नेपाल में मुस्लिम महिला की अवस्था : साधना यादव ‘विराजी’

नेपाल के सन्दर्भ में अगर बात की जाय तो मुस्लिम धर्मावलम्बी की जनसंख्या वि.सं. २०६८ की जनगणना के अनुसार ११,६४२५५ है । इसे प्रतिशत में परिणन करना हो तो नेपाल की कुल जनसंख्या का ४ प्रतिशत मुस्लिम धर्मावलम्बी नेपाल में रहते हैं । इसमें महिला की जनसंख्या लगभग ५७३५५०१ है । मुस्लिम समुदाय नेपाल के ७५ जिला में है कही स्थायी रूप से हैं तो कहीं अस्थाई रूप से

कोषाध्यक्ष, म.ट्रे.यु.म. केन्द्रीय अध्यक्ष, सद्भावना काठमाडौं सप्तरी मञ्च

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इतनी अधिक संखया में महिलाओं की उपस्थिति रहने के बावजूद इनकी अवस्था दयनीय है । हर एक दृष्टिकोण से इनकी अवस्था पिछड़ी हुई है । चाहे वह आर्थिक हो, शैक्षिक हो या सामाजिक । मुस्लिम समाज में शिक्षा की प्रणाली अलग प्रकार की है । ये मदरसा में जाकर शिक्षा अर्जित करती हैं । प्रायः धारणा यह है कि साधारण शिक्षा दिलाकर शादी कर दी जाय क्योंकि इन्हें घर ही तो सम्भालना है । उच्च शिक्षा से ये प्रायः वंचित ही रह जाती हैं । आज के परिवेश में सभी स्वयं को प्रथम स्थान में देखना चाहते हैं । किन्तु मुस्लिम समाज में महिलाओं के लिए ऐसी कोई सोच नहीं दिखती है ।
मुस्लिम महिला पर्दा प्रथा को स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं । यहाँ उनकी स्वयं की सोच काम नहीं करती बल्कि वो परम्परा का ही पालन करती हैं । जबकि पहनावे की स्वतंत्रता होनी चाहिए । नेपाल की मधेशी महिलाओं की भी अवस्था ऐसी ही है । समय और जगह के हिसाब से वस्त्र का चुनाव महिला का अधिकार है । उदाहरण के लिए हमारे पड़ोसी देश भारत की एक महिला टेनिस खिलाड़ी का उदाहरण हम ले सकते हैं, ‘टेनिस’ खेल जगत की चर्चित खिलाड़ी ‘सानिया मिर्जा’ । मुस्लिम समुदाय की होने की वजह से ये कई बार विवादों में आईं । जबकि बात सीधी सी थी कि बुरका लगाकर वो टनिस तो कभी नहीं खेल सकती थी । इन विरोधों का सामना कर ही वो आगे बढ़ सकी । अर्थात् समय और सन्दर्भ सापेक्ष वस्त्र का प्रयोग महिलाओं को दिया जाना चाहिए ।
मुस्लिम धर्म में विवाह के सन्दर्भ में अगर देखा जाय तो वहाँ बाल विवाह का प्रचलन भी है । कानून के द्वारा सजा की व्यवस्था है फिर भी छोटी उम्र में शादियाँ होती हैं । उनका शरीर इसके लिए तैयार नहीं होता फिर भी वो ब्याही जाती हैं और कम उम्र में ही माँ बनती हैं । साथ ही तलाक की तलवार भी उनके सिर पर लटकी रहती है । मुस्लिम समुदाय के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था फतिमा फाउन्डेसन प्रति महिना ३ से ५ पारपाचुके अर्थात् तलाक होने की तथ्य को बताती है । इसकी वजह बाल विवाह भी है । मुस्लिम समुदाय में परिवार नियोजन के साधन का प्रयोग भी वर्जित है । जिसकी वजह से ये कई कई बच्चों की माँ बनने के लिए बाध्य होती हैं ।
अतः मुस्लिम महिलाओं को सशक्त और सदृढ बनाने के लिए कदम उठाना अत्यन्त आवश्यक है । उन्हें शिक्षित और आर्थिक रूप से सबल बनाने की आवश्यकता है । महिला के अधिकार की बात जब भी उठती है तो यहाँ पुरुष वर्ग मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि देश के उच्च निकायों में राष्ट्रपति महिला, सभामुख महिला, न्यायाधीश महिला हैं वहाँ और क्या चाहिए । लेकिन क्या इन तीन पदों में महिलाओं के होने से अधिकार प्राप्ति हो जाती है ? यह सवाल मेरा हर पुरुष से है । व्

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