नेपाल दूसरी मुक्ति की प्रतीक्षा में:शिव मुखर्जी

सामान्य रूप से यह माना जाता है कि ‘मधेश’ शब्द ‘मध्यदेश’ शब्द से बना है । हमारे लिए यह समझना पर्याप्त है कि भारत–नेपाल सीमा क्षेत्र से पूर्व से पश्चिम तक सटी नेपाल के तराई और भीतरी तराई क्षेत्र का नाम ही ‘मधेश’ है ।


पृथ्वीनारायण शाह के द्वारा एकीकरण किए जाने के बाद सभी पहाड़ी और काठमांडू आधारित कुलीन वर्गों ने तराई की जनता के ऊपर कभी विश्वास नहीं किया । उन्हें नेपाल में रहते हुए भी भारत के आवासी ९ःष्नचबलत० और हस्तक्षेपकारी के रूप में देखा जाता रहा और क्रमिक रूप से उनके प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाने लगा


भेदभाव की यह नीति महेन्द्र के शासनकाल में विशेषकर सन् १९६० में नेपाल की नवोदित प्रजातान्त्रिक सरकार को अपदस्थ करने और पञ्चायती राज को प्रारम्भ करने के बाद अपनी पराकाष्ठा पर पहुँची । तराई के जंगलों का विनाश करते जाने पर जब वह धीरे–धीरे आवासयोग्य बनता गया, महेन्द्र पहाड़ियों को तराई में आ कर बैठने के लिए प्रोत्साहित करते रहे । इस प्रकार तीस लाख से अधिक लोग वहाँ आकर बस गए


यह आख्यान ‘अफ्रिकाज थर्ड लिवरेसन’ Africa’s Third Liberation  नामक पुस्तक की विषयवस्तु से अभिप्रेरित है, जिसके सह–लेखक हैं– ग्रेग मिल्स एवं जेफ्रे हर्बस्ट । वे लिखते हैं– अफ्रिका की पहली मुक्ति औपनिवेशिक एवं नश्लवादी सरकारों से हुई । दूसरी स्वयम उन मुक्तिदाताओं से हुई, जो विभिन्न कारणों से नये तानाशाह बन गए और कभी–कभी तो पूर्व औपनिवेशिक शासकों से भी बदतर प्रमाणित हुए । तीसरी और वर्तमान मुक्ति ‘स्वयम् राजनीति के केन्द्रविन्दु में हो रहे परिवर्तन’ के द्वारा प्रकट हो रही है ।

नेपाल दूसरी मुक्ति की कगार पर खड़ा है । उसे पहली मुक्ति निरंकुश राजतन्त्र और राणा शासकों से मिली । उनके कार्यकाल के विभिन्न निरंकुश सरकारों ने नेपाल की जनता को एक दूसरे से पृथक रखने, गरीब बना कर छोड़ने और दमन का शिकार बनाने की भरपूर कोशिशें की । सन् १९५० में हवा का जो एक झोंका आया, उसके फलस्वरूप नेपाल में पहली बार परिवर्तन की लहर फैली । महेन्द्र के १९६० के कदम ने उसे जो चोट पहुँचायी, उसे सन् १९९० में उत्पन्न, एक और जबरजस्त लहर ने सवांरकर तन्दुरुस्त किया । २००६ के दूसरे निर्णायक आन्दोलन ने राजतन्त्र को उखाड़ फेंकने में सफलता प्राप्त की । जिसके फलस्वरूप नेपाल को अपने सामाजिक संविधान तैयार करने का सही में पहली बार स्वतन्त्र अवसर मिला ।

पर उत्साह का यह वातावरण सन् २००६ के दशक से निराशा और अनिश्चितता का रूप पाने लगा और नेपाली जनता, जो २५० वर्ष पुराने राजतन्त्र के जड़ों को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंक चुकी थी और सशस्त्र एवं हिंस्रक विद्रोहियों को मुख्यधार में लाने में कामयाव हुई थी, अपने संघर्षरत नेताओं को सत्ता के लिए लड़ते, निहित स्वार्थ में उलझते, भ्रष्टाचार में लिप्त होते ओर अपने सपने को चकनाचूर होते देख खिन्न और क्रुद्ध हो रही थी । हरेक नेता की दृष्टि ‘गद्दी’ पर केन्द्रित थी, जिसके फलस्वरुप एक के बाद दूसरी सम्मिलित सरकार बनती गई, सत्ता के लिए सौदेबाजी होती रही और समाज के विभिन्न वर्गों की भलाई और खुशहाली के लिए कार्य किए जाने के बदले उनकी दृष्टि सत्ता के वंटवारा करने और अपने निकट के एवं दलगत अनुयायियों को लाभ पहुँचाने के लिए सौदेबाजी की ओर जाने लगी ।

भूकम्प का अनुभव

एक वर्ष पहले नेपाल को महाविनाश से जर्जरित करनेवाले भूकम्प के दिनों में और उसके बाद राजनीतिक नेतृत्व के द्वारा किए गए क्रियाकलापों से बेहतर दृष्टांत कुछ और नहीं हो सकता । महाविपत्ति की उस बेला में, जब उस विनाश लीला के कारण हजारों लोग मारे गए, विकलांग हुए और लाखों लोग घरबारविहीन हुए थे, वह लोग कहीं नहीं दिखाई दे रहे थे । जबकि अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय और विशेष कर पड़ोसी देश भारत ने उन्हें तत्काल राहत पहुँचाने के सिलसिले में भीमकाय करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । भारत और अन्य दातृ राष्ट्रों ने चार अर्ब डॉलर की राशि की सहायता प्रदान की या देने की प्रतिवद्धता जतायी । लेकिन नेतृत्व वर्ग संकट में पड़ी जनता को सहायता पहुँचाने के बदले कई कमियों से भरे संविधान को जारी करने की तीव्रता दिखाने, सत्ता के केन्द्र में पहुँचने की जल्दबाजी करने और मधेशी, जनजाति एवं दलितों के ऊपर विशिष्ट बाहुन–क्षेत्री–पहाडी वर्गों की चिरकालिक प्रभुत्व बनाए रखने में लीन होते रहे । इसके अतिरिक्त उन्होंने भूकम्प पीडितों को राहत पहुँचाने और पुनर्वास करने के सम्बन्ध में एक पुननिर्माण प्राधिकरण की स्थापना की घोषणा की । लेकिन दातृराष्ट्रों से प्राप्त अर्बों डालर की लालच और उस संयुक्त निधिपर पकड़ जमाने की नीयत से स्थापित यह निकाय कुछ समय उपरान्त ही विवादों के घेरे में आ पड़ा । पीड़ित जनता अब भी घोर संकटों में दिन बिता रही है । यह प्राधिकरण एक वर्ष बाद भी न तो एक घर बना पाई है और नहीं पुनर्निर्माण का कोई काम कर पाई है, जिस कार्य के लिए दस लाख से भी कम राशि की आवश्यकता थी । उस गैरसरकारी संगठन (ल्न्इक) और व्यक्ति भी जिन्होंने उन्हें आश्रय देने के लिए अपनी ओर से झोपड़ी बनाने का काम शुरु किया था, उन्हें भी यह कहते हुए रोक दिया गया कि प्राधिकरण ने नये भवनों के निर्माणों के सम्बन्ध में आवश्यक प्रतिमान को अभी अन्तिम रूप नहीं दी है ।
शान्ति प्रक्रिया के शुरु होने के दस वर्ष और संविधानसभा के प्रथम चुनाव होने के आठ वर्ष बीत जाने के बाद भी नेपाल की दूसरी मुक्ति नहीं हो पाई है । नेपाली जनता को राजा और राणाओं की निरंकुश प्रशासकों के बदले लालची, नये प्रजातन्त्रवादियों और स्वयं नियुक्त बाहुन–क्षेत्री–पहाडी कुलीन शासकों के कुशासन को ही स्थापित होते पा रही है । माओवादियों के भी वरिष्ठ नेताओं में आठ ब्राह्मण ही हैं । प्राचीन निरंकुश शासक वर्ग, ‘दैवी शक्ति’ की भावना से और शक्ति का निष्ठुरतापूर्वक प्रयोग करते हुए अपने शासन की वैधता प्राप्त कर रहे थे । वर्तमान नेतृत्व वर्ग भी उसी भावना से प्रेरित है और स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव के नाम से वैधता प्राप्त करते हुए मधेशी, जनजाति और दलितों के विरुद्ध उसी प्रकार शक्ति का प्रयोग कर रहा है । अतिराष्ट्रवाद को सदैव ही भारत विरोधी भावना के साथ जोड़ा जाता है और अपनी असफलताओं का दोष बड़े भाई भारत के ऊपर थोपा जाता रहा है । वर्तमान प्रधानमन्त्री केपी ओली तो भारत के विरुद्ध तीखे स्वर में अनर्गल प्रलाप करने के मामले में शाह और राणा शासकों से भी आगे निकल पड़े हैं ।
यह सच है कि एक सामन्ती निरंकुश शासन प्रणाली से प्रजातान्त्रिक प्रणाली का क्रियाशील स्वरूप प्राप्त करने का कार्य नेपाल के इतिहास, गरीबी, राज्य को प्राप्त संशाधन की कमी और विभिन्नता को देखते हुए कठिन प्रतीत होता है । क्रान्ति के कारण जनता में उत्पन्न और बढ़ती उम्मीदों को सक्षम से सक्षम सरकार को भी पूरा कर पाना कठिन होता है । इसका सबसे निकटतम दृष्टांत पाने के लिए हमें भारत को देखना ही पर्याप्त होगा । जहाँ, धर्म, जाति, और विभिन्न वर्गों में विभाजित सामाज के कारण विगत की असमानताओं को मिटाने और सभी लोगों को समान अवसर देने, उन्हें जागरुक बनाने और राज्य व्यवस्था को समावेशी बनाने में कितनी कठिनाइयाँ हुई थी, फिर भी अन्तर हमें दिखाई पड़ता है । भारतीय प्रजातन्त्र को अपने समय का सम्भवतः सबसे उदार और पक्षपात से मुक्त संविधान निर्माण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । यह इसमें सन्निहित मौलिक सिद्धान्तों को क्षति पहुँचाने के प्रयास को निरुत्साहित तो करता ही है, बहुमत, साम्प्रदायिकता कि अभिमान रखनेवाले और अड़चने उत्पन्न करनेवालों के प्रभाव के विरुद्ध एक दीवार के रूप में भी प्रस्तुत होता है । यह हमारे बाद औपनिवेशिकता से मुक्त होने और स्वतन्त्र होने वाले देशों के लिए एक आदर्श रहा है । लेकिन नेपाल के शासकों ने ‘समावेशी’ प्रजातन्त्र को कूडेÞदान में फेंकते हुए अतीत में जड़ जमा बैठे पूर्वाग्रहों के ही उभारने का काम किया और एक ऐसे संविधान की घोषणा की, जिसमें कई भयानक खामियां हैं, जिसमें महिलाओं को अधिकारों से वञ्चित करने और अपनी आधी जनसंख्या को स्थायी रूप से दूसरे दर्जे में रखने के लिए किए गए प्रयास स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं ।

मुख्य समस्या
हमारे समक्ष यही तथ्य आज नेपाल की मुख्य समस्या के रूप में विद्यमान है । जिसका समाधान किए बिना नेपाल की दूसरी आजादी, मुक्तिदाताओं से मुक्ति, शुरु नहीं होगी । इसके सफलता की तो बात ही नहीं की जा सकती और यही संघीयता का मामला है, जिसकी केन्द्र में मधेश का प्रश्न है और पहाड़ी–मधेशी (पर्वतीय जनता और तराई की जनता) का विभेद है ।
मधेश क्या है और मधेशी कौन हैं ?
सामान्य रूप से यह माना जाता है कि ‘मधेश’ शब्द ‘मध्यदेश’ शब्द से बना है । हमारे लिए यह समझना पर्याप्त है कि भारत–नेपाल सीमा क्षेत्र से पूर्व से पश्चिम तक सटी नेपाल के तराई और भीतरी तराई क्षेत्र का नाम ही ‘मधेश’ है ।
तराई की जनता, जो मधेशी कहलाती है, हजारों वर्षों से उस देशीय जनता की तरह वहाँ निवास कर रही है, जिस प्रकार इस ग्रह की अन्य जनता वहाँ निवास करती आ रही है । नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा में जो भी परिवर्तन हुए, उससे इस तथ्य में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है । नेपाल का एकतिहाई भूभाग, जो तराई में पड़ता है, सन् १८१४–१८१६ में हुए आँग्ल–गोरखा युद्ध के बाद ब्रिटिश शासकों के द्वारा कब्जा कर लिया गया था, और इसका अधिकांश भाग नेपाल के द्वारा सन् १८५७ में ब्रिटिश शासकों को सैनिक्य उपलब्ध कराये जाने के एवज में पुरस्कार स्वरूप लौटा दिया गया था । मधेशी जनता वहाँ शुरु से ही निवास करते रहने की बात एक निर्विवाद तथ्य है । पृथ्वीनारायण शाह के द्वारा एकीकरण किए जाने के बाद सभी पहाड़ी और काठमांडू आधारित कुलीन वर्गों ने तराई की जनता के ऊपर कभी विश्वास नहीं किया । उन्हें नेपाल में रहते हुए भी भारत के आवासी ९ःष्नचबलत० और हस्तक्षेपकारी के रूप में देखा जाता रहा और क्रमिक रूप से उनके प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाने लगा । उन्हें अपमानित करने के कार्य भी किए जाने लगे । जंगबहादुर राणा का मुलुकी ऐन, जो नेपाल की पहली न्याय प्रणाली थी, जनजाति को ‘मतवाली जाति’ (सदैव शराब के नशे में डूबनेवाले कौम) बताते हुए गुलाम के रूप में व्याख्या करती है । भेदभाव की यह नीति महेन्द्र के शासनकाल में विशेषकर सन् १९६० में नेपाल की नवोदित प्रजातान्त्रिक सरकार को अपदस्थ करने और पञ्चायती राज को प्रारम्भ करने के बाद अपनी पराकाष्ठा पर पहुँची । तराई के जंगलों का विनाश करते जाने पर जब वह धीरे–धीरे आवासयोग्य बनता गया, महेन्द्र पहाड़ियों को तराई में आ कर बैठने के लिए प्रोत्साहित करते रहे । इस प्रकार तीस लाख से अधिक लोग वहाँ आकर बस गए । जिस भूमि पर वो लोग आ कर बसे, उसे मधेशियों विशेषतः थारुओं से जोरजबरजस्ती के साथ छीन लिया गया । उन्हें पहले भूमिहीन बनाया गया और बाद में बंधुवा मजदुरों की तरह दासता के बन्धन से बाँध दिया गया । तराई में तैनात अधिकांश सरकारी अधिकारी पहाड़ी ही थे । जैसे–जैसे तराई औद्योगिक और कृषि मामले में नेपाल का मुख्य केन्द्रबिन्दु बनता गया, राज्य का दमनकारी और दोहनकारी दृष्टिकोण कठोर बनता गया । अधिकारीतन्त्र, पुलिस और सेना में उनकी उपस्थिति नगण्य होती रही । एक मधेशी को काठमांडू आने के लिए विशेष अनुमतिपत्र लेने की आवश्यकता पड़ती थी । उसके नागरिकता के पहचानपत्र, जो प्रमाणपत्र कहलाता है, में लगे फोटो में वह यदि पहाड़ी नागरिक की तरह दौरा–सुरुवाल में दिखाई नहीं पड़ता तो उसे अवैध माना जाता । शासकों की असफलता को छिपाने के लिए भारत विरोधी भावना को प्रचार किया जाता और मधेशियों को भारत के गुप्तचरों के रूप में अविश्वास की नजर से प्रचार किया जाता ।
निषेध की नीति
सन् १९९९ में की गई एक सर्वेक्षण के अनुसार प्रशासकीय विभागों के ३९ प्रमुखों में २९ उच्च जाति के बाहुन–क्षेत्री, ७ नेवार (दूसरा विशेष सुविधा सम्पन्न वर्ग) और ३ जनजाति के लोग थे । मधेशी समुदाय से एक भी अधिकारी उनमें नहीं थे ।
सन् २००४ के सर्वेक्षण के अनुसार १४१ वरिष्ठ पुलिस और सैनिक अधिकारियों में एक मधेशी नहीं था ।
संचार के क्षेत्र में भी यही स्थिति देखने को मिली । सरकारी और निजी समाचार माध्यमों में ३३ पदों में सिर्फ दो ओर १३१ पदों में सिर्फ तीन मधेशी क्रमशः दिखाई पड़े । बाकी सभी पहाड़ी लोग थे ।
यद्यपि मधेशी के अधिकारों के लिए सन् १९५० से ही संघर्ष चलता रहा पर सन् २००७ के आन्दोलन को ही अन्ततः सफलता मिली । राजतन्त्र के विरुद्ध छेड़ी गई आन्दोलन के बाद राजनीतिक रूप से जागरुक मधेश ने एक ऐसा आन्दोलन छेड़ दिया, जिसके कारण नेपाल के तत्कालीन प्रजातान्त्रिक निकायों को मधेशियों के स्वायत्तता, समावेशी संवैधानिक सुरक्षा, समानुपातिक प्रतिनिधित्व और संघीयता के सम्बन्ध में मधेशियों के मांग को स्वीकार करना पड़ा । इस सम्बन्ध में फ्रेबु्रअरी २८, २००८ में तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइराला और मधेशी नेताओं के बीच एक समझौते के ऊपर हस्ताक्षर हुआ । इसके बाद निर्मित अन्तरिम संविधान में भी इस प्रतिवद्धता को समावेश किया गया । लेकिन महाभूकम्प के बाद जब सरकार को संविधान घोषणा करने की जल्दी हुई, तब अन्तिम मसौदे में मधेशियों से लिखित रूप में की गई प्रतिवद्धताओं को समावेश नहीं किया गया और भूकम्प के अवसर पर अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए कुछ प्रयास में लीन हुई । इसके साथ ही वह नागरिकता सम्बन्धी उन आवश्यकताओं को पूरा करने के काम में जुट गई, जो एक गैर नेपाली से शादी करनेवाली महिला के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करता था, जो मञ्जुश्री थापा, जिन्होंने नयाँ संविधान के विरोध में उसे जला डाला, के शब्दों में ‘भारतीय बीज’ से प्रदूषित होने से नेपाल को बचाने का निर्लज्जतापूर्ण प्रावधान है । इससे भी महत्वपूर्ण बात तो यह रही कि नये संविधान ने एक न्यायसंगत संघीय ढाँचे के सम्बन्ध में दीर्घकालिक मांग की उपेक्षा करने की कोशिश की और इसके बदले प्रान्तीय सीमाओं को बंद करने की कोशिश की । जिसका तात्पर्य राजनीतिक निर्वाचनों में लाभ के लिए अनुचित प्रभाव डालने के उद्देश्य के साथ मधेशियों को, देश की जनसंख्या के एक तृतीयांश से अधिक लोगों को (जिसमें तराई क्षेत्र के थारु, जनजाति, दलित और मुस्लिम आदि की जनसंख्या है) भविष्य में गठन होनेवाले संसदों में स्थायी रूप से अल्पसंख्यों का रूप देना था ।
इन सब कारणों से तराई एक बार फिर आन्दोलित हो उठा । निर्मम शक्ति के प्रयोग के कारण चालीस से अधिक लोग मारे गए और खुली सीमा के प्रमुख नाकों पर मधेशियों ने अवरोध खड़ी कर दी, जिसके लिए शासकों ने तत्काल ही और खुले रूप से भारत को दोषी ठहराया । भारत–विरोधी और अतिउग्र राष्ट्रवादी बयानों के साथ ‘चाइना कार्ड’ का प्रयोग किया जाने लगा । जिसका भारत के ऊपर सन् ६० के वर्षों की तरह भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा । भारत के द्वारा इस संकट को सम्हालने के मामले में उठाए गए कदमों के सम्बन्ध में यदाकदा आलोचनात्मक टिप्पणियाँ हुईं । इसके समय के साथ–साथ इस सम्बन्ध कहीं कोई गलत फैसले हुए होंगे और हमारे सन्देशों में भी कहीं स्पष्टता का अभाव रहा होगा । पर सबसे अधिक चिन्ता की बात तो दिल्ली के नेपाल मामलों से सम्बन्धित लोगों में सरकार और उसके बाहर के वरिष्ठ राजनीतिज्ञों की विषय में फैली यह अफवाह रही कि वे नेपाल को धर्मनिरपेक्षता को नयी ढाँचे से हटाकर वापस हिन्दू राष्ट्र के रूप में पुनस्र्थापित करने की इच्छा रख रहे हैं । हम आशा करते हैं कि यदि यह भयानक और मुर्खतापूर्ण विचार सही है तो हमारे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी इस बात से अवश्य ही खुश नहीं होंगे । यह समस्या का एक ऐसा दृष्टान्त है, जिसके सम्बन्ध में प्रत्येक भारतीय राजदूत को यह शिकायत रहती है कि दोनों देशों के बीच में विभिन्न स्तरों पर ऐसे कई वार्ताकार होते हैं, जो पहले से ही विद्यमान संवेदनशील स्थिति को जटिल और गम्भीर बनाते हैं । सरकार की ओर से स्थिति को सुधारने के कुछ कोशिशें की गई है और सरकारी निकायों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व और समावेशीकरण के सिद्धान्त के सम्बन्ध में कई संशोधन किए गए हैं (जो एक अभिमुख नौकरशाह के कार्यों से प्रभावित हो सकता है), जिसका अनुमोदन होने जा रहा है । पर संघीय ढाँचे में प्रान्तों का सीमांकन जैसे सभी महत्वपूर्ण विषय की उपेक्षा की गई है । इसकी अलावा हैरानी की बात यह है कि समावेशीकरण सम्बन्धी प्रस्ताव में उच्च जाति के लोगों को भी सकारात्मक कार्याप्रणाली के अधीन शामिल किया गया है ।
मधेशियों का अवरोध समाप्त हो चुका है । इसे हटाने के सम्बन्ध में मधेशी नेतागण आमनागरिकों के सामने उत्पन्न कठिनाइयाँ और हत्या की घटना के प्रति उनकी सहानुभूति जैसे कई कारण बताते हैं । साथ ही उनके न्यायसंगत मांगों को पूरा न किए जाने की स्थिति में आन्दोलन फिर शुरु करने की भी बातें करते हैं, जो इसबार काठमांडू केन्द्रित होगा । पर इसमें कोई शक नहीं है कि मधेशी मोर्चा बीच की एकता कमजोर हो रही थी । इसके अलावा एक संयुक्त मोर्चा गठन करने की दिशा में जनजाति और दलितों को शामिल करने के मामले में यथेष्ठ कार्य नहीं किए गए और उन नेताओं ने अपनी ख्याति पाने के लिए आपसी एकता को दाव में लगा दिया । उन्हें अमेरिकी क्रान्तिकारी नेताओं को बेञ्जामिन फ्रैंकलिन के द्वारा कहे गए इन शब्दों का स्मरण करना उपयुक्त होगा– ‘महोदय, हमे एक साथ फाँसी की तख्ते पर लटकना होगा, अन्यथा हम अलग–अलग लटका दिए जाएंगे ।’ मधेशी राजनीतिज्ञों, जो नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एमाले) या नेकपा माओवादी के साथ मूलधार में समाविष्ठ हैं, को यह फैसला करना होगा कि वह इन पार्टियों के साथ अपना गठबन्धन कायम रखेंगे या मधेशी आन्दोलन में शामिल होने के लिए उस गठबन्धन से सम्मानपूर्वक त्यागपत्र देंगे । तटस्थ बने रहनेका समय अब नहीं रहा । उन्हें अब यह निर्णय करना ही होगा कि वह उन पार्टियों के सहयात्री के रूप में उनके साथ बने रहेंगे या अपनी भूमि के लिए नेपाली धूप में खड़े होते हुए संघर्ष में उतरेंगे । विभिन्न अवसरों में बनी सम्मिलित सरकारों में मधेशी मन्त्रियों की दूधमलाई खाने की अग्रसर होने की प्रवृत्ति को तराई की जनता ने अनदेखी नहीं की है । अतः इन नेताओं के लिए संघर्ष के सही पथ पर उतरना और व्यक्तिगत हित के मामले को त्यागना उपयुक्त होगा
भारत की भूमिका
भारत के लिए आक्रामक कूटनीतिक क्रियाकलाप करने का यह उपयुक्त समय नहीं है । और न ही यह ओली सरकार के ऊपर दबाव बनाने का समय है । न यह फलदायी ही है । यद्यपि यह आकर्षक बात लगती है । ओली को उनकी भारतयात्रा काल में जो अवसादपूर्ण स्वागत प्रदान की गई और एक संयुक्त विज्ञप्ति जारी करने के मामले में अस्वीकृति व्यक्त की गई, वह नेपाल सरकार को यह स्पष्ट सन्देश देने के लिए पर्याप्त होना चाहिए कि भारत इस सम्बन्ध में इससे आगे नहीं बढ़ सकता और भारत के ‘पीछे हटने’ के विषय को लेकर प्राप्त सफलता के सम्बन्ध में नेपाल के घरेलु उपयोग के लिए जो भी प्रचार की जा रही है, वह गलत है । विकासजन्य कार्यक्रमों के लिए सहयोग और सहायता जारी रखनी चाहिए । हमें नेपाल की जनता, सिद्धान्तहीन लोग और कुशासन में संलग्न विशिष्ठ वर्ग, जो वर्तमान में नेपाल में शासन कर रहे हैं, के बीच सावधानी के साथ और संवेदनशील होते हुए अन्तर करना चाहिए । यह विशिष्ठ वर्ग और उनके गुर्गे भारत को कोई चोट नहीं पहुँचा सकते । अतः वे मधेशियों को ही अपना लक्ष्य बनाकर काम करेंगे । दक्षिण एशिया में कई वर्ष और नेपाल में चार वर्ष बितानेवाले कनाडा के एक पत्रकार ड्यानियल ल्याक की हाल के ही एक लेख का एक उद्धरण यहाँ उपयुक्त होगा । वह लिखते हैं– ‘नेपाल के जनमत को प्रभावित करनेवाले तत्व वह माओवादी हों वा राजा, या प्रजातन्त्रवादी, इस (भारत–विरोधी) कार्ड का उपयोग करते हैं, मधेशी के विरोध जानबूझ कर और अनिवार्य रूप से मधेशी के विरुद्ध निर्मम शक्ति का प्रयोग करते हैं । दूसरे दर्जे की नागरिकता के साथ दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में देखे जानेवाले मधेशियों के साथ अपने ही देश में दिल्ली के गुप्तचरों के रूप में व्यवहार किया जाता है और उनके साथ प्रतिशोध लेने के लिए तथा उनकी शादी ब्याह के मामले को भारत के द्वारा उनकी भूमि के ऊपर कब्जा करने की कार्यसूची के रूप में लिया जाता है । नये संविधान में इस खतरनाक प्रवृत्ति की झलक मिलती है, जो महिलाओं एवं अन्य लोगों को उनके हकअधिकारों से वञ्चित करने के सम्बन्ध में प्रदर्शित वत्र्तमान पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण का एक ऐसा दृष्टान्त है, जो विश्व में अनूठा ही मिलेगा ।’
नेपाल की जनता अपनी शक्ति और प्रतिभा, मानवीय मूल्यों और कठोर परिश्रम करने के मामले में किसी से भी कम नहीं है । एक बार देश में कुशासन में संलग्न वर्तमान प्रशासन का स्थान, सही प्रजातन्त्र सफल हो जाने पर मानवीय एवं भौतिक संशाधन का उपयोग देश के तीव्र विकास में सहायक हो जाएगा । यह भारत के हित में होगा कि वह रचनात्मक सहायता के लिए उस समय तक सदैव तैयार रहे, जब तक नेपाल की जनता, विशेषत वर्तमान उत्पीड़ित मधेशी, जनजाति और दलित वर्ग, उस संविधान को पाने के अपने सपने को पूरा होते हुए देख नहीं पाते, जिससे पाकर सभी नेपाली गर्व से सिर ऊपर कर सके । सारे अनर्गल प्रलाप, भारत–विरोधी विष वमन और खोखले भाषणों का किसी पर भी नहीं, यहाँ तक कि यात्रियों के ऊपर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता । क्योंकि सभी बात अच्छी तरह जानते हैं कि किसी वर्कपरमिट की आवश्यकता के बिना भारत में काम करनेवाले साठ से अस्सी लाख नेपालियों के द्वारा अपने परिजनों को भेजी जानेवाली राशियाँ और भारतीय रुपये के साथ नेपाली रुपये के साथ निरन्तर सन्तुलित बने रहना, दो ऐसी जीवन रेखाएं है, जो नेपाल के विभिन्न शासकों के द्वारा राजनीतिक बलात्कार किए जाने के बावजूद नेपाल की अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखती हैं । भारत को इस बात के लिए श्रेय देना ही चाहिए कि नेपालियों को भारत के निकटस्थ खुली सीमा तक में किसी भी प्रकार से प्रताड़ित करने की एक भी घटना नहीं हुई । यह आशा की जाती है कि हमारी सरकार अपने दृष्टिकोण में स्थिर बनी रहेगी और नेपाली जनता को उनको शासकों के पापों के लिए दोषी नहीं मानेगी ।
सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल की मित्रवत सरकार भारत के लिए महत्वपूर्ण है । पाकिस्तान, भारत–नेपाल खुली सीमा का प्रयोग सदैव भारत में अवैध प्रवेश करने और नकली मुद्रा को लाने के लिए करता रहा है । चीन भी अपना राजनीतिक प्रभाव विस्तार करने लगा है और चीन और पाकिस्तान के वर्तमान साँठगाँठ की रणनीति को हमें अपने कुटनीतिक अभ्यासों से प्रभावहीन बनाना है । मैं सदैव धैर्य और नियमित वार्ता के पक्ष में जोर डालता रहा हूँ । पर वर्तमान शासकों को यह स्मरण कराने की आवश्यकता पड़ सकती है कि यदि उनकी नीतियाँ चुभन की सीमा से बाहर जा कर हमारी सुरक्षा के लिए अनदेशा का कारण बनती है तो भारत दुरदम्य साधनों का प्रयोग कर सकता है ।
नेपाल के लिए लाभ
अफ्रिका की दूसरी मुक्ति आन्दोलन को प्रथम मुक्ति आन्दोलन के बाद सफल होने में लगभग ३० वर्ष लगे । (रंगभेद विरोध की लम्बी संघर्ष का इतिहास तो अलग ही है) नेपाल को इससे भी कम समय लगेगा, हो सकता है कुछ साल ही लगे । इसका सबसे बडा लाभकारी पक्ष यह है कि यहाँ का समाज एक तो खुली है, जिसमें कई जनआन्दोलन की सफलता का अनुभव सन्निहित है । एक नागरिक समाज है, जो अपनी द्वेध वृत्ति से मुक्त हो सकने की अवस्था में अपने प्रभाव का उपयोग कारगर ढंग से कर सकता है । इसके अलावा एक अपेक्षाकृत स्वतन्त्र प्रेस है, जो अतीत में अपने साहसका प्रदर्शन करता रहा और फिर कर सकता है । एक मधेश है, जो राजनीतिक दृष्टि से पूर्णतः जाग उठा है, । एक अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय (चीन को छोड़ कर) है, जो नेपाल के भ्रष्ट शासकों से परेशान हो उठा है और भारत जैसा एक प्रजातान्त्रिक और मित्र पड़ोसी देश है, जिसका नेपाल को स्थिर और सम्पन्न देखने के अलावा अन्य कोई स्वार्थ नहीं है । इन सबों के अतिरिक्त जनता है, जिसके अधिकांश लोग यथार्थ और न्यायसंगत प्रजातन्त्र से कम किसी बात पर सहमत नहीं होंगे । अब सम्मिलित सरकार बनाने और गिराने के दिन निकल गए हैं, क्योंकि वह सभी पहले की सरकार के समान ही अमंगलकारी रही हैं । कुछ दिन पहले ही हमने प्रचण्ड (एकीकृत नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के अध्यक्ष) को ओली को विस्थापित करने के लिए नेपाली कांग्रेस के साथ गठबन्धन करने की बातें करते हुए पाया, पर कुछ समय बाद हीं जब ओली ने माओवादी नेता को यह आश्वासन दिया कि बजट प्रस्तुतिकरण के बाद उन्हें प्रधानमन्त्री बना दिया जाएगा, वह अपने अभियान से पलट गए । इस बार चीन का हाथ स्पष्ट दिखाई पड़ा । पर कुर्सी बदलने का खेल जारी है । इस अवसर पर काठमांडू के नेपाली राजनीतिज्ञों के सम्बन्ध में अमरिका के एक भूतपूर्व राजदूत के बातें याद आती है कि ‘जब घर में आग लग रही है तो एक परिवार इस बात पर लड़ रहा है कि मुख्य शयन कक्ष पर किसका अधिकार हो ?’
सारी बातें अब स्पष्ट रूप से सामने दिखाई पड़ रही है, इन पर जितनी जल्दी कारवाही होगी, नेपाल को उतनी ही जल्दी दुःख–विपदा से बचाया जा सकेगा ।

(लेखकः शिव मुखर्जी एक नामवर राजनयिक एवं नेपाल के लिए पूर्वराजदूत हैं ।)
साभार ः फ्रन्टलाइन,
अनुवादकः प्रकाश उपाध्याय

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