है- तूं नहीं है। महेश्वर शास्त्री हलवे- ये पशुपतिनाथ महात्म्य को भारत-नेपाल में फैलाने के लिए हिन्दी भाषा में लिखा है। डा. संजीता वर्मा- वर्मा हिमालिनी की पर्ूव सम्पादिका तथा हिन्दी विभाग पद्यकन्या में कार्यरत हैं। इनकी हिन्दी कृतियों में मैं और मेरी कविताएं तथा सिसकियाँ उपन्यास है। रमेश झा- हिमालिनी के सम्पादकीय प्रभाग में लम्बे समय तक अपना योगदान दिया है। सम्प्रति इसके संपादक हैं और इनके कतिपय आलेख प्रकाशित हैं। मनकामना ‘महात्म्य’ नेपाली का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित है । रामाशीष- ये मूलतः भारतीय नागरिक हैं और नेपाल की हिन्दी पत्रकारिता में इन्होंने अपना विशिष्ट योगदान दिया है। नेपाल और भारत के हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते रहे हैं। डा. नवीन मिश्र- नेपाल की हिन्दी पत्रकारिता में इनका महत्वपर्ूण्ा योगदान है। हिमालिनी में इनके आलेख लम्बे समय तक नियमित प्रकाशित होते रहे हैं। कुमार सचिच्दानन्द सिंह- ये हिन्दी विभाग वीर गंज क्याम्पस में कार्यरत हैं तथा विचार ोत्तेजक राजनैतिक लेख लिखते हैं। नेपाली के प्रतिनिधि कथाकारों की कहानियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। गोपाल अश्क – अश्क भोजपुरी, नेपाली एवं हिन्दी रचनाएंँ करते हैं। मानिनी -कविता संग्रह) पर्वतों की ओट में गीतकाव्य आग का मौसम आदि हिन्दी कृतियाँ इनकी प्रकाशित हैं। डा. रामदयाल राकेश- राकेश हिन्दी, मैथिली, नेपाली भाषा में लिखनेवाले प्रसिद्ध लेखक, कवि हैं। इनकी हिन्दी कृतियाँ तुलसी दिवस की कविताएँ, काला सूरज, लाल सूरज हैं। अनुवाद साहित्य में भी इनका योगदान है। डा. मृदुला शर्मा- हिन्दी विभाग पद्यकन्या में कार्यरत हैं इनकी कई कृतियाँ- नेपाली लेखकों की अनुभूतियाँ , गाँव, नेपाली महिलाएँ, हिन्दी नेपाली शब्दकोश, नेपाली कवि व्यथित और उनका हिन्दी काव्य आदि ग्रन्थ प्रकाशित हैं। वीणा सिन्हा- सिन्हा की भोजपुरी, नेपाली, हिन्दी म ंे राजनीतिक लखे -रचनाए ं पक्र ाशित ह।ंै कछु समय तक हिन्दी हिमालिनी मासिक पत्रिका स े आवद्ध सिन्हा वतर्म ान म ंे ‘द पब्लिक’ हिन्दी मासिक पत्रिका प्रकाशित कर हिन्दी क े विकास म ंे यागे दान कर रही ह।ंै पुष्पा ठाकुर- श्रीमती पुष्पा ठाकुर की नेपाली, हिन्दी, मैथिली भाषा में प्रकाशित पत्र- पत्रिकाओं में सामाजिक, राजनीतिक र चनाएँ प्रकाशित हैं। सम्प्रति हिमालिनी की उपसम्पादक भी हैं। इनके अतिरिक्त नेपाल के ऐसे लेखकों के नाम संकेतित किए जा सकते हैं जिन्होंने हिन्दी के प्रति उत्साह तथा प्रेम-भाव रचना के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है- उमानाथ शर्मा, सीतारानी श्रेष्ठ, डा. आशा सिन्हा, उपेन्द्रप्रसाद कमल, रामस्वरूप प्रसाद, काशी राज उपाध्याय, योगेन्द्र प्रसाद अर्याल, मुरारी अधिकारी, किशोर नेपाल, डा. र्सर्ूय देव सिंह प्रभाकर, डार्.र् इश्वर बराल, हेमचन्द्र पोखरेल, प्रेमा शाह, सुश्री भन्द्रा घले, राजार ाम पौडेल, दर्ुगाप्रसाद श्रेष्ठ ‘उपेन्द्र’, बालचन्द्र

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