नेपाल जिसतरह भारत का विरोध किया था,भारत भूला नहीं है : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू,२ मार्च २०१६ |

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निष्कर्ष तो पहले ही आ गया था कि प्रधानमंत्री ओली की भारत यात्रा उपलब्धि विहीन रही है । संयुक्त विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर का ना होना और अब वार्षिक मिलने वाली आर्थिक सहयोग राशि में बड़ी कटौती ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री ओली जिस सद्भाव और सफलता की बात कर रहे थे वह सिर्फ कहने भर की बात थी क्योंकि परिणाम सामने है । अतिथि का सम्मान हमारे संस्कार होते है जिसका भारत ने निर्वाह किया । प्रधानमंत्री ओली का भव्य स्वागत किया गया , भारतीय प्रधानमंत्री ने सहजता और प्रसन्नता के साथ नेपाल के प्रधानमंत्री का स्वागत किया । किन्तु भारत का रुख उस वक्त ही दिख गया था जब भारतीय प्रधानमंत्री ने नेपाल के संविधान का स्वागत तो किया किन्तु यह भी कहा कि इसका कार्यान्वयन सम्पूर्ण नेपाल की सहमति से ही सम्भव है अर्थात् सीमांकन का मसला सुलझाकर मधेशियों को सहमति में लाना नेपाल सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और चुनौती है । मोदी ने भले ही कुछ खुद ना कहा हो किन्तु वहाँ की आबोहवा को प्रधानमंत्री ओली को तो समझ जाना चाहिए था । संचार माध्यम और जानेमाने व्यक्तियों की प्रतिक्रिया ने भारत की नाराजगी और रवैए का अंदेशा तो पहले ही दे दिया था कि कुछ महीनों पहले नेपाल ने जिसतरह से भारत का विरोध किया था, वह भारत भूला नहीं है । परन्तु कूटनीति में इन बातों के लिए स्थान नहीं होता । इस लिए भारतीय प्रधानमंत्री के भाषण में इसकी कहीं चर्चा नहीं हुई और उन्होंने सिर्फ नेपाल के विकास की बातें की और यह संदेश दे दिया कि नेपाल को अपनी समग्र जनता को साथ लेकर चलना चाहिए । किन्तु वर्तमान सरकार ने तो जैसे तय ही कर लिया है कि मधेश को अनदेखा करना है । भारत भ्रमण से आते ही मधेश भ्रमण में मधेश को लेकर यह वक्तव्य दे डाला कि मधेशी जनता अशिक्षित हैं जो संविधान को नहीं समझ रहे हैं । जिससे एक बार फिर मधेशी जनता उत्तेजित हो गई । एक राजनयिक और देश के अभिभावक की उक्ति बहुत मायने रखती है किन्तु प्रधानमंत्री ओली अपनी इसी बोली की वजह से जनता के दिलों से उतरते जा रहे हैं । सरकार न तो कालाबाजारी रोकने में सफल हो पा रही है और न ही मंहगाई को रोक पा रही है । नाकाबन्दी खत्म हो चुकी है परन्तु समस्याएँ अभी तक पूर्ववत है ।

समस्याओं से घिरे हुए नेपाल में नई सरकार आई जिस पर नेपाल की जनता, खासकर खस समुदाय अत्यन्त उत्साहित थी क्योंकि मधेशी जनता तो पहले से ही इस सरकार से निराश हो चुकी थी । उनकी झोली आज भी खाली है । कितनी मासूम जाने गईं किन्तु सरकार की नीति में कोई बदलाव नहीं आया । संशोधन का नाटक भी सिर्फ पड़ोसी राष्ट्र को दिखाने के लिए और नाका को सहज बनाने के लिए था । मूल समस्या आज भी ज्यों की त्यों है । देखने के लिए आन्दोलन खत्म हो चुका है किन्तु यह आग बुझी नहीं है । मधेशी मोर्चा ने उसकार को एक अवसर दिया है ताकि वो अपनी नीति का विश्लेषण कर सके और इसी क्रम में मधेश फिर से आन्दोलन को हवा देने के लिए तैयार है । आर्थिक विपन्नता से जूझती जनता आखिर कब तक सत्ता और सरकार की गलत नीतियों पर शहीद होती रहेगी । आन्दोलन फिर हो सकता है सरकार भी कमोवेश इस बात को समझ रही है शायद यही वजह है कि राज्य की गति आज भी नाका खुलने के बावजूद सहज नहीं हो पाई है । नई सरकार अपनी सत्ता को बचाने के लिए जनता की भावनाओं को उकसा कर और बड़ी बड़ी बातों और सपनों को दिखाकर शासन करना चाह रही थी । अपने इस चार पाँच महीनों के शासनकाल में ओली सरकार ने किसी विकास योजना को लाने की जहमत नहीं उठाई है । वो सिर्फ बातों का जादू बिखेर रही थी । किन्तु जल्दी ही जनता का यह मोहबंध भी टूट रहा है । सम्भावनाओं का कोई द्वार खुलता हुआ नजर नहीं आ रहा ।

जिस चीन के दम पर सत्ता ने सपने दिखाए उसने भी तातोपानी नाका के न खुलने का संकेत दे दिया है । बैशाख १२ के शक्तिशाली भूकम्प के बाद देश का सबसे बड़ा उत्तरी नाका तातोपानी अब तक चीन किसी न किसी बहाने को दिखाकर अवरुद्ध किया हुआ था । और अब तो खबर आ रही है कि यह नाका हमेशा के लिए बन्द कर दिया जाएगा । चीन का सारा ध्यान अभी केरुंग तक रेल लाने की योजना पर केन्द्रित है । दूसरी वजह स्वतंत्र तिब्बत गतिविधि में चीन के व्यापारियों की संलग्नता भी दिखाई जा रही है जिसकी वजह से चीन इस नाका को खोलना नहीं चाह रहा है । अगर यह कार्यान्वयन होता है तो रही सही कसर भी पूरी हो जाएगी और सरकार आर्थिक नीति में पूरी तरह असफल हो जाएगी ।

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