नेपाल–भारत बनते–बिगड़ते रिश्ते

प्रो. नवीन मिश्रा :साल २०१४ में प्रधानमन्त्री पद की शपथ लेने के साथ ही नरेन्द्र मोदी ने भारत की विदेश नीति, खासकर दक्षिण एशियाई देशों के साथ भारत के रिश्तों के सन्दर्भ में अपनी नीति और प्राथमिकता साफ कर दी थी । पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को नई उचाईयों पर ले जाने के लिए इस वर्ष उन्होंने खूब कोशिशें की है । वर्ष २०१५ की सबसे बड़Þी उपलब्धि बीबीआईएन यानी बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल के बीच हुआ मोटर वाहन समझौता है । इस समझौते के तहत इन चारों मुल्कों के बीच यात्री, निजी व कागों वाहनों की निर्वाध आवाजाही की सुविधा बढ़ेगी । हालांकि इसकी राह में एक अड़चन नेपाल की तरफ से आ सकती है ।

मधेशी नेताओं के भारतीय विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज से मिलने के बाद नेपाल के मौजूदा संकट का तुरंत कोई हल तो नहीं निकला, लेकिन इसके दूरगामी समाधान में मदद जरुर मिलेगी । मधेशी नेता जनता दल (यू) नेता शरद यादव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता डी.पी त्रिपाठी समेत अनेक पार्टियों के नेताओं से भी मिले थे । इसके पहले नेपाल के उपप्रधानमन्त्री कमल थापा भारत आकर सुषमा स्वराज व कई अन्य नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाल के मुद्दे पर बातचीत और चर्चा का दौर शुरु हुआ । नेपाल में संकट गहराने की एक बड़ी वजह यह थी कि भारत और नेपाल के बीच सम्वाद के सूत्र टूट गए थे, जबकि उस दौर में नेपाल के नए संविधान को अन्तिम रूप देने और उस पर राजनीतिक सहमति बनाने का काम चल रहा था । भारतीय विदेश सचिव एस जयशंकर नेपाल गए भी, तब तक देर हो चुकी थी ।
दरअसल, २०१५ में उम्मीद यही थी कि नेपाल के साथ भारत के रिश्ते और बेहतर होंगे । मगर उसमें बड़ी दरार यहाँ के संविधान को लेकर पैदा हो गई है । भारत अपने पड़ोसियों के साथ जब अपेक्षाकृत अधिक उदारवादी नीति अपनाता है, तो उन्हें शायद यह गलतफहमी हो जाती है कि वे कुछ भी अपनी मनमर्जी करेंगे और भारत कोई प्रतिक्रिया नहीं देगा । नेपाल के साथ यही हुआ है । भारत की गुजारिश सिर्फ यही थी कि वहाँ मधेशियों की जो विशाल आवादी है, उन्हें वह देश की मुख्यधार में मिलाए और संविधान बनाते हुए उनकी मांगों पर ध्यान दें । मगर नेपाल की मुख्य राजनीतिक पार्टियों ने जिनका मधेश से उतना जुड़ाव नहीं है, आपस मे मिलकर संविधान पारित कर लिया । इस घटना का मधेश पर पड़े प्रभाव के कारण सम्पूर्ण मधेश आन्दोलित हो गया और इस कारण भारत–नेपाल सम्बन्ध काफी प्रभावित हुए । आरोप यह भी लगा कि नई दिल्ली ने अनधिकृत रूप से नाकेबन्दी कर दी है । मगर यह अपेक्षा करना कि सीमा के नजदीक नेपाली क्षेत्रों में जाकर भारत स्थिति सम्भालेगा, गलत होगा । इसके अलावा, चूंकि सुरक्षा के लिहाज से नेपाल के सीमवर्ती क्षेत्र भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं, और श्रीलंका का सबक भी भारत भूला नहीं है । इसलिए भारत ने नेपाल में तमाम कोशिशें की । अच्छी बात यह रही कि इससे नेपाल की वह गलतफहमी भी टूट गई कि भारत से रिश्ते तोड़कर वह चीन के करीब जा सकता है ।
मधेशी नेताओं के भारतीय विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज से मिलने के बाद नेपाल के मौजूदा संकट का तुरंत कोई हल तो नहीं निकला, लेकिन इसके दूरगामी समाधान में मदद जरुर मिलेगी । मधेशी नेता जनता दल (यू) नेता शरद यादव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता डी.पी त्रिपाठी समेत अनेक पार्टियों के नेताओं से भी मिले थे । इसके पहले नेपाल के उपप्रधानमन्त्री कमल थापा भारत आकर सुषमा स्वराज व कई अन्य नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाल के मुद्दे पर बातचीत और चर्चा का दौर शुरु हुआ । नेपाल में संकट गहराने की एक बड़ी वजह यह थी कि भारत और नेपाल के बीच सम्वाद के सूत्र टूट गए थे, जबकि उस दौर में नेपाल के नए संविधान को अन्तिम रूप देने और उस पर राजनीतिक सहमति बनाने का काम चल रहा था । भारतीय विदेश सचिव एस जयशंकर नेपाल गए भी, तब तक देर हो चुकी थी । और संविधान को अन्तिम रूप दे दिया गया था, जिसमें कई विवादास्पद प्रावधान थे । इसीलिए उसके खिलाफ मधेशियों ने आन्दोलन छेड़ दिया । इस आन्दोलन की वजह से और नेपाल को भारत से जरुरी वस्तुओं की आपूर्ति बन्द होने से नेपाल और भारत के सम्बन्धों में इतनी कड़वाहट आ गई, जितनी पहले कभी नहीं आई थी ।
फिलहाल मधेशी नेताओं की रणनीति यह है कि संविधान पर बातचीत होने और किसी ठोस नतीजे पर पहुँचने के पहले आन्दोलन को धीमा न किया जाए । शायद उन्हेंं डर है कि अगर आन्दोलन धीमा पड़ा, तो बातचीत और सौदेबाजी में उनका पक्ष कमजोर हो जाएगा और तब जो पहाड़ी नेता तराई में रहने वाले मधेशियों के खिलाफ हैं, वे उनकी मांगें स्वीकार नहीं होने देंगे । मधेशियों की बुनियादी मांग यही है कि संविधान में उन्हें राजनीतिक रूप से बराबरी हासिल हो । मधेशियों की आबादी नेपाल की जनसंख्या में लगभग आधी है, लेकिन संविधान में ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे पहाड़ी क्षेत्र के नेपालियों के मुकाबले उनकी राजनीतिक शक्ति लगभग आधी रह जाएगी । नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में भारत विरोधी भावनाएं भड़काने के लिए मधेशी आन्दोलन का इस्तेमाल किया जा रहा है । भारत की ओर से जरुरी वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा पड़ने से आम जनता को जो समस्या हो रही है, उसे भारत विरोधी प्रचार का आधार बनाया गया है और चीन से नजदीकियां बढ़ाकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश पहाड़ी नेता कर रहे हैं । इसके बावजूद नेपाल का राजनीतिक नेतृत्व यह समझता है कि चीन, भारत का विकल्प नहीं हो सकता । भारत और नेपाल के बीच जैसे सहज भौगोलिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक तारतम्य है, वैसा चीन के साथ तकरीबन नामुकिन है । नेपाल का नेतृत्व यह समझ रहा है कि मधेशियों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखने से नेपाल में स्थायित्व नहीं आ सकता और भारत से खराब रिश्ते बनाए रखना भी नेपाल के हित में नहीं है । नेपाली राजनीतिक समुदाय के भारत से काफी पुराने वह गहरे सम्बन्ध है । इसलिए यह जरुरी है कि भारत के राजनीतिक और राजनयिक नेतृत्व में बिना किसी भेदभाव के जो भी नेता नेपाली नेताओं से संवाद कायम कर सकते हैं, उन्हें संकट सुलझाने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए । सुषमा स्वराज के भी तमाम राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से अच्छे रिश्ते हैं, इसलिए उनकी सक्रियता इस सिलसिले में महत्वपूर्ण है । मधेशी नेताओं को नैतिक समर्थन देने के अलावा नेपाली समाज के दूसरे तबकों से भी संवाद स्थापित करना जरुरी है ।
भारतीय संसद में भी नेपाल–भारत सम्बन्ध के विषय में भरपूर चर्चा हुई । सांसदों ने सरकार से अनेक सवाल पूछे । भारतीय सरकार नेपाल में चतुराई दिखाना चाहती है या समझदारी ? तात्कालिक विजय हासिल करना चाहती है या दीर्घकालिक दोस्ती ? नैतिक प्रभाव चाहती है या राजनीतिक बढावा ? सरकार की ओर से जवाब देते हुए विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज ने बड़े ही नपे तुले शब्दों में भारत–नेपाल सम्बन्ध की बेहतरी की दुहाई दी । नेपाल के संकट के बारे में उन्होंने अपनी पीड़ा दर्शाई और इस घड़ी में नेपाल की जनता ने मदद करने की तत्परता जाहिर की । नेपाल में संवैधानिक विवाद के परिणामस्वरूप उपजे संकट को नेपाल का आन्तरिक मामला बताया, लेकिन यह इशारा भी कर दिया कि मधेशियों की मांगें जायज हैं और नेपाल सरकार को इस मामले को हल करने की कोशिश करनी चाहिए । विदेश मन्त्री ने सीमा पर चल रहे गतिरोध के विषय में कहा कि सीमाबन्दी तो मधेशी कर रहे हैं, हम क्या कर सकते हैं । विदेश मन्त्री आधे घण्टे तक बोली लेकिन यह नहीं बताया कि उनकी सरकार करने क्या जा रही है ?
इतना तो अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि भारत सरकार को नेपाल का नयां संविधान पसन्द नहीं है । नेपाल के सत्ता समीकरण में मधेशियों को बेहतर हिस्सा देना होगा । मधेश नेपाल का एक पिछड़ा, गरीब और उपेक्षित इलाका है । मधेशियों की उपेक्षा की पीछे जातीय दुराग्रह है । नेपाल की सत्ता पहाड़ी ब्राह्मण–क्षेत्रीय और नेवाड़ी लोगों के हाथों में ही केन्द्रित रही है जबकि मधेश में भारतीय मूल के नागरिकों की बहुलता है । नेपाल के सत्ताधारियों ने मधेशियों के साथ भेदभाव किया है । नेपाल में लोकतन्त्र की स्थापना और संविधान निर्माण मधेशियों के लिए एक नई आशा लेकर आया था । उन्हें दोनों लोकतान्त्रिक चुनावों में सत्र का स्वाद भी चखने को मिला और उनके प्रतिनिधि सर्वोच्च पदों पर आसीन भी हुए । लोकतन्त्र के इस नतीजे को देखकर सत्तारुढ पहाड़ी वर्ग आशंकित हो गया । उसे ड़र लगा कि मधेशियों की जनसंख्या बढ़ती जाएगी और एक दिन वे अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएंगे । इसलिए नए संविधान का फायदा उठाकर पहाड़ी नेताओं ने जनसंख्या तक को अनदेखा करते हुए संसद में अपने बहुमत को सुनिश्चित कर लिया । दोनों पक्षों की चिंता वाजिब थी । ऐसे में जरुरत यह थी कि दूरगामी सोच और बड़े मन से दोनों पक्ष एक समझौता कर लेते । पहाड़ी नेताओं ने छोटा मन दिखाया तो मधेशी नेताओं ने आर पार की लड़ाई छेड़ दी । नेपाल सरकार ने मधेशी आन्दोलन का दमन किया और मानवअधिकारों का खुल्लमखुल्ला हनन किया । इस पर मधेशियों ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हुए भारत–नेपाल सीमा को बन्द कर दिया । सीमाबन्दी से पूरे नेपाल में त्राहित्राहि मची है । भारत सरकार कह रही है कि इस सीमाबन्दी से उसका कोई लेना देना नहीं है, लेकिन नेपाल सरकार यह मानने को तैयार नहीं है । एक बार फिर नेपाल के भीतर भारत को खलनायक की भूमिका में देखा जा रहा है और दोनों देशों का सदियों पुराना अनूठा सम्बन्ध खतरे में है ।

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