नेपाल भारत मैत्री संबन्ध
डा.नुतन ठाकुर

मैत्री सम्बन्ध चाहे दो व्यक्तियों के बीच हो या फिर दो देशों के बीच, वह प्रगाढÞ और आत्मीय तभी हो सकता है जब उनके बीच आपसी प्रेम-भाव और सौहार्द हो । परस्पर विश्वास और सहयोग की भावना हो और जब यही बातें दो पडोसी देशों के बीच हो तब तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि छोटे-मोटे स्वार्थों से ऊपर उठ कर एक दूसरे के प्रति सम्मान और उनके हितों को ध्यान में रखने की नीति को प्रधानता दी जाए । पडÞोसी देशों के बीच यदि मधुर सम्बन्ध न हो तो उसका खामियाजा अनावश्यक रुप से न सिर्फवहाँ की जनता को भुगतना पडÞता है बल्कि दोनों देशों की प्रगति में भी अवरोध उत्पन्न हो जाता है । वैसे भी कहते हैं ना कि मित्र तो हम अपनी मर्जी से चुन सकते है पर अपना पडÞोसी नहीं । और इस मामले में हमारा देश भारत सचमुत ही सौभाग्यशाली है । उसे नेपाल जैसा मैत्री संबंधों को निभाने वाला पडÞोसी देश मिला ।
वैसे तो भारत-नेपाल मैत्री संंबंध का बिना किसी अवरोध के इतने लंबे समय तक साथ रहने के पीछे कई वजह हो सकती है, पर मेरे नजरिये से तो इसकी एक प्रमुख वजह दोनों देशों के नागरिकों के लिए बिना किसी रोक-टोक और बंदिश के एक-दूसरे के देश में आने जाने के लिए अपनी-अपनी सीमाओं को खुला रखने की नीति है । इस नीति के फलस्वरुप ही दोनों देशो कें नागरिकों को एक-दूसरे की सभ्यता और संस्कृति को समझने का मौका मिला । यदि आप भारत-नेपाल सीमा के आस-पास के गाँव का दौरा करंे तो आप को कई सारे ऐसे भारतीय मिल जायेंगे जो रहते भारत में हैं और व्यापार नेपाल में करते हैं । उनके लिए यदि एक जगह उनकी मातृभूमि है तो दूसरी जगह उनकी कर्मभूमि । और कर्मभूमि का महत्व किसी भी प्रकार से मातृभूमि से कम नहीं होता । उनके लिए भारत और नेपाल का दो देश होना कोई मायने ही नहीं रखता । उनके लिए तो नेपाल और वहाँ के लोग भी उनके उतने ही अपने है, जितने कि भारत के ।
अगर मैं अपनी बात करुँ तो मुझे तो यही लगता है कि नेपाली होते ही ऐसी है, जो अपने कार्य, व्यवहार और आचरण द्वारा किसी को भी अपना बना ले । और यह बात मैं अपने अनुभव से कह सकती हूँ । आज से लगभग बीस-इक्कीस वर्षपर्ूव हमारे यहाँ कृष्णा नाम का एक नेपाली युवक काम की तलाश करते हुए आया था । उसकी उम्र तब लगभग पन्द्रह या सोलह वर्षरही होगी । उसके बारे में बिना कुछ ज्यादा पूछे मेरी माँ ने उसे काम पर रखने की हामी भर की । मेरी माँ के लिए तो नेपाली होना ही उसके चरित्र का प्रमाणपत्र था और इस प्रमाणपत्र के बाद उन्हें उसके बारे में और कोई जानकारी की जरुरत ही नहीं थी । अपनी मेहनत, लगन और्रर् इमानदारी की बदौलत वह हमारे परिवार के एक सदस्य की तरह हो गया यह पता ही नहीं चला । और जब वह वापस अपने घर जाने लगा तो उसकी आँखों में तो आँसू थे ही हमारी आँखें भी नम थी ।
अकसर वह यहाँ के जीवन की तुलना अपने गाँव के जीवन से करता था और काई बार तो दुखी हो कहा करता था कि यहाँ सभी चीजें बडेÞ आराम से मिल जाया करती हैं पर हमारे यहाँ पहाडÞों पर ऐसा नहीं है । कई बार तो नमक लाने में भी पूरा दिन निकल जाता है । रोज के जीवन का संर्घष्ा की कल्पना कर उत्साहित हो जाता कि अगर उसके गाँव तक भी सडÞक बन जाता तो जीवन कितना आसान हो जाता । इस बात को बीते अब काफी वक्त हो गया है । शायद अब तक उसका गाँव भी सडÞक से जुड चुका होगा । और उसके बच्चे अच्छी शिक्षा पा रहे होंगे ।
इतना जरूर है कि नेपाल के लोगों और वहाँ की संस्कृति के बारे में मेरा पहला परिचय कृष्णा के माध्यम से ही हुआ । वहाँ के लोग परिश्रमी और्रर् इमानदार होने के साथ-साथ इतने भावकु भी होते हैं यह बात मैं कृष्णा की वजह से ही जान पाई । बाद में तो फिर कई सारे नेपाली लोगों से मेरी मुलाकात हर्ुइ और उन सबो में भी मुझे काफी हद तक कृष्णा जैसे ही गुण मिले । शायद प्रकृति के ज्यादा करीब रहने की वजह से ही नेपाल के लोग ज्यादा सीधे, सच्चेर्,र् इमानदार और शांत प्रकृति के होते हैं ।
और अंत में यही कहुँगी कि कृष्णा भी नेपाल के पोखरा के किसी गाँव से भारत के बिहार प्रान्त की राजधानी पटना तक तभी आ पाया और उसकी गिनती हमारे परिवार के ही एक सदस्य के रुप में होने लगी, जब उसे यहाँ तक आने के लिए किसी पासपोर्ट और वीसा की जरुरत नहीं पडÞी, अन्यथा वह चाह कर भी भारत नहीं आ पाता । और फिर कृष्णा ही क्यों उसके जैसे अन्य तमाम लोग, जो नेपाल से भारत और भारत से नेपाल आ-जा पा रहे हैं शायद ही इतनी आसानी से आ-जा पा रहे होते और एक-दूसरे की सभ्यता व संस्कृति को समझ पा रहे होते । और यह सब तभी संभव हो पाया है, जब हमारी सीमाओं पर कोई कृत्रिम पहरा नहीं है । अपने मित्र और पडोसी देश में जाने के लिए वहाँ के लोगों को महीनों कागजी कारवाई नहीं पूरी करनी पडÞती है । और किसी भी पडÞोसी देश के लिए इससे बढÞकर उपलब्धि और क्या होगी ।
-(सामाजिक कार्यकर्त्री तथा कन्वेनर, नेशनल आरटीआई फोरम लखनऊ)

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