नेपाल में भारतीय भूमिका

कनकमणि दीक्षित

The flag of Nepal

The flag of Nepal (Photo credit: Wikipedia)

एक समय ऐसा था, जब नेपाल के राजनीतिक लोग भारत के राष्ट्रीय व्यक्तित्व के साथ कन्धे से कन्धे मिलाकर राजकाज के सर्न्दर्भ में विचार-विमर्श करते थे। पर आज समयचक्र उलटा चल रहा है। स्थिति ऐसी है कि आज देश के प्रभावशाली नेता एवं सबसे बडे पार्टी अध्यक्ष का नई दिल्ली के राजनीतिक पंक्ति के साथ सर्म्पर्क नगण्य है। नेपाल के मामले में नियुक्त कूटनीतिज्ञ के अतिरिक्त उनका मजबूत सम्बन्ध एन्जिओ के पदाधिकारी के साथ है। ऐसा होने से नेपाल के गौरव पर ही मात्र धक्का नहीं लगा है अपितु

The Flag of India. The colours are saffron, wh...

The Flag of India. The colours are saffron, white and green. The navy blue wheel in the center of the flag has a diameter approximately the width of the white band and is called Ashoka's Dharma Chakra, with 24 spokes (after Ashoka, the Great). Each spoke depicts one hour of the day, portraying the prevalence of righteousness all 24 hours of it. (Photo credit: Wikipedia)

नेपाली नागरिक के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अग्रगमन ही बाँधित हुआ है।
नेपाल के प्रति जिज्ञासा रखने वाले चन्द्रशेखर जैसे राष्ट्रीय स्तर के भारतीय राजनेता की अब नर्ही रहे । दिल्ली नेतृत्व पंक्ति को सीधे सम्बोधन करने वाले अन्तिम नेता थे- गिरिजाप्रसाद कोइराला। इनकी मृत्यु के बाद दिल्ली के पेरिफेरल भिजन अर्थात एक हिसाब से नेपाल हासिए में पडÞ गया है । यहाँ के निरन्तर राजनीतिक बबन्डरों से परेशान हो चुके नई दिल्ली के राजनेताओं ने नेपाल मामिला को कुछ राजनीतिज्ञ, गुप्तचर संस्था तथा काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के विश्वासपात्र जवाफदेह व्यक्तियों के हाथों में छोड दिया हैं।
इस अवस्था में दिल्ली क्रियाशील हो बाबूराम भट्टर्राई नेतृत्व के माओवादी, मधेशवादी गठबन्धनको नेपाली जनमानस के ऊपर थोपा दिया है। इस काम को पडÞोसी का एक यान्त्रिक गैरराजनीतिक समाधान का प्रयास कहा जा सकता है। जिससे २०४६ के बाद कडा प्रयास के साथ बना प्रतिनिधिमूलक राज्य व्यवस्था की विधि और मान्यताओं को ध्वस्त कर दिया गया। कोई सकरार रिमोट कण्ट्रोल से चलाया जा रहा हो तो वह वर्तमान सत्ता। पर माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ने अपने आविष्कार की पगरी आजतक अपने उपाध्यक्ष को लगा नहीं पाया है।
भारत को विश्व शक्ति की सीढÞी पर चढÞने के लिए मैत्री दक्षिण ऐशियाली वातावरण चाहिए, जो अभी हाल के भारतीय पर्ूवराजदूत तथा विदेश सचिव शयामशरण सहित अध्ययन की टोली द्वारा गत महीने में पेश किया गया प्रतिवेदन में भी उल्लेख है। इस सर्न्दर्भ में नेपाल-भारत दौत्य सम्बन्ध दक्षिण एशियाली परिपे्रक्ष्य में एक अनुकरणीय उदाहरण बन सकता है। पर इसके लिए दिल्ली के राजनीतिक वर्ग ने नेपाल की गतिविधि में दखल देना आवश्यक समझा है। भारत की आकांक्षा यदि दक्षिण एशिया में स्थायित्व स्थापित होना है तो उसे समझना चाहिए कि लोकतन्त्र के बिना वैसा स्थायित्व स्थापित नहीं हो सकता है, यह बात भारतीय शासक को समझना पडेÞगा। शान्ति स्थापना के क्रम में लोकतन्त्र को तिलाञ्जली देना हो तो निश्चय ही वह भारत के लिए ही प्रत्युत्पादक होगा।
मैत्री उपहार
प्रत्येक सीमा स्तम्भ के पीछे काई न कोई भारतीय षड्यन्त्र छिपा हुआ देखना काठमांडू के बौद्धिक वर्ग की नियत ही है। किन्तु हाल ही की घटनाक्रम को देखने से लगता है कि ऐसा भारत विरोध दिखावटी मात्र है, इस बात की पुष्टि होती है। हमारी केन्द्रिय शक्तियाँ नई दिल्ली की जैसे भी चाकरी करने में कोई कसर नहीं छोडÞती है और माओवादी तो इस प्रवृति को और भी वैज्ञानिक तरीके से स्वीकारता है। ऐसा अवसरवाद आजकल तो और भी अधिक दिखाई देने लगा है, जब कि नेपाल और नेपाली राजनीति में २०४६ साल के बाद दिल्ली ने सबसे अधिक भूमिका निर्वाह कर रहा है। कोई कोई तो इस घटना को हस्तक्षेपकारी तक मानता है। किन्त काठमांडू के विश्लेषक, जानकारलोगों की प्रतिक्रिया तो शून्य है, यही मौनता का मुख्य कारण है कि जडÞसूत्रवादी तथाकथित भारत विरोधी सभी लोग नई दिल्ली निर्मित भट्टर्राई की सत्ता में सहभागी हुआ है।
पाँच दशक से पहले नेपाल के उग्रराष्ट्रवाद को भारत विरोध का पर्याय बाची शब्द बना दिया राजा महेन्द्र ने। महेन्द्र के वर्तमान अवतार के रुप में पुष्पकमल दाहाल का उदय हुआ। मई २००८ में प्रधानमन्त्री पद से त्यागपत्र देने के बाद दाहाल ने दो वर्षके लिए पूरे देश को भारत विरोधी अभियान में लगा दिया। उस समय में सुलग रहे भारत विरोध का दोष अधिकांश ने तत्कालीन राजदूत राकेश सूद पर मढÞ दिया, किन्तु अपने सांगठनिक कमजोरी को सम्हालने वाली पार्टी को उत्तेजित बनाए रखने के लिए दाहाल अध्यक्ष द्वारा सञ्चालित अभियान था वह। उक्त अभियान सही नहीं है, यह समझने में दाहाल को पूरे तनि वर्षलग गया। समझ में आने के बाद दाहाल ने भारत को मैत्री स्वरुप भट्टर्राई प्रधानमन्त्री मण्डल प्रस्तुत किया।
माओवादी-मधेशवादी सत्ता
प्रत्येक राज्य का अन्तर्रर्ाा्रीय दौत्य सम्बन्ध स्वाभाविक रुप में आत्मस्वार्थ के आधार पर बना रहता है। नेपाल पर भारतीय दृष्टि मुख्यतः तनि खम्बे पर अडÞा हुआ है। खुला सिमाने के कराण अतिवादी घुुसपैठ में नियन्त्रण और जलविद्युत तथा सञ्चित जलसंसाधन का प्रयोग। अपने इन्हीं लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारत को नेपाल में लोकतन्त्र और कानूनी राजका प्रोत्साहन करना चाहिए।
निश्चय ही भारत एक ही नहीं है, नई दिल्ली का परराष्ट्र तथा सुरक्षा सम्बन्धी मन्त्रालय, साउथ ब्लक, नार्थ ब्लक, सीमा पार तीन ओर से भारतीय तीन प्रान्त, गुप्तचर संस्था राँव आइबी और भारतीय सेना जिसकी दृष्टि हिमालय क्षेत्र की सुरक्षा, गोर्खा सैनिक भर्ती में है। नई दिल्ली में कुछ राजनीतिक लबिइस्टु, व्यापार घराने से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्ति और विश्लेषक अनुसन्धानकर्ता हैं। जिनमें नेपाल के बारे में अवधारणा औपचारिक भारतीय परराष्ट्र नीति के साथ मिलता-जुलता रहता है। फिर भी नई दिल्ली में ऐसा एक वर्ग उपनिवेशीय प्रगतिशील बौद्धिक वर्ग है, जो पडÞोसी नेपाल में उग्रवाम प्रयोग के पक्ष में है, जिसको वर्तमान भारतीय संस्थापन पक्ष के नेपाल नीति स्वीकार्य है।
भारतीय पक्ष जो भी नीति निर्माण करे, आखिर में नेपाल का स्थापित तथा लोकतन्त्र रक्षा का काम तो नेपाली राजनीतिक समुदाय और बृहत नागरिक समाज का ही है। राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतिरक्षा के लिए भी पडÞोसी को ही तो नहीं पुकारेंगे। यदि नई दिल्ली की वर्तमान नीति नेपाल के लिए अहितकर जैसा है तो काठमांडू के विचार निर्माता द्वारा आपत्ति सुनानी चाहिए। पर ऐसी आशा करना र्व्यर्थ है। हमारे कतिपय प्रभावशाली राजनीतिज्ञ लोग भारतीय दूतावास से अपनी माँगे -शैक्षिक सीट या छात्रवृत्ति) निरन्तर पर्ूर्ति होने के कारण कुछ नहीं बोलने की अवस्था में है। इधर नागरिक समाज के व्यक्तित्व वर्ग मूलभूत विषय में अडÞान लेने में असक्षम दीखते है।
प्रत्यक्ष रुप से नहीं दिखाई देनेे पर भी स्पष्ट
निश्चय ही भारत राज्य को नेपाली माओवादी व्रि्रोह को प्रोत्साहन देने की कोई नीति नहीं थी। पर माओवादी ने नेपाल में सशस्त्र युद्ध के लिए भारतीय भूमि का उपयोग किया ही है। युद्धकालीन अधिकांश समय भारतीय भूमि नोएडा, फरिदावाद और अन्य स्थानों में रहकर काम करने वाले माओवादी नेताओं के ऊपर विशेष प्रकार से गुप्तचारों की निगरानी थी। इस में कोई शंका नहीं है। भारतीय भूमि में कौन, कहँा क्या कर रहा है, इस बात से नई दिल्ली अनभिज्ञ नहीं थी, पर नेपाली माओवादियों के कृयाकलापों से जब भारत पर असर पडÞने लगा, तब इस सर्न्दर्भ में नई दिल्ली सक्रिय हर्ुइ। उस समय भारत ने बाबूराम भट्टर्राई को प्रयोग करते हुए १२ सूत्रीय सम्झौता का कार्यान्वयन करने के मर्म को सहज कर दिया।
व्रि्रोही माओवादी २०६४ साल में खुली राजनीति में तो प्रवेश किया पर शान्ति प्रक्रिया बाधित हो गई। ऐसी अवस्था में पुनः अपने को अग्रसर करना चाहिए, इस सोच के आधार पर नई दिल्ली बाबूराम भट्टर्राई की गठबन्धन सरकार बनाने की दिशा में उन्मुख हर्ुइ। भारतीय विदेश मन्त्रालय में नेतृत्व परिवर्तन के समय नेपाल में उथल-पुथल होना शुरु हो गया। साथब्लाँक में नये परराष्ट्र सचिव नियुक्त होने की अवस्था थी तो लैनचौर दूतावास में राकेश सूद के स्थान पर वर्तमान राजदूत जयन्त प्रसाद पदस्थापन के क्रम में थे। माओवादी तथा विभिन्न रंग और विचारों के मधेशवादी पार्टर्ीीो एकजूट करने का काम गुप्तचर शक्ति का न होकर भारतीय कुटनीतिज्ञों का है, विश्वास करने योग्य बात नहीं है।
भारत क्यों इस प्रकार क्रियाशील हुआ – इस प्रश्न का उत्तर मात्र विभिन्न सुझाव के रुप में प्रस्तुत किया जा सकता है। माओवादी पार्टर्ीीो विखण्डन तक पहुँचाने का काम भट्टर्राई के गठबन्धन निर्माण का हो सकता है। माओवादी सत्ता अर्न्तर्गत मात्र शिविरों का विघटन हो सकता है, ऐसा विचार नई दिल्ली का था कि – कुछ ने तो यहाँ तक विचार किया कि लोकतान्त्रिक पडÞोसी की तुलना में नई दिल्ली की पूजा करने को तत्पर माओवादी नेतृत्व की सत्ता को प्रयोग करके देखा जाय। देखने की बात है कि दिल्ली द्वारा नियुक्त दाँये हाथ को बाँये हाथ क्या करता है – उसे इस बात का पता नहीं भी हो सकता है।
मधेशवादी शक्ति तथा जनता के ऊपर ज्यादती करनेवाले माओवादी को एक ही स्थान में लाने की योजना भारत की आन्तरिक आवश्यकता अनुरुप बनाई गई, जैसी लगती है, किन्तु नेपाल के सुुधारोन्मुख माओवादी को दिखाकर भारत में फैल रहे नक्सलवादी आग को नियन्त्रण किया जा सकता है कि इस विचार से अभ्रि्रेरित दिल्ली की योजना पूरी होती दिखाई नहीं देती, जो भी हो नई दिल्ली ने अपने प्रबल प्रभाव को प्रयोग करके भट्टर्राई द्वारा सञ्चालित सत्तँ से ही शान्ति प्रक्रिया की इतिश्री करने का निश्चय किया, जबकि भारत वर्तमान सरकार से पर्ूव कार्यरत दो सरकारों के हाथ से भी वैसी ही अवस्था का सृजन कर सकता था। पर यह बात हम कैसे समझ सकते है, कारण समान विचार या दर्शन अपनाने वाले भारतीय माओवादी को आतंकवादी घोषित करता है तो दूसरे ही क्षण में समान दर्शनधारी नेपाली माओवादी को सत्तासीन करने की कसरत करती है नई दिल्ली।
दो बडÞे लेकिन लोकतान्त्रिक पार्टर्ीीो प्रतिपक्ष में रखकर भट्टर्राई नेतृत्व वाला गठबन्धन निर्माण करते समय नेपाल राज्य की आधारशिला में बहुत बडÞी क्षति हर्ुइ। वर्तमान गठबन्धन सत्ता निर्माण कर्ता नई दिल्ली इस गठबन्धन को बनाने के लिए क्रियाशील दो दस्तावेजों के बारे में भी जबावदेह होना चाहिए। जबाज देहिता वह है, माओवादी पार्टर्ीीारा घोषित पाँच सूत्रीय घोषणा और माओवादी संयुक्त मधेशी लोकतान्त्रिक मोर्चा बीच हुए चार सूत्रीय सहमति। इन दस्ताबेजों में राष्ट्रीय सेना में सामुहिक प्रवेश की मान्यता है। अपरिभाषित, आत्मनिर्ण्र्ााा अधिकार कबूल है। ज्यादती आरोपित विरुद्ध मुकदमा फिर्ता तथा अदालत द्वारा दोषी साबित हुए व्यक्तियों को माफी कबूल है। यदि काठमांडू का चश्मा लगाकर देखता है तो नई दिल्ली नेपाल के ऊपर ऐसा गठबन्धन लादना रियल पोलिटिक का र्सवघृणित प्रयोग है।
नेपाली चक्रव्यूह
आरम्भ में भट्टर्राई गठबन्धन का लक्ष्य सीमित था। नई दिल्ली शान्ति प्रक्रिया को शीघ्र समाधान करवना चाहती थी, पर वैसा नहीं हुआ। नेपाल मामले में भूमिका खेलते हुए नई दिल्ली नेपाली संक्रमण कालीन तथा संवैधानिक राजनीतिक चक्रव्यूह में फँस गई। किन्तु नई दिल्ली इतनी क्रियाशील होते हुए भी भारतीय संविधानवाद का महान लिगेसी होने का कुछ भी लाभ नेपाल को नहीं मिल रहा है। नेपाल में शान्ति स्थापना करने का लक्ष्य यदि नयी दिल्ली का है तो नेपाली जनाकाङ्क्षा के साथ एकात्मक हो। दुःख की बात है कि नई दिल्ली के विचार से नेपाल के संवैधानिक लेखन प्रक्रिया समेत प्रभावित हो रहा है। मुख्यतः शासकीय स्वरुप -प्रत्यक्ष राष्ट्रपतीय तथा संसदीय) तथा संघीयता अर्न्तर्गत प्रान्त निर्माण के सर्न्दर्भ में रहस्यपर्ूण्ा बात यह है कि नई दिल्ली पहचान पर आधारित संघीयता और इसके अर्न्तर्गत तर्राई केन्द्रित प्रान्तों के पक्ष में है। यह बात संविधान लेखन प्रक्रिया को सीधे रुप से प्रभावित कर रहा है।र्
नई दिल्ली ने यह रास्ता क्यों अपनाया समझ से परे है। तर्राईबासी मधेशी समुदाय को काठमांडू सीमान्तकृत किया जाना एक कठोर ऐतिहासिक यथार्थ है किन्तु तर्राई-मधेश के रुप में सीमित प्रान्त निर्माण होने से उस क्षेत्र की गरीबी और भी व्यापक रुप में बढेÞगी। समावेशीकरण की दवा निश्चय ही तर्राई मधेश में सीमित प्रान्त नहीं, यदि सीमान्तकृत उत्थान जन्य काम को आगे बढÞाते है तो उत्तराखण्ड से लेकर सिक्किम तक और भारत के अवधी, भोजपुरी एवं मिथिला क्षेत्र को छुते हुए नेपाल में प्रान्त निर्माण हो रहा है, इस विषय में भारतीय नेता लोग सुसुचित हैं या नहीं – पूछना जरुरी है।
भारतीय राजनेताओं को यह स्वीकार होना चाहिए कि बहुलवाद और लोकतान्त्र से ही नेपाल में स्थिरता आएगी और यही स्थिरता भारत की कामना है, ऐसा कहा जाता है। श्मशान जैसी शान्ति नहीं अपितु लोकतान्त्रिक शान्ति द्वारा स्थापित स्थिरता मात्र सम्भव है। नेपाल और नेपाली के लिए मानवाधिकार, बहुलवाद और शान्ति अन्तर्रर्ाा्रीय मान्यता अनुरुप प्राप्त कराने की इच्छा भारत को रखनी चाहिए। लोकतान्त्रिक राजकाज, संवैधानिक कानून निर्माण और शासन व्यवस्था नेपाली नागरिक और उनके प्रतिनिधियों के हाथों में छोडÞ देना उचित होगा।

साभारः नागरिक दैनिक
अनुवादकः रमेश झा

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