नेपाल में खसवादियों की सदियों की तानाशाही

मनुष्य के लिए दासत्व या गुलामी से बड़ा कोई कलंक नहीं होता है

वो स्वतंत्र जन्म लेता है और स्वतंत्र ही मरना चाहता है ।

त्रिभुवन सिंह :आज विश्व भर में जहाँ लोकतंत्र के स्तम्भ को मजबूत बनाने के लिए एकतंत्रीय तानाशाही व्यवस्था को पूरी तरह से नेस्तनाबूत किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर नेपाल में खसवादी नेपाली शासक तानाशाहों ने पूरे नेपाल को मुट्ठी में कर रखा है और अपनी तानाशाही के बलबूते पर देश पर अपनी सत्ता को कायम रखना चाहते हैं । वो भूल रहे हैं कि तानाशाही का अस्तित्व कभी भी लम्बे समय तक नहीं रहा है । वह भी अपने अस्तित्व को खोता है, भले ही उसमें वक्त लगे, क्योंकि जब जनता जग जाती है और अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो जाती ही तो उसे लम्बे समय तक रोका या दबाया नहीं जा सकता है ।
जब हम नेपाल के इतिहास की ओर अपनी दृष्टि दौड़ाते हैं और शासकों की तानाशाही पर विचार करते हैं, तो अब तक का इतिहास यही बताता है कि यह तानाशाही किसी एक व्यक्ति या कई समुदाय की नहीं है बल्कि इसके पीछे सिर्फ एक समुदाय है और उसी के वर्चस्व हम को पाते हैं । हमारे नेपाल के इतिहास में शासकों के रूप में सदियों से एक जातीय समुदाय का ही वर्चस्व रहा है । लिच्छवि काल में लिच्छवियों की, किरात काल में किरातियों की, शाहवंश काल में शाहवंशियों की और प्रजातंत्र काल में खसवादियों की । ये नेपाल के लिए बडेÞ दुर्भाग्य की बात है ये ब्राह्मण खसवादी अपनी करिश्माई नेतृत्व के बदौलत आजतक नेपाल को अपने इशारों पर नचाते आए हैं और इतना ही नहीं अपनी स्वार्थी नीतियों की बदौलत खुद को वो सबसे ऊपर और सर्वोपरि मानते आए हैं ।
आज के नेपाल की अभी जो अवस्था है, वो खसवादी ब्राह्मणों की अपनी स्वार्थपूर्ण नीतियों का परिणाम है । नेपाल में जितने भी शासकों ने शासन किया है उस सबने मधेशी समुदाय की सदियों से उपेक्षा की है । समावेशी संविधान के नाम पर मधेशियों का हक अधिकार सब छीन लिया गया है । देश में चारो ओर त्राहि त्राहि मचा हुई है, अशांति है, लाशों के ढेर लगे हुए हैं और यह हम सभी जानते हैं कि जहाँ अशांति है, वहाँ प्रगति कभी नहीं होती है । भ्रष्टाचार, अत्याचार, बेरोजगारी और महिला हिंसा सीमा लाँघ चुकी है । देश विभिन्न समुदायों में बँट चुका है, साम्प्रदायिकता ने जड़ पकड़ लिया है । द्वेष–विद्वेष की भावना हर दिलों में जन्म ले चुकी है । ये खसवादी शासक तानाशाही और अधर्म के मार्ग पर चल चुके हैं । नैतिकता के लिए आज की राजनीति में कोई जगह ही नहीं रह गई है । आज के वर्तमान नेपाल को देखकर गणतंत्र देश जर्मनी की याद आ रही है । लगभग दो सौ पाँच वर्ष पहले जर्मन भी इसी अवस्था से गुजर रहा था जिस अवस्था से आज नेपाल गुजर रहा है । सन् १९०७ के उपरांत ही जर्मन में साम्यवादियों और यहुदियों ने सबके अधिकार को छीन कर अपना वर्चस्व कायम किया था । ठीक इसी तरह जिस तरह से हमारे नेपाल में इन खसवादियों ब्राह्मण ने जमाया है । जर्मन में भी इसी तरह जातीय विभेद अशांति, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अत्याचार व्यापक रुप में व्याप्त था । आम जनता बदहाल थी । उनकी हालत बद से बदतर होती जा रही थी ।
इसी बीच जर्मन के इतिहास में एक नया नाम सामने आया एडोल्फ हिटलर का । सन् १०३३ के दौरान एडोल्फ हिटलर ने सत्ता कब्जा किया और इसी के साथ शुरु हुआ यहूदियों के नरसंहार का सिलसिला । जब भी तानशाही शब्द सामने आता है तो उसके साथ हिटलर का नाम स्वतः जुड़ जाता है । तानाशाह और हिटलर ये दोनों शब्द एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं । दुनिया हिटलर को तानाशाह के रूप में जानती है, पर आज के जर्मन की जो रुपरेखा है उसमें हिटलर का महत्वपूर्ण योगदान है । आज नेपाल की जो अवस्था है, उसमें तानाशाही तो है किन्तु हिटलर के जैसा व्यक्तित्व नहीं जिसने जर्मन के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । जिसकी वजह से आज विश्वपटल पर जर्मन एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है । वर्तमान में नेपाल जिन हाथों में है उनके लिए भी तानाशाही शब्द प्रयोग किया जाता है, किन्तु ये तानाशाही देश के कल्याण के लिए नहीं है बल्कि देश को विखण्डन की राह पर धकेलने के लिए है, ये सिर्फ उनकी एक जिद है जो धीरे धीरे मधेश की जनता के अन्दर आग भर रही है । देश जल रहा है किन्तु इन्हें इसकी कोई परवाह ही नहीं है । कोई भी देश एकजातीय तानाशाही से कभी आगे नहीं बढ सका है और न ही आगे बढ़ सकता है । किसी भी देश के समग्र विकास के लिए सबको समान अवसर देने की जरुरत होती है । खसवादियों को भी अपना हठ को छोड़कर देश को उन्नति के मार्ग पर लाने के लिए अग्रसर होने की जरुरत है । आज का जर्मनी एक बहुत ही योग्य श्रम शक्ति, एक बड़ी पूँजीवादी संपत्ति के साथ एक बृहत सामाजिक बाजार अर्थ व्यवस्था है, जिसमें भ्रष्टाचार निम्नस्तर पर है । यह घरेलु उत्पादक के हिसाब से यूरोप की पहली और दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है । जर्मनी २००३ से लेकर २००८ तक विश्व का सबसे बडा निर्यातक और तीसरा सबसे बडा आयातक था । देश का ज्यादातर निर्यात अभियांत्रिकी विशेष रूप से मशीनरी रसायनिक वस्तु ऑटोमोबाइल और धातु के क्षेत्र में है । जर्मनी पवनचक्की टर्माइन और सौर्यशक्ति प्राद्योगिक का एक प्रमुख उत्पादक है । यह सब जर्मनी ने अपनी काबीलियत से प्राप्त किया है । क्या नेपाल इस समृद्धि को प्राप्त कर सकता है ? यह सवाल हर जागरुक नागरिक के जेहन को परेशान कर सकता है । प्राकृतिक सौन्दर्य नेपाल के कण कण में व्याप्त है । जिसका फायदा इसे भरपूर मिल सकता था । दातृ संगठन जी खोलकर नेपाल के लिए अनुदान करते हैं किन्तु आज तक नेपाल अपनी स्थिति को नहीं सुधार सका । सदियों राजतंत्र की दासता को स्वीकार किया गया, फिर जनआन्दोलन की समाप्ति के बाद एक नए नेपाल की आशा जगी किन्तु प्रकृति के कहर ने इसे फिर वर्षों पीछे धकेल दिया और इस सबसे ज्यादा किसी ने देश का बुरा किया तो वो खसवादी नेता जो सिर्फ स्वार्थ की राजनीति करते आए हैं । जिन्हें देश के विकास और प्रगति से कोई वास्ता नहीं है । आज मधेश आन्दोलन ने देश की रीढ को कमजोर कर दिया है किन्तु सत्ता न जाने कहाँ मस्त है जिन्हें यह सब दिखाई नहीं दे रहा । कभी कभी तो लगता है कि सच में यह देश सती से शापित देश है ।

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