नेपाल में चीन की भूमिका भारत से ज्यादा प्रभावकारी : वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र

चीन का जो मुख्य उद्देश्य था कि भारत की कुटनीति को एक धक्का देकर यह दिखा देना था कि नेपाल की राजनीति में यह भारत से कम महत्व नहीं रखता है । परन्तु तत्काल यह सम्भव नहीं हो सका । अब देखना है, आगे क्या होता है ?


चीन का खुले रूप में समर्थन करनेवाली ये दो पार्टियां एमाले तथा माओवादी केन्द्र को शक्ति केन्द्र में नेतृत्व की भूमिका से अलग होना चीन को स्वीकार नहीं था । तीसरी बात, वर्तमान देउवा की सरकार खुलकर चीन का विरोध न कर सकी है, परन्तु चीन के प्रति नेपाल का जो झुकाव था, उसमें गतिहीनता निश्चित रूप में दिखा, जो चीन को स्वीकार नहीं था ।

नेपाल में राजनीतिक दलों का बनते बिगड़ते समीकरण, क्या चीन की भूमिका प्रभावकारी ?

वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र
गत अक्टुवर ३ को ऐसा लगा था कि नेपाल की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है, जिसमें सभी बामपंथी दल एक ऐसा गठबंधन का निर्माण करेंगे जो आगामी नवम्बर २१ तथा दिसम्बर १० में में हो रहे संसद एवं प्रान्तीय सभा के निर्वाचनों में एक साथ मिलकर भाग लेंगे तथा बाद में एक ही साम्यवादी दल के रूप में न केवल नेपाल को ही विकास के पथ पर अग्रसित करेंगे वरन् विश्व में वामपन्थियों के पस्त हौसले के लिए नयी उत्साह का संचार करेंगे । परन्तु कुछ दिनों में ऐसी आशा रखने वालों के उत्साह पर पानी फिर गया । जब समीकरणों में आबद्ध दलों, नेकपा एमाले, माओवादी केन्द्र तथा नयी शक्ति पार्टी नेपाल में नयी शक्ति पार्टी नेपाल ने उस गठबंधन से बाहर रहने का फैसला किया और बाकी साथ रह रहे दो दलों के बीच भी निर्वाचन क्षेत्रों के बटबारे को लेकर नहीं ठनेगी, यह कहना मुश्किल है । निर्वाचन क्षेत्रों के बटबारे का जो आधार प्रस्तुत हुआ है, वह अव्यवहारिक लगता है, जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों में इन दलों से स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में इनके उम्मीदवार चुनावी मैदान में आकर इनके निर्वाचन परिणामों को प्रभावित नहीं करेंगे, ऐसा सोचना गलत होगा ।
वैसे नेकपा एमाले तथा माओवादी केन्द्र के बीच लगभग एक वर्ष से (जब से इन दलों की सरकार खत्म हो गई थी)वार्ताएँ हो रही थी, परन्तु इस वार्ता में जब से वर्तमान समीकरण के अन्तर्गत बनी सरकार के नेतृत्व में परिवर्तन आया, तब से इसमें तीव्रता आयी ओर विशेष रूप में प्रान्त २ के निर्वाचन जहाँ मधेशी बहुल ८ जिला हैं, के परिणामों ने और भी गति ले ली । इस निर्वाचन ने इन तीनों दल के नेताओं के आत्मविश्वास को इस तरह से हिला दिया था कि बिना पर्याप्त सोचे–विचारे इस कम्युनिष्ट गठबंधन की घोषणा कर डाली । सच में इन तीन दलों के अतिरिक्त नेपाली कांग्रेस को भी भगवान पशुपतिनाथ के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए कि उन्होंने राष्ट्रीय जनता पार्टी तथा संघीय समाजवादी फोरम के नेताओं के एक साथ मिलकर निर्वाचन में भाग लेने की सद्बुद्धि पहले नहीं दी । अन्यथा, इन चारों दलों की क्या स्थिति होती, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है ।
एमाले तथा माओवादी केन्द्र के नेताओं का प्रान्त २ के निर्वाचन में अधिक स्थान में विजय प्राप्त करने की आशा रही होगी या प्रचार के लिए बोल रहे होंगे, साथ ही नेपाली काग्रेस भी जो इस प्रान्त के आठ जिलों गत संविधानसभा के निर्वाचन में सबसे अधिक स्थानों में विजय प्राप्त की थी, अधिक स्थान प्राप्त करने में विश्वस्त दिखती थी । इसका कारण मधेशवादी दलों का विभक्त होना था, वैसे ६ दलों ने राष्ट्रीय जनता पार्टी के नाम से एक दल निर्णय कर लिया था पर असल में एक दल नहीं बन पाया था, और संघीय समाजवादी फोरम तथा नेपाल लोकतान्त्रिक फोरम नेपाल जो अपने–अपने दलों के नाम से ‘मधेशी’ विशेषण हटा चुके थे, आपस में लड़ रहे थे जिससे ये दल अपने को फायदाजनक स्थिति में रहने का सहज आकलन कर रहे थे । परन्तु इन उपरोक्त चारो दल द्वारा संविधान बनाने प्रक्रिया में खेले गये भूमिकाओं को मधेश की जनता भुला नहीं पायी थी, जिसमें एक सौ से अधिक निर्दोष मधेशियों ने अपनी जानों की आहुति दी थी, इन चारों दलों को हतप्रभ कर दिया था ।
वर्तमान राजनीतिक परिवेश का तत्कालिक प्रभावकारी कारण प्रान्त २ का स्थानीय तह निर्वाचन तो एक सीमा तक है ही, परन्तु इसका मुख्य कारण नयां संविधान के घोषणा करने से पूर्व तथा पश्चात की अवस्था से जुड़ा दिखता है । संविधानसभा के दूसरे निर्वाचन ने नेपाली कांग्रेस तथा एमाले की स्थिति में पहले निर्वाचन की तुलना में काफी फेरबदल कर दिया था । और इसमें नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले की अवस्था मे सुधार हो गयी थी और ये दोनों दल संख्यात्मक दृष्टि से पहले, दूसरे दल के रूप में स्थापित होकर तत्कालीन नेकपा माओवादी को तीसरे स्थान में पहुँचाने में सफल हो गया ।
सत्ता साझेदारी के चक्कर में ये दल इस तरह फंसे गये कि एक दल के नेतृत्व में संविधान की घोषणा हो तथा दूसरे दल के नेतृत्व में संविधान कार्यान्वयन हो, परिणामतः नयां संविधान के घोषणा के बाद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सभामुख एवं उप–सभामुख को चयन आवश्यक हो गया । अन्य दल एवं समूह जो संविधान के विरोध कर रहे थे, उन्हें नजरअन्दाज कर ६०१ सदस्यों में ५०७ की बहुमत से बिना विशेष छलफल संविधान पारित करने में सफल हो गए थे । उपरोक्त सत्ता साझेदारी के कारण नेपाली कांग्रेस को सत्ता से हटना पड़ा, इन्ही दिनों सत्ता के खेल के कारण नेकपा एमाले एवं नेपाली कांग्रेस में चल रहे खटपट के कारण सभी शीर्षस्थ पदों के लिए निर्वाचन हुआ, जिसमें नेकपा एमाले तथा माओवादी केन्द्र को सत्ता समीकरण के कारण विजय प्राप्त हुआ और नेपाली कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी । विभिन्न पदों पर रह रहे नेपाली कांग्रेस के प्रतिनिधिजन वापस बुला लिए, जिससे इन दोनों दलों (एमाले एवं कांग्रेस) के बीच ठन गई । उधर एमाले एवं माओवादी केन्द्र के समीकरण, जिस के अन्तर्गत आधा–आधा समय दोनों दलों के नेताओं को प्रधानमन्त्री पद प्राप्त करना था, उससे एमाले के नेता तथा तत्कालीन प्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली मुकर गये, जिससे उनके और माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ में अपासी तनाव शुरु हो गया । इधर नेपाली कांग्रेस, जो इस अवसर की तलाश में थी ही, फिर माओवादी केन्द्र के साथ नयां समीकरण बनाया और ओली को प्रधानमन्त्री का पद अविश्वास प्रस्ताव के कारण छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा । कहा जाता है, इस नये समीकरण के बनने में भारत का भी सहयोग नेपाली कांग्रेस को मिला, जिसके कारण मधेश केन्द्रीत दलों ने नेपाली कांग्रेस का साथ दिया और नयां समीकरण अन्तर्गत फिर दूसरी सरकार पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ के नेतृत्व में बनी । इस समीकरण का आधार पूर्ववर्ती सरकार की तरह प्रधानमन्त्री का कार्यकाल दो भागो में बाँटा गया । स्थानीय तह निर्वाचन तक प्रचण्ड प्रधानमन्त्री रहेंगे तथा चुनाव सम्पन्न होने के साथ नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा प्रधानमन्त्री पद पर आसीन होंगे । ऐसा हुआ भी पर आश्चर्य के साथ ।
स्थानीय तह का निर्वाचन एक चरण की जगह दो चरणों में होने की घोषणा प्रचण्ड सरकार ने की क्योंकि मधेश केन्द्रीत दल मधेश के २० जिलों में जनसंख्या के समानुपातिक में स्थानीय इकाई की मांग की पूरी नहीं होने तक निर्वाचन में भाग नहीं लेने का निश्चय किया था । अतः मधेश के जिलों को छोड़कर अन्य जिलों में निर्वाचन सफल हुआ था । परन्तु अन्त में प्रान्त २ के ८ जिलों के अलावा बांकी जिलों में निर्वाचन हुआ था । यहां ध्यान देने की बात यह है कि पहले चरण की समाप्ति के बाद ही प्रचण्ड ने प्रधानमन्त्री पद से इस्तीफा दे दिया था । और पहले चरण के निर्वाचन के तुरन्त बाद भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें धन्यवाद तथा शुभकामना दी थी । दो–तीन दिनों के बाद ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया, यह कहते हुए कि उन्होंने समीकरण के शर्त को अक्षरसः पालन किया है ।
नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा के नेतृत्व में ७ मई २०१७ को सरकार बनी, इस सरकार ने मई में ही दूसरे चरण का निर्वाचन सम्पन्न कराया तथा तीसरे चरण का मतदान गत १८ सितम्बर के दिन हुआ, जिसका अन्तिम परिणाम प्रकाशित होने के तुरन्त बाद बड़ादशै (विजया दशमी की छुट्टी) शुरु हो गई और छुट्टी के तुरन्त बाद ३ अक्टुबर को इस बृहत वाम गठन की घोषणा हुई ।
इस तरह विगत दो वर्षों का राजनैतिक चक्र की पृष्ठभूमि में इस गठजोड़ के कारणों का विवेचन आवश्यक दिखता है । उसके परिणाम प्राप्त होने में अभी समय लगेगा । एक ओर तो इस गठबंधन पर प्रारम्भिक दबाव तो है ही साथ ही आगामी निर्वाचन के बाद ही सही मूल्यांकन हो सकता है । जहां तक गठबंधन के कारणों का प्रश्न है, उसके तीनों घटकों का अपना–अपना स्वार्थ दिखता है । सबसे छोटी पार्टी नयां शक्ति पार्टी को एक असफल पार्टी के रूप में स्थानीय तह के निर्वाचन परिणामों ने सिद्ध कर दिया है, उसका नामोनिशान भी करीब–करीब मिट–सा गया है । अतः इस पार्टी के संयोजक पूर्व प्रधानमन्त्री डॉ. बाबुराम भट्टराई को अपना निर्वाचन क्षेत्र गोरखा–२ से अपनी उम्मीदवारी देने के लिए एमाले अध्यक्ष ओली की की शरण में जाना पड़ रहा था, नहीं तो अपने पूर्व अध्यक्ष प्रचण्ड के पाँव पकड़ पर है या नहीं तो इस नये गठबंधन से बाहर आने को बाध्य हो चुके थे । वैसे गठबंधन में आने से इन्हें कुछ भी हानि नहीं हुई थी, क्योंकि उनके पास में बचा ही क्या था, सिर्फ लाभ ही प्रात होने की आश थी, वह भी खत्म हो गयी क्योंकि इन्हें अपना निर्वाचन क्षेत्र पाना भी मुश्किल हो गया था । इनके अन्य समर्थकों का भविष्य तो और भी अन्धकारमय हो गया । दूसरा कारण यह दिखता है कि डॉ. भट्टराई के बहुत सारे साथी इनकी पार्टी छोड़ कर माओवादी केन्द्र मे वापस हो गए थे, इसका कारण वे अलग–थलग हो गये थे, अपने साथियों के बीच में जाकर फिर शक्ति संचय कर सकते थे । पर उनका इस नये पार्टी में नहीं रहना निश्चित प्रायः लगना लोगों का अन्दाज था ।
इस गठबंधन में माओवादी केन्द्र जो मुख्य घटक के रूप में शामिल हुआ है, इसे आगामी निर्वाचन में ४० प्रतिशत स्थान दिए जायेंगे, जिसमे यह पार्टी पुनः एक शक्तिशाली पार्टी बन कर आ सकती है । संविधानसभा को दूसरे निर्वाचन परिणाम तथा हाल ही सम्पन्न स्थानीय तह के बुरे परिणामों से इसके हौसले पस्त हो गये थे, इसमें नया जीवन आने की परिकल्पना से यह पार्टी काफी खुश दिख रही है । वैसे, इस पार्टी के अध्यक्ष कह रहे हैं कि इस गठबंधन से उनका दस वर्ष पुराना स्वप्न अब साकार बन रहा है । पर यह पुःन संशय के घेरे में आ गया, जिसका कारण इनका डॉ. बाबुराम भट्टराई प्रति कठोर रबैया था, जो डॉ. भट्टराई को उनका पुराना निर्वाचन क्षेत्र नहीं देना चाहते थे । सबसे महत्वपूर्ण बातें उन्होंने गत ७ अक्टुबर के अपने केन्द्रीय कार्यालय पोलिटव्युरो तथा प्रशिक्षण बैठक में कहीं, वह सनसनी खोजपूर्ण है । उन्होंने कहा कि एमाले से गठबंधन के लिए उन पर बड़ा दबाव पड़ा जिसे वे झेल नहीं सके और अपने दल के नेताओं से बिना सलाह मशबिरा किए उन्होंने तालमेल की घोषणा कर दी । उन्होंने यह नहीं बताया कि जो दवाब उन पर पड़ा, वह आन्तरिक था या बाह्य । आन्तरिक दबाब उतना नहीं हो सकता है, जितना बाहरी, जिसे हम विदेशी भी कह सकते हैं ।
इस बाहरी दबाव का पृष्ठपोषण इस बात से भी होता है कि आखिर नेकपा–एमाले ने चालीस प्रतिशत निर्वाचन क्षेत्र माओवादी केन्द्र को देने में क्यों स्वीकारा, जबकि उनकी पार्टी ने हाल ही सम्पन्न स्थानीय तह के निर्वाचन में सबसे अधिक प्रतिनिधि प्राप्त करने में सफल हुई है । हो सकता है, अधिक स्थान में विजयी होने के बाबजूद भी मतों की संख्या इस दल में और नेपाली कांग्रेस में बहुत का अन्तर नहीं होने से एमाले भविष्य के निर्वाचन प्रति पूर्ण रुप में विश्वस्त नहीं हो पाने के कारण माओवादी केन्द्र को इतना अधिक क्षेत्र देने में सहमत हो गयी । साथ ही यह भी आश्चर्य की बात है कि लगभग एक वर्ष पहले जिस तरह ओली को लात मारकर प्रचण्ड ने उन्हें सरकार से निकाल बाहर किया था, उस बेइज्जती के बाद भी उन्होंने आगे बढ़कर प्रचण्ड से हाथ मिलाया ।
सामान्य रूप में ऐसा दिखता है कि निर्वाचन में लाभ की प्रत्यासा से एमाले ने माओवादी केन्द्र से हाथ मिलाया परन्तु प्रचण्ड की उस घोषणा से जिसमें उन्होंने दबाब में आकर गठबंधन किया है, जानकर लोगों को इस पर सोचने के लिए बाध्य कर दिया है । निश्चय ही दोनों दलों पर बाहरी दवाब पड़ा है एवं दोनों को एक ही शक्ति जो इन्हें मान्य है का आदेश पालन करना पड़ा है ।
आखिर यह शक्ति है कौन ?
इसका समुचित उत्तर के लिए हमें संविधान जारी करने के समय की ओर देखना होगा । संविधान के जारी करने से दो–तीन दिन पहले भारत के विदेश सचिव का आना तथा संविधान को तत्काल पारित नहीं कर विपक्षी समूहों से बात करने की उनकी सलाह नहीं मानने के परिणामस्वरुप नेपाली कांग्रेस, एमाले तथा माओवादी केन्द्र के बीच की सहमति टूटने में भारत की भूमिका को एमाले सहित अन्य लोग विश्वास करते हैं । सहमति टूटने के कारण प्रधानमन्त्री तथा अन्य सभी पदों के लिए निर्वाचन हुआ, जिसमें मधेश केन्द्रीय दलों ने नेपाली कांग्रेस को समर्थन किया । इससे एमाले ने सहज ही भारत की भूमिका का अनुमान लगाया । दूसरा, जब एमाले एवं माओवादी केन्द्र के बीच में प्रधानमन्त्री पद के लिए मनमुटाव शुरु हुआ और एमाले नेता ओली के प्रति सदन में अविश्वास प्रस्ताव आया तथा नये प्रधानमन्त्री देउवा के विश्वास मत प्राप्त करना पड़ा उसमें भी मधेश केन्द्रीय दलों ने नेपाली कांग्रेस को साथ दिया, जिसमें भारत की भूमिका नहीं रहने की कल्पना तक भी नही की जा सकती । इस तरह चीन का खुले रूप में समर्थन करनेवाली ये दो पार्टियां एमाले तथा माओवादी केन्द्र को शक्ति केन्द्र में नेतृत्व की भूमिका से अलग होना चीन को स्वीकार नहीं था । तीसरी बात, वर्तमान देउवा की सरकार खुलकर चीन का विरोध न कर सकी है, परन्तु चीन के प्रति नेपाल का जो झुकाव था, उसमें गतिहीनता निश्चित रूप में दिखा, जो चीन को स्वीकार नहीं था ।
अतः परिणाम जो सामने आया है, वह स्वाभाविक था । देउवा सरकार को हटाकर पुनः साम्यवादियों की सरकार बनाना चीन का मुख्य अभिप्राय रहा होगा, जो पूर्णरूप में पूरा नहीं हो सका और निर्वाचन में आपस में मिलकर जायें और आगामी सरकार बनाने की कोशिश में लग जाए, बाद में एकीकरण के रुप मैं आए ।
वास्तव में ऐसा दिखता है कि यह गठबंधन का उद्देश्य बहुत दूर का था । परन्तु इन दोनों दलों को आधे रास्ते में ही रुकना पड़ा और चीन का जो मुख्य उद्देश्य था कि भारत की कुटनीति को एक धक्का देकर यह दिखा देना था कि नेपाल की राजनीति में यह भारत से कम महत्व नहीं रखता है । परन्तु तत्काल यह सम्भव नहीं हो सका । अब देखना है, आगे क्या होता है ?

लेखक पुर्व निर्वाचन आयुक्त हैं

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