नेपाल में मधेशी और नागरिकता

सुनिल रंजन सिंह

नागरिकता का शाब्दिक अर्थ होता है, देश का नागरिक अर्थात् राष्ट्र द्वारा व्यक्ति को ही गई समुचित पहचान पत्र । नेपाल में जब-जब नागरिकता का सर्न्दर्भ उठता है, तब-तब मधेश और मधेशी शब्द चर्चा में आ जाता है । और इस सर्न्दर्भ के साथ भारतीय विस्तारबाद की चाल है, यह कहकर स्वाभाविक सर्न्दर्भ को अस्वाभाविक रुप में उत्तेजित बना दिया जाता है । विडम्बना यह है कि नेपाल की आदिवासी एवं मधेशी जनता को अपने ही देश में यह करना पडÞता है कि हम भी नेपाल के नागरिक हैं, हमें नागरिकता दो । नागरिक होकर मधेशियों को नागरिकता लेना संवैधानिक, नैर्सर्गिक अधिकार है । मधेशियों को नागरिकता प्राप्त करने के अधिकार को नैर्सर्गिक अधिकार सिद्ध करने के लिए स्व. नेता गजेन्द्र ना. सिंह ने ने. सदभावना पार्टर्ीीा निर्माण किया, जिसका स्वरुप आज के दिनों में विभिन्न टुकडÞो में बँटा हुआ है ।
इसी तरह नागरिकता एवं मधेशियों की जीती जागती समस्याओं के समाधान के लिए ही सभी मधेशवादी पार्टियाँ विगत का चुनाव लडÞी और अपनी-अपनी वजूद को स्थापित की । फलस्वरुप गणतन्त्रात्मक नेपाल का प्रथम राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और संविधान सभा सदस्यों के रुप में मधेशियों की उपस्थिति स्थापित हर्ुइ । वि.सं. २०६३ के बाद नेपाल में बनी हरेक सरकार में मधेशी मंत्रियों की बहुल उपस्थिति को देखकर माधव नेपाल के प्रधानमंत्रित्व काल में नियुक्त कार्यवाहक निर्वाचन आयुक्त नीलकण्ठ उप्रेती नीलकंठ पक्षी की तरह नहीं, विषधर नाग की तरह फुंफकार के तर्ज पर गरजना शुरु किया, और कहा कि नेपाल में ५० लाख मतदाता फर्जी है । जिसको रद्द करना पडेÞगा । इसका र्समर्थन करते हुए पर्ूव प्रधानमंत्री माधव नेपाल ने निर्वाचन आयोग से कहा कि तुम मतदाता नावमाली तैयार करों, जिससे भविष्य में होने वाले मतदान में मधेशियों को मतदान से बंचित करके उन्हें अपने मनोनकूल नेता चूनने से रोका जाय, ताकि मधेशी लोग पहाडÞी लोगों की गुलामी करता रहे ।
नेपाल में नागरिकता सम्बंधी संवैधानिक व्यवस्था
वि.स. २००४, २००६ और २०१५ साल में संवैधानिक रुप में नागरिकता का अधिकार नहीं दिया गया था । २०१९ में भी निर्दलीय पंचायती शासन के समय में पहलीबार संविधान में एक अलग व्यवस्था के अर्न्तर्गत जन्म, वंश, बसोबास और वैवाहिक नागरिकता प्राप्ति का आधार माना था । इसी तरह प्रजातान्त्रिक आन्दोलन २०४६ के बाद २०४७ में निर्मित संविधान में वंशज, बसोबास, जन्म और वैवाहिक नागरिकता प्राप्ति का आधार माना गया था । जनआन्दोलन २०६२/०६३ के फलस्वरुप नेपाल का अन्तरिम संविधान २०६३ में राजनीतिक सहमति के आधार पर भी जन्म, वंशज, बसोबास एवं वैवाहिक सम्बंध को ही नागरिकता प्राप्ति का आधार माना गया ।
नेपाल में नागरिकता सम्बंधी कानून
नेपाल में पहलीबार वि.स. २००९ वैशाख २६ गते नागरिकता सम्बंधी ऐन आया था । ऐन ‘क’ में लिखा था कि नेपाल की आदिवासी होकर नेपाल में ही जन्म लेने की अवस्था में, ऐन ‘ख’ में माता और पिता में से कोई एक नेपाल में ही जन्मा हुआ है तो, ऐन ‘ग’ नेपाल में स्थायी रुप में रहते हो, ऐन ‘घ’ नेपाली नागरिकता के साथ स्थायी रुप में कोई विदेशी महिला रहती हो, ऐसा उल्लेख था । वि.स. २०२० में नागरिकता ऐन आया, उसके ऐन दफा नं. ३ में अंगीकृत नागरिकता के रुप में व्यवस्था की गई थी । इसी तरह नेपाल नागरिकता ऐन २०६३, नागरिकता प्रमाणपत्र वितरण कार्यपत्र विधि २०६३, नेपाल नागरिकता एन् २०६३ और नागरिकता वितरण कार्य निर्देशिका २०६३ के आधार पर अधिक मधेशियों को पहाडÞी शासक द्वारा नागरिकता प्रमाणपत्र दिया गया । ऐसा कहकर व्यपक प्रचार-प्रसार किया गया, उसमें भी यह कहा गया है कि मधेशी लोग कम, भारतीय लोग अधिक मात्रा में नागरिकता प्रमाणपत्र प्राप्त किया है ।
नागरिकता वितरण टोली
वि.स. २०३२, ३६, ०४३, ०४४, ०४५, ०४६, ०५० और ०६३ में नेपाली नागरिकों को नागरिकता प्रमाणपत्र प्रदान करने के लिए प्रत्येक ग्राम पञ्चायत और नागरपालिका में नागरिकता वितरण टोलियों ने नागरिकता प्रमाणपत्र वितरण किया पर मधेशियों की तुलना में दार्जीलिङ्ग, सिक्किम में बसे नेपाली भाषा-भाषियों को चेहरे की समानता के आधार पर, अपना भाई-बहन समझकर नागरिकता प्रमाणपत्र देने का काम किया । जिस के लिए किसी पहाडी नेपाली नागरिक एतराज नहीं हुआ, यही इस देश की विभेद नीति है ।
नागरिकता के सम्बंध में गठित आयोग
वि.स. २०५१-११-२३ गते गठित आयोग ने अपना कार्य २०५१-१२-२९ गते आरम्भ किया । गठित आयोग के अध्यक्ष के रुप में स्व. धनपति उपाध्याय तथा सदस्यों के रुप में क्रमशः रामजी विष्ट, अग्नि खरेल, गंगाप्रसाद थापा, श्याम ढकाल, राधेश्याम अधिकारी थे । नेपाली कांग्रेस ने २०५१ १२-२९ में ही अपना प्रतिनिधि वापस बुलाया । डा. वंशीधर मिश्र, राजेन्द्र महतो, रामेश्वर साह -सदस्य सचिव) के रुप में नियुक्त कर उच्चस्तरीय नागरिकता आयोग बनाया गया था । २०५२ साल में धनपति आयोग का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया । अध्यक्ष महन्थ ठाकुर, जयप्रकाश आनन्द, मिर्जा दिलसाद वेग तथा अनीस अन्सारी द्वारा प्रतिवेदन अध्ययन एवं सुझाव प्रस्तुत किया गया पर उसे कचरे की टोकरी फेंक दिया गया ।
नागरिकता के सम्बंध में सर्वोच्च अदालती धारणा
नेपाल राज्य द्वारा विवशतावस समय-समय पर नागरिकता देने के लिए ऐन कानून अवश्य बनाया गया, जिससे मधेशियों को सहज रुप में नागरिकता प्रमाणपत्र मिल सके किन्तु पहाडी संकर्ीण्ा मानसिकता से ओत-प्रोत पहाडÞी वकील ने सर्वोच्च अदालत में केश डायर कर पहाडÞी न्यायाधीश द्वारा मधेश मधेशी विरोधी फैसला करवाने के कई उदाहरण है ।
बालकृष्ण न्यौपाने विरुद्ध श्री ५ की सरकार समेत के केश में सर्वोच्च अदालत की व्याख्या इस प्रकार थी- संविधान और ऐन द्वारा माने गए आधार विपरीत वि.सं. २०३६ साल को आधार वर्षमानने की बात संविधान और ऐन द्वारा निर्धारित किया गया । आधारों को उल्लंघन करते हुए नागरिकता नियमावली २०४९ का नियम ३-४) का खण्ड ‘क, ख, ग’ की व्याख्या संविधान की धारा ८, ९ तथा नेपाल नागरिकता ऐन २०२० की दफा ३ और १६ के विरुद्ध होने के कारण शुरुवात में बदर करके रीट जारी किया गया था । इसी तरह अधिवक्ता अच्युत खरेल, अधिवक्ता चन्द्रकान्त ज्ञावली के केसों में सर्वोच्च अदालत ने पहाडÞी शासक वर्ग कर्ीर् इच्छा पर्ूर्ति करने का काम किया ।
नागरिकता सम्बंध में अन्तर्रर्ाा्रीय संधि सम्झौताः
मानव अधिकारों के विकास के साथ-साथ नागरिकता प्राप्ति के सम्बंध में अन्तर्रर्ााट्रय दस्तावेजों में किसी भी देश के नागरिक को नागरिकता प्राप्त करने के अधिकार को आत्मसाथ किया गया है । खासकर मानवाधिकार सम्बंध में विश्वव्यापी घोषणापत्र सन् १९४८ की धारा १५ में मानव को अपनी राष्ट्रीयता होगी, किसी को उसकी राष्ट्रीयता से विमुख नहीं किया जाना चाहिए साथ ही किसी को भी अपनी राष्ट्रीयता परिवर्तन करने के अधिकार से विमुख नहीं किया जाना चाहिए, ऐसी व्यवस्था की गई है । इसी तरह शरणार्थी सम्बंध में भी संयुक्त राष्ट्रसंघीय अनुबन्ध १९५१ के द्वारा किसी भी देश में शरणार्थी के रुप में रहने का अधिकार प्रदत्त किया गया है । साथ ही उन्हें परिचयपत्र और यात्रा करने के सम्बंध कागज पत्र प्रदान करने का अधिकार देने के लिए राष्ट्र को कहा गया है ।    ऐन २४ में बच्चों को पंजीकरण करने तथा राष्ट्रीयता प्राप्त करने के अधिकार की भी व्यवस्था की गई है । अन्तर्रर्ाा्रीय विधान अनुसार नागरिकता प्राप्त करने का मुख्य अधार जन्म, वंशज, रजिस्ट्रेशन अंगीकरण, क्षेत्रविलयन एवं पुनर्स्थापना आदि है ।
-लेखक सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता हैं

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