नेपाल में संघीयता का ऐतिहासिक पक्ष और संवैधानिक व्यवस्था:धु्रव सिम्खडा

धु्रव सिम्खडा
नेपाल में संघीयता का एजेण्डा पहले किसने लाया था – इस का प्रष्ट उत्तर न होते हुए भी क्षेत्रीय दल के रुप में रह रहे गजेन्द्र नारायण सिंह के नेतृत्ववाली सद्भावना पार्टर्ीीे इस मुद्दा को पहली बार उठाया था। बाद में व्यक्ति गत रुप में ढुण्डीराज शास्त्री ने २०५४ साल के आसपास इस विषय को उठाया था। सम्भवतः उसी समय गोविन्द न्यौपाने ने भी नेपाली समाज का रुपान्तरण और राज्य पर्ुनर्संरचना के सम्बन्ध में किताब प्रकाशित किया था।
२००७ में राणा शासन से मुक्त होने पर लम्बे समय तक देश में राजनीति को नीचले तह तक पहुँचाने में असफलता मिलने पर जनता ने प्रजातन्त्र का अभ्यास नहीं किया। पञ्चायत काल में विकेन्द्रीकरण के नाम में सिंहदरबार से कुछ अधिकार जिल्ला पञ्चायत और गाँव पञ्चायत को दिया गया फिर भी उससे गाँव का विकास नहीं हुआ साथ ही पिछडÞा क्षेत्र और सीमान्तकृत समुदाय का हित भी नहीं हुआ। २०४६ में बहुदलीय व्यवस्था आने पर ९ वर्षबाद में ‘स्वायत्त ऐन, २०५५’ स्थानीय सरकार को अधिकार सम्पन्न बनाने का प्रयास किया गया। मगर उस समय तक देश माओवादी सशस्त्र व्रि्रोह के चक्रव्यूह में फँस चुका था।
उसके बाद जब सात राजनीतिक दल और तत्कालीन नेकपा माओवादीबीच १२ सूत्रीय समझदारी हर्ुइ, उस में पहली बार राज्य को अग्रगामी पर्ुनर्सरचना में लेजाने की बात उल्लेखित की गई। ‘निरंकुश राजतन्त्र को अन्त्य करते हुए पर्ूण्ा लोकतन्त्र स्थापित करने में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभी क्षेत्र में वर्गीय, जातीय, लैंगिक और क्षेत्रीय आदि समस्याओं का समाधान करने के लिए राज्य की अग्रगामी पर्ुनर्संरचना करते हुए पर्ूण्ा लोकतन्त्र की अवधारणा को कार्यान्वयन करना अपरिहार्य बताया गया।’ १२ सूत्रीय समझदारी के प्रस्तावना में यह उल्लेखित है।
इस प्रकार २०६२/०६३ के जनआन्दोलन के पहले ही आन्दोलनकारी राजनीतिक दल सब राज्य की पर्ुनर्सर्र्रचना करने वाले एजेण्डा में सहमत हो चुके थे। मगर दलों के बीच कैसा संघीय स्वरुप निर्माण किया जाए, इस बारे में स्पष्ट मोडेल नहीं था। निरंकुश राजतन्त्र के विरोध में सडक में उतरे दल शुरु में संघीयता के पक्ष में अग्रसर नहीं थे। इसलिए उस समय सडÞक में संघीयता के बारे में कोई नारा नहीं गूंजा था। आन्दोलन सफल होने के बाद माओवादी नेतृत्व काठमांडू आने पर सात दल और माओवादी के बीच २०६३ आषाढ २ गते बालुवाटार में हर्ुइ सहमति में भी संघीय पर्ुनर्संरचना के विषय में कोई खास बात नहीं लिखी गई। उस में ‘संविधान सभा के निर्वाचन के माध्यम से वर्गीय, जातीय, क्षेत्रीय, लैंगिक आदि समस्याओं का समाधान करते हुए राज्य की अग्रगामी पुनर्संरचना की जाएगी’ सिर्फइतना उल्लेख किया गया था। सात दल और माओवादीबीच पहली खुली सहमति होने पर भी राज्य पर्ुनर्संरचना के विषय में दल सब स्पष्ट हो नहीं सके थे।
०६३ कात्तिक २२ गते सात दल और माओवादी बीच बालुवाटार में सम्पन्न सम्झौता में भी १२ सूत्रीय समझदारी में जैसे राज्य के संघीय ढाँचे के विषय में उल्लेख किया गया था। ‘वर्गीय, जातीय, भाषिक, लैंगिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, क्षेत्रीय भेदभाव को अन्त्य करने के लिए राज्यका वर्तमान केन्द्रीकृत और एकात्मक ढाँचे को अन्त्य करते हुए समाजसेवी, लोकतान्त्रिक और अग्रगामी पर्ुनर्संरचना किया जाए’ सम्झौता में कहा गया है। राज्य पुनर्संरचना के लिए सुझाव देने के लिए उच्चस्तरीय आयोग गठन किया जाए। सम्झौते मे राज्य पर्ुनर्संरचना अन्तिम रुप संविधान सभा द्वारा दिया जाएगा, ऐसा उल्लेख किया गया।
इस तरह दल सब राज्य के एकात्मक स्वरुप को बदल कर संघीयता में जाने के लिए सहमत हुए। नेपाल सरकार और व्रि्रोही माओवादी बीच २०६३ मार्ग ५ गते सम्पन्न विस्तृत शान्ति सम्झौता ने भी इससे पहले दलों के बीच में हर्ुइ समझदारी को निरन्तरता देते हुए महिला, दलित, आदिवासी, मधेशी, उपेक्षित, उत्पीडित और अल्पसंक समुदाय, पिछडÞे क्षेत्र की समस्याओं को सम्बोधन करने के लिए वर्तमान केन्द्रिकृत और एकात्मक ढाँचे को समाप्त करके राज्य को समावेशी, लोकतान्त्रिक और अग्रगामी पर्ुनर्संरचना मे ले जाने की बात को महत्व के साथ उल्लेख किया गया।
अन्तरिम संविधान जारी होने से पहले ८ राजनीतिक दल संघीय शासन प्रणाली के पक्ष में सहमत हो चुके थे। मगर २०६३ माघ १ गते जारी अन्तरिम संविधान संघीय पर्ुनर्संरचना सम्बन्धी पर्ूव सहमतियों को आत्मसात नहीं कर सका। संघीय संरचना को अन्तरिम संविधान में स्वीकार नहीं किया गया है। ऐसा कहते हुए मधेशी जनअधिकार फोरम ने आन्दोलन शुरु किया। उस के फलस्वरुप सरकार और राजनीतिक दल संविधान संशोधन करके संघीयता के उल्लेख करने के लिए सहमत हुए। २०६३ चैत्र ३० गते संविधान संशोधन करते हुए संघीयता को अन्तरिम संविधान में उल्लेख किया गया। ‘मधेशी जनता लगायत आदिवासी, जनजाति और पिछडे हुए तथा अन्य क्षेत्र की जनता की स्वायत्त प्रदेश-चाहना को स्वीकार करते हुए नेपाल संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रतात्मक राज्य होगा। नेपाल की र्सार्वभौमिकता, एकता और खण्डता को अक्षुण्ण रखते हुए स्वायत्त प्रदेशों की सीमा संख्या, नाम-संरचना के अतिरिक्त केन्द्र और प्रदेश को सूचीगत करते हुए साधन-स्रोत और अधिकार का बँटवारा संविधान सभा के द्वारा निर्धारित किया जाएगा’, नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ में ऐसा उल्लेखित है।
संविधान में ही देश को संघीयता में ले जाने की बात है। और प्रदेशों का निर्माण और संघीय शासन प्रणाली की व्यवस्था अन्तरगत रखने की बात राष्ट्रीय प्रमुख कार्यसूची में आ गई। संघीयता के पक्ष में बहस शुरु होने पर संवैधानिक रुप में ही व्यवस्था को उल्लेखित करते-न करते विभिन्न मोडेल बहस के लिए आगे लाए गए। इस प्रकार का खाका मूलतः बौद्धिक व्यक्तित्व, जातीय संगठन के नेता लोग, क्षेत्रीय आन्दोलन के नेता-कार्यकर्ता तथा नागरिक मञ्च के प्रमुख और राजनीतिक दल के नेता-कार्यकर्ता एवं राजनीतिक दलों ने आगे बढÞाया।
संघीय इकाई की रचना के लिए संविधान सभा को सुझाव देने के लिए राज्य पुनर्संरचना आयोग गठन करना चाहिए। यह बात अन्तरिम संविधान में ही उल्लेख है। इधर संविधान सभा अन्तरगत राज्य पर्ुनर्संरचना और राज्य शक्ति वितरण समिति ने २०६३ माघ ६ गते १४ प्रदेश को प्रस्तावित किया हुआ मोडेल के साथ संविधान सभा को दिया गया। मगर उस विषय को लेकर संविधान सभा स्वयं विभाजित हो गई और संविधान द्वारा व्यवस्थित राज्य पर्ुनर्संरचना आयोग गठन होना चाहिए, इस निष्कर्षमें कांग्रेस और एमाले पहुँचे। ऐसा आयोग गठन करने के लिए माओवादी भी सहमत हुआ। मगर संविधान सभा के दो वषर्ीय कार्यकाल समाप्त होने पर भी आयोग गठन नहीं हो सका। फिर संविधान सभा का कार्यकाल १ वर्षबढÞा दिया गया। संविधान सभा की बढÞाइ गई अवधि चार महिना गुजरने पर भी आयोग गठन के बारे में कुछ नहीं हो सका है। ऐसी स्थिति में आयोग गठन होने पर भी उसकी कानुनी हैसियत क्या होगी – इस बारे में विवाद हो सकता है। क्योंकि संविधान सभा को राज्य पर्ुनसंरचना समिति ने अपने प्रस्ताव पेश कर दिया है। अब आयोग के सुझाव के लिए क्या करना चाहिए – आयोग बनने पर भी आयोग बडÞा या राज्यपर्ुनर्संरचना समिति बडÞी, यह विषय बिवादित होना निश्चित है।
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