नेपाल, जहाँ जनता का खून चूस कर विदेशों में विदेशी खून चढाया जाता है : सुरभि

देश अनुदान पर चलता है और नेता जनता की कमाई पर । बस इसी वास्तविकता ने मुझे इस ग्लानि से बाहर निकाल दिया कि मैं गरीब देश की नागरिक हूँ और इसी लिए, आज मैं ऊपर आसमाँ नीचे, आज मैं आगे जमाना है पीछे …।

सुरभि, बिराटनगर | आज मैं उपर आसमाँ नीचे …आज मैं आगे जमाना है पीछे ..आज मनीषा कोइराला के इस गाने के साथ सुर मिलाकर मस्त होने का दिल कर रहा है । अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह गाना आप को क्यों सुना रही हूँ ? कहीं इसका मानसिक संतुलन तो नहीं गुम हो गया ? अरे नहीं, मैं बिल्कुल ठीक हूँ ।

वो बात दरअसल ये है कि कल तक मैं यह सोचती थी कि मैं एक गरीब देश की नागरिक हूँ, जहाँ के युवा होश सम्भालने से पहले यह सोच लेते हैं कि उन्हें दसवीं की परीक्षा के बाद कोरिया, जापान, मलेशिया या अरब देशों में जाना है जहाँ अपना खून जलाकर, आत्मसम्मान को ताक पर रखकर कमाना है । किस्मत अच्छी रही तो वापस आना है या फिर क्या पता नहीं किसी दिन ताबुत में बन्द होकर आना पड़े, पर जो भी हो उनके रेमिटान्स से यह देश तो जरुर चलेगा । जब भी बेटियाँ बिकती हैं तो लगता था कि मैं गरीब देश की नागरिक हूँ, जब भी बच्चों को स्कूल बैग ढोने की जगह पत्थर ढोते या तोड़ते या फिर जूठे प्लेटों को धोता देखती तो सोचती थी कि मैं गरीब देश की नागरिक हूँ, पर आज मैं इस वहम से बाहर निकल गई हूँ । आज तो मेरे पाँव जमीं पर नहीं हैं, मुझे लग रहा है कि मैं विश्व के सबसे अमीर देश में पैदा हुई हूँ, और इस सकारात्मक उर्जा की वजह है हमारे देश की राजनीति, राजनीतिज्ञ और उच्च पदों पर आसीन देश के सर्वोच्च प्रतिनिधि । धन्यवाद इन्हें ।

हम तो गरीब हो ही नहीं सकते, अरे किस बात की गरीबी ? यहाँ तो ब्लड प्रेशर की बीमारी का इलाज हमारे नेता सरकारी खर्च पर विदेशों में कराते हैं, सरकारी खर्च पर उनकी किडनियाँ बदली जाती हैं, जनता का खून चूस कर विदेशों में उन्हें विदेशी खून चढाया जाता है, फिर किस बात की गरीबी ? एक बार नेता, साँसद या किस्मत अच्छी है तो मंत्री बन जाओ तो क्या कहने पूरी जिन्दगी आपकी इन्स्योरेन्स हो जाती है, सरकारी नौकर का वेतन हर साल नहीं बढ सकता पर इनके भत्ते कभी भी बढ जाते हैं और मजे की बात तो यह है कि देश के हर मसले पर इनकी मतभिन्नता भले ही क्यों ना हो इस मसले पर तो ये सगों से भी ज्यादा सगे हो जाते हैं । गरीब देश में पैदा होने का मेरा भ्रम तब और टूटा जब हमारे देश को चलाने के लिए छः छः प्रधानमंत्रियों की आवश्यकता पड़ी । अरे है इतनी हिम्मत विश्व के किसी भी देश में जो वो जनता की कमाई पर छः छः प्रधानमंत्रियों को पाले ? पर हमारा देश महान, हम पाल सकते हैं इन्हें, तो भला हम गरीब कैसे हुए ? और अब तो मैं पूरी तरह इस भ्रम से निकल चुकी हूँ कि मैं गरीब देश की नागरिक हूँ, जिस देश के राष्ट्रप्रमुख को सोलह करोड़ की गाड़ी चाहिए, जहाँ के निर्वाचन आयोग हर चुनाव के बाद गाडि़यों की खरीद करती है और करोड़ों की गाडि़याँ निर्वाचन आयुक्त को मिलती है, जहाँ के नेता करोड़पति होने के बाद भी तथाकथित कैंसर के इलाज के लिए सरकारी अनुदान लेते हैं, जहाँ के मेयर पद सम्भालने के साथ ही लाखों के मोबाइल की चाह रखते हैं (वैसे ये और बात है कि यहाँ उनकी दाल नहीं गली) जैसे मोबाइल में ही शहर के विकास के हर नुस्खे छुपे हुए हैं, उस देश के नागरिक गरीब कैसे हो सकते हैं ?
भला ऐसे रईस देश में पैदा होने का गर्व किसे नहीं होगा ? अब यह बात पर्दे के पीछे रहने दें कि प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर इस देश को अनुदान पर चलने की आदत हो गई है । देश अनुदान पर चलता है और नेता जनता की कमाई पर । बस इसी वास्तविकता ने मुझे इस ग्लानि से बाहर निकाल दिया कि मैं गरीब देश की नागरिक हूँ और इसी लिए, आज मैं ऊपर आसमाँ नीचे, आज मैं आगे जमाना है पीछे …। (व्यंग्य)

 

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