नेपाल न भारत का मित्र न चीन का, केवल ठगने वाला भिखारी और नाशा मे स्वाभिमानी है : कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी , २६ अक्टूबर |

विश्व रेकर्ड तोड़ मधेश आन्दोलन, सौम्य नाकाबन्दी । विगत ७१ दिनों का मधेश आन्दोलन कोई पार्टी का नही, अपितु यह मधेश जन आन्दोलन है, जिस में कुछ राजनीतिक दल और उनके नेता लोग भी स्नान करने की भरपूर कोशिश की है । यह मधेश आन्दोलन पवित्र गङ्गा की धार की तरह वह पवित्र धार है जो सारे पापो को नष्ट कर सकता है, अगर कुत्सित भावनाओं को तिलान्जली देकर जन स्नान करे । मगर वैसी सम्भावना कम दिखायी दे रही है । मधेशी नेताओ से हम मधेशी जन की यही प्रार्थना है कि अब मधेशियाें का कम से कम विश्वास तो नही तोडे । मगर उसकी भी शुरूवात हो चुकी है । मधेशी नेताओ ने तो आन्दोलन को आश्विन २४ को ही खत्म कर दिया । मगर मधेशी जनता के अपार साहस और धैर्य ने इसे न टूटने दिया न झुकने दिया और आन्दोलन को जारी रखा ।

rally birgnj
मगर एक शिकायत मधेशी जनता से भी करना ही पड़ेगा कि हम और हमारे पुर्खो ने विगत ६४ सालो से अपने हक और अधिकार के लिए करते आए सङ्घर्ष के बावजुद हम आज भी सड़क पर ही है और दश वर्ष जङ्गल से सङ्घर्ष करने वाले माओवादी लगायत के पार्टी को सफलता क्यों मिल जाती है ? राजनीतिक दावपेच में पीछे पड़ जाने के बावजुद भी आन्दोलन के मुद्दो पर खस पहाड़ी पार्टिया क्यों जीत हासिल कर लेती है ? हम और हमारे पुर्खे लड़ते रहे, लड़ रहे हंै, लेकिन हाथ में आ गया जीरो । आखिर ऐसा क्यों ?

कुछ दिनो पूर्व डा. सि. के राउत ने सामजिक सन्जाल पर हम और हमारे आन्दोलन पर गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए एक सुझाव भी उन्होने देने की कोशिश की है । उनका अध्ययन और विश्लेषण यह है कि मधेशी जनता संसार के लगभग सब से पीड़ित, संघर्षशील, आन्दोलित और सक्रिय रहे है । मगर वे चेतनाशून्य प्रयास रहने के कारण आज भी सड़क पर ही एक ही मुद्दा को लेकर आन्दोलन मे सक्रिय है । चिन्तनशील आज भी नहीं दिख रही है । संघर्ष खूब किया, शहादत बहुतों ने दी, बर्बादी खर्बो की हुई, भविष्य पुस्तों की मिट गयी, पहचान, सम्मान और अरमान दिन प्रति दिन खिसकता रहा । लेकिन न हमारे पुर्खो ने , न तो हमने उनके कारण ढूँढ पाए । बस लड़ते गए, मरते और अपनी सारी चीज गँवाते गए । सोच ही नहीं पाए हम, न हमें सोचने दिया गया न तो हमारे नाम पर लड़ने का नाटक करने वाले बहुसंख्यक नेताआें ने सोचा और हमारे शहादत पर मस्ती की, पैसे कमाए, महल खड़ा किए, परिवार के लोगों को विदेश के यूनिवर्सि्टियो में दाखिला करवाए और बच्चों को विदेश में डालर में तथा अपने मधेश के नाम पर कमाई कर के आलिशान जिन्दगी जीने का उपाय निकाल लिए । हम लड रहे है, मर रहे है और आन्दोलन मे सकृय है, मगर चेतना नही है कि हम क्यू और किस लिए यह सब कर तहे है । मिल क्या रहा है और एक ही मुद्दे पर बार बार क्यू लड़ रहे है ? इसका कोई और विकल्प भी है या नही ता कि उसी मुद्दे पर फिर से कभी लडना न पडे ।

मधेशी दलों को तो अपने को भाग्यशाली मानना चाहिए कि जो काम उसे करने में अकल्पनीय कोशिश करनी पड़ती, उसे किसी अज्ञात शक्ति ने चुटकी में ही आसान कर दिया है । वह शक्ति भी इसी आशा में है कि मधेशियों का यह आन्दोलन अन्तिम हो । अब के बाद मधेश में आन्दोलन विकास का हो, उन्नति का हो, भाईचारे का हो, मेल मिलाप का हो और मधेश के सम्पूर्ण कल्याण का हो ।

मधेश में जब जब अधिकार प्राप्ति के लिए मधेशियों ने आवाज उठायी, राज्य मे अपनी सहभागिता के लिए राज्य से मांग की तो उन सारे आन्दोलनों को भारतीय आन्दोलन, भारतीय चलखेल, भारतीय घुुसपैठ कहा गया । उधर वेचारा भारत कुछ करे तो भी गाली, ना करे तो भी गाली दशको से सुनती आ रही है । दवा खाओ तो भारत से, दुख में पहले सहयोग करे तो भारत करे, राजनीतिक नेता बना दे तो भारत, दूतावास के जरिए नेपालियों को डाक्टर इन्जीनियर, पाइलट बना दे तो भारत, चुनाव मे अर्बो रूपए दे तो भारत, तेल दे तो भारत, खाना दे तो भारत, सब भारत कर दे तो भी भारत और भारतीय सरकार नेपाल विरोधी, मानो नेपाल एक शक्तिशाली राष्ट्र हो, जिससे भारत डर रहा हो या नेपाल इतना सम्पन्न राष्ट्र कि इसके सम्पन्नता से भारत कुछ हड़पना चाहता हो ।

मधेश आन्दोलन के क्रम में जब भारतीय नाका बन्द हुआ तो नेपालियो का नमक हरामीपना फिर से जग गया और सारा दोष भारत पर लगा डाला कि यह सब भारत ने ही किया है । भारत इस बात को कई बार स्पष्ट किया है कि नेपाल अपने आन्तरिक मामले को सलटाए ताकि उसके नेपाल प्रवेश करने वाले जन और धन की क्षति न हो पाए । वैसे भी नेपाली राज्य और इसके कुछ नापाक इरादे तथा मधेश और भारत दोनो विरोधी लोगो का कहना है कि नेपाल के आन्तरिक मामले में भारत दखल ना दे । समान्य रूप में ही समझने वाली बात यह है कि भारत इसके आन्तरिक मामले मे हस्तक्षेप क्यों करेगा ? लेकिन यह भी बात सत्य है और तय है कि किसी पड़ोसी के घर में आग लग जाए तो दूसरा पड़ोसी उससे पूछकर आग पर पानी डालने आएगा क्या ? अगर वो नही पहुँचा तो उसके भी दीवार जलेंगे छत ढहेगी और हो सके कि कहीं उसके भी घर मे भी न वो आकर कब्जा जमा दे । और वैसे हालत मे भारत ही नही, दुनिया की हर देश अपना नैतिक काम करेगी, और इसलिए तो पड़ोसियो की आवश्यकता होती है, संयुक्त राष्ट्रसंघ बनाए गए है ।

भारत के खिलाफ अपने से तो कोई प्रमाण जुटा नहीं पाए नेपाली सरकार ने । शंका ही शंका के घेरे मे उसने भारत विरोधी शब्द और क्रिया कलापाें का इस्तेमाल किया और भारत जब हल्का सा गम्भीर हुआ तो अपने दोहरे चरीत्र को दोहराते हुए चीन का धाक दिखाना शुरू कर डाला । चीन से तेल लाने का, चीन का नाका खोलने का, हावाइ मार्ग से ही तेल व्यवस्था करने का, अन्य देश से तेल आदि मंगवाने का, भारत के विरुद्ध अन्तर्‍राष्ट्रीय अदालते मुद्दा चलाने का जैसा बात कर डाला और भारत चुपचाप है इस प्रतिक्षा में है कि नेपाली सरकार मधेशियो के साथ बार्ता कर नाका खुलबाने मे सहयोग करे ।

चीन का धाक दिखाने वाले नेपाली चरित्र को चीन भी बखुबी जानता है कि नेपालियो का कोई धर्म नही है । इसका धर्म सिर्फ व सिर्फ कभी गरीबी के नाम पर तो कभी प्रकृति के नाम पर, तो कभी बुद्ध के नाम पर, तो कभी विकास के नाम पर तो कभी विपदा के नाम पर यह सिर्फ लेने का काम ही करता है । न यह भारत के स्वच्छ मित्र है न चीन का । यह सिर्फ विभिन्न बहानो में ठगने वाले भिखारी मित्र है, जो नाशा मे ही स्वाभिमानी नेपाली है । चीन यह भी जानता है कि भारत और चीन के बीच मे नेपाल हमेशा चाहता रहता है कि अनबन होता रहे ताकि दोनो से इसे लाभ होता रहे । भारत और चीन दोनो शक्तिशाली और सम्पन्न राष्ट्र है जो मधेश के लिए गर्व साबित हो सकता है । दोनो के बीच एक हार्दिक आवश्यक है । दोनो की शक्ति समान रूप से बढ़े और दोनो के मित्रता से दक्षिण एशिया लगायत के देशो मे भी विकास की लहर दौड़े, मधेश हमेशा यही चाहेगा ।
“नेपाली उपनिवेश का अन्त हो, मधेश देश स्वतन्त्र हो ।“

 

Loading...