नेपाल में राष्ट्रीयता का विषय हमेशा से सत्ता प्राप्ति का साधन रहा है : श्वेता दीप्ति

अब सबसे बड़ा सवाल मधेशवादी दलों का है । आगे भी वो अपनी गलतियों पर टिके रहेंगे या मधेश की जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए एकीकरण की नीति अपनाकर आगे बढेंगे ?

श्वेता दीप्ति, काठमांडू | हिन्दुओं का महान पर्व विजयादशमीका आज अंतिम दिन, असत्य पर सत्य और अन्याय पर न्याय की विजय के इस त्योहार को पूरे देश ने उत्साहपूर्वक मनाया है । वहीं स्थानीय चुनाव की जीत और हार के बीच नेता त्योहार से अधिक आगामी चुनाव को लेकर चर्चा में रहे । कौन कहाँ से चुनाव लडेगा और आगामी रणनीति उनकी क्या होगी ? जनता के बीच अब कौन से चुनावी मुद्दे लेकर जाएँगे और किस लुभावने वादे के साथ जनता के मन को जीता जा सकता है फिलहाल यही तय किया जा रहा है । दो नम्बर प्रदेश में काँग्रेस अपनी स्थिति को मजबूत देखकर खुश है वहीं माओवादी संतुष्ट ।

देश की शुभचिन्तक पार्टी का दावा करने वाली एमाले दो नम्बर प्रदेश में कमजोर होने के बावजूद अपनी राष्ट्रवाद की नीति बदलने के मूड में नजर नहीं आ रही है । वो अब तक अपनी चुनावी कश्ती को इसी मुद्दे के साथ पार करना चाह रही है । जाहिर सी बात है कि मधेश अब तक उसके लिए हाशिए पर ही है बावजूद इसके एमाले अध्यक्ष और अन्य वरिष्ठ नेता बहुमत के साथ आगामी चुनाव के बाद सत्ता पर काविज होने के मनसूबे बाँध रही है । आज तक राष्ट्रीयता के मुद्दे को जिस तरह भजा कर राजनीति करते आए हैं उसे ही आगे भी हथियार बनाकर बढने की नीति है । नेपाल में राष्ट्रीयता का विषय हमेशा से सत्ता प्राप्ति का साधन रहा है । क्या राष्ट्रीयता कुछ विशेष नागरिक के कथित आत्मसम्मान का विषय मात्र है या तीन करोड़ नेपाली (जिसमें जाहिर तौर पर मधेश की जनता भी है) के अस्तित्व और पहचान का विषय है ? मधेश की जनता की लड़ाई दोयम दर्जे से निकल कर पहचान और अधिकार की लड़ाई है । पर उसे हमेशा राष्ट्रीयता की कसौटी पर खड़ा कर नेपाली नागरिक की पहचान से वंचित किया जाता रहा है । अगर मधेशी नेपाली हैं तो क्यों बार बार उन्हें यह स्पष्टीकरण देना पड़ता है कि वो भी नेपाली हैं ? यह ‘भी’ शब्द ही उन्हें अपने ही देश में अजनबी बनाता है और मुख्य दलों की खासकर एमाले की यही मानसिकता ने देश को दो धार में बाँट दिया है । नेपाल में संकीर्ण राष्ट्रवाद का हौवा पंचायत काल से ही हावी रहा है जो हमेशा से भूगोल और भावना के इर्दगिर्द घूमता रहा है । भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीयता हमेशा से किसी भी देश के लिए संवेदनशील विषय रहा है जो देश को जोड़ने की क्षमता भी रखता है और तोड़ने की भी क्षमता रखता है । अफसोस इस बात का है कि इसी संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक दल आग की तरह भड़का कर उस पर अपनी स्वार्थ की राजनीतिक रोटी सेकते आ रहे हैं और आश्चर्य इस बात की है कि यही दल राजनैतिक केन्द्रबिन्दु बन जाते हैं और देश की जनता के मन को बाँटकर सत्तासुख लेते हैं । वो भूल जाते हैं कि अगर यही स्थिति रही तो यह विष घातक सिद्ध हो सकता है ।

कुछ दिनों पहले एक आलेख पढ़ने का अवसर मिला था जिसमें एमाले अध्यक्ष ओली की विलक्षण, उक्तिवैचित्र्यपूर्ण तथा घाव करने वाली वाक्पटुता, की जम कर तारीफ की गई थी और साथ ही यह भी कहा गया था कि जिस तरह गोली का जवाब गोली से दिया जाता है उसी तरह आवश्यक हो तो जलने और जलाने वाली बोली का जवाब बोली से एमाले को देना चाहिए । यह एक विश्लेषक और चिन्तक की धारणा है परन्तु क्या यह उचित है ? जहाँ आप एक ओर समग्र देश पर शासन करने के इच्छुक हैं वहीं देश के एक हिस्से को दमित, शोषित और अवहेलित कर के आगे बढ़ना चाह रहे हैं क्या इक्कीसवीं सदी का परिदृश्य आपकी इस मानसिकता को स्वीकार कर पाएगी ? परिवार का जिम्मेदार मुखिया वही हो सकता है जिसमें पूरे परिवार को साथ लेकर चलने की क्षमता हो वरना परिवार का टूटना तय है । दो नम्बर का परिणाम मधेश की मनोदशा को बताने के लिए काफी है बावजूद इसके आपका अडि़यल रुख अगर बरकरार रहा तो आगे के परिणाम का अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है ।

संविधान संशोधन का प्रयास और आगे भी प्रयासरत रहने की उक्ति से स्थानीय चुनाव के सफर को फिलहाल काँग्रेस ने तय कर लिया है अब देखना है कि आगे उसकी रणनीति किस लालीपाप को लेकर आ रही है । माओवादी अभी समन्वयवादी नीति को अपनाए हुए है । अब सबसे बड़ा सवाल मधेशवादी दलों का है । आगे भी वो अपनी गलतियों पर टिके रहेंगे या मधेश की जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए एकीकरण की नीति अपनाकर आगे बढेंगे ? अगर संसद में अपनी बात मनवानी है, तो इन्हें संख्या बढ़ानी होगी यह तो इन्हें समझना ही होगा । स्थानीय चुनाव में भाग लेकर आन्दोलन की संभावना तो समाप्त ही हो चुकी इसलिए अब खुद को संवैधानिक तौर पर मजबूत कर मधेश के मुद्दों को सम्बोधित करवाना होगा और इसके लिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि इन्हें एक होकर आगे बढ़ना होगा वरना परिणाम वही ढाक के तीन पात ।

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