नेपाल-भारत सीमांचल पर जागृति नेपाल द्वारा द्विदिवसीय कार्यशाला

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वीरगंज, ब्यूरो न्यूज,14 फरवरी । ‘जागृति’ नेपाल की आयोजना में नेपाल–भारत सीमांचल के सम्बन्धों पर चार सत्रों में विभाजित द्विदिवसीय (१२–१३ फरवरी) कार्यशाला का आयोजन स्थानीय भिस्वा होटल में किया गया जिसके उद्घाटन सत्र के प्रमुख अतिथि भारत के राजदूत महामहिम रंजित रे थे । संस्था के कार्यकारी निदेशक एवं पूर्व राजदूत प्रो. विजयकान्त कर्ण की अध्यक्षता में सम्पन्न इस कार्यक्रम में अतिथि के रूप में माननीय प्रभु साह, तमलोपा अध्यक्ष श्री महंथ ठाकुर, सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष श्री राजेन्द्र महतो, भाजपा के बिहार (बेतिया) के सांसद डॉ. संजय जायसवाल, पटना कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य एवं वीपी कोइराला स्टडीज सेण्टर के निदेशक प्रो. डॉ. एन. के. चौधरी जैसे व्यक्तित्वों की उपस्थिति थी ।
कार्यक्रम का परिचय देते हुए ‘जागृति’ नेपाल के निदेशक श्री कर्ण ने कहा कि भारत और नेपाल का सामाजिक और सांसकृतिक सम्बन्ध इतना गहरा है कि इसे दोनों देशों की राजनीति निर्धारित नहीं कर सकती । इसके नियमन के लिए नीतियाँ यहाँ की जमीनी हकीकत और मनोविज्ञान के आधार पर बननी चाहिए ।

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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नेपाल में भारत के राजदूत श्री रे ने कहा कि नेपाल में स्थिरता और विकास भारत की प्राथमिकता है । इसलिए जनस्तर के सम्बन्धों को मजबूती विकास के आधार पर दी जानी चाहिए । विकास के लिए वातावरण आवश्यक है और इसका निर्माण करने का काम राजनीति का है । भारत यहाँ के विकास के लिए लिए हाइड्रोपावर और कनेक्टीविटी को आवश्यक मानता है और इस क्षेत्र में वह विभिन्न स्तरों पर काम कर रहा है । लेकिन उनसे असहमति जतलाते हुए प्रो. चौधरी ने कहा है कि भारत–नेपाल के रिश्ते आज सही दिशा में नहीं हैं । यह टर्निंग प्वाइंट पर है और भारत को यह निर्धारित करना है कि वह सम्बन्धों को किस ओर ले जाना चाहता है । इसके लिए सबसे आवश्यक है कि उसे डोमिनेंस से बचना होगा ।
इस सत्र को संबोधित करते हुए श्री महंथ ठाकुर ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच औपचारिक सम्बन्ध नहीं हैं । यह पारंपरिक और जनस्तर का आत्मीय सम्बनध है । कभी–कभी इसमें तनाव की अवस्था देखी जाती है । इसका मूल कारण है कि समस्या हमारी आन्तरिक होती है मगर इसे वाह्य बनाकर प्रस्तुत किया जाता है । हर राजनैतिक उतार–चढ़ावों के लिए भारत को जिम्मेवार ठहराया जाता है जो सही नहीं है । राष्ट्रीयता को एक निश्चित मापदण्ड में यहाँ देखा जाता है जिसके कारण इस क्षेत्र की समस्याओं को देखने का नजरिया बदल जाता है । इस कार्यक्रम में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए प्रो. लोकराज बराल ने कहा कि किसी न किसी रूप में राजनैतिक दलों और बुद्धिजीवियों में भी एक मतिभ्रम की अवस्था है जिसके कारण तथ्यों को वे समझ नहीं पाते कि शक्ति राष्ट्रों की आकांक्षा को कैसे समझी जाए और उनसे कैसे सार्थक संवाद किए जाएँ ।
मंतव्य रखने के क्रम में संघीय समाजवादी फोरम के उपाध्यक्ष श्री लालबाबु राउत ने कहा कि भारत के साथ हमारा सम्बन्ध तो ऐसा है कि हम जब विभिन्न कार्यों से भारत के किसी स्थान की यात्रा करते हैं तो हम उस विशेष की यात्रा करते हैं, न कि भारत की । इसलिए हमारी जो समस्याएँ हैं वे पूरी तरह सीमांचल की समस्याएँ हैं न कि दो देशों के बीच की । इसलिए स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर दोनों देशों के नागरिकों में संवाद होना चाहिए । इस अवसर पर बोलते हुए राजेन्द्र महतो ने कहा कि दोनों देशों की जनता का सम्बन्ध प्राकृतिक है, देश तो बाद में बना है । देश ने अपनी नीतियों से इस सम्बन्ध को घेरने की कोशिश की है जबकि इन नीतियों का प्रयोग जनता के हित में होना चाहिए । उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि दोनों देशों का सम्बन्ध विशेष है और इसे कायम रखने के लिए सहयोग भी विशेष होना चाहिए तथा इस सहयोग को स्वीकार करने के लिए राजनैतिक दृष्टि भी विशेष होनी चाहिए ।
इस पूरे सत्र में जो एक महत्वपूर्ण बात उभर कर सामने आयी कि दोनों देशों के नागरिकों का सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है और इसका नियमन करने के लिए राष्ट्रों को चाहिए कि नीतियाँ यहाँ रहने वाले लोगों के मनोविज्ञान को समझते हुए बननी चाहिए । सम्बन्धों में उतार–चढ़ाव सबकी चिन्ता का विषय था और इसके प्रति आमलोगों के भी जागरुक रहने की आवश्यकता वक्ताओं ने बतलाई ।।

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