नेपाल पर क्या है मोदी की ‘मन का बात’?

नेपाल में नए संविधान के लागू किए जाने के एक दिन बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है. प्रधानमंत्री के ट्विटर अकाउंट से उनके ‘मन की बात’ कार्यक्रम के बारे में तो ट्वीट किया गया पर नेपाल के लोगों को अब तक उन्होंने अपने मन की बात नहीं कही है.

हालांकि सरकार की तरफ़ से विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बयान ज़रूर जारी किया और कहा, “हमने इसका संज्ञान ले लिया है कि नेपाल ने एक संविधान अपनाया है पर हमें चिंता है कि भारत की सीमा से जुड़े इलाकों में हिंसा भड़की हुई है.” बयान में ये भी जताया गया कि नेपाल के संविधान बनाने की प्रक्रिया में भारत ने हमेशा ‘समावेशी संविधान’ बनाने का समर्थन किया है.

पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार नेपाल गए और दोनों बार इस बात पर बल दिया कि संविधान की रचना सभी अल्पसंख्यकों के हित ध्यान में रखकर ही की जानी चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर के मुताबिक रविवार की संविधान की घोषणा के बाद भारत ‘ठगा’ सा महसूस कर रहा है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “अपनी यात्राओं में प्रधानमंत्री मोदी ने सीधा नेपाल के लोगों से बात की और कहा कि संविधान बहुसंख्यकों द्वारा नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों की सहमति से बनना चाहिए. इस साल अगस्त में उन्होंने प्रधानमंत्री कोयराला से फोन पर मधेशी समुदाय के हितों के बारे में बात की थी.”

सुशील कोयराला, नेपाल के प्रधानमंत्री
सुशील कोयराला, नेपाल के प्रधानमंत्री

भारत सिर्फ़ पड़ोसी नहीं

नेपाल के राजनीतिक इतिहास में भारत का बड़ा दख़ल रहा है. एक पड़ोसी देश से कहीं आगे बढ़कर भारत ने नेपाल के दस साल चले गृह युद्ध को ख़त्म करने की शांति प्रक्रिया में भूमिका निभाई थी.

पिछले डेढ़ साल से संविधान रचने की प्रक्रिया में भारत लगातार सभी अल्पसंख्यकों के हितों को ध्यान में रखते हुए एक समावेशी संविधान अपनाने की वकालत करता रहा है.

इसी के मद्दे-नज़र भारत के विदेश सचिव एस.जयशंकर शुक्रवार को नेपाल गए और रविवार को काठमांडू में भारत के राजदूत रंजीत रे ने नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोयराला से बातचीत की.

नेपाल की राजनीतिक उथल-पुथल पर किताब, ‘बैटल्स ऑफ़ द न्यू रिपब्लिक’ लिखने वाले प्रशांत झा के मुताबिक भारत अपनी सीमा में रहते हुए नेपाली जनता के हितों की बात कर रहा है.

उन्होंने कहा, “तराई, थारू और कुछ जनजाति के लोग एक महीने से प्रदर्शन कर रहें हैं, उनका कहना है कि नए संविधान में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है और प्रांतों का बंटवारा भी उनके हक़ में नहीं है.”

वो आनेवाले समय को भारत-नेपाल रिश्तों के लिए ‘जटिल समय’ बताते हैं.

नेपाल में हिंसाImage copyrightAFP
नेपाल में हिंसा

हिंसा का डर

रविवार को नेपाल में संघवाद और धर्मनिरपेक्षता को अपनाने वाले संविधान के लागू होने से पहले से ही नेपाल के दक्षिणी और पश्चिमी तराई इलाकों में विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं और हिंसक झड़पों में 40 लोगों की मौत हो गई है.

दक्षिण-एशिया मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर एस.डी.मुनि के मुताबिक भारत की नाराज़गी की सबसे बड़ी वजह यही है कि ये संविधान ‘समावेशी’ नहीं है और इससे कई अल्पसंख्यक खुश नहीं है.

बीबीसी से बातचीत में प्रोफ़ेसर मुनि ने कहा, “नेपाल के तराई इलाकों में जो हिंसा भड़की है उसका असर भारत पर भी हो सकता है, बिहार में चुनाव होनेवाले हैं, ऐसे में सीमा के दोनों ओर से माहौल ख़राब करन की कोशिशें की जा सकती हैं, और इससे सबसे मोदी जी की नेपाल पॉलिसी पर सवाल उठने लगेंगे.”

नेपाल की क़रीब 1712 किलोमीटर लंबी सीमा भारत से जुड़ती है. तराई के लोगों का भारत में बहुत आना-जाना है, सीमापार शादियां और रिश्तेदारी भी आम हैं.

प्रशांत झा कहते हैं, “इस पूरे मुद्दे पर सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी नेपाल की है, जैसे ही काठमांडू और तराई का संबंध सुधरेगा वैसे ही दिल्ली भी संतुष्ट हो जाएगा.”

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भारत पर निर्भरता

नेपाल के नए संविधान से देश के कुछ तबकों में खुशी भी है. इसे एक बड़ी कामयाबी के रूप में भी देखा जा रहा है. क़रीब 240 साल तक नेपाल में राजशाही के बाद साल 2008 में माओवादियों ने चुनाव जीता था पर नया संविधान रचने पर सहमति नहीं बन पाई.

हालांकि जानकारों का दावा है कि इस संविधान की रचना में तराई के लोगों को साथ नहीं लिया गया, बल्कि तीन बड़ी पार्टियों ने आपस में मिलकर ये काम किया.

तो क्या भारत, नेपाल को उसके संविधान में संशोधन लाने पर मजबूर कर पाएगा?

प्रोफ़ेसर एस.डी.मुनि के मुताबिक, “चीन चाहे जितना निवेष कर ले, अगर नेपाल के लोग सचमुच विकास करना चाहता है तो भारत की मदद लेनी ही होगी, इसलिए इस व़क्त भारत की नाराज़गी को ध्यान में लेना होगा और नेपाल को कुछ ना कुछ उस तरफ़ करना पड़ेगा.”

वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर मानती हैं कि लगातार हो रही हिंसा से नेपाल के व्यापार पर भी असर पड़ा है. नेपाल की सीमा का बड़ा हिस्सा भारत से जुड़ता है और व्यापार के लिए भारत पर उसकी निर्भरता सरकार को संविधान में संशोधन जैसे कुछ फैसले लेने पर मजबूर कर सकती है.

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