नेपाल में कम्युनिस्टतन्त्र

रणधीर चौधरी:पाठकों से मेरा अनुरोध है कि कृपया “कम्युनिस्टतन्त्र” को किसी शब्दकोष में ढूँढने का प्रयास ना करें । क्योंकि यह तन्त्र अभी अपना प्रभाव बनाने में लगा हुआ है । सम्भवतः बहुत जल्द हीे हिंदी शब्दकोष में भी इसको स्थान मिल जायगा ।
नेपाल में भारत और चीन
भौगोलिक हिसाब से नेपाल दो शक्तिशाली (दक्षिण एसिया में) देश भारत और चीन के बीच अवस्थित हैै । परंतु मित्र राष्ट्र के अच्छे गुणों का प्रभाव नेपाल में बहुत कम देखने को मिल रहा है । सन्दर्भ राजा महेन्द्र के समय का हो या वर्तमान का । नेपाल में भारत ने अपना दबदबा बनाने की नीति को निरन्तरता दिया वहीं चीन हर दिन, हर पल नेपाल में कैसे कम्युनिस्ट का शासन हो पायेगा इसी सोच में डूबा रहता है । इस आलेख में भारत और चीन की नेपाल नीति के इतिहास पर चर्चा नहीं की जाएगी । परंतु वर्तमान परिस्थिति पर चर्चा की जाएगी ।
पिछले ६ दशकाें से संविधानसभा से संविधान बनाना नेपालियों का सपना था । अनेक उथल पुथल के बाद सेप्टेम्बर २० को संविधान लाया गया । उसी वक्त नेपाल की जनसंख्या दो हिस्साें में बँट चुकी थी । एक हिस्सा वो जो संविधान आने÷लाने की खुशी में दिवाली मना रहा था वहीं राज्य का एक बड़ा हिस्सा ब्लेक आउट कर मातम मना रहा था ।
संविधान निर्माण की इस “क्रोनोलोजी” के दौरान देखी गई एक जमीनी सच्चाई की चर्चा भी अन्दर अन्दर शुरु हो गई है । चर्चा है नेपाल मे अब कम्युनिस्ट शासन की शुरुआत होना । सपाट रूप में भले ही दिखाई ना देता हो परंतु एमाले और माओवादी द्वारा जीती गई सीट (कांग्रेस—१९६ और एमाले÷माओवादी—२५५ संविधानसभा २०१३ चुनाव परिणाम)े को एक साथ रख कर देखें, तो स्पष्ट है कि कम्युनिस्ट नेपाल मे संख्यात्मक रूप से हावी है । अब संख्यात्मक और प्रभाव के हिसाब से मजबूती प्रदान करने के लिये खडग प्रशाद शर्मा ओली और पुष्पकमल का प्रचंड समीकरण दिखाई दे रहा है । रातों रात ओली और प्रचंड जो की एक दूसरे को बीमार और आतंकवादी की संज्ञा देने मे जुटे रहते थे आज पार्टी एकीकरण के प्रयास में लगे दिखते हैं । खैर…।
नेपाल मे कम्युनिस्टिक इभोलिउसन
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना सन् १९४९ में हुई थी । जिसके प्रथम महाधिवेशन से नया जनवादी क्रान्ति की धार स्थापना की गयी, १९५१ में । फिर दूसरे तीसरे अधिवेशन के बाद पार्टी गुटों में तब्दील हो गया । उसी गुट का एक खेमा था “झापा ग्रुप” तथा माले (मण्डले भी उसी का कहा जाता था÷है) जिसने वर्ग शत्रु खत्म करने के नाम पर गोरिल्ला संघर्ष की शुरुआत की थी, सन १९७२ में । आज का एमाले उसी ग्रुप का विस्तृत रूप है ।
फिर सन १९९६ में नेकपा (माओवादी) समूह ने एक दशक तक सशस्त्र संघर्ष किया और २००६ मे १२ सूत्रीय सम्झौते के बाद नेपाली मूलधार की राजनीति में शामिल हुआ ।
भले ही नेपाल में रहे कम्युनिस्ट का सिद्घान्त दुनिया के किसी भी अन्य कम्युनिस्टों से मेल न खाता हा,े यहाँ तक कि चीन से भी नहीं । परंतु कुछ जानिफकारों के अनुसार चीन को पूर्ण विश्वास है कि अगर नेपाल में हरेक कम्युनिस्ट पार्टी एक जुट हो जाता है तो विश्व के कम्युनिस्ट राष्ट्रों की संख्या मे बढ़ोतरी होगी । आमतौर पर पर्दे के पीछे से प्ले करने वाला देश चीन कुछ ज्यादा ही चिन्तित और दौड़ धूप में लग जाते हैं जब माओवादी पार्टी पर किसी भी प्रकार की दरार दिखाई देती है । और इस चीज को बयाँ करता है बाबुराम भट्टराई द्वारा पार्टी त्याग के कुछ दिन बाद ही नेपाल के लिये चीनियाँ राजदुत ऊ चिन्ताइ का बुधनगर दौरा । जी हाँ नेपाली छापा को आधार माना जाय तो ऊ चिन्ताइ ने बानेश्वर बुधनगर स्थित वैद्य माओवादी पार्टी दफतर में जा कर रामबहादुर थापा और देव गुरुङ से प्रश्न किया था— अब बाबुराम कम्युनिस्ट पार्टी गठन करेगा या गैर कम्युन्स्टि ? चीन की यह खुली लॉबी बहुत कुछ बयाँ करती है । भारत को सीधा वाइकट तभी कोई कर सकता है जब नेपाल में कोई दूसरा वैकल्पिक पावर दिखे । वर्तमान समय में जिस तरह भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश सचिब एस जयशंकर के प्रस्तावों को अनसुना किया गया उससे और स्पष्ट होता है कि नेपाल अब प्रजातांत्रिक देश भारत का विकल्प खोज रहा है नेपाल के शक्तिशाली मित्र राष्ट्र के रूप में ।
मधेश और दसगजा
मधेश के हरेक एजेन्डे को भारत के एजेन्डे से जोड़ कर देखना बहुत बड़ी विडम्बना है जो नेपाली शासकों का मधेस के प्रति के नजरिया को बयाँ करता है । हाँ इस बात को कदापि नहीं नकारा जा सकता है कि नेपाल (खास कर दक्षिणी भाग) और भारत के बीच रोटी–बेटी का सम्बन्ध है । मै ंयहाँ पर एक एनेकडट (उपाख्यान) रखना उचित समझता हूँ । बात है सेप्टेम्बर ३० की मैं महोत्तरी में था । प्रहरी द्वारा चलाई गई गोली से ६ लोगों की मौत हुई थी, महोत्तरी में । उसी क्रम में रामविवेक यादव के गाँव महोत्तरी जाने के क्रम में परिकौली में आयोजित की गई एक श्रद्घांजली सभा में भाग लेने का मौका मिला था । उसी क्रम में ३ साल के एक बालक का एक्सप्रेशन सुन के चकित रह गया । साढ़े तीन वर्ष का अम्बिकेश झा अपने परिवारजनों से कह रहा था आब पुलिसबा बन्दुक ल क एतौ त सब गोटे हमरा गाम प इंडिया चलि है (अब अगर पुलिस बंदुक ले कर गाँव में आता है तो सब लोग मेरे गाँव चलना, जो कि भारत में है ) । यह एनेकडट मधेश और भारत के बीच रहे ममतामय सम्बन्ध को प्रमाणित करता है ।
संविधान में अपना एसपिरेसन न लिखने के बाद मधेशी मोर्चा ने नेपाल भारत के बीच के दसगजा पर बैठ कर काठमाण्डौ में नाकाबंदी लगाने का निर्णय लिया । परिणामस्वरूप काठमाण्डौ खौल उठा और मधेशी आन्दोलन को भारत का आन्दोलन कह कर प्रचारबाजी में लग गया । भारत अघोषित नाकाबंदी कर के मधेशियो को सहयोग कर रहा है यह नेपाल के पढ़े लिखे लोग कह रहे हंै । इस तर्क को भारतीय राजदुत रंजित राय ने यह कह कर खंडन किया कि भारत कभी भी किसी खास समुदाय के लिये अपनी कूटनीति तैयार नहीं करता । यह महज सिर्फ डिपलोमेटिक बयान नहीं है बल्कि एक सच्चाई है । मुझे डर लगता है । हमारे मधेशी नेता लोग कहीं भारतमुखी न हो जाय । मेरा मानना है कि आज अगर मधेशियो का आंदोलन पिक पे नहीं रहता तो शायद भारत को भी प्ले करने की जगह नहीं मिलती ।
नेपाल में बढ़ रही कम्युनिस्ट के रफ्तार को भारत जरुर रोकना चाहेगा । चल रहा मधेश आन्दोलन भारत के लिये भी उपयोगी है÷हो सकता है ।
मधेश में चल रहे आन्दोलन को अनदेखा करना । सर और सीने में जो राज्य के तरफ से गोली चलायी जा रही है दुनिया इसे करीब से देख रही है और इस से पता चलता है नेपाल के नेताओ में मानवता की कमी है । ये लोग अभी तक जनप्रतिनिधि नहीं हो पाए हंै । इसी सन्दर्भ मे मुझे एक पुराने गीत की पंक्ति याद आ रही है— वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे…
पर यहाँ के सन्दर्भ में तो—
जनप्रतिनिधि तेने कहिये, जो पीर पराई जाने रे…पर दुखे उपकार करे, ते मन अभिमान न आने रे…

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