नेपाल में हिन्दी की ऐतिहासिक यात्रा

प्रा.डा. आशा सिन्हा:हिन्दी है जनजन की बोली, अपने आप पनपनेदो’

-स्व. गोपाल सिंह नेपाली नेपाल एक बहुभाषी देश है, जहाँ हिन्दी भी बोली जाती है। कोई भी विवेकशील प्राणी इस तथ्य को अस्वीकार नहीं कर सकता कि हिन्दी का वैश्विक प्रचार और साहित्यिक परि भाषा में निरन्तर वृद्धि हो रही है और कथित अंग्रेजीदां वर्ग द्वारा उपेक्षा के बावजूद भी जनस् तर पर स्वाभाविक एवं सामान्य रूप से इस में और बढÞोत्तरी हो रही है। संचार में कमी होने पर भी इलेक्ट्रोनिक मीडिया और व्यावसायिक उपलब्धियों के लिए भी इसका उपयोग एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक फैल गया है। वास् तव में भारत के बाद सबसे अधिक हिन्दी पढÞने, बोलने और लिखने वालों की संख्या नेपाल में ही है।

तर्राई और पहाडÞ के बीच एक करोडÞ से अधिक लोगों की भाषा हिन्दी है। हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है, जो सारे देश को भावनात्मक रूप से जोडÞ सकती है, और सभी मधेश को एकता के सूत्र में बाँध कर रख सकती है। ऐतिहासिक दृष्टि से ३ हजार वर्षपहले नेपाल के सिद्ध संत एवं नाथ योगियों ने अपभ्रंश भाषा में रचनाएँ की। वह आज भी काठमांडू उपत्यका में उपलब्ध है। उसे हिन्दी का प्रारम्भिक रूप माना जाता है।hindi dibas-himalini hindi magazine

दाङ जिले की पाटेश्वरी मन्दिर में ग्यारह सय वर्षपुराना अभिलेख और रतनपुर चौघटा स्थित सिद्ध र त्ननाथ मठ में ६ सौ वर्षप्राचीन रत्ननाथ की कृति ‘रत्नवोध’ प्राप्त है। परन्तु निस्पृह भाव से भाषाओं के सन्तुलित और समुचित विचार के अभाव में किसी भाषा के प्रति कुंठित धार णा बन जाए तो इस में आर्श्चर्य नहीं। प्राचीन काल मंे कोई भाषिक समस्या नहीं थी। शिक्षा और संस्कृति के लिए प्रमुख एक मात्र भाषा संस् कृत थी, जिसे सब लोग सहर्षस्वीकार करते थे। मध्ययुग में काठमांडू उपत्यका में नेवारी के साथ मैथिली, व्रजभाषा और हिन्दी आदि का प्रयोग होता था।

तथा उपत्यका से बाहर पर्ूर्वी तथा पश्चिमी नेपाल की राजभाषा स्थानीय भाषा मैथिली, अवधी, भोजपुरी के साथ हिन्दी -ब्रजभाषा) का प्रयोग करते थे। सन् १७६८ में पृथ्वीनारायण शाह द्वारा वर्तमान नेपाल राज्य की स्थ्ाापना के बाद भी इन क्षेत्रों में प्रशासनिक कार्य क्षेत्रीय भाषा -हिन्दी) में होता था। इस बात की जानकारी नेपाल सरकार द्वारा प्रकाशित ‘पुर ातइभ्वपत्र संग्रह’ से प्राप्त होती है। शाहवंश के पुराने राजाओं के समय नेपाल में दो भाषाओं की ही प्रधानता थी, एक थी- नेपाली और दूसरी हिन्दी। धार्मिक और शैक्षिक कार्य हेतु अंग्रेजी और संस्कृत का महइभ्व था।

हिन्दी भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में शाहवंशीय र ाजाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। इन राजाओं ने समान रूप से आत्मीयतापर्ूवक नेपाली के साथ हिन्दी को भी आदर एवं सम्मान का दर्जा दिया। भक्तपुर के राजा जगज्ज्योति मल्ल, जगतप्रकाश मल्ल, भूपतीन्द्र मल्ल तथा रणजीत मल्ल के अतिरिक्त श्रीनिवास मल्ल तथा योगनरेन्द्र मल्ल ने हिन्दी भाषा में अनेक नाटक लिखे। काठमांडू उपत्यका के गुहृयेश्वरी केल टोल, नारायणहिटी आदि अनेक स्थलों में हिन्दी दोहे और चौपाइयों से भरे हुए शिलालेख प्राप्त हैं। निश्चित रूपेण नेपाली भाषा और साहित्य के विकास में हिन्दी भाषा और साहित्यकार ों की अथक सेवा को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। नेपाल में नयी वौद्धिक चेतना, नयी जागरुकता और नये युग के आगमन में हिन्दी साहित्य की भूमिका चिरस्मरणीय है।

उसी समय में जनकपुरधाम में १६७र्४र् इ. में महात्मा सूर किशोर दास रचित ‘मिथिला विलास’ की एक छोटी सी पुस्तिका के अध्ययन से उनके जीवन, सम्प्रदाय तथा कृतित्व की झलक मिलती है। उनकी शिष्य-परम्परा में प्रयोग दास हुए जिन्होंने हिन्दी के प्रति अपनी अभिरुचि का परिचय दिया है। काठमांडू में कृष्णभक्ति की र चनाओं के लिए तीन सौ वर्षपर्ूव ‘चन्द्रसखी’ नाम की एक प्रसिद्ध महिला का नाम स्मरणीय है। जनकपुरधाम की संत परम्परा में डेढÞ सय वर्षपर्ूव जनकराज किशोरी शरण ‘रसिक अलि’ दो दर्जन पुस्तकें लिख चुके हैं। उसी परम्परा में रामानन्द आश्रम के संस्थापक पं. अवध किशोर दास ने ‘रामानन्द साहित्य माला’ के नाम से हिन्दी पुस्तकों का प्रकाशन कर नेपाल में हिन्दी के विकास में अद्वितीय योगदान दिया है।

इसीर् वर्ग में पं. उर्मिलाकान्त शरण की करीब २९ पुस् तकें हिन्दी में प्रकाशित हैं। संत साहित्य की पर म्परा में पं. रामदुलारी शरण, रामकृष्ण शरण, अवध कुमार दास, रामस्नेही दास आदि का नाम आता है। कवि मोतीराम भट्ट के साथ ही गिर ीश बलम्भ जोशी तथा युवा साहित्यकार शम्भु ढुङ्गेल की कृतियाँ नेपाल के हिन्दी साहित्य की अनुपम धरोहर हैं। उन्होंने सात दशक पर्ूव प्रेमकान्ता आठ भाग और प्रेमकान्ता सन्तति १२ भाग लिखा था जो प्रकाशित है। इसके साथ ही नारायण भक्त माथेमा और मीनबहादुर राणा के नाम भी उल्लेखनीय हैं। नाथ सिद्धों की परम्परा में ही नेपाल में ‘जोशमणि’ निर्गुण सम्प्रदाय का विकास हुआ है। इस सम्प्रदाय का नेपाल में बडÞा व्यापक प्रभाव था। काठमांडू के उच्च अधिकार ी तथा स्वयं श्री ५ रणबहादुर शाह इस मत में दीक्षित हुए थे।

इस मत के हिन्दी तथा नेपाली काव्य का अन्वेषण तथा सम्पादन जनकलाल प्रा.डा. आशा सिन्हा @ नेपाल में हिन्दी भाषा, साहित्य तथा कला संस्कृति से सम्वद्ध अनुसन्धान अध्ययन का क्षेत्र विशाल तथा सम्भावनाएं अपरिमित हंै। हिन्दी ही वह कडÞी है, जो सारे देश को भाषिक रूप से जोडÞ सकती है। भौगोलिक, जातीय, सांस्कृतिक तथा धार्मिक दृष्टिकोण से भी यहां की आधी से भी अधिक आवादी हिन्दी बोलने वालों की है। फिर भी जाने अनजाने रूप से हिन्दी भाषियों के साथ दुराग्रह करना अदूरदर्शी तथा संकुचित मनोवृत्ति का परिचायक है। नेपाल में हिन्दी की ऐतिहासिक यात्रा हिमालिनी l

जनवरी/२०१४ ढ किसी भी वस्तु की सुन्दरता आपकी मूल्यांकन करने की योग्यता में छिपी हर्ुइ है। शर्मा ने परिश्रमपर्ूवक किया है। इस सम्प्रदाय का कबीरमत से सम्बन्ध की ऐतिहासिकता अब भी शोध का विषय है। जोशमणि सम्प्रदाय का काव्य भक्तिकाव्य के अर्न्तर्गत आता है। हिन्दी की भाँति ही नेपाली साहित्य का आदि काव्य वीर गाथाओं का है। नेपाली की उपलब्ध प्राचीनतम कविताएँ सुवानन्द का कवित्त तथा ‘साढ्या को कवित्त’ आदि ओजस्विता से फडÞकते हुए छन्दों में है। भाषा की दृष्टि से ये प्राचीन ‘खडÞीबोली’ हिन्दी के अत्यन्त निकट हैं। उस समय तक नेपाली भाषा का स्वतन्त्र व्यक्तित्व कायम हो चुका था। फिर भी दरवारी कविगण केवल संस् कृत और ब्रजभाषा में ही कविता लिखने में गौर व समझते थे।

उदाहरणार्थ १९वीं शताब्दी के नेपाल के बडÞे ‘पंडित’ वाणी विलास पांडेय ने नारायण हिटी शिलालेख में संस्कृत के अतिरि क्त ब्रज बोली में ही पदों की रचना की है। गुहृयेश्वरी में अमर सिंह थापा के शिलालेख में संस्कृत के अतिरिक्त व्रजभाषा में कविताएं हैं। विद्यारण्य केशरी ने तो नेपाली के साथ-साथ हिन्दी में भी काव्य रचना की है। नेपाल के चारण कवियों के वीरकाव्य का अपना महइभ्व है। जब उत्तर भारत के कविगण विलासिता के पंक में आकंठ निमग्न होकर नायिका की नख शिख छवि अवलोकन में लगे थे, तो भूषण और सुवानन्द जैसे वीर रस के कवियों ने सुदूर दक्षिण में महाराष्ट्र के शिवाजी और हिमालय की पहाडियों पर तलवार चमकाने वाले वीर पृथ्वीनारायण शाह की प्रशंसा से अपनी वाणी को पवित्र किया। इन कवित्व का भाषा, छन्द तथा अलंकार आदि की दृष्टि से अपना महइभ्व है। इसी श्रेणी में गढÞवाल के कुछ हिन्दी कवियों की नेपाल सम्बन्धी रचनाएँ भी आती हैं। गढवाल कुमाऊ सन् १७९० से १८०४ तक गोरखा राजा के अधीन था। उसी समय के कवि ‘गुमानी’ की संस्कृत तथा भाषा रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हंै। इसी तरह गढÞवाल के सुप्रसिद्ध कवि भोलाराम की नेपाल सम्बन्धी अनेक हिन्दी काव्य पुस्तकों का पता चला है।

उनकी शैली में ओजस्विता और स्पष्टवादिता का भरपूर गुण है। वे स्वयं नेपाल उपत्यका में रहते थे। उसी दौरान ‘रणबहादुर चन्द्रिका’ और ‘शमशेर जंग चन्द्रिका’ की रचना उन्होंने हिन्दी में की थी। भक्तिकाव्य के सर्न्दर्भ में जनकपुर के भक्त कवियों की रचनाएँ मिलती हंै। यहाँ के प्रसिद्ध जानकी मन्दिर, रसिक निवास र मानन्द आश्रम आदि प्राचीन साम्प्रदायिक मठों में विद्वान सन्त महन्तों की परम्परा अब तक कायम है। वे अभी तक अवधी, बज्र में काव्य र चना करते हैं। कुछ नये साधुओं ने खडÞी बोली में भी काव्य रचना की है। इनका विपुल साहित्य आश्रमों में कुछ प्रकाशित तथा अप्रकाशित रूप में मिलता है।

यहाँ के सन्तों पर रामभक्ति की श्रृंगारिक साधना का प्रभाव है। इन में सबसे प्राचीन रचना सीतायण रामायण है। सीतायण के रचयिता महात्मा सूर किशोर माने जाते हैं। वे सम्भवतः अयोध्या से मिथिला की ओर आए थे, जिसका संकेत उन्हों ने स्वयं किया है। सूर किशोर के परवर्ती रामभक्त के सखी सम्प्रदाय के कवि ‘रसिक अलि’ का मिथिला में बडÞा सम्मान है। आधुनिक काल में भी जनकपुर के स्व. र माकान्त झा, सुन्दर झा शास्त्री आदि ने हिन्दी में अच्छे काव्यों की रचना की है, जिनके कुछ अंश प्रकाशित हैं। आधुनिक काल में नेपाल में साहित्य रचना अपेक्षाकृत थोडÞी मात्रा में हर्ुइ है।

फिर भी गुण क्षेत्र विस्तार तथा शैली की दृष्टि से इनका संकलन और नई प्रवृतियों का अध्ययन फलदायक सिद्ध होगा। हिन्दी के आधुनिक साहित्य को नेपाल की महान देन स्वयं गोपाल सिंह ‘नेपाली’ को है, जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व का सम्यक मूल्यांकन आवश्यक है। नेपाल के प्रसिद्ध उपन्यासकार धूस् वां सायमी -गोविन्दबहादुर मानन्धर) ने अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त हिन्दी मंे कहानी और उपन्यास लिखे हंै। इनके अतिरिक्त भारतीय साहित्यकारों द्वार ा नेपाल के सर्न्दर्भ में लिखी गई अनेक रचनाएँ, पत्रपत्रिकाएं तथा पुस्तक के रूप में प्रकाशित हर्ुइ हैं। इनमें स्व. फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ -नेपाली क्रान्ति कथा)

श्री बलभद्र ठाकुर -नेपाल की वो बेटी) विराज -नेपालेश्वर) आदि उल्लेखनीय हंै। ये अधिकतर ऐतिहासिक सर्न्दर्भ पर आधारि त हैं। इनके द्वारा वणिर्त तथ्यों की शुद्धता और दृष्टिकोण एवं शैली की मौलिकता का विवेचन पारस्परिक पे्रम और सद्भाव को अधिक महइभ्व देगा। अनुसंधान एवं अध्ययन ही नहीं, बल्कि अन्य भी कई दृष्टियों से नेपाल हिन्दी का एक ऐसा विशाल क्षेत्र हैं, जिससे हिन्दी जगत अब तक लगभग अपरिचित सा रहा है। हिन्दी साहित्य का र्सवप्रथम परिचय महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने किया, जब उन्होंने विद्यापति की कर्ीर्तिलता एवं कुछ पदों को ढूंढÞ निकाला। वास्तव में नेपाल के तर्राई और पहाडÞ के लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान और सर्म्पर्क ने पहाडÞी क्षेत्रों में भी हिन्दी को कुछ ग्राहृय बनाया।

हिन्दी के सर्म्पर्क से नेपाली भाषा का भी बहुत विकास हुआ है और इस विकास के पीछे हिन्दी का मुख्य रूप से हाथ रहा है। हिन्दी जहाँ तर्राई को आसानी से नेपाली के निकट ले गई, वहीं पहाडÞ के लोगों के बीच सुगम ओर लोकप्रिय भी होती गई। नेपाल में प्रजातन्त्र के साथ ही हिन्दी का सम्बन्ध जुडÞा हुआ है। उसी समय में एकर् र्सवदलीय अखिल नेपाल हिन्दी रक्षा समिति का गठन हुआ था और नेपाली कांग्रेस के नेता महेन्द्र नारायण निधि उसके अध्यक्ष हुए थे। उस समिति में डा. नगेन्द्र प्रसाद सिंह, गोरखा परि षद् के डा. युगेश्वर प्रसाद बर्मा और वरिष्ठ पत्रकार उमाकान्त दास थे।

शिक्षा का माध्यम हिन्दी को न रखने की बात भी आई परन्तु हिन्दी रक्षा समिति ने इस का विरोध किया। यहाँ तक कि मोरिसस में आयोजित द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी नेपाल को आमन्त्रित नहीं किए जाने पर पत्रकार राजेश्वर नेपाली का विरोध पत्र ‘नेपाल में हिन्दी’ शर्ीष्ाक धर्मयुग में छपने के कारण उन्हें यातना भी दी गई। नेपाल में हिन्दी भाषा, साहित्य तथा कला संस्कृति से सम्वद्ध अनुसन्धान अध्ययन का क्षेत्र विशाल तथा सम्भावनाएं अपरिमित हंै।

हिन्दी ही वह कडÞी है, जो सारे देश को भाषिक रूप से जोडÞ सकती है। भौगोलिक, जातीय, सांस्कृतिक तथा धार्मिक दृष्टिकोण से भी यहां की आधी से भी अधिक आवादी हिन्दी बोलने वालों की है। फिर भी जाने अनजाने रूप से हिन्दी भाषियों के साथ दुराग्रह करना अदूरदर्शी तथा संकुचित मनोवृत्ति का परिचायक है। यहां के कवियों, लेखकों तथा चिन्तकों ने प्रारम्भ से ही हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में महइभ्वपर्ूण्ा योगदान दिया है। आधुनिक काल में भी नेपाली साहित्य के बहुत से कवियों ने हिन्दी तथा नेपाली में साथ-साथ रचनाएँ की हैं। कवि लेखनाथ पौड्याल, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा,

केदार मान व्यथित जैसे मर्ूधन्य कवियों ने कुछ रचनाएँ हिन्दी में की हैं। लोकप्रिय गीतकार गोपाल सिंह नेपाली को कौन हिन्दी प्रेमी नहीं जानता – इतना सब होते हुए भी आज इस देश में हिन्दी शिक्षा की स्थिति सन्तोषजनक नहीं है। तरार्इ मे ही नही अपितु समस्त उत्तराञ्चल तक की धार्मिक सांस्कृतिक परम्पराएँ हिन्दी से पभ्र ावित रही ह। रामचरित मानस की प्रि तया ँ आज घर-घर मे सम्मान एव ं श्रद्धा स े पजू नीय है। विद्वत् समाज से लेकर सामान्य व्यक्ति भी विशष्े ा रूप स े हिन्दी पत्र-पत्रिकाआ,ंे पस्ु तका ंे एव ं अखबारा ंे का े पढनÞ े म ंे दिलचस्पी रखत े ह।ंै रे िडया े आदि सञ्चार माध्यम म ंे हिन्दी का पय्र ागे हाते ा रहा ह।ै राणा शासन काल म ंे १९५० र्इ. स े पहल े नपे ाल म ंे कवे ल एक कालँ जे तथा कछु स्

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