नेपाल में महिला हिंसा की मौजूदा दशा : विनोदकुमार विश्वकर्मा

संदर्भ–महिला विरुद्ध के हिंसा उन्मूलन संबंधित अन्तर्राट्रीय दिवस, नेपाल में महिला हिंसा की मौजूदा दशा
विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’ ९ दिसिम्बर |
नारी ईश्वर का वरदान है, उसकी महत्ता को किसी भी समाज में नकारा नहीं जाता, क्योंकि उसका समाज के निर्माण में अमूल्य योगदान है । नारी–पुरुष परिवार रूपी रथ के दो पहिये हैं । जिनमें से यदि एक पहिया टूट जाये तो रथ का चलना कठिन हो जाता है । पुरुष के जीवन काल में तीन स्त्रियां से घनिष्ट सम्बन्ध स्थापित होता है– माता, पत्नी और बेटी । ये तीनों स्त्रियां अपनी–अपनी भूमिका का कुशलता से निर्वाह करती हुई लोगों के आदर, प्रेम और वात्सल्य की हकदार होती हैं ।

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भारतीय समाजशास्त्री एम.एन.अंसारी के अनुसार ‘समाज के सृजन का श्रेय नारी को है । नारी ने पुरुष को जन्म दिया । जगत जननी ने प्रकृति रूप में पुरुष सहवास से मानव बीर्य को अपनी सृष्टि गर्भ में धारण किया और सृष्टि सृजन का सूत्रपात किया । सृजन के साथ ही नारी पुरुष पर निर्भर हुई, जिसके संसर्ग, सहवास व संबल के कारण नारी का न केवल भोग्या स्वरूप व अस्तित्व ही सार्थक रहा सका अपितु उसका सृजन रूप भी आगे निसृत होती रही । इस प्रकार आदि सृष्टि के अन्तर्गत नारी पुरुष की संगिनी, अंकशायिनी, सहवासिनी रही, किन्तु इसके साथ–साथ वह पराश्रयी भी हो गई । नारी का अस्तित्व पूर्ण तथा पुरुषाधीन हो गया ।’
नारी को सुख व सुरक्षा प्रदान करने के बदले में, पुरुष वर्ग ने नारी से जो मूल्य लिया है उससे नारी की सामाजिक समता, सामाजिक अन्तर्चेतना व अन्तरात्मा को झकझोर दिया है । पुरुष अधिशासित सामाजिक व्यवस्था में नारी को तिरस्कृत किया जाता है, नारी को शोषण किया जाता है, उसका अपमान किया जाता है, और यहां तक की नारी के साथ मानवीय पशुवत हिंसात्मक व्यवहार किया जाता है । आज नारी को खरीदा जाता है, बेचा जाता है तथा लूटा जाता है ।
नेपाल की इस पितृप्रधान व्यवस्था में महिलाओं को अत्याचार का एक माध्यम माना जाता है । ये अत्याचार कभी उस अनुशासित करने के बहाने से, तो कभी अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए किये जाते हैं । ये अत्याचार कभी शारीरिक तो कभी मानसिक होते हैं । महिलाओं के साथ शारीरिक या यौन आधारित भेदभाव से तो हम सभी परिचित हैं, जबकि उनके साथ मानसिक या भावनात्मक और आर्थिक आधार पर जो भेदभाव होता है, उसके बारे में संवेदनशीलता बहुत कम ही देखने को मिलती है ।
एक महीने पूर्व काठमांड़ू स्थित एक व्यावसायिक हाउस में नोकरी करनेवाली विपासा (नाम परिवर्तन) को ऑफिस में उसके सामने की केबिन में बैठनेवाला उसका सहकर्मी निरंतर घुरता रहा, पर कहता कुछ नहीं, उसकी इस हरकत से विपासा को काफी असहज महसूस होता था । उसकी इस हरकत की वजह से वह अपने काम पर पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाती थी । उनसे एक दो बार उस लड़के से इस बारे में खुल कर पूछा भी, पर उसने ऐसी किसी भी हरकत से साफ इन्कार कर दिया । इस मामले में भी स्पष्ट तौर से विपासा के साथ किसी तरह का दुव्र्यवहार नहीं किया, लेकिन उसके सहकर्मी द्वारा उसे लगातार घूरते रहने की वजह से वह मानसिक रूप से तनावग्रस्त हुई, जिसका असर उसे वर्क परफॉर्मेंस पर पड़ा, तो ऐसे मामले को कानूनन मानसिक या भावनात्मक उत्पीड़न की श्रेणी में रखा गया है ।
यह एक उदाहरण है यह बताने के लिए कि आज भी हमारे समाज में किस तरह से महिलाओं के साथ भेदभाव देखने को मिल रहा है । इसके अलावा किसी महिला के सामने पांव पर पांव चढ़ा कर बैठना, दोनों तर्जनी उंmगलियों को महिला की ओर इंगित करते हुए बात करना, अपने गरदन या चेहरे पर हाथ फेरना, शर्ट के बटन खुले रखना, नंगे बदन केवल तौलिया पहन कर घूमना, उसके सामने अपने गुप्त अंग को खुजलाना, मां–बहन से जुड़ी गालियां देना जैसे व्यवहाराें को भी महिलाओं के सन्दर्भ में असम्मानजनक माना जाता है । लड़कियों व महिलाओं को अपने घरों में भी ऐसे कई भेदभाव का शिकार होना पड़ता है, जिस पर लोग बात भी नहीं करते ।
महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के प्रकारों में महिलाओं के साथ त्रूmरता का व्यवहार करना, उनका यौन शोषण करना, यातना देना, बलात्कार करना, अपहरण करना, उनको मारना–पीटना, मादा भ्रू्ण हत्या के लिए बाध्य करना, उनके साथ छेड़छाड़ करना, दहेज के लिए यातनाएं देना और हत्या करना आता है । इस परिभाषा के अनुसार महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का वर्गीकरण निम्नानुसार किया जा सकता है– (१) मानसिक हिंसा (२) शारीरिक हिंसा (३) सामाजिक हिंसा और (४) घरेलु हिंसा ।
वर्तमान में शारीरिक हिंसा, सामाजिक हिंसा एवं घरेलु हिंसा संबंधित घटनाएं दिन–प्रति–दिन बढ़ती जा रही हैं । जैसे, बलात्कार संबंधित घटनाएं । बलात्कार संबंधित ज्यादातर घटनाएं पीड़िताओं के घर में, अभियुक्त के घर में, एकान्त में तथा उनके कार्यस्थल में घटित होती हैं । इसी प्रकार दहेज भी एक गंभीर विषय बना हुआ है । इसके कारण माता–पिता के लिए लड़कियों का विवाह एक अभिशाप बन गया है । दहज के कारण न जाने कितनी स्त्रियों को अनेक प्रकार की यातनाएं दी जाती हैं । हत्या तथा आत्महत्या के लिए मजबूर कर दी जाती है । जैसे, नेपालगंग–७ फुल्टेक्रा की जाहिरा सल्मानी, बांके, इन्द्रपुर–९ मानपुर की पूजा ठाकुर, नेपालगंज कारकांदो भुजे गांव की हेमकुमारी धोवी, बांके लक्ष्मणपुर–८ मियापरवा की फरिद शेष, नेपालगंज–१९ बालेगांव की आसरुन जोलहा, नेपालगंज, जयसपुर की चांदनी सल्मानी, चितवन, माड़ी–९ कल्याणपुर की देवी सुनार के साथ घटित घटनाएं हैं (कान्तिपुर, २०७३) । उपरोक्त सभी घटनाएं हत्या से संबंधित हंै । दहेज ने पारिवारिक विघटन, ऋणग्रस्त निम्न जीवनस्तर, बहु–पत्नी प्रथा, वेमेल विवाह, अनैतिकता, अत्याचार, भष्टाचार एवं अनेक मानसिक बीमारियों का जन्म दिया है । आज दहेज के कारण ही कई परिवारों में पुत्री के जन्म को अपशकुन माना जाता है ।
महिला उत्पीड़न का एक रूप है महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करना आज के हमारे समाज में आम बात हो गई है । कोई भी शहर, नगर या गांव इस गम्भीर अपराध से अछूता नहीं है । आज छेड़छाड़ ने बहुत विकृत रूप ले लिया है । छेड़छाड़ केवल ताने फिकरे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हिंसक रूप ले लिया है । छेड़छाड़ की घटनाएं अशिक्षित महिलाओं की अपेक्षा शिक्षित महिलाओं के साथ अधिक घटित होती हं । पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित खबरों के अनुसार सौ प्रतिशत पीड़िताएं छेड़छाड़ की घटना घटने का कारण सामाजिक दुर्बलता व पुरुष प्रधानता को मानती हैं ।
वर्ष २०६६ में महिला संगठनों, विभिन्न संस्थाओं, मानवाधिकार कर्मियों एवं नागरिक समाज की पहल एवं मांग के फलस्वरूप देश में ‘घरेलु हिंसा (कसूर एवं सजा), ऐन, २०६६ तथा ‘घरेलु हिंसा (कसूर एवं सजा) नियमावली, २०६७ को लागू किया गया । इसके तहत उन तमान पहलुओं को शामिल किया गया है, जो महिलाओं की गरिमा व सम्मान को किसी भी रूप में ठेस पहुंचा सकते हैं । कुछ लोग मानते हैं कि इस कानून के लागू होने के बाद से महिलाओं के प्रति होनेवाले अपराधों में कमी आयी है, जबकि दूसरा पहलू यह भी है कि कई बार लोग ऐसे अपराध के भागीदार बन जाते हैं ।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि नेपाल की आधी से अधिक आवादी महिलाओं की है । उन्हें अपना दर्द निवारण हेतु स्वयं आगे बढ़ना होगा । इसके लिए नारी का उत्पीड़न करनेवाली सामाजिक परंपराओं, प्राचीन रीतिरिवाजों, मान्यताओं, संस्थागत राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानदंड़ों का बहिष्कार करना पड़ेगा, तब ही नारी के सफल व सुखमय जीवन का सपना साकार हो सकेगी ।

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