नेपाल, निर्वाचन और निम्न जनता : बसन्तकुमार विश्वकर्मा

जनता को चिढ़ाकर एवं राजनीतिक दल को रुष्ट बनाकर कहीं का लोकतंत्र महान नहीं बना है । अतः जालझेल की राजनीति से आगे बढ़कर संवैधानिक विवाद को मिटाने के लिए संविधान में संशोधन एवं परिमार्जन होना चाहिए, जो संविधानतः सदा खुला है । इसके विपरीत चलने वाले नेता एवं पार्टी लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं ।

प्रो. बसन्तकुमार विश्वकर्मा, काठमांडू, २८ अप्रैल ,

नेपाल का वर्तमान भूगोल अतीत कालखण्ड में सदा–सर्वदा एकीकृत नहीं था, इसे पृथ्वीनारायण शाह ने केन्द्रीयकरण किया । तभी से केन्द्रीय शासन व्यवस्था का प्रारम्भ हुआ था । शाहकाल से पूर्व बाइसी–चौबीसी अलग–अलग छोटे–छोटे स्वतंत्र सामन्ती राज्य थे । तत्कालीन समय में सामन्ती शासन व्यवस्था का विरोध करने की और उसके विकल्प प्रस्तुत करने की चेतना एवं क्षमता जनता में नहीं थी । अतः वर्षों–वर्ष सामन्ती या राजतंत्र शासन व्यवस्था चलती रही । वैसी शासन व्यवस्था का विकल्प बड़े शक्तिशाली जैसे सामन्ती राजतंत्र होते थे, जो अपनी शक्ति के आगे कम शक्तिशाली राज्य को दबाने या दमन करने में सफल होते थे । उस युग में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ बाली कहावत चरितार्थ थी । इसी कहावत को चरितार्थ कर वर्तमान नेपाल का भूगोल तैयार हुआ था ।
उन्नीसवीं शताब्दी की विश्व की प्रजातांत्रिक बयार की लहर जब एशिया महादेश पर पहुँची तो यहां के बड़े–बड़े भू–भाग, स्वाधीन, प्रजातांत्रिक एवं प्रगतिशील धाराओं पर चलता हुआ अपने लक्ष्य तक पहुँच गया । यह मुल्क बाहरी आवरण में एकत्रित दिखते हुए भी भीतर चार वर्ण व्यवस्था के ज्ञानी–मूर्ख, शक्ति सम्पन्न–विपन्न, सक्षम–अक्षम, धार्मिक–अधर्मी, नारी–पुरुष, शिक्षित–अशिक्षित, पूर्वेली–पश्चिमेली, काले–गेरे, पहाड़ी–मधेशी, छूत–अछूत, हिन्दू–अहिन्दू आदि अनेक विषमता एवं विकृति से झुलस रहा था । हिमालय के प्रांगण में यह मुल्क पशुपतिनाथ की छाया, राजतंत्र–छत्र के प्रभाव से वैदिक वर्णव्यवस्था, सामाजिक शोषण एवं आर्थिक विविधिता का फैलाव बढ़ता चला गया । फलस्वरूप यहां वर्णीय, वर्गीय, जातीय एवं सामुदायिक असमानता बढ़ती रही । राजनीतिक उपेक्षा, आर्थिक शोषण, शैक्षिक वंचन, सामाजिक बहिष्करण, दमन, छुआछूत तथा भाषिक–क्षेत्रीय विभेद के कारण समग्र नेपाली जनता ‘रैती’ ‘प्रजा’, ‘मदिसे’ एवं ‘अछूत’ की स्थिति में पनपती, घीसती–पीटती, लंगड़ाती हुई वर्तमान लोकतांत्रिक गणतंत्र के मुकाम तक पहुंच पायी है । पर यहां तक पहुँचने के बाद भी मधेशी, दलित एवं आदिवासी जनजाति आदि को उनके अनुकूल का उद्देश्यपूर्ण संविधान नहीं मिल पाया है ।
राणा शासन, शाही शासन एवं सुधारी हुई निर्दलीय पंचायती व्यवस्था के विरुद्ध लड़ती जूझती और बलिदान देती आयी । तृतीय, चतुर्थ एवं पंचमा श्रेणी में गिनी जाती रही जनता माओवादी सशस्त्र युद्ध को बलिदान देकर भी लोकतांत्रिक संविधान की अन्तर्वस्तु में प्रथम–द्वितीय श्रेणी की जनता के माफीक अन्य श्रेणी की जनता को उठाने को उचित व्यवस्था न पाकर हतप्रभ एवं निराश दिखती है । द्रूतमार्ग से घोषित संविधान जारी होते ही विवादित होता आया है । इस अंतहीन विवाद को क्षण भर समय देकर बड़ी पार्टी होने के अहंकार के मद में समाधान करना नहीं चाहती हैं । परंतु ऐसी पार्टियां अपने जनमत की धौंस बात–बात पर सुनाती हैं और उपेक्षित जनता एवं जनता की अपेक्षित पार्टियों को नीचा दिखाती एवं उपहास करती दिखती है । लोकतंत्र में राजनीतिक दल जितना महत्वपूर्ण होता है, उससे हजारों गुणा अधिक महत्व जनता का होना चाहिए और होता है । जनता को चिढ़ाकर एवं राजनीतिक दल को रुष्ट बनाकर कहीं का लोकतंत्र महान नहीं बना है । अतः जालझेल की राजनीति से आगे बढ़कर संवैधानिक विवाद को मिटाने के लिए संविधान में संशोधन एवं परिमार्जन होना चाहिए, जो संविधानतः सदा खुला है । इसके विपरीत चलने वाले नेता एवं पार्टी लोकतांत्रिक नहीं हो सकते हैं ।
सरकार ने वैशाख ३१ गते स्थानीय चुनाव की घोषणा की है । चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को करने में जुटा हुआ है । आज स्थानीय चुनाव निश्चित होकर भी अन्योलपूर्ण सशंकित स्थिति में है । ऐसी अवस्था इसलिए है कि चुनाव के लिए सभी दलों की सहभागिता का वातावरण नहीं बन पाया है ।
संविधानतः संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल की मौलिक संरचना संघ, प्रदेश एवं स्थानीय सरकार के रूप में तीन स्तर का उल्लेख है । राज्य शक्ति का प्रयोग इन्हीं तीन संवैधानिक संरचना से होती है । लोकतंत्र में स्थानीय निकाय का महत्वपूर्ण स्थान होता है, जो जनता तक सरकार को पहुँचने में आसान बनाता है । ऐसे प्रत्यक्ष शक्तिशाली निकाय एवं संयंत्रों की स्थापना अधिक होने से लोकतंत्र की मूल्य–मान्यता एवं लोकप्रियता को बढ़ाती है, परन्तु साल २०१९ में गठित ग्राम पंचायत, जो वी.पी. कोइराला सरकार की ढाँचा से अभिप्रेरित (३१५७ संख्या) थी, उसे नियोजित करके सिर्फ ७४४ संगठित संख्या बनाई गई है । इसे जनसंख्या की औसत औचित्यपूर्ण मानना कठिन है । इसलिए तराई–मधेशवासी शिक्षित, राजनीतिक कार्यकर्ता एवं राजनीतिक पार्टियां स्थानीय निकाय पुनः संरचना आयोग के सुझाव से असहमत हैं ।
आज सोचनीय बौद्धिक विषय यह है कि साल २०१५ की जनसंख्या एवं राजनीतिक जनचेतना आज की तुलना में अत्यन्त कम होते हुए भी तत्कालीन पंचायती सरकार में स्थानीय स्तर की इतनी अधिक इकाईयां शासन पद्धति को दुरुस्त बनाने के लिए ही तो किये होगे । २००७ साल के आंदोलन से स्थापित सरकार के राजनीतिक चिंतन एवं दृष्टिकोण प्रजातांत्रिक, लोकतांत्रिक एवं गणतांत्रिक थे । वे जनता के प्रथम शुभचिंतक थे, बाद में पार्टी के चिंतक । इसलिए स्थानीय निकाय अधिक बनाने का प्रजातांत्रिक राजनीतिक चिंतन हुए थे । परन्तु लोकतंत्र की निरतंरता नहीं रह सकी । जनता एवं राजनीतिक दल को करीब आधी शताब्दी जूझना पड़े । आखिरकार लोकतंत्र–गणतंत्र जनता ने प्राप्त की । राजनीति में जितनी अधिक जनता की संलग्नता और सहभागिता होती है, उतना ही लोकतंत्र–गणतंत्र सफल माना जाता है । लोकतंत्र जनता द्वारा जनता के लिए और जनता की शासन व्यवस्था है । अतः जनपक्षीय बहुतायत निकाय स्थापना लोकतंत्र के लिए श्रेयस्कर समझा जाता है । परन्तु प्रथम संविधान निर्माण के साथ ही स्थानीय लोकतांत्रिक संयंत्र को नियोजन एवं कमी करके किस लोकतंत्र का खाका बुना जा रहा है ? यह लोकतांत्रिक सिद्धान्त, व्यवहार एवं मान्यताओं के अनुकूल है या नहीं, यह सोचने–सुनने और सुनाने की आवश्यकता सरकार एवं कुछ राजनीतिक दल नहीं समझती हंै । दर्जनों मौलिक अधिकार संविधान में दर्ज हैं परन्तु दलित, आदिवासी जनजाति, अल्पसंख्यक आदि को समक्ष बनने के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था संविधानतः नहीं है । जो कुछ है, उससे ये लोग राजनीतिक दासत्व एवं गुलामी के शिकार बनकर चुप हैं । दलित, आदिवासी जनजाति, अल्पसंख्यक बनाए गए नेतागण भी विभिन्न दल में है, परन्तु भावी निजी की स्वार्थ उम्मीद सजाए संविधान की त्रुटियां पार्टियों के विरुद्ध बोलना, लिखना और चर्चा करना नहीं चाहते । यद्यपि लोकतंत्र स्थापना के संघर्ष में उनका सराहनीय योगदान है फिर भी पद एवं पैसा के लालच एवं राजनीतिक मर्यादा कम होने के भय से वे आम दलित, आदिवासी जनजाति के विरुद्ध बनते नियम–कायदे के विरुद्ध आवाज नहीं उठा पाते और ऐसी आवाज उठाने पर भी संगठन की बहुसंख्यक स्वार्थी स्वर के बीच दब जाते हैं । दलित, आदिवासी जनजाति, मधेशी एवं महिलाएं अब तक नेपाल में सशक्त राजनीतिक दल स्वयं स्थापना नहीं कर सकी है और अपना विचार मान्यता एवं भावनाओं को स्पष्ट नहीं कर पाएं हंै । फलतः लोकतंत्र आने के बाद भी उनके युगों से होते आए शोषण उत्पीड़न आज भी कोई सुनना या सुनाना नहीं चाहता । नारी का उत्पीड़न तो पार्टियो ने समझा और उन्हें ३३ प्रतिशत आरक्षण मिला है । उनके लिए अब ५०÷५० की आवाज बुलंदी पर है, जो भविष्य की प्रतीक्षा पर है । परंतु दलित, आदिवासी जनजाति, बैकवार्ड आदि वर्ग का चिंतन कहां मिलता है ? कौन करता है ? जो स्वयं अपने वर्ग की चिंतन से भिन्न अन्य के विचार, चिंतन एवं सिद्धान्त पर आश्रित हैं । इसीलिए तो लोकतंत्र में बोलने, लिखने और सोचने की स्वतंत्रता दी जाती है और बिना बोले, लिखे और सोचे कुछ नहीं मिलता है । हम लोग जो किसी के पीछे लगे हैं, बोलते नहीं हैं और हमें भी सबसे अधिक पाना है और पाना चाहिए ही अतीत युग के शोषण, उत्पीड़न और बहिष्करण के कारण । वैसे तो हम आज भी सोचने, बोलने और मांगने की कला में अनाड़ी हैं । अतः सही मांगने पर, सही रास्ता तय करने पर भी उसमें राजनीतिक कांटे रोड़े खड़े किए जाते हैं और हमें गुमराह किया जाता है । हम पीछे पड़ते जाते हैं । पर हमें उससे आतंकित होकर मुड़ना उचित है क्या ? सोचिए, बोलिए और अपनों के हित में लगे रहिए । यह भी लोकतांत्रिक संस्कार है । अब भी न कर सके तो हमें और अधिक पीछे छूट जाना पड़ेगा । लोकतंत्र सबके लिए है, आपके लिए और हमारे लिए भी । जो लोकतांत्रिक मूल्य एवं मान्यता को अपनी मुठ्ठी में रखना चाहेंगे वे स्वयं लोकतंत्र की दायरा से दूर चले जायेंगे । यह लोक व्यवहार है, लोकतंत्र का संस्कार है, लोकतंत्र का सार है । हमें अपना लोक व्यवहार, लोक विचार एवं लोकतांत्रिक सिद्धान्त में हर हाल पर दृढ़ और समर्पित रहना चाहिए । यही हमारे भावी दिनों के उत्थान का पतवार बनेगा ।

साल २०५२ से लेकर २०७३ तक की प्रमुख घटनाएं


२०५२ फल्गुन १ सशस्त्र द्वन्द्व की शुरुआत
२०५६ आषाढ़ माओवादी समस्या समाधान सुझाव आयोग गठन
२०५८ विद्रोही और सरकार के बी पहली वार्ता
२०६० जेठ ९ शांति वार्ता समन्वय सचिवालय कि स्थापना
२०६१ श्रावण २८ उच्चस्तरीय शान्ति समिति गठन
२०६२ अगहन ७ सात राजनीतिक दल व माओवादी के बीच १२ सूत्री समझदारी
२०६३ अगहन ५ माओवादी व मुख्य दलों के बीच बृहत् शान्ति समझौता
२०६३ माघ १ अन्तरिम संविधान जारी
२०६३ चैत १८ शान्ति तथा पुनर्निर्माण मन्त्रालय गठन
२०६४ चैत २६ संविधान सभा चुनाव
२०६५ श्रावण ३१ माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड के नेतृत्व में सरकार गठन
२०६९ १४ सौ ६० माओवादी गुरिल्ला नेपाली सेना में समायोजन
२०७० अगहन ४ दूसरी संविधान सभा चुनाव
२०७१ माघ २७ सत्य निरूपण तथा मेलमिलाप आयोग गठन
२०७१ माघ २८ डिजएपीयोरेन्स व्यक्तियों की छानबीन आयोग गठन
२०७२ आश्विन ३ नेपाल का संविधान जारी
२०७२ आश्विन २४ एमाले अध्यक्ष केपीशर्मा ओली प्रधानमन्त्री में निर्वाचित
२०७३ श्रावण १९ पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड दूसरी बार प्रधानमन्त्री में निर्वाचित
२०७३ अगहन १४ सरकार द्वारा संविधान संशोधन विधेयक पंजीकृत
२०७३ अगन १५ संविधान संशोधन के विरुद्ध एमाले द्वारा संसद अवरोध करने का निर्णय
२०७३ अगहन १६ संघीय गठबंधन द्वारा संविधान संशोधन प्रस्ताव अस्वीकार
२०७३ अगहन १७ एमाले सहित अन्य दलों द्वारा संसद अवरोध
२०७३ अगहन १७ थरुहट संघर्ष समिति द्वारा संशोधन प्रस्ताव के विरुद्ध में आंदोलन की घोषणा
२०७३ अगहन १७ बुटवल लगायत प्रांत नं. ५ के विभिन्न इलाकों में एमाले द्वारा प्रदर्शन
२०७३ फाल्गुन ९ सरकार द्वारा स्थानीय चुनाव की घोषणा

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