नेपाल में मधेशी समुदाय की अवस्था और मधेश आन्दोलन का उद्देश्य

जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण हो और सेना एवं अदालतसहित राज्य के हरेक अंग मे मधेशी समेत सभी समुदायों के समानुपातिक प्रतिनिधित्व को संवैधानिक गारेन्टी हो

अमरेन्द्र यादव :नेपाल में तीन भूभाग हैं – हिमाल, पहाड़ और मधेश । मधेश को तराई भी कहा जाता हैं । ये नेपाल का दक्षिणी मैदानी इलाका हैं । नेपाल के कुल भू–भाग का १७ प्रतिशत हिस्सा तराई÷मधेश का हैं । लेकिन यहाँ ५१ प्रतिशत से ज्यादा नेपाली नागरिक स्थाई तौर पर निवास करते हैं ।
मधेश की ५१ प्रतिशत जनसंख्या में सभी मधेश के मूलवासी नहीं हैं । विगत सौ वर्षों में नेपाल के उत्तरी पहाड़ी इलाका से अप्रवासी के तौर पर आए पहाड़ी हिन्दू जातजातियाँ और जनजाति भी आज यहाँ पर निवास करते हैं । मधेश की कुल जनसंख्या में पहाड़ी जातजाति और जनजाति की कुल जनसंख्या एक तिहाई हो गयी है । इस तरह अपने ही भू–भाग में मधेशियों की जनसंख्या दो तिहाई के अनुपात में हैं तो नेपाल की कुल जनसंख्या में

मधेशी जनसंख्या का अनुपात एक तिहाई है ।
मधेश मूलतः तराईवासी मधेशियों की आदिभूमि है । यहाँ धार्मिक रूप से हिन्दू और मुस्लिम समुदाय निवास करते हैं । हिन्दू अन्तर्गत ब्राह्मण, कायस्थ, भुमिहार, राजपूत, यादव, कोइरी, कुर्मी, तेली, सुड़ी, केबट, कानु, कलवार, धानुक, दुसाध, चमार, खत्बे, मुसहर, डोम, मेहतर, सुतिहार, हलवाई, मल्लाह, धोबी आदि अनेक जातजातियाँ निवास करते हैं । थारु, राजवंशी, दनुवार, सन्थाल, उरावसहित अनेक आदिवासियों की भी ये प्राचीन भूमि रही है । मैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, अवधि, थारु और राजवंशी जैसे भाषा यहाँ के मूल बासिन्दा की अपनी मातृभाषा है और हिन्दी भाषा को यहाँ के बासिन्दा सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं ।
मधेश पर पहाड़ी शासकों का शासन
बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमा से जुडेÞ मधेश क्षेत्र के मूलवासी आज भी नेपाल के पहाड़ी शासकों द्वारा संचालित आन्तरिक उपनिवेश का शिकार हैं । अंग्रेजों ने सन् १८१६ डिसम्बर ८ के सन्धि के जरिये दो लाख रुपये के बदले में पूर्वी मधेश को नेपाल के राजा को सौप दिया । अंग्रेजों ने पश्चिम मधेश को भी सन् १८६० नवम्बर १ तारीख को नेपाल के तत्कालीन शासक को उपहार स्वरूप प्रदान किया । क्योंकि नेपाल के शासकों ने भारत के सिपाही विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों की मदद की थी । तभी से २० प्रशासनिक जिलों मे बटे मधेशी इलाका पहाड़ी शासकों का आन्तरिक उपनिवेश बनकर रह गया हैं । सन् १९५८ तक भी मधेशियों को राजधानी काठमांडु और पहाडी इलाकों मे जाने के लिए वीसा लेना पड़ता था ।
 

राज्य के निकायों में मधेशियों के प्रतिनिधित्व की स्थिति

नेपाल में मूलतः तीन समुदाय निवास करते हैं । खस हिन्दू पहाड़ी जाति, पहाड़ी आदिवासी÷जनजाति एवं मुस्लिम और थारु सहित के मधेशी समुदाय । दलित सहित पहाड़ी हिन्दू जाति की जनसंख्या ३२ प्रतिशत है तो आदिवासी÷जनजाति और मधेशी समुदाय की जनसंख्या लगभग समान ३४ प्रतिशत के आसपास हैं । लेकिन राज्य निकायों में इन तीन समुदायों की सहभागिता बहुत असमान हैं । न्यायपालिका क्षेत्र में खस हिन्दू उच्च पहाड़ी जाति का दबदबा ९० प्रतिशत के आसपास है । इसी तरह व्यवस्थापिका संसद में इन शासक समुदाय का प्रतिनिधित्व ६० प्रतिशत और प्रशासनिक तथा अन्य संवैधानिक निकायों मे ८५ प्रतिशत से कम नही हैं । इस आँकडेÞ से पता चल जाता हैं कि राज्य के निकायों मे मधेशी समुदाय की सहभागिता का अनुपात क्या होगा ।
मधेशी समुदाय के जनसंख्या को अंक में कहा जाए तो नेपाल में ये समुदाय एक करोड़ के आसपास है । लेकिन १ लाख की जनसंख्या में रहे नेपाली सेना में उनका प्रतिनिधित्व १ हजार से ज्यादा नहीं हैं । इसी तरह, प्रशासनिक निकाय में भी मधेशी समुदाय की उपस्थिति १० प्रतिशत से ज्यादा नही हैं । मधेश के २० जिलाें की अवस्था देखें तो जिला अन्तर्गत के प्रशासनिक प्रमुख माने जानेवाले जिला प्रशासन प्रमुख, जिला अदालत के न्यायाधीश, जनपथ प्रहरी प्रमुख, सशस्त्र प्रहरी प्रमुख, जिला अन्तर्गत के सेना बैरेक के प्रमुख लगायत अधिकांश प्रमुख पद पर आज भी गैर मधेशी समुदाय का प्रभुत्व कायम है ।

 
मधेश आन्दोलन का विकास–क्रम

नेपाल में पारिवारिक राणा शासन की समाप्ति के बाद से ही अपने अधिकार और पहचान के लिए मधेशियों द्वारा आन्दोलन का इतिहास रहा है । सब से पहले सन् १९५० के दशक में कुलानन्द झा और वेदानन्द झा ने तराई कांग्रेस पार्टी गठन करके अधिकार का आन्दोलन आरम्भ किया था । निर्दलीय पञ्चायती व्यवस्था के अन्त के बाद गजेन्द्र नारायण सिंह ने नेपाल सद्भावना पार्टी के बैनर तले अधिकार के आन्दोलन को आगे बढ़ाया । माओवादी सशस्त्र विद्रोह के पृष्ठभूमि में उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाला मधेशी जनअधिकार फोरम ने मधेश आन्दोलन के मशाल को उठाया । उपेन्द्र यादव के अलावा महन्थ ठाकुर, राजेन्द्र महतो, महेन्द्र प्रसाद यादव जैसे दर्जनों नेता और पार्टियाँ वर्तमान मधेश आन्दोलन मे शरीक हैं । इन सभी नेता और राजनीतिक पािर्टयोंं की मांग और अड़ान यही है कि मधेश के २० जिला को मिलाकर दो स्वायत्त प्रदेश हो । एक पूर्वी मधेश प्रदेश और दूसरा, पश्चिमी मधेश प्रदेश । मधेश के दो प्रदेश में बहुभाषिक नीति के तहत मधेशी भाषाओं को सम्मान और अधिकार मिले । जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण हो और सेना एवं अदालतसहित राज्य के हरेक अंग मे मधेशी समेत सभी समुदायों के समानुपातिक प्रतिनिधित्व को संवैधानिक गारेन्टी हो आदि इत्यादि ।
इन सभी व्यवस्था और अधिकार सहित का नया संविधान बनाने के लिए संविधान सभा को अन्तरिम संविधान ने निर्देश दिया था । उत्पीडि़त और उपेक्षित समुदाय के पक्ष में और पहचान पर आधारित संघीय प्रदेश निर्माण करने की ज्यादा सम्भावना पहले संविधानसभा में थी । क्योंकि उस समय के क्रान्तिकारी माओवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी तो मधेशी पार्टियो ंकी भी ताकतवर उपस्थिति थी । उस स्थिति को भाँपते हुए पहाड़ी शासक वर्ग ने पहले संविधानसभा को संविधान बनाए बिना षडयन्त्रपूर्वक विघटित करवाया और दूसरे संविधान सभा से अपने मनमाने तरीके से संविधान बनाया । दूसरे संविधान सभा से, संविधान बनाते वक्त नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और एकीकृत माओवादी जैसी बड़ी तीन पार्टियों ने उत्पीडि़त मधेशी और जनजाति समुदायों की मांग को नजर अन्दाज ही नहीं किया बल्कि भारत सरकार और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के सलाह को ठुकराते हुए मधेशी पार्टियों को भी अनदेखा किया । उन्होंने पहले और दूसरे मधेश आन्दोलन से चौथे शक्ति के रूप में उभरे मधेशी मोर्चा और उनके नेताओं के आन्दोलन पर दमन कर के दूसरे संविधान सभा से बलपूर्वक संविधान जारी किया । ये नया संविधान अन्तरिम संविधान से भी पश्चगामी तथा सिर्फ पुराने शासक वर्ग का पृष्ठपोषण करने के लिए लाया गया है । इसका सब से बड़ा उदाहरण है कि निर्धारित ७ प्रदेश में ६ प्रदेश में पहाड़ी खस शासक समुदाय का दबदबा ही कायम नहीं रहेगा बल्कि इन सभी ६ प्रदेश में उसी शासक समुदाय के नेता मुख्यमन्त्री बनेंगे ।
इसी वजह से सम्पूर्ण तराई मधेश में पाँच महीनों से भी ज्यादा समय से तीसरा मधेश आन्दोलन जारी है । इस आन्दोलन में भारत सरकार का ही नही, भारत की सम्पूर्ण जनता, बिहार तथा उत्तर प्रदेश के नेताओं एवं आम जनता का और अधिक समर्थन और सहयोग अपरिहार्य है ।

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