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नेपाल में भारत का विरोध तब शुरु हुआ जब राजा त्रिभुवन को भारत ने पनाह दी थी : कैलाश महतो

प्रचण्ड सा इमानदार नेता बनो, अपने समाज का उद्दार करो

कैलाश महतो, परासी, ३ जून | नेपाल के राजनीति में इमानदारी का दृश्य पहली बार देखने को मिला है । आश्चर्य की बात तो यह है कि दुनियाँ के बहुत सारे मुल्कों में लोकतन्त्र को मानने बाले लोकतान्त्रिक नेतृत्वों के द्वारा ही तानाशाही रबैयों को अख्तियार की गयी है । वहीं पर जन्मजात साम्यवादी धार को ही अपना सिद्धान्त और तानाशाही शासन को राजनीतिक धर्म मानने बाले नेपाल के काम चलाउ प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल ने २३ मई को अचानक राजिनामा देते हुए नेपाली काँग्रेस के साथ हुए समझदारी की पालन की है । प्रचण्ड वाकई में सोंच समझ के नेता सावित हुए हैं जो आम तौर पर नेपाल के राजनीति में कल्पना तक नहीं की जा सकती ।

प्रचण्ड ने राजनीति, रणनीति और कुटनीति सब में एक बडी सफलता हासिल की है । वे समझदारी के आधार संसार में अपने को अब्बल कायम रखने बाला नेपाल का पहला प्रधानमन्त्री होने का इतिहास का एक तरफ निर्माण किया है, वहीं दूसरी तरफ नेपाल को सशक्त और मधेश पर हो रहे पारम्परिक शोषण को भी मजबूत बनाने का अतुलनीय काम किया है । एक ही व्यक्ति में मदारी और नृतक दोनों का कला होना लगभग असंभव सा होता है । मधेश को खडा चुनौती देने बाले नेपाली अन्य नेतृत्व तो सिर्फ मदारी हैं जो सिर्फ डमरु बजाता है और मधेशी नाचता है । मगर दाहाल जी डमरु बजाते हुए इतने कलापूर्ण ढंङ्ग से नृत्य भी कर लेंगे, यह कमाल की बात है । डमरु बजाते हुए अपने साथ मधेशी बडेमान के नेतृत्वों को समेत नचा डालना बेजोड की कला है । वे हँसकर और हँसाकर मारने बाले प्यारा मौत बन गये जिसे मधेश ने पहचानना तो दुर, उसके बेसुमार सुन्दरता के जाल में फँसे मधेशी नेतृत्व भी मरने को ही सफलता मानती है ।

हकिकत यह है कि दाहाल के चाल को मधेशी नेतृत्व तो क्या, नेपाल के बहुतेरे नेपाली लोग भी नहीं समझ पा रहे हैं । उन्हें भी यही लग रहा है कि प्रचण्ड ने मधेशियों को प्रान्त दे दिया, संविधान संसोधन का प्रस्ताव ला दिया, चुनाव करवा दिया, मधेश के लिए बजेट में इजाफा कर दिया । मगर उसके अन्दर की गलियों में जाकर देखें तो प्रचण्ड ने नेपाल के पहाडों को, हिमालों को और मधेश के नेपाली बस्तियों को वो सब दे डाला जो आजतक ओली ने नहीं कर पाया, काँग्रेस ने दे नहीं पाया ।

शासन इतिहास के पन्नों से जुडी होती है । मधेश विरोधी दुस्साहसपूर्ण कार्य पृथ्वीनारायण शाह के अतिक्रमण से शुरु होकर नेपाली शासन का भारत सहित मधेश विरोधी शासन राणा काल के अन्त के साथ महेन्द्र के शासन से शुरु होता है । नेपाल में भारत विरुद्ध का शासन तब शुरु होता है जब राजा त्रिभुवन को भारत ने पनाह दी, राणा शासन का अन्त करने में सहायता की और प्रजातन्त्र की स्थापना करबायी । भारत के इस सहयोग के कारण राणाओं को भारत से चिढना स्वाभाविक था । मगर जिस वंश को भारत ने राणा के जुत्ते के नीचे से निकाला, स्वतन्त्र महाराजा बनने का सौभाग्य प्रदान किया, उसी वंश का राजा महेन्द्र ने भारत के खिलाफ आग उगलना शुरु किया जो आज पर्यन्त नेपाली राष्ट्रवाद माना जा रहा है । ज्ञात हो कि भारत ने अगर राजा त्रिभुवन को शरण न दी होती, राणाओं का शासन अन्त न की होती, प्रजातन्त्र स्थापना में सहयोग न की होती तो संभवतः आज भी नेपाल में राणातन्त्र ही होता ।

भारत से बदला लेने के लिए राणाओं ने महेन्द्र की शादी राणा परिवार में कराने की रणनीति बनायी । शादी के बाद ससुराल के दीवाने महेन्द्र ने अपने पिता त्रिभुवन के खिलाफ ही अनसन पर बैठ गये जब उन्हें यह पता चला कि त्रिभुवन उन्हें राजा बनाने के पक्ष में नहीं थे ।

शादी के बाद राणाओं ने महेन्द्र को भारत के खिलाफ भरकाने लगे जिसे महेन्द्र ने सुगा के तरह रट लिया और उसी भारत के खिलाफ भारत के विरोधियों के भाषा बोलने लगे जिस भारत ने उनके वंश को स्वतन्त्र राजा बनाया था । वही भारत विरोधी भाषा, कार्य, शैली तथा मानसिकता आजतक नेपाली राष्ट्रवाद का पर्याय बना हुआ है । दूसरी तरफ भारत एक ऐसा देश है कि उसके विरोध में अनाव सनाव बोलने बालों को कमजोर और अपने को सम्पन्न और ताकतवर समझता है । उसका यह मनोविज्ञान बडा विचित्र का है कि नेपाल एक छोटा सा देश है । उसे यह पता ही नहीं कि भियतनाम भी एक छोटा सा ही देश है जो चीन के पचास हजार सैनिकों की मौत का कारण बन गया । वह अपने विरोध करने बालों को भिखारी समझकर हमेशा उसे दान दक्षिणा देकर शान्त करना चाहता है जो पाने बाले के लिए फायदा और भारत के लिए कालान्तरीय नोक्सानदेह है ।

नेपाल और भारत के बीच में बली का बकरा बना है मधेश । मधेश, जिसका जिक्र भारत के महान् इतिहास माने जाने बाले हर ग्रन्थ; मनुस्मृति में, वेदों में, बुद्ध ग्रन्थों में, रामायण, गीता, एवं महाभारत आदि समेत में उल्लेखित तथ्य तथा प्रमाणें को भी अनदेखा किया जा रहा है । मधेश को नेपाल से जोडकर भारत ने हमेशा एक गम्भीर भूल की है जो मधेशी नहीं चाहता है । क्यूँकि प्रमाण के रुप में भी मधेश का सबसे नजदिक भारत ही तो है ।

मधेश अपने आजादी के लिए अभियानमय है । मधेश का हर समस्या का समाधान भारत नहीं हो सकता, और न होना चाहिए । मधेशी दल और उसके नेतृत्वों की भी हर छोटेमोटे समस्या में भारत को ही परेशान करना एक बिमारी बन गयी है जिसे मधेश को ही हल करना होगा । लेकिन भारत को इस बात से वाकिफ हो ही जाना चाहिए कि मधेश उसका अहित कल्पना में भी नहीं चाहेगा । क्यूँकि मधेश का आधा प्राण तो भारत है । जनकपुर और अयोध्या का सम्बन्ध न किसी भारत ने, न तो किसी नेपाल ने बनाया है । त्रेता युग का एक राम और एक सीता अब लाखों में है जिनके सम्बन्धों को तोडना कठिन ही नहीं, नामुमकिन भी है ।

मधेश को भारत यह कैसे कह सकता है कि वह नेपाली चुनावों में भाग ले ? अगर भारत यह कहता है तो यह प्रमाणित हो सकता है कि मधेश का शोषण में भारत का भी कहीं न कहीं हाथ है । शोषित और शासित लोग जब किसी के कारण मरने लगे तो वो मौत स्वीकारने से पहले उन्हें मौत देने बालों से भी हिसाब माँग लेता है । और वह घडी मरने बालों के लिए जितना कठीनपूर्ण होगा, मौत देने दिलवाने बालों के लिए भी कठीनपूर्ण ही होगा । वैसे भी मधेश नेपाल का नहीं है, न हो सकता । यह बात अंग्रेज ने जाना और भारत को भी जानना होगा । क्यूँकि मधेशियों को नेपाली मानकर भारतीय सेना में भर्ती नहीं लिया जाता है ।

प्रचण्ड, जिसने मधेश को चूना लगाने का काम किया है, मधेश बखुबी समझता है । नेपाली बजेट का भाग बण्डा ही तय करता है कि २.५ मधेशी बराबर १ नेपाली है । ५,००० नेपाली लोगों के लिए एक नगरपालिका पहाडों में है, वहीं मधेश में ५२,००० जनसंख्या पर एक नगरपालिका मधेश में । जबकि १२ खर्ब, ७८ अर्ब, ९९ करोड, ४८ लाख, ४४ हजार बजेटीय रकम का ९०% रकम मधेश का है ।

सबसे गम्भीर बात तो यह है कि मधेश आन्दोलन के बल पर स्थापित संघीयता को ही समूल नष्ट करने के रणनीति अनुसार ही नेपाली पार्टिंयों ने गाँवपालिका जैसे भयंकर समस्यादायक स्थानीय संरचना का निर्माण हुआ है । उन गाँवपालिकाओं में भ्रष्टाचार, अनियमितता, घुसखोरी तथा आम जनता की परेशानियाँ बढेंगी और संघीयता के लिए लडने, मरने और शहादत देने बाले लोगाें द्वारा ही उसे शमसान घाट पर पहुँचाने की काम करने की जुगाड लगायी गयी है ।

मधेशी नेता बिगडे तो बिगडने दें । उन्हें अब सुधारने की जरुरत नहीं है । अब मधेशी जनता को खुद सुधरना होगा । मत बदर कर मधेश की जित को सुनिश्चित करना करना होगा । मतदान के द्वारा ही नेपाली शासन, प्रशासन, लगानी, सुरक्षा, मतपत्र आदि को सदुपयोग कर बदर मत के साथ मधेश को जिताना होगा । वह एक जनमत संग्रह का ही काम करेगा ।

मधेशी नेता मधेश के लिए नहीं, नेपाल के लिए राजनीति कर रहे हैं । हमें सचेत होना है । अपने देश और समाज के लिए इमानदार रहे प्रचण्ड से हमें शिक्षा लेनी होगी और हमें भी अपने समाज के उद्दार के लिए संकल्प लेना होगा ।

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